पिछले पांच दशकों से हम भोपाल आते रहे हैं और हर प्रवास के मध्य एक बार भोजपुर हो आते थे. जी, हम उस महान शिव लिंग को अपने आगोश में लिए ध्वस्त विशाल मंदिर की ही बात कर रहे हैं जो भोपाल से २९ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में अपनी कहानी कह रहा है. यहाँ का शिव लिंग भारत के विशाल-काय लिंगों में से एक है (न कि सबसे विशाल, जैसी कुछ लोगों की धारणा है) और इसे पूर्व का सोमनाथ कहा गया है. इस मंदिर का निर्माण परमार वंशीय महान राजा भोज (भोजदेव) के शासन काल (१०१० – १०५३) में हुआ था. राजा भोज एक कला और साहित्य प्रेमी रहा है और बहुत से निर्माण कार्य करवाए थे. बेतवा नदी के किनारे हलकी ऊँचाई लिए चट्टानों के ऊपर बना यह भव्य मंदिर चौकोर है. सीढियों से चढ़ने पर लगभग २० फीट ऊपर हमें २७५ फीट लम्बी और ८० फीट चौडी समतल प्लेटफोर्म मिलती है जिसके एक छोर पर अपवाद स्वरुप पश्चिम दिशा की ओर देखता हुआ इस मंदिर का चंद्रशिला युक्त बुलंद दरवाज़ा बना हुआ है. किसी मंदिर में इतना विशाल दरवाजा तो हमने कहीं और नहीं देखा है. चौखट को, द्वारपाल, कुबेर, गंगा और यमुना (नदी देवियाँ) तथा उनके सेविकाओं की मूर्तियों से सजाया हुआ है. अलंकरण के लिए बारीक कारीगिरी वाली लताएँ एवं पुष्प भी बने हैं.मंदिर के अन्दर प्रवेश के लिए कुछ नीचे उतरना होता है जिसके लिए लोहे की सीढियां ए.एस.आई के द्वारा लगवाई गयीं हैं. उतरते ही आपके सामने होता है वह भव्य शिव लिंग जिसके सम्मुख हमारी अवस्था एकदम बौनों की सी हो जाती है. जलहरी जो चौकोर है उसके तीन खंड है और ऊँचाई २१.५ फीट बताई गयी है. उसके ऊपर का शिवलिंग ७.५ फीट ऊंची है और गोलाई में १७.८ फीट.
अन्दर से मंदिर की ऊँचाई का अंदाज़ तो नहीं लगाया जा सका लेकिन वृत्ताकार छत लगता है अन्दर बनाये गए चार बहुत ही विशाल खम्बो पर टिका हो. खम्बो पर शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण, ब्रह्मा सावित्री तथा राम सीता को ब्राकेट्स पर उकेरा गया है. छत की गोलाई में शिव गणों को वाद्य यंत्र बजाते हुए कुछ कुछ अंतराल में प्रर्दशित किया गया है. शिवलिंग के उत्तर और पूर्व की ओर नीचे ज़मीन पर ही मंदिर के स्थल विन्यास की रूप रेखा ( ब्लू प्रिंट) खुदी हुई है जिसे बाड लगाकर सुरक्षित किया गया है.
बाहर की तरफ दाहिनी दीवार पर तीन बहुत ही सुन्दर छज्जे दृष्टिगोचर होते हैं परन्तु उनका शीर्ष भाग क्षतिग्रस्त हो चुका है. मंदिर के ठीक सामने एक छतरी वाला मंडप है जो शिवजी के वाहन नंदी जी के लिए बनाया गया रहा होगा. परन्तु इस मंडप से लगा हुआ कुछ पीछे की ओर बगल से एक और छतरी है जो मंदिर का मूल हिस्सा रहा हो ऐसा नहीं लगता. देखा जाए तो यह मूल संरचना के सिमेट्री को बिगाड़ रहा है. इस छतरी के अन्दर एक संगमरमर का शिव लिंग ओर छोटा सा नंदी भी स्थापित है और एक पुजारी के रोजी रोटी का साधन बना हुआ है.
यहाँ इस पंडित से बात करने पर उसने बताया था कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई. इसलिए काम अधूरा रह गया. उनकी बातों को सुन कर हम तो खिसक लिए. एक और बुजुर्ग ने हमें बताया था कि यहाँ होशंगशाह का लड़का बाँध में डूब गया था. उसकी लाश भी नहीं मिली. नाराज़ होकर उसने बाँध को तोप से उड़ा दिया और मंदिर को भी तोप से ही गिरा देने की कोशिश की थी. इसके कारण मंदिर का ऊपर और बगल का हिस्सा गिर गया. इस तरह की कई बातें हम सुना करते थे. हाँ यह जरूर है कि एक प्राचीन बाँध के अवशेष मंदिर के पास अब भी देखे जा सकते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि उस काल में भी बाँध बनाकर नदी के पानी को संचित करने का प्रयास हुआ था. कहते हैं कि इस बाँध का पानी कुल ५०० वर्ग किलोमीटर में फैला था. यहाँ तक कि आज जिसे मंडीदीप कहा जाता है वह वास्तव में द्वीप ही रहा. भोपाल के कई हिस्से इस पानी में डूबे हुए थे जैसे शाहपुरा आदि. आज की बड़ी झील भी उसी में समायी हुई थी. भोपाल गजेटियर में भी इस बात का उल्लेख है.
आज भी इस मंदिर के पीछे मिटटी से बना एक रपटा है जो दूर से मंदिर के शीर्ष तक बड़े बड़े पत्थरों को ले जाने के लिए बनाया गया होगा. यही विधि भारत के ऊंचे ऊंचे मंदिरों के निर्माण में अपनाई गयी थी.मंदिर के निर्मित हो जाने के बाद उस मिटटी को हटा दिया जाता था. परन्तु भोजपुर में मिटटी से बने इस निर्माण की उपस्थिति दर्शाती है कि वास्तव में मंदिर का छत पूरा बन ही नहीं पाया था. एक बात और ध्यान देने योग्य है. वह ये कि विशाल शिव लिंग में दरार दिखती है. जैसी की सम्भावना व्यक्त की गयी है, कोई बड़ा सा शिला खंड छत के निर्माण के समय नीचे गिरा होगा जिस से दरार निर्मित हुआ होगा. हमारी मान्यताओं के अनुसार ऐसे खंडित शिव लिंग पूजनीय नहीं होते . इसे एक अपशकुन भी माना गया होगा जिसके कारण आगे का निर्माण स्थगित कर दिया गया होगा. राजा भोज अपने जीवन काल में इस मंदिर के निर्माण को पूरा नहीं कर पाया होता तो उसके उत्तराधिकारी भी तो थे. परमार वंश का पतन तो लगभग सन १३१९ में हुआ जब अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण कर मालवा को अपने अधिकार में ले लिया था. पूरी सम्भावना है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हमारे इस मंदिर को भी भारी क्षति उठानी पड़ी हो अन्यथा इतनी जल्द यह इतना अधिक क्षतिग्रस्त नहीं हो सकता था.
जैसा की हमने प्रारंभ में ही कहा है कि पिछले पांच दशक से इस मंदिर को देखते आ रहे है और तब से ही भग्न भागों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास होता आ रहा है. ऊपर छत को भी ठीक कर मंदिर के मूल स्वरुप को प्राप्त करने की जी तोड़ कोशिश की गयी और अंत में सफल न हो सकने के कारण फाइबर ग्लास की बनी हुई एक छत डाल दी गयी है.श्वेत/श्याम चित्रों (ए.एस.आइ.एस के सौजन्य से) जो १०० वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, को देखकर हम अंदाजा लगा सकते हैं कि आज हम जिस मंदिर को देख रहे हैं उसकी क्या हालत रही और वर्त्तमान स्वरुप में लाने के लिए कितना अथक प्रयास किया गया होगा. इस वर्ष के आरम्भ में इस मंदिर को यूनेस्को के विश्व धरोहर की सूची में शामिल किये जाने हेतु आवश्यक प्रस्ताव भेजे गए हैं.
May 11, 2009 at 7:09 am
बहुत महत्वपूर्ण आलेख बहुत श्रम के साथ लिखा गया है। बहुत सी जानकारियाँ दे रहा है।
May 11, 2009 at 8:41 am
बहुत उम्दा जानकारी..और तस्वीर. बहुत आभार साथ घुमाने का.
May 11, 2009 at 8:42 am
सम्भावना है कि अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हमारे इस मंदिर को भी भारी क्षति उठानी पड़ी हो अन्यथा इतनी जल्द यह इतना अधिक क्षतिग्रस्त नहीं हो सकता था.
बिलकुल सहमत -मैंने जब इस मंदिर पर पहुंचा था तो यही निष्कर्ष मेरा भी था -पर आश्चर्य है यह बात वहां कोई नहीं कहता !
May 11, 2009 at 9:10 am
SAATH GHUNMAANE KE LIYE BAHOT BAHOT AABHAAR… WESE MAIN BHOJPUR KA RAHNE WAALAA HUNN… BADHAAYEE
ARSH
May 11, 2009 at 9:16 am
बहुत लाजवाब जानकारी हमेशा की तरह दी आपने. चित्र भी बिल्कुल सजीव हैं.
रामराम.
May 11, 2009 at 9:52 am
दो तीन बार भोजपुर गया… बहुत अद्भुत मंदिर है… आपने जीवंत ्चित्रण किया.. बधाई… हाँ भोजपुर के पास भीमबैटका भी बहुत प्यारी जगह है..
May 11, 2009 at 10:05 am
यह इतिहास को संजोने जैसा प्रयास है. बहुत अच्छा लगा जानकारी पा कर. सम्भव है कभी प्रत्यक्ष भी देख सकें.
May 11, 2009 at 10:22 am
” एतिहासिक स्थलों और देश की अमूल्य धरोहर से परिचय करने का आभार….”
regards
May 11, 2009 at 10:49 am
रोचक जानकारी .
दिलचस्प प्रस्तुतिकरण , हमेशा की तरह .
May 11, 2009 at 11:09 am
आपके द्वारा वर्णित भग्नावशेष निश्चित ही भव्य रहा होगा । प्रत्येक इतिहासकार जब भी भूतकाल को कुरेदता है तो उसमें सामाजिक, आर्थिक और अन्य सन्निहित दोषों का ही प्रमुखता से वर्णन करता है । तनिक सोचें कि क्या इतने बड़े निर्माण सामाजिक व आर्थिक रूप से क्षीण राज्य कर सकते थे ?
May 11, 2009 at 11:54 am
महत्वपूर्ण आलेख!!
हमेशा की तरह लाजवाब जानकारी !!
May 11, 2009 at 12:22 pm
मैं भी सीमाजी के शब्दों को दोहराता हूं, जो उन्होने बहुत ही सही लिखा है:
” ऐतिहासिक स्थलों और देश की अमूल्य धरोहर से परिचय करने का आभार….”
ये स्थान मेरे स्मृतियों में बारीकी से अंकित है, क्योंकि मैं बचपन से वहां अक्सर जाया करता था, पिकनिक पर, जब हम बेतवा नदी की जलधारा में (जो उस समय थोडी उथली ही रहा करती थी) मस्ती किया करते थे. बाद में करीब २० साल से नही जाना हुआ है, इसलिये इस रंगीत चित्र नें ्धूमिल यादों को फ़िर से जीवंत कर दिया है. धन्यवाद आपका.
आप वाकई इस जीवंतता के साथ स्थान का सचित्र वर्णन करते है, कि बस लगता है, हम भी वहीं हैं.
पता नही आज बेतवा की जलधारा की क्या वस्तुस्थिति है.
वैसे बाकी जानकारी जैसे मंडीदीप का पहले द्वीप होना और भोपाल के तालाब का वर्तमान से भी बृहद आकार होना, साथ ही पुराने बांध के अवषेश सभी बडी ही अचूक और सत्य है.
चूंकि प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता श्री वाकणकर भोपाल में हमारे यहां हमेशा आते रहते थे, जब उन्होने भीम बेटका का काम लिया था, उनसे अल्प आयु में भी चर्चा करने में रस आता था, और मेरे पिताजी जो उनके साथ स्वयं इस तरह के अन्वेषण में लगे रहते थे, मुझे लगता है कि ज़रूर पिछले जन्म में मैं भी एक Archealogist रहा हूंगा!!
May 11, 2009 at 1:05 pm
बहुत ही मेहनत से लिखा गया आलेख……साथ में मुंह बोलते चित्र और उम्दा जानकारी….आभार
May 11, 2009 at 1:06 pm
बहुत ही रोचक सरगार्वित सचित्र जानकारी पूर्ण आलेख प्रस्तुति के लिए आभार.
May 11, 2009 at 1:08 pm
आदरेय पी एन दा
ये अच्छी बात नहीं इतना जीवंत चित्रण कि मन करता है कंप्यूटर बंद करें और चल पड़ें आपके साथ किंतु हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता आप विश्वास करें मैं निश्चित ही इस मामले में दुर्भाग्य का मारा रहा कविसम्मेलनों के लिये देश के बहुत हिस्सों में गया पर घूमा नहीं एक धारावाहिक के लेखन के लिये ३२ दिन लगातार मुंबई रहा चौपाटी भी उन्होनें ही दिखा दी ३६गढ़ में भी स्थानीय आयोजक ने चितरकोट जलप्रपात और दंतेवाड़ा का मां दंतेश्वरी सिद्धपीठ दिखा वरना अपना कोई आग्रह नहीं था आप आशीर्वाद दें कि ये उमंग इधर भी उठे
बहरहाल आप सब को नमन
-स्नेहाधीन
–योगेन्द्र मौदगिल
May 11, 2009 at 1:27 pm
Is baar fir ek nayi jankari mili…
May 11, 2009 at 1:56 pm
यह मेरी मनपसंद घूमने की जगहों में से एक है, वाकई आपने पूरा इतिहास कवर किया है।
May 11, 2009 at 2:18 pm
I live in Ujjain, but so far could not see Bhojpur, the temple you have written about. The information given by you however is equally good as going and seeing the site itself. There is one more Bhojpur (in Dhar District) . That place also belongs to Raja Bhoj. Please tell us about that place also . Thanks for the nice post.
May 11, 2009 at 2:35 pm
धर्मस्थलों के विध्वंस का प्रयास हर उस जगह पर हुआ है जहां-जहां मुस्लिम आक्रांता गए. दुनिया के कई संस्कृतियां तो नष्ट ही हो गईं इनके चलते. लेकिन यह बात कहते ही हम प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं.
May 11, 2009 at 2:54 pm
Bhojpur ki jaankari acchi lagi. ASI ne bhi kafi mehnat ki hai ise vartman swarup mein lane ke liye.
May 11, 2009 at 4:21 pm
बहुत ही उत्क्रिस्ट प्रस्तुति .ये सब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं ,जिनसे हम सभी गौरवान्वित होतें हैं .प्राचीन शिल्प के ऐसे विवरणों की प्रतीक्षा आपके पोस्ट से ही हम सबको रहती है .आपने इतनी मेहनत से सब कुछ संकलित किया इसके लिए आपको बहुत -बहुत बधाई और धन्यवाद .
May 11, 2009 at 5:23 pm
राजा भोज के भोजपुर से मिलकर प्रसन्नता हुई। इन स्थलों के संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है। वैसे मैंने राजा भोज द्वारा बनवाए भोपाल के बडे ताल के दर्शन किए हैं, अदभुत रचना है वह। लगता ही नहीं कि मानव निर्मित हो सकता है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary- TSALIIM / SBAI }
May 11, 2009 at 5:26 pm
सुब्रमनियम जी,
भोजपुर के बारे में पहले भी कुछ कुछ सुना पढ़ा था. लेकिन जो किंवदंतियाँ आपने बताई हैं, वे पहली बार ही पता चली हैं. हमेशा की तरह बहुत ही शानदार पोस्ट.
May 11, 2009 at 7:17 pm
हमे तो आपके साथ ही घूमने का मौका मिलता है । वरना एसी किस्मत कहा है । बहुत अच्छी पोस्ट है ।
May 11, 2009 at 8:32 pm
खंडहर बता रहें हैं कि इमारत कभी बुलंद थी। काफी वक्त बिताने के बाद भी हम भोपाल की इस संपदा से वंचित रहे। आपका आभार कि आपने न केवल इस स्थल की महत्ता और अतीत की जानकारी दी बल्कि जीवंत आलेख व चित्रों के माध्यम से ऐसा प्रतीत करा दिया जैसे हम वहीं कहीं हों।
May 11, 2009 at 10:46 pm
जानकारी बढिया !चित्रोँ तथा स विस्तार वर्णन से ऐसा लगा मानोँ हम भी घूम लिये !
आभार …
– लावण्या
May 12, 2009 at 12:31 am
ब्लॉग दिन – ब -दिन निखरता जा रहा है.
May 12, 2009 at 12:32 am
ब्लॉग दिन – ब -दिन निखरता जा रहा है ..बधाई
May 12, 2009 at 8:36 am
आपका ब्लॉग देखकर थोड़ी सी आपसे जलन होती है…कितने लकी है आप….कितना कुछ देख पाते हैं….कोने-कोने में घूमते हैं….कितने सुकून से बाकी दुनिया के साथ बांटते भी हैं…. Really u r lucky…..
May 12, 2009 at 9:35 am
बहुत अच्छी जानकारी है आपके पास इतना घूमने और फिर इतना लिखने का समय कहँ से आता है हमारा भी कुछ मार्गदर्शन करें सैर तो आप 5-10 मिनट मे करवा देते हैं पर खुद कितना समय लगाते हैं आपकी श्रम साधना को नमन्
May 12, 2009 at 9:48 am
अनोखे चित्र और मनोहारी वर्णन ! आपके इस लेख ने पहली ही दृष्टि में भावविभोर कर दिया।
May 12, 2009 at 2:47 pm
बहुत ही सुन्दर लेख और विवरण,[क्या यह उन्हीं राजा भोज की नगरी है जिनके नाम से एक मुहावरा bana था..raja bhoj और गंगू तेली वाला?]
आज तो आप ने एक दुर्लभ शिवलिंग और इस प्राचीन जगह के दर्शन करा दिए हैं.जीवन में शायद वैसे तो कभी इन जगहों को देख न पायें मगर आप के ज़रिये इन जगहों की सैर कर पा रहे हैं.और श्वेत श्याम चित्र भी अनूठे लगे.बहुत बहुत आभार.
http://www.alpana-verma.blogspot.com
May 12, 2009 at 9:09 pm
Bhojpur ka somnath ghumane ka shukriya. chaukor jalhari wala shivling pehalibar aapke sahyog se dekha. Mandir ka warnan ekdam prtyaksh darshi anubhaw karata hai. Abhar.
May 12, 2009 at 10:31 pm
भोपाल से बहुत बार गुजरे पर यह स्थान न देख पाये। आज आपकी नजरों/कलम/कैमरे से देखा। बहुत धन्यवाद।
May 15, 2009 at 3:45 pm
बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्द्धक। इतिहास का एक झरोखा खुल गया हो जैसे।
May 17, 2009 at 10:33 pm
इस मंदिर की संरचना, ढांचा, पीछे का रपटा आदि मुझे एकदम ककनमठ की याद दिला गया जो 1400 ईस्वी के आसपास का है.
एक बार और भारत की महानता को देखने का मौका मिला
सस्नेह — शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
May 19, 2009 at 2:54 pm
रोचक जानकारी। मुझे तो श्वेत श्याम चित्र ही अधिक पसन्द आए।
घुघूती बासूती