राजू की पहली उड़ान

By पा.ना. सुब्रमणियन

सन १९६१, जनवरी का महीना, राजू उन दिनों कॉलेज में पढ़ता था. छोटा सा शहर. आबादी मुश्किल से २५/३० हज़ार की रही होगी. लेकिन पहले यह शहर एक देसी रियासत का मुख्यालय था. इस कारण एक हवाई पट्टी भी थी जो करीब ही थी, यही कोई २/३ कि.मी. कभी कभार ही उसका उपयोग हो पाता था. एक बार अचानक एक हवाई जहाज़ और दो हेलिकॉप्टरों ने यहाँ डेरा ही डाल दिया. दिन में काई बार हेलिकॉप्टर शहर के ऊपर से चक्कर लगाता. ढा ढा ढा ढा. यह सिलसिला चलता ही रहा. क्योंकि हेलिकॉप्टर काफ़ी नीचे से उड़ते, आवाज़ भी जोरदार होती. राजू उड़ते हुए इन हेलिकॉप्टरों को देखता. मन में एक टीस सी उठती. लोगों ने बताया कि हेलिकॉप्टर वाले आदिवासियों को बिठा कर घुमाते भी हैं.

एक दिन राजू से नहीं रहा गया. वह सीधे हवाई पट्टी की ओर निकल पड़ा. वहाँ पहुँचने पर देखा कि बड़े बड़े अफसरों, उनके परिवार की महिलाओं, बच्चों आदि को हवाई जहाज़ पर बिठाया जा रहा है. थोड़ी देर में जहाज़ ने उड़ान भरी. आधे घंटे में लौट कर भी आ गयी. सब उतर गये. घुमाने का यह सिलसिला भी छोटे छोटे समूहों में २/३ बार चला. अब राजू तिलमिला रहा था. काश वह भी किसी अफ़सर का बेटा होता. उस दिन  राजू दिल छोटा कर वापस आ गया. उसने फिर इस कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठी कर ली. पता चला कि क्षेत्र के वन संसाधनों के आंकलन के लिए पूरे जिले का हवाई सर्वेक्षण किया जा रहा है, जिसका नाम था “प्री इनवेस्टमेंट सर्वे ऑफ फोरेस्ट रिसोर्सस” (वन संसाधनों का निवेश-पूर्व सर्वेक्षण).  यह राष्ट्र संघ तथा भारत सरकार के  वन (केंद्रीय) विभाग द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित था. जहाज़ और हेलिकॉप्टर भी विदेश से ही आए थे और उनको चलाने वाले पाइलट भी विदेशी थे. जहाज़ में उच्च क्षमता वाले कॅमरा लगे हुए थे जो जंगलों के ऊपर से चित्र खींचते. चित्रों का बारीकी से अध्ययन किए जाने के लिए “फोटो इंटर्प्रेटेशन इन्स्टिट्यूट” भेजा जाता जो देहरादून में स्थित थी. अब आजकल तो यही काम उपग्रहों के माध्यम से किया जाता है.

एक रविवार के दिन सुबह से ही हेलिकॉप्टर और जहाज़ शहर के ऊपर मंडराते रहे, राजू के दिल में उड़ने की इक्षा फिर छलाँग लगाने लगी. ना मालूम उसके मन में क्या बात उठी, उसने सायकल उठाई, पड़ोस के एक छोटे लड़के को पीछे बिठा लिया और चल पड़ा, हवाई पट्टी की ओर. वहाँ जाने पर लगा जैसे कोई मेला लगा हो. उत्सुक लोग पट्टी के किनारे कतार में खड़े थे. जहाज़ से लोग उतारे जा रहे थे. केंद्रीय वन विभाग के अधिकारियों के बीबी बच्चे हवाई सफ़र का आनंद उठा रहे थे. राजू भी भीड़ के बीच से घुस कर सामने जाकर खड़ा हो गया. धूप कुछ तेज थी इसलिए राजू ने धूप का चश्मा पहन रखा था.

जहाज़ में लोगों को चढ़ाने उतारने की देख रेख एक बुजुर्ग अंग्रेज कर रहा था. एक बार और जहाज़ ने उड़ान भरी. क्योंकि उसके वापसी में अभी देर थी इसलिए वह बुजुर्ग अंग्रेज भीड़ से दूर एक किनारे जाकर खड़ा हो गया था. राजू के मन में कई विचार आते जाते रहे. फिर एकाएक कुछ विचार कर वह उस बुजुर्ग अंग्रेज के पास जाकर खड़ा हो गया. राजू को अँग्रेज़ी आती थी क्योंकि पिताजी ने मार मार के सिखाया जो था. धीरे धीरे अंग्रेज के एकदम नज़दीक जा पहुँचा और बातचीत करने की कोशिश की. राजू भूगोल का अच्छा जानकार था. बुजुर्ग से पूछ ही लिया कि वो कहाँ के हैं. उसने कहा, कनाडा. राजू ने फिर पूछा ओट्टावा? जवाब मिला नहीं वांकोवर. बड़ा सुंदर शहर है, राजू की टिप्पणी थी. क्या आप जानते हो. राजू ने फिर जवाब दिया हाँ, वहाँ मेरा एक पेन फ़्रेंड है. इस तरह परिचित होकर राजू अपने वास्तविक उद्देश्य के करीब पहुँच चुका था. लेकिन कैसे कहे कि मुझे भी उड़ना है. उसने एक तरकीब सोची. उस बुजुर्ग से कहा, जहाज़ में बैठने पर डर नहीं लगता क्या?. बड़े आश्चर्य की बात है कि छोटे छोटे बच्चे भी घूम के आ रहे है?. बुजुर्ग ने कहा, ऐसा कुछ नहीं है. इस बीच जहाज़ वापस आ गया और राजू बुजुर्ग को छोड़ जहाज़ के करीब, हवाई पट्टी के किनारे, सामने खड़ा हो गया.

जहाज़ के खाली हो जाने के बाद अंग्रेज बुजुर्ग खड़े हुए लोगों के सामने से दो बार गुजरा मानो किसी को ढूंड रहा हो. राजू का मन उछलने लगा. उसे अचानक इस बात का आभास हुआ कि उसने अपने चश्मे उतार दिए थे. झट जेब से चश्मा निकाल कर पहन लिया. राजू ने स्थिति को समझने में कोई ग़लती नहीं की थी क्योंकि तीसरी बार उस अंग्रेज बुजुर्ग ने राजू को पहचान कर अपने साथ जहाज़ की ओर लेगया. दरवाज़ा खोलकर अकेले राजू को बिठा दिया. कुछ देर तक पाइलट से बुजुर्ग ने बात की थी और कुछ निर्देश भी दिए. अब राजू जहाज़ के अंदर था, अकेले. जगह कम थी, केवल बेंच नुमा आमने सामने दो सीट थे. रेल गाड़ी के सीट की तरह हल्के गद्दे वाले. कुल तीन दूनी छै लोगों के बैठने की व्यवस्था थी. दोनो सीटों के बीच एक बड़ा कॅमरा ही तो था जिससे ये लोग ज़मीन की तस्वीर लिया करते थे. दोनो ओर एकदम पारदर्शी दरवाज़े थे. कुछ देर में ही जहाज़ हवाई पट्टी पर रेंगते हुए चल पड़ी. फिर एकदम रफ़्तार बढ़ गयी और अब तो हवाई पट्टी के ऊपर उड़ ही रही थी. कुछ दूर जाने पर खेत सॉफ दिख रहे थे. ऊँचाई एकदम कम थी. राजू ने देखा की एक चरवाहा खेतों में बहुत सारे गाय बैल चरा रहा था. अचानक वह दौड़ने लगा, अपनी जान बचाने, साथ मे उसके जानवर भी. उन्हें लगा कि ये कौनसी आफ़त आ गयी. पाइलट ने बदमाशी की थी. जानबूझ कर जहाज़ को कम उँचाई पर उड़ा रहा था. राजू हंसते हंसते लोटपोट हुआ जा रहा था.

अब जहाज़ को घुमाया जा रहा था. वापस फिर हवाई पट्टी पर उतरा लेकिन गति कम करने की जगह और बढ़ा दी. पट्टी के छोर से एका एक सीधे ऊपर की ओर उठा. राजू ने संभलने की कोशिश में इधर उधर पकड़ने की कोशिश की. पर पकड़ने के लिए कुछ था ही नहीं. ऊपर कोने में एक हॅंडल नुमा काले रंग की तार दिखी. उसे ही पकड़ लिया. फिर ख़याल आया कि कहीं एंजिन से उसका संबंध ना हो इसलिए तुरंत छोड भी दिया. कोई दूसरा चारा ना देख सीट के किनारों को ही कस के पकड़ रखा. ऊपर से नीचे, दाएँ, बाएँ मोड्ते हुए पाइलट कालाबाज़ियाँ दिखाने में मस्त था. इधर राजू की आफ़त. बगल के दोनो दरवाज़ों पर कोई भरोसा भी नहीं किया जा सकता था. ना मालूम कब खुल पड़े. फिर क्या होगा. ऐसा भी क्या रोमांच कि सीधे राम नाम सत्य हो जावे. राजू ने चीखने की कोशिश की थी पर जहाज़ की आवाज़ में सब बेकार साबित हो रही थी. अंततोगत्वा, वह घड़ी आई जब पुनः हवाई पट्टी पर जहाज़ स्थिर हुई. राजू की जान में जान आई. बुजुर्ग अंग्रेज ने दरवाज़ा खोला और राजू सीधे नीचे कूद पड़ा.

जिस बुजुर्ग ने राजू के उड़ने की इक्षा पूर्ति करवाई थी, उसे धन्यवाद दे राजू सायकल पर सवार हो सीधे घर भागा. बेचारे की पेंट जो गीली हो गयी थी.

11 Responses to “राजू की पहली उड़ान”

  1. Shastri JC Philip Says:

    राजू के हिम्मत की दाद देते हैं. उम्मीद है कि इसके बाद कभी कपडे इस तरीके से गीले न हुए होंगे!!

  2. Satish Pancham Says:

    रोचक पोस्ट।

  3. मनीष Says:

    raju ki ye udaan rochak rahi

  4. राज भाटिया Says:

    बहुत ही सुन्दर लगी राजू की कहानी.
    धन्यवाद

  5. ताऊ रामपुरिया Says:

    पहली बार यहाँ आया ! पढ़कर अभिभूत हूँ ! बहुत धन्यवाद !

  6. Anunad Singh Says:

    अभी तक पुरातत्व आदि विषयों पर केवल शास्त्रीजी हिन्दी में लिखते रहे हैं। आपके आने से हिन्दी में इन विषयों पर लेखन को बल मिलेगा। ‘संरक्षण’ वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता और परम धर्म है और इसके लिये जागरूकता लाना हम सबका कर्तव्य!

  7. Dr.Arvind Mishra Says:

    राजू की कहानी पढ़ कर मजा अ गया !

  8. yoginder moudgil Says:

    Wah DADA
    mazaa aa gaya

  9. limit Says:

    ” really very adventerous and mind blowing story, in childhood every body is anxious to have a plane ride like this, i too remember when we use to see plane flying till it disappers from our eyes, it was very enjoyable full of cureousty even..” nice to read.

    Regards

  10. आदर्श राठौर Says:

    अच्छी कहानी है

  11. सतीश सक्सेना Says:

    पहली बार आपका ब्लाग देखा ! आप अच्छा लिखते हैं !

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