पिछले वर्ष ही पुत्र के साथ जयपुर जाना हुआ था. दो तीन दिन का प्रवास था. जयपुर के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास ही हमें एक साधारण परन्तु अच्छे होटल में जगह मिल गयी. होटल किसी बंगाली कायस्थ का था. दुपहर में खाना वाना कर लेने के बाद हम लोग सीधे १६ किलोमीटर दूर अमेर या अम्बेर के किले सह महल के लिए आटो से निकल पड़े. किले से कुछ दूरी पर ही आटो वाले ने अपनी गाडी रोक दी और बताया कि आगे की यात्रा या तो हाथी पर करें या फिर जीप में. वहां कई हाथी ग्राहकों के इंतज़ार में थे. हम लोगों ने जीप तय कर लिया और आगे निकल पड़े. कुछ दूर चलते ही ड्राईवर ने बताया कि इधर बायीं तरफ लाल बाज़ार है, जहाँ बंगाली लोग बसते हैं. हमें यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ. उधर होटल वाला भी बंगाली ही था. उसने हमारी उत्सुकता समझ ली थी और बताया कि ऊपर जो देवी का मंदिर है वहां के पुजारी भी बंगाली ही हैं. बहुत शीघ्र ही हम किले के अन्दर थे. एक जगह गाडी रोक कर ड्राईवर ने बताया कि आप लोग इधर से अन्दर चले जावो और हम यहीं पर मिलेंगे. हम लोग अपना रास्ता ढूँढ़ते हुए उस महल में चले गए और पूरा आनंद लिया वहां की भव्यता का. मंदिर में भी गए “सिंह पोल” से होते हुए और देवी के दर्शन किये. दो चांदी के सिंहों ने जो अंग रक्षकों की तरह बने हुए थे, बड़े आकर्षक लगे. चांदी से ही बने दरवाजे पर दुर्गा जी की नौ और सरस्वती जी की दस आकृतियाँ उकेरी गयीं है.
शिला माता का मंदिर
हमारे कालोनी के अन्दर ही हमारे एक अभिन्न मित्र रहते हैं. नाम है सुभाष भट्टाचार्य जो C.B.I. (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) में डी.आइ.जी हैं परन्तु बड़े ही संवेदनशील. पर्यावरण के उन्नयन के प्रति समर्पित. हम बड़े प्रसन्न थे कि वे भी हमारी जामात में शामिल होने वाले थे परन्तु उनके सेवाकाल में एक वर्ष की बढोतरी हो गयी. हमने घर वापस आते ही उन्हें यह बात बताई कि जयपुर में अम्बेर के किले के नीचे बंगालियों की बस्ती भी है. हमें वैसे मालूम था कि
सुभाष जी मूलतः राजस्थान के ही थे और उनका खुद का एक घर पिलानी में था.
हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने हमें बताया कि पीढियों से (लगभग ४०० वर्षों से) उनके कुनबे के लोग ही अमेर में राज पुरोहित बने हुए हैं. उनके सगे बड़े भाई श्री महेश भट्टाचार्य जी ही आजकल देवी मंदिर के वरिष्ट पुजारी हैं. उन्होंने यह भी बताया कि बचपन में वे अपने पिता के साथ मंदिर जाया करते थे और जब पिताजी पूजा/आरती कर रहे होते थे तो बालक सुभाष नगाडा बजाया करता. इसके बाद तो बातों का सिलसिला थमा ही नहीं. हमें उन्होंने अपने निजी एल्बम से कई चित्र दिखाए जिसमे प्रमुख था नौ मंजिला चूड़ सिंह हवेली जिसे भट्टाचार्य जी के खानदान को आवास हेतु राज परिवार द्वारा दे दिया गया था.
राजा चूड़ सिंह हवेली
आज वह हवेली इनके खानदान की मिलकियत है. उन लोगों का एक खानदानी मंदिर भी है, मनसा माता का, जिसके महेश जी ही महंत हैं. यहाँ प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, येसा विश्वास किया जाता है. लेकिन साथ साथ हाथ जोड़ कर ऊपर जयगढ़ किले के भैरों बाबा से भी विनती करनी होती है. देवी अकेली कुछ नहीं कर सकती. और भी बहुत सारी जानकारियाँ हासिल कीं. हमने स्वतंत्र रूप से भी कुछ तथ्य जुटाए. एक दूसरे पुरोहितों (गुसाईं, गोस्वामी) के वंश के ही विद्या धर बंदोपाध्याय, वास्तुविद, के निर्देशन में जयपुर नगर सन १७२७ में बसाया गया था. जयपुर के सिटी पैलेस के कृष्ण मंदिर में भी गोस्वामी लोग ही हैं. भूतपूर्व महारानी गायत्री देवी कूच बिहार से थीं इसलिए भी कुछ और बंगाली समुदाय जयपुर में आ बसा. संसार चन्द्र सेन नामके एक बड़े विद्वान् जयपुर के दीवान हुआ करते थे और एक सड़क उनके नाम पर है.
विदित हो की वर्त्तमान अम्बर/अमेर के किले/महल को राजा मान सिंह ने सन १५९२ में बनवाया था. मान सिंह बादशाह अकबर के प्रिय नवरत्नों में से एक थे. उन्हें बंगाल के गवर्नर के रूप में नियुक्त किया गया था. उन दिनों मान सिंह को जेस्सौर (वर्त्तमान में बांग्लादेश में है) के राजा पर विजय प्राप्त करनी थी. लेकिन अभियान की सफलता संदिग्ध हो चली थी. मान सिंह को युद्ध में पराजित होना पड़ सकता था. इस आशंका के कारण मान सिंह मां काली की स्तुति करने लगा. कहते हैं कि मान सिंह को देवी ने सपने में जताया कि जेस्सौर के नदी में एक शिला पड़ी हुई है, वह स्वयं उनकी ही प्रतिमा है और उस शिला को आमेर में स्थापित किया जावे और प्रति दिन एक नर बलि दी जावे. यदि इसके लिए मान सिंह राजी हों तो विजय सुनिश्चित की जा सकती है. मान सिंह ने देवी की इच्छा के अनुरूप कार्य करने का प्रण किया और युद्ध में जेस्सौर का राजा पराजित हुआ. अतः वह शिला जेस्सौर से मान सिंह के द्वारा आमेर लायी गयी और मंदिर में उसकी स्थापना हुई. यह एक कारण है कि आमेर की उस देवी को शिला माता कहा जाता है. यही दुर्गा भी है जस्सेश्वरी भी हैं और अम्बा देवी भी. जब देवी के शिला को लाया जा रहा था तो काली माता की पूजा अर्चना के लिए शास्त्रों के जानकार पंडित की भी आवश्यकता थी. अतः मान सिंह ने वहीँ से बंगाली पंडित के एक परिवार को साथ ले लिया और आमेर ले आये. इस परिवार को और उन्हीं के वंशजों को मंदिर में पूजा का एकाधिकार भी प्रदान किया गया. रहने के लिए महल नुमा हवेली के साथ साथ कुछ जागीर भी उन्हें दी गयी थी.
शिला माता के लिए अब नर बलि की व्यवस्था करनी थी. बंगाल के अभियान में पकड़ कर लाये गए युद्ध बंदी कब काम आते. कहते हैं कि यह बर्बर परंपरा मान सिंह के जीवन पर्यंत चली. उसके बाद उसके पुत्र के सामने समस्या खड़ी हो गयी. बलि के लिए आदमी कहाँ से लाया जावे. उसने शिला माता के सामने जाकर प्रार्थना की और मनुष्य के बदले बकरे की बलि से संतुष्ट हो जाने की याचना की. कहते है कि इस प्रस्ताव को सुन कर ही देवी ने रुष्ट होकर अपना मुह फेर लिया. हमने तो बारीकी से नहीं देखा है परन्तु श्री भट्टाचार्य जी पुष्टि करते हैं कि आज भी देवी की मूर्ती का मुह टेढा है. हलाकि तब से अब तक निर्बाध रूप से प्रति दिन एक बकरे की बलि दी जाती है, परन्तु कछवाहा राज वंश का पतन तब से ही प्रारंभ हो गया था.
प्रातः ५.३० के लगभग सींगवाले एक बकरे की ही बलि होती है. पहले यह उपस्थित जन समूह के सम्मुख ही किया जाता था परन्तु अब बलि के लिए एक अलग कक्ष है. कटे हुए बकरे के सर को चांदी की थाल में रख कर देवी माता को भोग दिया जाता है. सम्पूर्ण पूजा विधान एक परदे की आड़ में ही होता है. पूजा के बाद पर्दा खुलता है और भक्तों को देवी के दर्शन प्राप्त होते हैं. इस समय देवी का दर्शन महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि मान्यता है कि रक्तपान के बाद देवी संतुष्ट रहती हैं और भक्तों की मनोकामना पूर्ण कर देती हैं.
बात तो चली थी बंगालियों की जो अम्बेर और जयपुर में बसे हैं. मराठी या सौराष्ट्री जो तामिलनाडू में बस कर स्थानीय संस्कृति में घुल मिल गए हैं, उनकी तुलना में यहाँ के बंगाली अपनी भाषा, संस्कृति आदि को संजीदगी से संजोये हुए हैं.
किले के चित्र: जिल Gil trotter@sapo.pt
June 8, 2009 at 7:08 am
बहुत बढ़िया रिपोर्ट लिखी है आपनें .मैं दो-तीन बार आमेर गया लेकिन ये पुरोहित वाली कहानी से अनजान था .जानकारी देने के लिए धन्यवाद .
June 8, 2009 at 7:18 am
नया पहलू है । पिछले ही हफ्ते संगीतकार शांतनु मोईत्रा ने अपने कॉलम में हिंदुस्तान टाइम्स मुंबई में जयपुर में एक बंगाली होटेल और वहां मिले माछेर झोल के बारे में विस्तार से लिखा था ।
June 8, 2009 at 7:26 am
आमेर के पुजारी बंगाल से हैं और अन्य बाते पता थी परंतु आपने पुजारी जी से निकटता पुर्वक मिलवा दिया यह आज की पोस्ट से हमे विशेष रुप से ज्ञान हुआ.
रामराम
June 8, 2009 at 8:53 am
Ek baar punah rochak aur shodhparak jaankari di aapne.
June 8, 2009 at 8:58 am
sसुब्रह्म्णियम जी अब तो लगता है कि आपके कुनबे मे शामिल होना पडेगा आपके अलेखों ने भारत दर्शन की अभिलाषा जगा दी है बहुत बडिया पोस्ट है1 शायद ही भारत का कोई कोना बचेगा आपकी पैनी नजर से बहुत बहुत धन्यवाद और शुभकामनायें
June 8, 2009 at 9:14 am
इतिहास , संस्कृति और परम्पराएँ ,आव्रजन सभी आप इस तरह पिरोते हैं की जानकारी के साथ शैली का अलग आनंद भी मिलाता चलता है .
धन्यवाद !
June 8, 2009 at 9:52 am
एक वर्षपूर्व किल्ले को देखने का मौका मिला था. आपकी पोस्ट से जानकारी में अभिवृद्धि हुई. सुन्दर जानकारी.
June 8, 2009 at 10:17 am
अम्बेर किले से जुड़े बंगाली समाज के बारे और और किले के बारे में सचित्र जानकारीपूर्ण आलेख के लिए आभार . पोस्ट के माध्यम से काफी कुछ जानने का अवसर मिला .
June 8, 2009 at 10:30 am
आमेर के किले के बारे में अच्छा आलेख… वैसे आमेर के पास ही नाहरगढ़ का किला है.. वो भी बहुत जंगी है…
June 8, 2009 at 11:04 am
बहुत उत्तम जानकारी .आप ऐसे तथ्यों से अवगत कराते हैं जो जानकारी आमतौर पर हमें नहीं मिल सकती.
June 8, 2009 at 12:08 pm
आमेर के किले के पुजारी बंगाली हैं ये हमने सुना था जब हम किला देखने गए थे, वहीँ नरबलि की कहानी भी सुनी थी पर बकरे की बलि की बात सुनकर देवी रुष्ट हो गयीं नहीं मालूम था हमें…रोंगटे खड़े हो गए सोच कर.
हमने एक कहानी और भी सुनी थी इस सिलसिले में, कहते हैं की राजा ने स्वयं अपना मस्तक काटकर देवी को बलि दी थी…उससे देवी बहुत प्रसन्न हुयी और उस दिन से नर बलि बंद हो गयी.
@सुश्री पूजा:
सुना तो होगा परन्तु जानकारी गलत है क्योंकि मानसिंह सन १६१४ में एल्लिच्पुर में मरा था, इसके प्रमाण उपलब्ध हैं.
June 8, 2009 at 12:57 pm
ओह कैसी क्रूर प्रथा -विवरण के लिए शुक्रिया !
June 8, 2009 at 1:53 pm
हिन्दुस्तानी संस्कृति की ये झलक बहुत उम्दा लगी । आपकी पोस्ट चित्रो से ओर भी सजीव लगती है ।
June 8, 2009 at 2:15 pm
आपका ये आलेख पहले से मालूम जानकारी में और विस्तार कर गया. बंगाली समुदाय का एक और प्रभाव चैतन्य महाप्रभु के कारण भी हुआ,जिनमे वृन्दावन के जीव गोस्वामी और रूप गोस्वामी चैतन्य दर्शन को विस्तार देते रहे और बंगाली समुदाय इतर क्षेत्रों में बसता रहा.
आपका आभार.
June 8, 2009 at 2:42 pm
अम्बर किले के बारे में जब मैं ने ताऊ जी की साप्ताहिक पत्रिका के लिए लिखा था.उस समय बहुत सी जानकारी एकत्र की थीं.मगर आप ने जो नर बलि और अब बकरे की रोज़ एक बलि वाली जानकारी दी हैं वे तो रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं.
बंगाली और दक्षिण भारतीय जहाँ भी रहते हैं अपनी परम्पराओं और रीती रिवाजों को नियमपूर्वक निभाते चलते हैं और अपने नयी पीढी को हस्तांतरित bhi करते रहते हैं. जो सच में सराहनीय है.
आप की मित्र द्वारा बांटी गयीं जानकारियां और तस्वीर bahut nayaab hain.
पोस्ट में दिखाए गए नौमंजिला किले की तस्वीर अन्यत्र उपलब्ध नहीं है.बहुत बहुत आभार आप ke मित्र और आप का.
विभिन्न स्थानों के दुर्लभ चित्र और जानकारिया आप की ही पोस्ट से मिल रही हैं.
[एक बात मुझे बहुत सालती है कि अगर देवी द्वारा रक्तपान करती हैं तो फिर हम हिन्दू शाकाहारी क्यूँ बने हुए हैं.वास्तव में brahmin या हिन्दू का पर्याय ही शाकाहार रहा है. हिन्दू अहिंसा वादी हैं….फिर देवी क्यों बलि मांगती है?
बलि के नाम पर एक निरीह जानवर को maarne वाला भी हत्या का दोषी नहीं हुआ?
मैं ने वहां यह सुना था कि राजा मानसिंह ने अपने सर को काट कर देवी के चरणों में अर्पित किया था और उस के बाद नारियल को प्रतीकात्मक वहां चढाया जाता है..इस bakre ki बलि वाली बात को शायद पर्यटकों से छुपाया जाता है.
@सुश्री अल्पना:
राजा मान सिंह तो एल्लिचपुर में ६ जुलाई १६१४ में मरा था. तो उसके द्वारा अपना सर चढाने की बात काल्पनिक है. लगता है शक्ति के उपासक तालिबानी प्रवृत्ति के रहे होंगे. कोई भी माता (दुर्गा) क्या अपने लिए अपने बच्चों की बलि चाहेगी? हमने जानबूझ कर अपने आलेख में चुप्पी साध ली थी और अब तक कोई बहुत अच्छी प्रतिक्रिया नहीं आई है
June 8, 2009 at 3:43 pm
जय माता दी
बहुत ही बेहतरीन शब्दों में आपने अपनी आमेर यात्रा का वर्णन किया है। माता के मंदिर के महात्यम के बारे में विस्तार से बताया है आपने काफी रोचक और जानकारी पूर्ण है बहुत ही बेहतरीन लगी आपकी पोस्ट
जय शिला माता की
June 8, 2009 at 4:06 pm
एक बहुत ही सुंदर जानकारी दी आप ने अब आप को पकडना ही पकडना ही पडेगा कभी ना कभी.
धन्यवाद
June 8, 2009 at 5:31 pm
ye to ji nayi jankari hai. waise hamne bhi abhi talak jaipur nahin dekha hai. jayenge to ham bhi dekhenge.
June 8, 2009 at 6:28 pm
aapki posts to hamein hindustaan ke kone kone tak ghuma kar chhodengi!! Aaj ki post bhi rochak rahi..
June 8, 2009 at 6:41 pm
इन्सान किसी ना किसी कारण से ही अपनी जड़ों से दूर कहीं जा बसता है / बसाया जाता है ! आपके आलेख का सबसे मजबूत हिस्सा यही है कि आप अम्बेर , जयपुर में बंगालियों की बसाहट का कारण भी रिवील (उद्घाटित ) करते हैं ! नरबलि की बात सुन कर आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि राजतन्त्र इसी तरह के क्रूर कर्मों और उस पर धार्मिकता के मुलम्में की दम पर आक्सीजन (स्थायित्व) प्राप्त करते थे !
सुन्दर प्रविष्टि !
June 8, 2009 at 6:49 pm
bahut rochak jaankaaree milee. man men kaee prashn bhee uthe lekin unkaa uttar kaun de saktaa hai, yah bhee sochaa. badhaaee !!
June 8, 2009 at 7:55 pm
आमेर गया हूं पर बंगाली कालोनी के बारे में जानकारी नहीं थी। वर्षों बंगाल में रहने के कारण वहां का नाम सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं। सुंदर प्रस्तुति के लिये साधूवाद।
June 8, 2009 at 8:41 pm
आमेर का किला तो हमारा भी देखा हुआ है, किन्तु इतनी जानकारी नहीं थी, जितनी कि आपने घर बैठे उपलब्ध करवा दी. वहां जाने पर ही हमें मालूम हुआ था कि यहां अभी भी पशुबली जैसी ये क्रूर, पाशविक प्रथा प्रचलित है। इन निरीह पशुओं की हत्या करके हम कौन से धर्म को निभा रहे हैं।
June 8, 2009 at 8:44 pm
हम तो मानसिंह को बहादुर व्यक्ति समझते थे। बहादुर व्यक्ति कभी किसी निहत्थे और मूक प्राणी का वध नहीं कर सकता।
June 8, 2009 at 9:28 pm
बंगाली लोगों के बारे में जानकारी जमी। बलि प्रथा अब भी है – यह समाप्त हो तो शायद देवी नाराज न हों!
खैर बलि तो अलग, मांस का उपयोग समृद्धि बढ़ने के साथ बढ़ रहा है।
June 8, 2009 at 9:55 pm
अरे ! मुझे आज लगा कि मैं तो आम्बेर को आज से पहले कभी जान ही नहीं पाया था….इतनी सिलसिलेवार जानकारी के लिए धन्यवाद.
June 9, 2009 at 1:07 am
आमेर के किले के व शिला माता के मंदिर की कहानी और हाँ बसे भट्टाचार्या परिवार तथा अन्य वंगालीयों की कहानी सुनकर जानकारी में बहुत वृध्दी हुई । ये सब लिखने के पहले आपका शोध कार्य भी काफी समय लेने वाला होता होगा ।
June 9, 2009 at 9:04 am
बेहद रोचक तरीके से आपकी हर प्रविष्टी आप रखते हैँ जारी रखिये
- लावण्या
June 9, 2009 at 10:55 am
आमेर का किला तो देखा हुआ है पर उससे जुड़ी गाथाओं के बारे में बहुत ही दिल्चस्प जानकारी दी है आपने। नर-बलि और आज की पशु-बलि के बारे में पहली बार पता लगा। बलि की बर्बर परम्परा
अभी भी वैध है क्या
June 11, 2009 at 4:13 pm
आमेर के इस काले अतीत के बारे में पढ़कर सर शर्म से झुक गया मगर अधिक आर्श्चय नहीं हुआ. मृत पति की जीवित पत्नियों के ज़िंदा जल जाने और अपनी नाक नीची न हो इसके लिए पुत्रियों की जन्मते ही ह्त्या करने वाले काल-समाज में नरबलि जैसी क्रूर और बर्बर प्रथा पनपी होगी इसका आर्श्चय नहीं हुआ. आश्चर्य हुआ तो इससे जुड़े पक्षों का आज भी उन मृतकों के प्रति क्षमाप्रार्थी न होकर इस प्रथा को भी किसी अन्य सामान्य धार्मिक कृत्या की तरह लिया जाना. और एक राजवंश के पतन को नरबलि के रुकने से जोड़ा जाना भी नरबलि को सफलता से जोड़ने जैसा लगता है. मुझे पूरा विशवास है की शोध करने पर राजवंश के पतन के असली कारण सामने आ सकेंगे.
June 12, 2009 at 5:31 pm
Bada hi rochak vivran hai…bahut bahut aabhar aapka.
June 13, 2009 at 12:27 pm
आमेर का किला तो हमने भी देखा है । वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है । इतनी ऊँचाई पर बने किले में चारों तरफ़ योजनाबद्ध तरीके से पानी को चैनलाइज़ करने की बेहतरीन तकनीक आधुनिक युग के वातानुकूलन सिस्टम को मुँह चिढ़ाती ्है । लू के थपेड़ों के बीच किले के कई हिस्सों में ठंडी हवा के झोके हैरत में डालते हैं । आपने जो जानकारी उपलब्ध कराई उसने आमेर के बारे में हमारे अल्प ज्ञान को मिटाने में काफ़ी मदद की ।
June 16, 2009 at 11:33 am
bhut hi romanchak jankari avm vivran .
aapke blog par phli bar hi aana hua lekin ab ye roj ka silsila ho jayega kyoki peeche vali bhi ati mulyvan post pdhni hogi?
bali ke bare me pdhkar to rogte hi khde ho gye .
dhanywad
June 19, 2009 at 6:34 pm
Khojpurn aur rochak jaankaari ke liye dhanywaad. Aapne to kile kee sair ghar baithe hee kara dee.
June 24, 2009 at 2:17 pm
पशु बलि आदि विषय पर कृपया कविता कल्याण के ब्लॉग (3.18.2008
Kalika Mata at Kalighat, a sacred Shakti Peetha) देखें…नरबली आदि पर भी सुश्री कविता कल्याण के ब्लॉग पर मैंने टिप्पणियाँ समय समय पर दी हैं…
‘हिन्दू मान्यता’ को समझ पाना कठिन अवश्य है किन्तु ऐसा भी नहीं है कि बिलकुल समझ ही न आये, यदि कोई व्यक्ति उसे खुले दिमाग से सर्वगुण संपन्न, सर्वव्यापी. अजन्मे और अनंत, अनदेखे प्रभु द्वारा रचित ‘माया’ का अर्थ जानने का प्रयास करे…ध्यान में रख कि काल को सतयुग से कलियुग की ओर जाता माना गया है, जबकि माना जाता है कि अनंत कि उत्पति शून्य, नादबिन्दू, से आरंभ हुई …
यानि निराकार ब्रह्म, भूतनाथ शिव, का अपने ‘तीसरे नेत्र’ में अपना ही इतिहास देखना, अनंत से आरंभ कर शून्य तक का, और साथ-साथ अपने ही विभिन्न रूपों में भी, जिनमें मानव रूप प्राणियों में सर्वश्रेष्ट है, उसका अवलोकन कर पाना ..जैसे हर मानव नींद में स्वप्न देखता आ रहा है अनादिकाल से…पर्दे पर माया जगत द्वारा बनायीं गयी फिल्म, टीवी और कंप्यूटर मॉनिटर पर भी…
June 25, 2009 at 8:46 am
सुश्री कविता कल्याण के ब्लॉग का पता है http://indiatemple.blogspot.com…और आप मेरी कुछ टिप्पणी इस ब्लॉग http://judson.blogs.nytimes.com/ पर भी देख सकते हैं…जो मैंने हाल ही में ‘पश्चिम’ को ध्यान में रख लिखी हैं…जिस दिशा का राजा नीलाम्बर कृष्ण, नटखट नन्दलाल (यानि ‘शैतान’) माना गया ‘पूर्व’ में…जबकि ‘उत्तर’ का राजा पीताम्बर कृष्ण, अथवा ‘हिमालय पुत्री’ दुर्गा अथवा पार्वती (‘शिला माता’) को माना गया…