हम में से अधिकतर लोग जानते ही हैं कि सन १८५७ में भारतीय सैनिकों ने अपने अंग्रेजी हुक्मुरानों के विरुद्ध बगावत कर दी थी. यह आग फैलते हुए हमारे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिणित हुआ. ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत में आकर व्यापार करने के लिए तत्कालिन शासकों से अनुमति प्राप्त कर अंग्रेज विभिन्न जगहों में अपनी फैक्ट्री डाला करते थे और उनकी सुरक्षा के लिए किलेबंदी कर लिया करते थे. कलकत्ता में उनका किला फोर्ट विलियम कहलाता
था. स्थानीय जनता इन अंग्रेजों से तंग आ गयी थी. बंगाल के तत्कालीन शासक सिराज-उद-दौला ने सन १७५६ मे फोर्ट विलियम को अपने कब्जे में ले लिया. कुल १४६ लोगों को नवाब के सैनिकों ने बंदी बना लिया था जब कि अधिकतर अंग्रेज वहां के गवर्नर सहित समुद्री रास्ते से भाग खड़े हुए. कहा जाता है कि नवाब के सैनिकों ने इन १४६ लोगों को (जिसमे अंग्रेज, फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली आदि के अतिरिक्त भारतीय कुली भी थे) २० जून १७५६ की रात एक १८ x १४ फीट के कमरे में बंद कर दिया था जिसमें से २३ को छोड़ बाकी सब दम घुटने से मारे गए थे. इस घटना को इतिहास में कलकत्ता के ब्लैक होल के नाम से जाना जाता है.
कलकत्ता की इस घटना को तो पीढियों तक याद किया जाता रहा है परन्तु अंग्रेजों का नर संहार जो इस से भी ३५ वर्ष पूर्व सन १७२१ में हुआ था बिलकुल ही बिसरा दी गयी जिसमे लगभग १८० अंग्रेजों की निर्ममता से हत्या कर दी गयी थी. लार्ड कर्ज़न के द्वारा कलकत्ता में मारे गए अंग्रेजों की स्मृति में संगमरमर का एक स्मारक बनवाया था (जो बाद में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में जनता द्वारा आक्रोश व्यक्त किये जाने के कारण हटा दिया गया था) परन्तु भारत में सर्वप्रथम अंग्रेजों के विरुद्ध घटित खूनी विद्रोह मे मृत उन अंग्रेजों के लिए कोई स्मृति पटल उस स्थल पर नहीं बनाया गया है.
यह कहानी है एक नगर “अत्तिनगल” (Attingal) से, जो थिरुवानंथापुरम से मात्र ३१ किलोमीटर उत्तर में मुख्य राज मार्ग NH-४७ पर है. प्रमुख रेलवे स्टेशन “वर्कला” है जो १५ किलोमीटर दूर है. वर्कला अपने खूबसूरत बीच
के लिए प्रसिद्द है. ट्रावन्कोर राजघराने की रानियाँ अत्तिनगल में ही रहा करती थीं. उस प्रदेश का शासन भी सीमित स्वायत्तता में वहां की रानी के आधीन था. (मात्रु सत्तात्मक व्यवस्था) और १६वीं /१७वीं शताब्दी में उनकी बड़ी धाक रही. नायरों का एक और शक्तिशाली समूह था जिन्हें “एट्टू वीट्टू पिल्लामारू” (आठ घरों के पिल्लई) के नाम से जाना जाता है. वहां कि रानी पर भी इन लोगों का खासा प्रभाव रहा जिसके चलते राज काज में इनका भी काफी दखल था.
उन दिनों अंग्रेजी कंपनी अपना कारोबार “विज्हिंजम” (Brinjohn) नामक जगह से चलाया करती थी. रानी साहिबा को सलाह दी गयी कि इन अंग्रेजों को वहां से हटा दिया जावे और सन १६९४ में अंग्रेजों को पट्टे पर
“अन्जुतेंगु” (अन्जेंगो) नामक जगह दी गयी जहाँ से वे कारोबार कर सकते थे. वहीँ उस प्रभावशाली नायर लोगों के एक वर्ग ने स्थानीय जनता को अंग्रेजों के खिलाफ भड़काना भी प्रारंभ कर दिया. दूसरी तरफ अंग्रेजों ने शीघ्र ही उस नयी जगह “अन्जेंगो” में एक किला बनाकर अपना अड्डा स्थापित
कर लिया. किले के अन्दर की गतिविधियों के बारे में नाना प्रकार की खबरें मिल रही थीं. ईस्ट इंडिया कंपनी का दुर्भाग्य ही था कि उसके अधिकतर अधिकारी/कर्मचारी समुद्री लुटेरे थे. उनका व्यवहार स्थानीय जनता के साथ अत्याचार का रहा. उन्होंने हिन्दुओं के मंदिरों की भूमि पर भी अपना कब्जा जमा लिया. वहां के मुसलमानों के साथ भी अंग्रेजों ने बदसलूकी की. इन सब बातों से निराश हो रानी साहिबा ने अंग्रेजों को वहां से भी चले जाने का फरमान सुना दिया परन्तु तब तक अंग्रेजोंने अपने किले पर तोप आदि लगा कर अपने आप को सुरक्षित कर लिए था. बीच बीच में झड़पें होती रहीं. अंग्रेजों ने स्थानीय नायर समुदाय में फूट डाल कर अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया. इस तरह दो दशक से ऊपर निकल गए.
पट्टे पे ली गयी अन्जेंगो की भूमि के एवज में अंग्रेजों द्वारा वार्षिक नजराना दिया जाना था परन्तु मन मुटाव और संवादहीनता के चलते यह राशि भी लंबित ही रही. इसका एक कारण और था. सन १६९८ में रानी “उमयम्मा” के मृत्यु के उपरांत उत्तराधिकारी के बारे में कुछ अनिश्चितता बनी रही. अंग्रेजों ने संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से तत्कालिन रानी साहिबा को पूर्व की लंबित धन राशि और कुछ उपहार भेंट करने की सोची. प्रभावशाली नायर गुट ने इन सबको स्वयं प्राप्त करना चाहा परन्तु अंग्रेज स्वयं व्यक्तिगत रूप से रानी साहिबा से मिल कर भेंट देने की जिद पर अडे रहे.
सन १७१२ में जॉन कैफ्फिन अन्जेंगो के किले का करता धरता बनाया गया परन्तु कंपनी के पैसों के गबन के कारण १७१९ में उसे बर्खास्त कर दिया गया. उसके पूर्व भी किला इसी प्रकार के लोगों के आधीन रहा था. कैफ्फिन के उत्तराधिकारी के रूप में विलियम गैफ्फोर्ड नियुक्त हुआ जो उससे भी अधिक भ्रष्ट था. परन्तु शामत इन्ही पर आने वाली थी. विलियम गैफ्फोर्ड रानी साहिबा को प्रसन्न करने के लिए उन्हें देय राशि, उपहारों सहित स्वयं राज प्रसाद में जाने की ठान ली थी. दिन भी तय कर लिया गया. १४ अप्रेल १७२१, मलयालियों के लिए विशु का दिन (नव वर्ष का दिन जो बिहू या बैसाखी के दिन पड़ता है). अन्जेंगो के किले से ७ या ८ किलोमीटर की दूरी पर ही अत्तिनगल का राजप्रसाद था.
गैफ्फोर्ड करीब २०० लोगों के साथ पैदल ही निकल पड़ा था. सिपाहियों के अतिरिक्त उसके साथ पूर्व में एजेंट रह चुके साइमन कौसे, पुर्तगाली दुभाषिया इग्नशियो मल्हेइरोस, बर्टन फ्लेमिंग आदि भी साथ थे. राज प्रसाद में पहुँचने पर इन सबका अच्छा स्वागत किया गया और लायी गयी भेंट आदि भी स्वीकार कर ली गयी . रानी साहिबा ने अंग्रेजों को रात्रि राज प्रसाद में ही बिताने का आग्रह भी किया. क्योंकि सब को एक ही जगह नहीं रखा जा सकता था इसलिए अलग अलग ठिकानों (कमरों) में व्यवस्था की गयी थी. साइमन कौसे को दाल में कुछ काला दिखा और उसने गैफ्फोर्ड को चेतावनी दी जिसपर उनमे बहश छिड गयी. गैफ्फोर्ड ने कौसे को वहीँ पर बंदी बना कर एक कमरे में ड़ाल दिया. कुछ समय बाद जब गैफ्फोर्ड ने पाया कि उनके द्वारा लाये गए हथियारों को निष्क्रिय कर दिया गया है तो उसने एक मलाबारी चाकर को अतिरिक्त बंदूकों के लिए किले की और दौडा दिया.
पूरी जनता में अंग्रेजों के राज प्रसाद में होने की खबर थी. मुसलमान भी बड़ी संख्या में एकत्रित हो गए थे. फिर प्रारंभ हुआ तांडव. उस रात कुल १७ स्थानीय कुलिओं को छोड़ कर बाकी सभी अंग्रेजों को बहुत ही बर्बर तरीके से हत्या कर दी गयी. गैफ्फोर्ड को पकड़ कर उसकी जुबान काट दी गयी और एक लट्ठे में कील से ठोंक कर उसके शव को नदी में प्रवाहित कर दिया गया था. दूसरा व्यक्ति जिसको धीरे धीरे एक एक अंग काट कर मारा गया वो था इग्नशियो मल्हेइरोस जिसपर मंदिर की जमीन हड़पने का इल्जाम था. किले में खबर पहुँच गयी थी इसलिए वहां की तीन महिलायें, जिनके पति मारे जा चुके थे, कोल्लम और मद्रास के लिए एन केन प्रकारेण भाग निकलीं . अंततोगत्वा किला खाली हो गया और दुबारा अंग्रेजों के आधीन ६ माह के बाद ही आ पाया जिसके लिए एक सेना की टुकडी “तलास्सेरी” (कन्नूर के पास) के किले से भिजवाई गयी.
इस प्रकार अपनी अदूरदर्शिता, स्थानीय रीति रिवाजों और लोगों की भावनाओं की अवहेलना की कीमत अंग्रेजों ने चुकाई. क्योंकि इस घटना को लगभग अनदेखा कर दिया गया था इसलिए अंग्रेजों ने कुछ भी नहीं सीखा और अंततः १८५७ में ग़दर का सामना करना पड़ा.
May 18, 2009 at 8:32 am
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इन अनजाने पहलुओं से अवगत कराने के लिये हार्दिक आभार।
May 18, 2009 at 9:03 am
वाह बेहतरीन जानकारी पूर्ण ऐतिहासिक पोस्ट
May 18, 2009 at 9:09 am
वाह, उम्दा जानकारी दी. आनन्द आ गया. आभार.
May 18, 2009 at 9:36 am
Nai aur Mahatwapurn jaankari di aapne.
May 18, 2009 at 9:36 am
hamesha kee tarah sundar jankaaree .
May 18, 2009 at 10:09 am
जानना चाहूँगा कि इसका कोई ऐतिहासिक आधार है ?
जैसे ब्लैक होल की घटना को लेकर बहुत मतभेद हैं इतिहासकारों के मध्य !!
कहीं उसी रूप में यह भी तो नहीं?
वैसे आपका विवरण हमेशा की तरह उम्दा!!
ऐसा लगता है कि हम आपके साथ ही रहे हैं!!
May 18, 2009 at 12:16 pm
ane vali santano ke liye aisi jankari jaroor sahej kar rakhi jani chahiye apka bahut bahut dhanyvad
May 18, 2009 at 12:45 pm
इतिहास से अवगत कराती बहुत ही उम्दा जानकारियों से भरपूर पोस्ट……
May 18, 2009 at 12:54 pm
Anonymous historic fact! Hard to believe! Never heard before; I’ll find out more about this thing. Thanking you very much.
[If you could also paste an India map that shows above place; so we can imagine the exact point where the event happened.]
Reply by PNS: Dear Sanjay, a map has been inserted.
May 18, 2009 at 1:13 pm
इतिहास की यह एक रोचक जानकारी है ।
May 18, 2009 at 1:19 pm
आज की आप की पोस्ट में इतिहास के अनछुए या अनजाने पन्ने हैं..जिनकी दास्ताँ को हम नहीं पढ़ पाए थे अब तक.
आज आप ने रूबरू कराया -आभार.
इस के बाद भी अंग्रेजों को सबक कहाँ मिला??जैसा आप ने भी लिखा ही है..आखिर उन्हें १८५७ का ग़दर का सामना करना ही पड़ा.
May 18, 2009 at 1:21 pm
मैंने भी इतिहास के इस अनछुए तथ्य के बारे में नहीं पढ़ा पर मुझे इसकी प्रामाणिकता पर ज़रा भी संदेह नहीं है क्योंकि ब्रिटिश काल का ज़्यादातर इतिहास well documented है.
May 18, 2009 at 3:02 pm
Nayi jankari aur achhi picturs…
May 18, 2009 at 3:07 pm
भारत ने असंगठित होने की कीमत चुकाई। अब भी भिन्न संस्कृतियों के देश भारत को एक रख पाना दुनिया भर में एक अजूबे से कम नहीं है।
May 18, 2009 at 4:03 pm
इतिहास को खँगालती एक उम्दा प्रविष्टि । बहुत कुछ अछूता पा गये हम । आभार ।
May 18, 2009 at 5:01 pm
सुब्रमनियम जी, ये तो मेरे लिए भी बिलकुल नयी जानकारी है. इसी तरह टीपू सुलतान ने भी तो बाद में अंग्रेजों के छक्के-चौक्के उडा दिए थे. अगर उसके साथ भी दूसरी रियासत वाले गद्दारी ना करते तो शायद अंग्रेज भारत में ना फैलते.
May 18, 2009 at 5:09 pm
सुब्रमणियन जी!
मुझे यह जानकर अच्छा लगा और आश्चर्य भी हुआ कि सन 1700 से पहले दक्षिण भारत में भी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ आवाज उठाई जा चुकी थी और यह विरोध नपुंसक नहीं, बल्कि सशस्त्र था. दिलचस्प बात यह है कि 18वीं सदी के अंतिम दशक में ही अंग्रेज उत्तर भारत में भी पहुंच चुके थे और यहां भी उनके ख़िलाफ़ ऐसा ही माहौल था. उत्तर प्रदेश मे महराजगंज (तब गोरखपुर) जिले में कुछ अंग्रेजों को मार डाला गया था और इसके ही आसपास बखिरा (बस्ती) में भी एक अंग्रेज को मारा गया था. ऐसी कई और घटनाएं भी सुनी जाती हैं. पर इनका लेखा-जोखा यहां भी कहीं नहीं है. य्ह इतिहास सिर्फ़ जनश्रुतियों में ज़िन्दा है.
May 18, 2009 at 6:14 pm
आपके शोधपरक आलेख रोचक ही नहीं ज्ञानवर्धक भी होते हैं…सदैव ही एक नया तथा जानने को मिलता है….
इस महत कार्य हेतु साधुवाद आपका..
May 18, 2009 at 6:28 pm
कोलकाता का फोर्ट विलियम शायद अकेला किला है, जो धरातल से नीचे बना हुआ है।
May 18, 2009 at 8:06 pm
भारतीय इतिहास का एक विस्मृत प्रसंग ! शुक्रिया !
May 18, 2009 at 8:31 pm
Intersting and important historical information. It speaks of so many things about our past. We as human beings can see that violence results in hatred, and thereby in revenge, further violence, and everyone has to suffer. That is perhaps the only lesson we can have from history. Thanks for highlighing this truth.
May 18, 2009 at 9:30 pm
नयी बात पता चली।
यहां भी भारत में भेद दीखता है। नायर और अत्तिनगल की रानी में एका नहीं था।
यह विभेद अब भी बहुत दीखते हैं।
May 18, 2009 at 10:38 pm
shukriya is nayi sachitra jaankari ke liye.
May 18, 2009 at 10:51 pm
उम्दा आलेख ..रोचक जानकारी हमेसा की तरह
May 18, 2009 at 11:41 pm
Great Information!!
May 19, 2009 at 12:02 am
साम्राजी सत्ताएं इसी तरह उपनिवेशों की रीढ़ तोड़ती हैं। हमें अपने इतिहास का और ज़ियादा निरपेक्षता से अध्ययन करना होगा। कहीं ना कहीं हमारी सोच में राष्ट्रवादी भावुकता आ ही जाती है, इसके साथ हम नई साम्राजी शक्तियों से जूझने का एक नया और मारक रास्ता नहीं तलाश सकते। हमें अपनी कमियों को ज्यादा रेखांकित करना होगा ताकि इनसे बचा जा सके।
अगर अंग्रेज हमारी भावनाओं की अवहेलना नहीं करते और सीख लेते, तो क्या सही हो जाते?
और १८५७ की गदर को भी उन्होनें हमारी कमियों का फ़ायदा उठा कर बुरी तरह कुचला, और कई सीख लेकर हमें ९० साल और कुचला।
और अब काले अंग्रेज हैं….और वही हम हैं…
May 19, 2009 at 1:16 am
Very unusual subject & until now,
unknown information for me —
Liked this post
May 19, 2009 at 2:24 pm
…फिर भी हम गोरों को देखते ही अभिभूत हो जाते हैं। आपने फिरंगियों के अत्याचारों की दास्तान दोहरा कर नेक काम किया है। नई पीढ़ी को ये मालूम होना चाहिए कि उनके पूर्वजों पर कितने अत्याचार हुए और उन्होंने कितनी कुर्बानियां दीं।
May 19, 2009 at 2:42 pm
मेरे लिए यह नई जानकारी है।
घुघूती बासूती
May 19, 2009 at 5:52 pm
बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी ! आभार !
May 19, 2009 at 7:18 pm
बेहतरीन जानकारी. आभार
May 19, 2009 at 8:31 pm
उत्तरभारत के विद्रोह के विस्तृत विवरण तो मिल जाते हैं मसलन कानपुर पर दक्षिण के विद्रोह का यह सविस्तार वर्णन देकर ापने जानकारी बढाई है । धन्यवाद ।
May 20, 2009 at 11:20 pm
केरल के इतिहास का एक पन्ना यहां देने के लिए बहुत धन्यवाद। सुंदर फोटोचित्रों के कराण रूक्ष ऐतिहासिक तथ्य सजीव हो उठे हैं।
May 21, 2009 at 8:58 pm
बेहतरीन ज्ञानवर्धक ऐतिहासिक जानकारी है.
May 22, 2009 at 1:17 am
Да,aleks,побороть лень, действительно иногда очень сложно..
Yes, aleks, overcome laziness, in fact sometimes it is very difficult ..
May 22, 2009 at 10:30 am
गजब की कहानियां सुनने को मिलती हैं आपके ब्लॉग पर. धन्यवाद इस जानकारी के लिए.
May 24, 2009 at 3:19 am
Хм… Как раз на эту тему думал, а тут такой пост шикарный, спасибо!
Hmm … Just thinking about this topic, but here such as chic, thanks!
May 26, 2009 at 8:23 pm
उम्दा ऐतिहासिक जानकारी .
May 27, 2009 at 1:32 am
अपने आप से फुर्सत मिली तो आपके ब्लॉग पर पहुंचा.यहाँ तो अद्भुत दृश्य है सुन्दर चित्र ,नई जानकारियाँ, वह भी नई दृष्टी के साथ ,उम्मीद है आपसे अच्छी जमेगी . मै मूलत: कवि हूँ ,मुझे मार्गदर्शन देते रहिये.आपका शरद कोकास
June 3, 2009 at 1:04 pm
बहुत बढ़िया, रोचक जानकारी। इतिहास वही नहीं है जो किताबों में दर्ज़ होता है…