केरल की सांस्कृतिक राजधानी थ्रिस्सूर (त्रिचूर) से २९ किलोमीटर उत्तर पश्चिम में एक नगर है ‘गुरुवायूर’ जिसे दक्षिण का द्वारका भी कहा जाता है. कहा जाता है कि जब भगवान श्री कृष्ण के स्वर्गारोहण का समय आया और द्वारका के अस्तित्व पर भी संकट छाने लगा तो चिंता हुई कि श्री कृष्ण जी के द्वारा पूजित विष्णु जी की प्रतिमा का क्या किया जावे. आचार्य बृहस्पति (गुरु) से परामर्श किया गया और उन्हें यह दायित्व दिया गया कि वे उस प्रतिमा को कोई अन्य पुण्य स्थल ढूँढ कर वहां स्थानांतरित कर दें. बृहस्पति जी को वायु का साथ मिला. दोनों मिलकर प्रतिमा सहित निकल पड़े. परशुरामजी ने पश्चिमी तट पर समुद्र से एक बड़ा भूभाग छीन लिया था अतः उन्होंने अपने यहाँ आने का निमंत्रण भिजवा दिया. वहां पहंचने पर एक सरोवर जो सुन्दर कमल के फूलों से भरा पडा था, दिखाई दिया. वहीँ भगवान् शिव भी अपने तप में तल्लीन थे. शिव जी ने बृहस्पति से कहा कि यह जगह ही तो नारायण के लिए सर्वोत्तम है. मूर्ती को यहीं स्थापित कर दें. यह कह कर वे अपना दंड कमंडल ले दूसरे छोर पर ‘मम्मियूर’ में अपनी धूनी जमा ली. इस तरह श्री कृष्ण जी के द्वारा पूजित विष्णु जी की स्थापना उस सरोवर के तट पर की गयी थी और उस स्थल का नाम पड़ा गुरु + वायु + उर = गुरुवायूर.
भले ही गुरुवायूर में भगवान् विष्णु की स्थापना की गयी थी परन्तु यहाँ उनकी आराधना कृष्ण के रूप में ही होती है. मंदिर के मुख्य द्वार पर भी मलयालम में लिखा मिलेगा “ॐ नमो नारायणा”. मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के बारे में अधिक कुछ जानकारी नहीं है. केवल इतना मालूम है कि सन १६३८ में इसका पुनर्निर्माण अथवा जीर्णोद्धार हुआ था. हर कोई यही कहेगा की मंदिर तो ५००० वर्ष पुराना है. शून्य का अंक हमने ही ईजाद किया था और शायद इसी के कारण उसके प्रयोग में हम कोई कंजूसी नहीं बरतते. आप किसी भी मंदिर आदि में जाएँ तो जो इतिहास बताया जायेगा वह हजारों वर्ष में होगा. हम भी मान जाते हैं. आखिर आस्था का जो प्रश्न है.
अब क्योंकि आस्था की बात आई तो बता दें कि केरल में वैसे तो बहुत सारे आस्था के केंद्र हैं परन्तु गुरुवायूर मंदिर से अधिक महत्त्वपूर्ण कोई दूसरा मंदिर नहीं है. रोज ही हजारों की संख्या में लोग यहाँ दर्शन के लिए दूर दराज से आते हैं. कुछ ख़ास दिनों में तो आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है और वहां तिल रखने को जगह नहीं होती. ऐसा कोई हिन्दू घर न होगा जहाँ के पूजा गृह में गुरुवायूर के कृष्ण जिन्हें ‘गुरुवायुरप्पन’ के नाम से पुकारा जाता है, विराजमान न हों. कई घरों में घुसते हुए दरवाजे के ऊपर आप मलयालम में “नारायणा” लिखा हुआ देख सकते हैं. हर कोई उन्हें ही नमन करता है और हर शुभ/मंगल कार्य उनके सानिध्य में करने में ही लोग विश्वास रखते हैं, जैसे बच्चों का अन्नप्रासन, उपनयन आदि. शादियों के मौसम में यहाँ विवाह भी संपन्न कराया जाता है. विवाह कहीं दूर हुआ हो तो नव दम्पति अनिवार्यतः सर्वप्रथम गुरुवायुर दर्शन के लिए आते ही हैं. मंदिर में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं लगता परन्तु केवल हिन्दू ही प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं. प्रवेश के लिए पुरुषों को धोती पहननी होती है और वक्ष स्थल खुला रखना पड़ता है. महिलाओं के लिए साडी ग्राह्य है. लड़कियों के लिए पहले लहंगा और ब्लाउस निर्धारित था परन्तु अभी दो साल पहले मंदिर प्रशासन ने सलवार कमीज़ के लिए अपनी स्वीकृति दे दी है. अलग अलग अनुष्ठान के लिए दरें तय कर दी गयीं हैं और आपको भुगतान कर रसीद प्राप्त करना भर होता है. लेकिन कोई भी गर्भ गृह के अन्दर का अनुष्ठान आपके सम्मुख या आपकी उपस्थिति में हो पाना अकल्पनीय है. वहां तो निरंतर पूजा होती ही रहती है. आप दर्शन कर बाहर से प्रसाद भर प्राप्त कर सकते हैं. मंदिर की ओर से निःशुल्क मध्याह्न भोजन की व्यवस्था भी है परन्तु शुद्ध दक्षिण भारतीय. रोटियों के लिए तो आपको बाहर ही तलाशना पड़ेगा. हमारे दृष्टिकोण में कोई भी उत्तर भारतीय केरल के लोगों की गुरुवायुरप्पन के प्रति विद्यमान आस्था की गहराई को सहजता से समझ नहीं सकता. वे उनके कुलदेव की तरह जीवन के हर क्षण स्मरण किये जाते हैं.
जैसे हमने पूर्व में ही कहा है, मंदिर में तो वास्तविक प्रतिष्ठा (विराजमान मूर्ति) विष्णु जी की है परन्तु उन्हें चन्दन की घिसी लेई से कृष्ण जी का रूप दिया जाता है. दिनभर में वे नाना रूप धरते हैं. प्रातः वे बाल रूप में दिखेंगे और धीरे धीरे युवा होते जायेंगे. गर्भगृह के द्वार कई बार बंद होकर खुलते हैं. कभी प्रभुजी नहा रहे होते है, कभी नाश्ता कर रहे होते है और कभी विश्राम कर रहे होते हैं. जब जब भी दरवाज़ा खुलता है, भक्त गणों की सामूहिक पुकार सुनाई देती है, “केशवा, नारायणा” और सर्वस्व भुला कर प्रभु के एक झलक के लिए लोग उतावले हो जाते हैं. हम भी इस माहौल में कहीं खो से जाते हैं.
इसी मंदिर के प्रांगण में बैठकर संस्कृत में एक महाकाव्य “नारायणीयम” की रचना की गयी थी. इसके रचयिता रहे १६ वीं सदी के महान मेलपतुर नारायण भट्टातिरी जो वात रोग से पीड़ित थे और इस १००० श्लोकों से युक्त भगवान् विष्णु के दसों अवतारों के गुण गान के बाद वे स्वस्थ भी हो गए. उसी काल में एक और महान कृष्ण भक्त हुए जिन्हें ‘पूंथानम’ पुकारा जाता है. इनकी सरल मलयालम भाषा में सबसे महत्वपूर्ण रचना थी “ज्ञानपना” जिसका शाब्दिक अर्थ होता है “ज्ञान से भरा मटका”. पूंथानम को केरल के भक्ति मार्ग के प्रवर्तकों में उच्चतम स्थान प्राप्त है. अपने इस ग्रन्थ के माध्यम से उन्होंने लोगों के दैनिक जीवन के लिए दिशा प्रदान की. उसी काल में कुछ अन्य कृष्ण भक्त जिन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई उनमे एक कुरुर इल्लम की कुरुर अम्मा और दूसरे स्वामी विल्वमंगल भी रहे. इनके बारे में लोग बात करते नहीं थकते.
सर्वप्रथम गुरुवायूर के मंदिर में ही कृष्ण की लीलाओं पर आधारित नृत्य नाटिका “कृष्ण आट्टम” का शुभारम्भ हुआ था जो आगे चलकर केरल के जगप्रसिद्ध “कथकली” के लिए आधार बना. वैसे तो इस मंदिर में उत्सव पुण्य तिथियों पर होता ही है परन्तु वर्ष में फरवरी – मार्च के महीने में एक दस दिनों का उत्सव होता है. इस अवधि में हर रोज नृत्य, गायन, वादन आदि के अति विशिष्ट कार्यक्रम होते हैं. प्रसिद्ध गायक येसुदास ईसाई होते हुए भी कृष्ण भक्तों में एक हैं. भले ही उन्हें मंदिर के अन्दर प्रवेश न मिलता रहा हो, वे कृष्ण जी की प्रतिष्ठा में बाहर के मंच से ही अपने भजन कार्यक्रम देते हैं.
वास्तव में हमने आप सब को एक निराले हाथी दौड़ के बारे में बताने की सोची थी जो हर वर्ष गुरुवायूर में संपन्न होता है. लेकिन लगता है कि उस नटखट कन्हैय्या ने हमें भटका दिया और विविश कर दिया कि पहले आप सब को गुरुवायूर के बारे में और उस नटखट की महिमा से अवगत करा दूँ. अब क्योंकि बहुत कुछ लिखा जा चुका है, हम अपने मूल प्रयोजन की ओर लौटते हैं. जैसा पहले हमने बताया था, हर वर्ष गुरुवायूर में १० दिनों का एक उत्सव फरवरी – मार्च में होता है. इस उत्सव के पहले दिन ही हाथियों की दौड़ आयोजित की जाती है. इस तरह की दौड़ के आयोजन के पीछे भी एक कहानी है. एक जगह हुआ करती थी ‘त्रिकन्नवाय’ या ‘त्रिकन्नमदिलगम’ जो गुरुवायूर और कोडूनगल्लुर के बीच था. एक समय था जब गुरुवायूर इस त्रिकन्नवाय के आधीन रहा. वहां भी वार्षिक उत्सव हुआ करता था लेकिन गुरुवायूर उत्सव के दो दिन पूर्व ही समाप्त हो जाता था. वहां के उत्सव की समाप्ति के बाद हाथियों का झुंड गुरुवायूर के लिए निकल पड़ता था. एक बार त्रिकन्नवाय से हाथियों को नहीं भेजा गया क्योंकि शुल्क की अदायगी नहीं हुई थी. परन्तु हाथियों ने स्वविवेक से काम लिया और अपने जंजीरों को तोड़ कर गुरुवायूर भाग निकले. इसी स्मृति में गुरुवायूर में हर वर्ष हाथियों की दौड़ आयोजित की जाती है. त्रिकन्नवाय सन १७५५ में डच लोगों के द्वारा नष्ट कर दिया गया था.

इस दौड़ में लगभग ४० हाथी हिस्सा लेते हैं. वे सब सर्वप्रथम मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार से आधा किलोमीटर दूर ‘मंजुलाल’ के पीपल के पेड़ तले इकट्ठे होते हैं और वहां से दौड़ लगाते हैं. मुख्य द्वार से मंदिर के अन्दर प्रवेश कर ७ चक्कर लगा जो हाथी पहले ध्वज स्तंभ को अपने सूंड से छू लेता है वही विजयी घोषित किया जाता है. इसके बाद दस दिनों तक वही विजयी हाथी प्रभु की सेवा में बना रहता है. इस दौड़ को ‘आनयोट्टम’ कहते हैं. इस प्रकार के आनयोट्टम और भी कई जगह होते हैं परन्तु गुरुवायूर का यह आयोजन अधिक ख्याति प्राप्त है. ये सभी हाथी मंदिर के ही हैं. गुरुवायूर मंदिर के पास आज लगभग ६५ हाथी हैं और इन सबका आरामगाह “पुन्नाथूर कोटा” कहलाता है जो लगभग २५ एकड़ के भूभाग पर फैला हुआ है. यह कभी राज प्रसाद था और ५०० वर्ष पुराना भी है. यहाँ हाथियों को वर्ष में एक बार एक माह पूरे आराम के साथ चिकित्सा होती है बिलकुल उसी तरह जैसे हम लोग केरल के किसी प्रसिद्ध आयुर्वेदिक आरोग्य-आश्रम में अपने स्वयं की कराते हैं. इसे देखना भी एक अलग अनुभव होता है.
गुरुवायूर वैसे थ्रिस्सूर से रेल द्वारा भी जुड़ा हुआ है. तैरने के लिए बहुत ही अच्छे होटेल आदि उपलब्ध हैं परंतु रोटी सब्जी के लिए थोड़ी कठिनाई हो सकती है. लोग अक्सर यहाँ शाम को ही पहुँच जाते हैं और संध्या कालीन दर्शन के बाद प्रातःकालीन प्रथम दर्शन के लिए ही वहाँ रात रुक जाते हैं. गुरुवायूर के कृष्ण के दर्शन के बाद शिव जी के दर्शन के लिए ‘मम्मीयूर’ भी जाना आवश्यक है जो करीब ही है और पैदल ही जाया जा सकता है. गुरुवायूर के करीब अरब महा सागर भी है परन्तु समुद्री तट पर रेत के (बीच) न होने से लोगों में लोकप्रिय नहीं है.
April 13, 2009 at 6:45 am
वाह ,बहुत सुंदर जानकारी और चित्र .हाथियों की यह दौड़ तो बहुत रोमांचक है .
April 13, 2009 at 9:01 am
दक्षिण के द्वारका के बारे में जानकारी अच्छी लगी । धन्यवाद ।
April 13, 2009 at 9:17 am
सजीव चित्रण .
रोचक जानकारी .
सुन्दर अभिव्यक्ति
April 13, 2009 at 9:19 am
Bahut Sunder jaankari tatha Elephant Race sounds fantastic !!
” “केशवा, नारायणा” ” ..Jai Ho !!
April 13, 2009 at 9:35 am
इस परंपरा से अवगत कराने के लिए आभार।
April 13, 2009 at 10:01 am
बहुत ही विस्तृ्त और रोचक जानकारी, हाथियों की दौड़ के बारे मे पहले भी पढ़ था लेकिन इतनी जानकारी कभी नहीं मिली, धन्यवाद!!
April 13, 2009 at 10:09 am
केरल के बारे में आपके ब्लॉग पर पढ़ कर ही एक उत्सुकता जगी है की केरल एक दर्शनीय स्थल है और वहां जाना चाहिए ….मनमोहक द्रश्य….हाथियों की यह दौड़ और विविध जानकारी बरबस ही आकर्षित करती है.. आभार
regards
April 13, 2009 at 10:21 am
सुन्दर जानकारी.
April 13, 2009 at 10:26 am
आपने तो सीधे केरल ही पहूंचा दिया था।सजीव चित्र खींचा आपने। हाथियो पर मैं भी बहुत दिनो से लिखना चाह रहा हूं पर किसी कारण से वो टल रहा है। आपकी पोस्ट के नाम का पुरा- ऐतिहासिक महत्व का गांव है यंहा छत्तीसगढ मे।मल्हार को कभी हाथी के व्यापार का केन्द्र भी माना जाता था।फ़िल्हाल तो हाथी यंहा जमकर उत्पात मचा रहे हैं।
April 13, 2009 at 10:31 am
सुन्दर और रोचक विवरण.शुन्य वाली बात आपने बिलकुल सही कही है
April 13, 2009 at 10:36 am
dhanyavad PNS jee,
pichale nivedan kee itnee jhatpat manbhavan aapoorti !
April 13, 2009 at 11:02 am
बहुत मनोरंजक और भव्य -इस हाथीदौड़ आयोजन के क्या कहने!
April 13, 2009 at 12:09 pm
तैरने के लिए अच्छे होटल को ठीक करें। सचित्र जानकारी देना बहुत अच्छा रहा। आप शून्य की बात करते हैं। संस्कृत में सारी गणित शब्दों में व्यक्त की गई है। मुझे आज तक सहस्र का अर्थ समझ नहीं आया।
April 13, 2009 at 12:43 pm
बहुत सुंदरतम जानकारी.
रामराम.
April 13, 2009 at 12:44 pm
लगभग 10 वर्ष पूर्व गुरुवायूर देखा था, तभी से मन में बसा हुआ है। आपने एक बात का उल्लेख नहीं किया जो हमें सर्वाधिक प्रिय लगी। इस मन्दिर में हजारों दीप प्रतिदिन प्रज्वलित होते हैं। हम इसे देखने के लिए जब लाइन में लगे थे तब मोटे रूप में हमने पंक्तियों के हिसाब से दीपक गिने थे, हमें लगा था कि ये दीपक आठ से दस हजार तक होने चाहिए। इनकी देखभाल के लिए 100 लोग लगे थे जो प्रतिदिन इनमें तैल और बाती डालकर इन्हें प्रज्वलित करते हैं। इसी प्रकार मन्दिर के चारों द्वारों पर रंगमंच बने हैं जहाँ प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। पूरे दक्षिण भारत में बालाजी पूज्य हैं लेकिन हमें कृष्ण का यही मन्दिर दिखायी दिया। आपने हाथियों की दौड़ का उल्लेख किया है यह हमारे लिए नवीन जानकारी है।
April 13, 2009 at 1:26 pm
बहुत ही रोचक जानकारी मिली, हाथियों की दौड़ वाह क्या बात है । हमारे यहाँ तो एक हाथी आ जाये तो सारा गाव देखने उमड़ पड़ता है । इस सुन्दर जानकारी के लिये धन्यवाद!!
April 13, 2009 at 2:03 pm
आपके इस लेख ने तो हमें गुरुवायूर के पूरे दर्शन करवा दिए। इतना सुन्दर वर्णन आप न जाने कैसे कर लेते हैं कि हमें लगता है कि हम भी वहिं पहुंच गए।
घुघूती बासूती
April 13, 2009 at 2:19 pm
सजीव चित्रों सहित बेहद रोचक जानकारी…….आभार
April 13, 2009 at 3:33 pm
बहुत सुंदर जानकारी और चित्र
April 13, 2009 at 6:16 pm
गुरुवायुर, नारायण भट्टातिरी, पूंथानम और हाथी दौड़ की एक साथ और पुनः अनूठी जानकारी दी आपने.
April 13, 2009 at 6:47 pm
अद्भुत! भाई मज़ा आ गया आपका यह पूरा आख्यान पढ़ कर तो.
April 13, 2009 at 7:40 pm
गुरुवायूर और ममियूर के बारे में रोचक जानकारी प्रस्तुत की है इस हेतु आपका आभारी हूँ . हाथियों की दौड़ और उनके फोटो देख कर लग रहा है कि मुझे भी देखना चाहिए. आभार..
April 13, 2009 at 8:15 pm
वाह!!! वाह!!! अरे इतनी सचित्र और विस्तृत जानकारी प् कर मन प्रसन्न हो गया
आपका आभार!!
April 13, 2009 at 8:34 pm
आपके द्वारा की गई यात्रा का जीवंत वर्णन ऐसा महसूस कराता है जैसे मैं भी वही कही हूँ
April 13, 2009 at 8:51 pm
आनंद आया। नई जानकारी मिली। जीवंत चित्र। आभार।
April 13, 2009 at 11:21 pm
रोचक और उपयोगी सचित्र जानकारी के लिए आभार।
April 14, 2009 at 8:17 am
सदैव की तरह मनमोहक जानकारी। चित्रों ने न केवल वर्णन को विस्तार दिया अपितु विवरण समझने में सहायता भी प्रदान की। वीडीयो क्लिप तो शानदार है।
क्या ‘गुरुवायुर’ नामके कोई साहित्यकार भी हैं? कन्याकुमारी में, विवेकानन्द शिला स्मारक के पास ही किन्हीं साहित्यकार की विशाल-भव्य मूर्ति स्थापित है। मुझे उनका नाम ‘गुरुवायुर’ ही स्मरण हो रहा है।
April 14, 2009 at 9:44 am
@विष्णु बैरागी जी
गुरुवायूर [गुरु + वायु + उर (पुर)] जगह का ही नाम है. किसी संत का नहीं. कन्याकुमारी में १३३ फीट ऊंची प्रतिमा संत कवी तिरुवल्लुवर की है जो ईसा से लगभग ८० वर्ष पहले के हैं. उनकी प्रसिद्द रचना है थिरुकुरल जो नीति (शास्त्र) पर आधारित है. इस संत के बारे में विवाद भी है. कुछ की सोच है की वे वाल्मीकि की तरह निम्न वर्ग से सम्बंधित थे. लेकिन अब तक जो खोज हुआ है उससे उनके एक जैन मुनि होने की अधिक सम्भावना बन पड़ी है.
April 14, 2009 at 12:23 pm
अद्भुत आलेख । हमेशा की तरह चित्रों ने शब्दों में प्राण फ़ूँक दिये ।
April 14, 2009 at 2:40 pm
बहुत ही सुन्दर वर्णन.गुरुवयूर के बारे में काफी देखा सुना है.आज आप की पोस्ट से भी चित्रमय जानकारी मिल गयी.
येसुदास जी के बारे में यही सुना था जैसा आप ने भी लिखा है.
हाथी दौड़ के बारे में भी जाना.हाथी खुद ही जंजीरें तोड़ कर गुर्वयुर भागे थे वह किस्सा पढ़ कर आश्चर्य हुआ.ईश्वर की लीला भी अद्भुत है.बहुत ही रोचक पोस्ट.धन्यवाद,
आज विशु पर्व की बहुत बहुत मंगल कामनायें.
Sir,आप को जानकार आश्चर्य होगा की यू.ऐ.इ में-..आज यहाँ की फ़ोन सुविधाओं में भारत फ़ोन करने के लिए विशु के अवसर पर कॉल करने में छूट दी गयी है.
April 14, 2009 at 2:43 pm
Sir,again there is some problem with the link with my name–in the above comments..-so please do not click that.
http://www.alpana-verma.blogspot.com
April 14, 2009 at 7:00 pm
एक बार त्रिकन्नवाय से हाथियों को नहीं भेजा गया क्योंकि शुल्क की अदायगी नहीं हुई थी. परन्तु हाथियों ने स्वविवेक से काम लिया और अपने जंजीरों को तोड़ कर गुरुवायूर भाग निकले.
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हाथी वास्तव में बहुत बुद्धिमान और सम्वेदनशील जीव है। और मैं यह विश्वास करता हूं कि ऐसा हुआ होगा।
हमेशा की तरह आपने बहुत अच्छा लिखा है सुब्रह्मण्यम जी।
April 15, 2009 at 7:06 am
बहुत ही रोचक जानकारी।
April 15, 2009 at 11:20 am
खान-पान ..वो सब उनके लिए सहज है इन उपक्रमों में समय को उन्हें सहेजना नही पड़ता …समय स्वयं इनकार्यों में बस सा गया है ..केरल जन .१० में जाना है …तब देखेंगे इस स्थल को….आपने लिखा है लड़कियों को मन्दिर प्रशासन ने शलवार-कमीज पहनने की अनुमति दे दी है …ये नही होना चाहिए था इसी तरह संस्कृतियाँ लुप्त हो जाती हैं ..भारत रहन-सहन खान-पान की वजह से ही तो दुसरे देशों से भिन्न और अद्भुत है …इस पोस्ट में कुछ नै जानकारियाँ ..कृष्णन अट्टम ,कथकली,गायक यशुदास का कृष्ण प्रेम गुरुवायर में हातियों की दौड़ और उनके पीछे की कथा ,महावत के जीवंत फोटो,….सब कुछ एक नै जानकारी भरा अनुभव है ….केशवा नारयनाकहते हुए इस पोस्ट को पढ़ना और भी सुखद ….अपनी बात अंत में …सुब्रमन्यम जी आपने मेरी पोस्ट पर आकर लिखा है की औकात से ज्यादा ….जी ये कैसे कह दिया …आपजो अद्भुत लिखतें हैं पढ़कर-चित्रों को देखकर ही पर्यटन का आनंद आजाता है ..पर्यटन लेखन की कारीगरी –कला कौशल मुश्किलसे सीखा जाता है….अब इस्कान मन्दिर पर लिखें ..उज्जैन एम्.पी में इस बार कृष्णन जन्मोत्सव पर भक्तों को नाचते भक्ति में लीन होते देखा था …कृष्णन का यथार्थवाद मुझे हमेशा से ही अपील करता रहा है …आप को ईमेल करती हूँ जरूरी बात करना है ….
April 15, 2009 at 11:28 am
केरल की मनमोहक जानकारी वास्तव में ॥ यात्रा करने लायक ही आपने लिखा है ये तो हम जानते हैं की दक्षिण में इश्वर केप्रति आदर,अपनी संस्कृति के लिए जो सम्मान है वो उनके दैनिक जीवन में इस तरह घुल-मिल गया है की …जो हमें अद्भुत लगता है उनकी निष्ठा प्रेम ,रहन सहन वो उनके लिए सहज है ……मेरे पहले कमेन्ट का ये पहला हिस्सा है ….भूल वश रह गया था …इसे पहले पढ़े….
April 15, 2009 at 1:03 pm
बहुत अच्छा लगा इस स्थान के बारे में जानकर.. आभार
April 15, 2009 at 1:21 pm
काश, यह हाथी दौड हम भी इतने करीब से देख पाते।
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तस्लीम
साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन
April 15, 2009 at 1:32 pm
Rochak jankari
April 15, 2009 at 5:19 pm
बहुत खूब।
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तस्लीम
साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन
April 15, 2009 at 10:48 pm
इस बेहतरीन जानकारी के लिए आपको अनेक शुभकामनाएं।
तस्वीरें भी काफी रोचक हैं।
April 16, 2009 at 10:24 pm
“…कभी प्रभुजी नहा रहे होते है, कभी नाश्ता कर रहे होते है और कभी विश्राम कर रहे होते हैं….”
ऍसी बातें आपको पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भि सुनने को मिलती हैं.
जब केरल गए थे तो त्रिसूर स्टेसन गुजरने पर सहयात्री ने इस मंदिर के बारे में बताया था। पर इतने विस्तार से आज ही पता चला। धन्यवाद !
April 18, 2009 at 2:19 pm
आपके इस सुन्दर आलेख के पुवंश ने शरीर में रोमांच भर दिया…….सचमुच मैं भी अटक गयी उस प्रसंग में…
जितने श्रम से आप इतने ज्ञानवर्धक और रोचक पोस्टों को लिखते हैं,वह वन्दनीय है…..नमन है आपको.
अभी कुछ दिनों से लगातार ही बहार रह रही हूँ,सो ब्लॉग और नेट से कटी हुई हूँ…..फिर भी आप जो कृपा कर मेल में अपने पोस्ट भेज देते हैं,इसके लिए आपकी असीम आभारी हूँ.मेल में रहने के वजह से जब कभी फुर्सत मिलती है देख पाती हूँ…
मेरे लिए यह पूर्णतः नयी जानकारी थी..बड़ा ही अच्चा लगा जानना और हाथी दौड़ तो कमाल का है…
ईश्वर से प्रार्थना है कि कभी वो अपने इस पुन्य भूमि में मुझे बुलाएँ….
April 18, 2009 at 8:27 pm
इस रोचक, मेरे जैसे लोगों के लिए नयी जानकारी के लिए आभार.
April 20, 2009 at 12:21 pm
lekh behtar hain main inhe apne newspaper peoples samachar, bhopal mai punlished kar raha hoon. aapke naam se.
bharosa hai aap mana nahi karenge