Archive for December, 2008

क्या हम भी रामलाल बनें

December 31, 2008

hornet-nestरामलाल वर्षों से भवन निर्मण से जुड़े ठेकेदार के साथ मिस्त्री का काम करते करते जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका था. उसे लगने लगा कि अब आराम करना चाहिए. बीबी बच्चों, नाती पोतों के साथ आराम से रहूँगा. उसने अपने मन की बात अपने मालिक से बताई. एक अच्छे कारीगर को सेवा से निवृत्त कर उसे खो देने का ठेकेदार को दुख था. लेकिन यह तो एक दिन होना ही था. उसने कुछ सोचा और मिस्त्री को बुलाकर कहा, चलो अब जाते जाते एक घर मेरे कहने पर बना दो.

रामलाल वैसे तो मन से नहीं चाहता था कि अब और कोई काम किया जाए, पर उसने अपने मालिक की बात रख ली. इस आख़िरी काम को जल्द निपटाने के लिए उसने काम शुरू भी कर दिया. जैसा कि ऐसी स्थितियों में देखा गया है, रामलाल का मन काम में लगता नहीं था. लेकिन क्या करे, काम को पूरा करना ही था इसलिए जैसे तैसे कुछ महीनों में ही एक काम चलाऊ घर बना ही डाला. घर के बन जाने के बाद ठेकेदार ने उसका निरीक्षण किया फिर रामलाल को बुला कर उस घर की चाबी उसे ही  सौंपते हुए कहा “लो अब यह घर तुम्हारे ही लिए है, मेरी तरफ से उपहार.”  यह सुन रामलाल सकते में आ गया. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो अपना ही घर बना रहा है. उसने बड़ी शर्मिंदगी महसूस की. पहले से पता होता कि उसे ही उसमे रहना है तो वह एक बेहतरीन घर बनाता.

ऐसे ही विचारों से घिरे रहकर जीवन में हम बहुत से कार्य करते हैं. जब बात स्वयं पर आकर रुकती है, तभी हमें आभास होता है. अतः सब हम पर ही है. हम अपने जीवन के ताने बाने बुनते ही रहते हैं. निर्माण चलता रहता है. इस निर्माण में हम अपनी क्षमता का अंश मात्र ही  प्रयोग में लाते हैं. झटका तब लगता है जब पता चलता है, अरे यह तो हमारे लिए ही था. हमने ही तो बुना/गढ़ा. काश पहले से मालूम होता तो इसे बेहतर बनाते.

अब बुनने/गढ्ने के लिए वापस जाना संभव नहीं है. हमने अपनी नियति का ही तो निर्माण कर लिया. हम सब रामलाल की तरह ही हैं. जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण और जो चयन हम आज कर रहे हैं उसी से तो अपना घरोंदा बनेगा.

इसी बात पर हमें एक और लघु कथा याद आ रही है:

दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज़ का चित्र बनाना चाहता है एक चित्रकार. सबसे पहले एक पंडित से पूछता है कि सबसे सुंदर कौन सी चीज़ है. पंडित ने कहा ‘विश्वास’, वह तुम्हें हर पूजा स्थल पर मिलेगा.

एक नयी नवेली दुल्हन ने कहा “प्रेम”. यह ग़रीबी में भी अमीरी का एहसास कराती है (सर्दी में गर्मी का भी !), आँसुओं को मीठा बनाती है, थोड़े को भी ज़्यादा बना देती है, इसके बगैर तो कोई सौंदर्य है ही नहीं.

एक सिपाही ने कहा ‘सौंदर्य’ तो ‘शांति’ में ही है. युद्ध तो विकृति है. इसलिए जहाँ शांति है वहीं सौंदर्य भी है.

विश्वास, प्रेम और शांति, इन्हें मैं कैसे चित्रित करूँ, असमंजस में पड़ जाता है चित्रकार.

अपने घर जाता है. अपने बच्चों की आँखों में उसे विश्वास दिखता है, पत्नी की आँखों में प्रेम और अपने ही घर में प्रेम और विश्वास द्वारा बनी शांति को महसूस करता है.

पारंपरिक

आप के घरोंदे में अमन चैन और संपन्नता लेकर आवे आने वाला नव वर्ष – इन्ही शुभकामनाओं के साथ

 

 

कुणाल ने अपनी आँखें फोड़ लीं

December 24, 2008

kunalहम भारत वासियों के सौंदर्यबोध की कोई मिसाल नहीं है और हमे इसके लिए तो गर्वित होने का हक बनता है. मानवीय शरीर के विभिन्न भागों की तुलना प्रकृति में पाए जाने वाले पेड़ पौधों, पुष्पों, मृगों, पक्षियों आदि से कर आनंदित होने की परंपरा अपने यहाँ रही है. ब्रहुब्रीहि समास की यह व्यापकता तो भारतीय नामों में ही दिखेगी.  मृगनयनी, राजीवलोचन, कमलनयनी,  पंकजाक्षी और ना जाने कितने ही और.    हिमालय की तराइयों में पाया जाने वाला एक पक्षी है “कुणाल”. इस पक्षी की आँखों से प्रेरित होकर ही सम्राट अशोक ने अपने एक पुत्र का नाम ‘कुणाल’ रख दिया होगा क्योंकि उस बालक के नयन भी कुणाल पक्षी के सदृश रहे होंगे.

बौद्ध ग्रंथों में कुणाल की कहानी मिलती है. ‘कुणाल अवदाना’ के अनुसार पाटलीपुत्र के सम्राट अशोक की अनेकों रानियाँ थीं. उनमे से एक थी पद्मावती (जैन मतावलंबी) जिस का पुत्र कुणाल था. कहीं उसे वीर कुणाल कहा गया है और कहीं उसे ‘धर्म विवर्धना’ कह कर संबोधित किया गया है. कुणाल की आँखें सुंदर तो थी हीं, उनमे लोगों को सम्मोहित करने की भी विशेषता थी. ऊर्जा से भरा पूरा गठीला बदन उसके पौरुष की पहचान थी. उसकी अनेकों विमाताओं में एक तिश्यरक्षा भी थी, बूढ़े अशोक की युवा रानी, जिसके सौंदर्य के आगे अप्सराएँ भी शर्मा जाएँ.  तिश्यरक्षा कुणाल की आँखों के सम्मोहन से  मोहित हो गयी. उसके प्रेम के लिए इतनी आतुर हो गयी की एक दिन कुणाल को अपने कक्ष में बुलाकर अपने बहुपाश में जकड लेती है और प्रणय निवेदन करने लगती है. कुणाल किसी तरह अपने आप को अलग कर, अपनी विमाता को धिक्कारते हुए, कलंकित होने से बच निकलता है.  इस प्रकार तिरस्कृत किया जाना तिश्यरक्षा के लिए असहनीय था. क्रोध से काँपते हुए अपनी शैय्या में गिर कर लोटने लगती है. कुछ देर बाद सहज होकर ध्रिड निश्चय करती है कि वह उन आँखों से बदला लेगी जिसने उसे आसक्त किया था.

कुछ दिन बीत गये. तक्षशिला से समाचार मिला कि वहाँ का राज्यपाल (संभवतः तिश्यरक्षा  के कहने पर) बग़ावत पर उतारू है. उसे नियंत्रित करने के लिए सम्राट अशोक ने अपने पुत्र कुणाल को चुना. कुणाल अपनी पत्नी कंचनमाला को साथ ले, जिसके प्रति वह पूर्ण निष्‍ठावान था, एक सैनिक टुकड़ी के साथ तक्षशिला की ओर कूच कर गया. इधर सम्राट अशोक अपने प्रिय पुत्र कुणाल के विरह में बुरी तरह बीमार पड़ गया. तिश्यरक्षा की देखभाल और दिन रात की सेवा से सम्राट अशोक पुनः स्वस्थ हो गया. सम्राट ने प्रतिफल स्वरूप तिश्यरक्षा  को एक साप्ताह तक  साम्राज्ञी के रूप में साम्राज्य के  एकल संचालन के लिए अधिकृत कर दिया.

तिश्यरक्षा ने इस अवसर का फायदा उठाना चाहा और तक्षशिला के राज्यपाल को निर्देशित किया कि वह कुणाल की आँखें निकाल दे. यह पत्र धोके से कुणाल के हातों पड़ गया और अपनी विमाता की इक्षा पूर्ति करते हुए उसने स्वयं अपने ही हाथों अपनी आँखें फोड़ लीं. कंचनमाला  अंधे कुणाल को साथ लेकर वापस पाटलीपुत्र पहुँचती है. सम्राट अशोक को तिश्यरक्षा के षड्यंत्र की कोई जानकारी नहीं रहती. वह तो केवल यही जनता था कि उसका प्रिय पुत्र अब अँधा हो गया है. अपने पुत्र की दयनीय अवस्था को देख सम्राट की आँखों से अनवरत अश्रु धारा बहने लगती है. कुणाल को अपनी विमाता से कोई द्वेष नहीं था और उसके मन में उसके प्रति आदर भाव यथावत रहा. कुणाल की निश्चलता के कारण कालांतर में उसे उसकी दृष्टि वापस मिल जाती है.

एक और कहानी के अनुसार सम्राट अशोक अपने आठ वर्षीय पुत्र कुणाल को लालन पालन एवं विद्यार्जन के लिए उज्जैन भेजता है. वह कुणाल के भावी गुरु को प्राकृत में पत्र लिखता है और शिक्षा प्रारंभ करने के लिए “अधियव” शब्द का प्रयोग करता है. तिश्यरक्षा उस पत्र को पढ़ती है और अपने स्वयं के पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की नीयत से  “अधियव” शब्द को परिवर्तित कर “अन्धियव” कर देती है. अब इस से आशय यह बनता है कि कुणाल अंधत्व को प्राप्त हो. यहाँ भी पत्र युवा कुणाल के हाथों मे लग जाता है और वह स्वयं अपने ही हाथों से अपने आँखों की पुतलियाँ निकाल देता है.

अशोकवदना” के अनुसार कहानी का अंत कुछ भिन्न है. जब सम्राट अशोक को सही जानकारी मिलती है तो वह अपने प्रधान मंत्री यश की सलाह पर तिश्यरक्षा को जिंदा ही जलवा देता है. एक बौद्ध भिक्षु “गॉश” या “घोष” की चिकित्सा से कुणाल को अपनी दृष्टि वापस मिल जाती है. कहा जाता है कि पूर्व जन्म में कुणाल ने ५०० हिरणों की आँखें ली थीं जिसका फल उसे भुगतना पड़ा था.

एक और कहानी के अनुसार अँधा कुणाल वर्षों बाद अशोक के दरबार में एक संगीतकार के रूप में पहुंकता है और अपने गायन से सम्राट को प्रसन्न कर देता है. सम्राट इस गायक से अपने लिए उपहार चुनने के लिए कहता है जिसके उत्तर में गायक कहता है “मै कुणाल हूँ, मुझे साम्राज्य चाहिए”. अशोक दुखी होते हुए कहता है कि अंधत्व के कारण तुम अब इस योग्य नहीं रहे. तब कुणाल बताता है कि साम्राज्य उसे नहीं वरन उसके बेटे के लिए चाहिए. आश्चर्य से अशोक पूछता है कि तुम्हे पुत्र कब हुआ. “संप्रति” अर्थात अभी अभी और यही नाम कुणाल के पुत्र का रख दिया गया. उसे अशोक का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया गया हालाकि अभी वह गोद में ही था. ऐसा कहा जाता है कि कुमार कुणाल ने मिथिला में अपना राज्य स्थापित किया था. भारत – नेपाल सीमा पर कोसी नदी के तट पर वर्तमान कुनौली ग्राम ही कभी कुणाल की नगरी रही होगी.

 

चित्र: विकीमीडीया कामन्स