(कृपया धैर्य रखे. इस पन्ने को पूरा लोड होने दें. चित्र अधिक होने से समय लग सकता है)
हमने अपने पिछले पोस्ट में आमेर/अम्बेर के महल/किले की चर्चा तो की थी परन्तु वहां शिला देवी के आगमन, उससे जुडी जनश्रुतियां, और उस मंदिर के कारण वहां निर्मित हुए बंगाली समाज तक ही सीमित रहे..
वैसे आमेर का किला जिसे आज हम जान रहे हैं, को तो राजा मान सिंह ने सन १५९२ में बनवाया था और उसे विस्तार दिया मिर्जा राजा जय सिंह प्रथम एवं द्वितीय ने. परन्तु मूलतः जो अम्बेर का किला अम्बा माता की प्रतिष्ठा में १३ वीं सदी में बना था वह तो ऊपर है और उसे बनवाया था मीणा (चंदा) राजवंश ने. उसे ही आज हम जय गढ़ के नाम से जानते हैं. आज वह भग्नावस्था में है. उस किले की तलहटी में पुराना आमेर महल और एक बस्ती भी थी जिसके भग्नावशेष भर रह गए हैं. वर्त्तमान महल के चाँद पोल के निकट से एक पत्थर बिछा मार्ग उन खंडहरों की ओर जाता है.
आमेर का वर्त्तमान महल हिन्दू एवं मुसलमानी स्थापत्यकला का एक बेजोड़ उदहारण माना जाता है. इसकी सुन्दरता की तारीफ सुन सुन कर बादशाह जहाँगीर जल भुन गया. कहते हैं कि उसने ईर्शावश उस महल की सुन्दरता को नेस्तनाबूद करने के लिए अपने आदमी भेजे थे. उनके पहुँचने के पहले ही महल के उन बेजोड़ अलंकरणों को प्लास्टर से ढक दिया गया. बादशाह को बताया गया कि महल की खूबसूरती महज अफवाह थी.
चूंकि आमेर/अम्बेर के किले के बारे में ताऊ के चिट्ठे में सुश्री अल्पना वर्मा ने विस्तृत जानकारी उपलब्ध करा ही दी है इसलिए अब हम नीचे किले/महल के वाह्य भागों का एवं भवनों के आतंरिक अलंकरण पर केन्द्रित चित्रों को प्रस्तुत कर रहे हैं जिनका रसास्वादन किया जा सकता है.
















अब जो चित्र हैं सभी भवनों के अंदरूनी अलंकरण को दर्शाते हैं

















और ये हैं पुर्तगाल से आये पर्यटक मित्र श्री जिल अपनी पत्नी के साथ शीश महल में:

सभी चित्र श्री जिल Gil के सौजन्य से
trotter@sapo.pt
June 15, 2009 at 7:30 am
बहुत मनमोहक चित्र हैं ,आमेर का किला मेरे पसंदीदा ऐतिहासिक स्थलों में से है जो कि वास्तुकला का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत करता है ,इस पोस्ट में आपके चित्रों नें सारे भावों को उकेर दिया है .बेहतरीन प्रस्तुति .
June 15, 2009 at 7:38 am
पूरा धैर्य रखा और पन्ना अपलोड होने दिया..तभी तो आनन्द आया.
June 15, 2009 at 8:32 am
वाह बेहतेरीन प्रस्तुति !
June 15, 2009 at 8:41 am
Vakai sundarta mein bemisal hai yeh Qila. Dhanyavad.
June 15, 2009 at 9:42 am
यह पोस्ट साबित करती है कि सारे सुन्दर भवन मुगलों की देन है
एक वर्ष पहले ही इस किल्ले को देखने का मौका मिला था. यादें ताज़ा हो गई.
June 15, 2009 at 9:43 am
स्मृतियाँ मुखर हो उठीं .
मैं तीन बार पहले आमेर का किला घूम चुका हूँ.
और चौथी बार आपके साथ घूम रहा हूँ .
यह इतने सारे हाथी वहाँ कब चलते हैं .
June 15, 2009 at 10:01 am
बहुत सुंदर आपने अच्छी सैर करवा दी. चित्र बडे मनोरम और नयनाभिराम लगे.
@ anupam agrawal
यह हाथी सुबह सुबह एक जगह इक्क्ठे रहते हैं जब दिन की शुरुआत ही होती है. आप शायद देर से गये होंगे तो कुछ इधर कुछ उधर और कुछ रास्बते मे रहते हैं तो जमावडा दिखाई नही पडता होगा.
रामराम.
June 15, 2009 at 10:04 am
sundar !
June 15, 2009 at 1:28 pm
ग़ज़ब के चित्र लिए हैं आपने…आमेर के किले के साथ ढेरों यादें जुडी हैं…कभी इसके मावठे में नावें चला करती थीं…अब तो वो सूख गया है…हमारे जयपुर की आन बान और शान है ये महल…
नीरज
June 15, 2009 at 1:32 pm
बहुत ही सुंदर लगी आज की जानकारी ओर उस से सुंदर लगा आप के चित्रो का प्रदर्शन, लेकिन लोड होने मै कुछ भी समय नही लगा, बिलकुल आम ब्लांग की तरह से खुला.
धन्यवाद
June 15, 2009 at 1:43 pm
संयोग से आमेर का किला देखने का सौभाग्य मुझे भी मिला है। पर आपके खींचे गये फोटो लाजवाब है। इन्हें देखकर और लेख पढकर पुरानी यादें ताजा हो गयीं। शुक्रिया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
June 15, 2009 at 1:52 pm
आमेर के इतने सुन्दर चित्र देख कर दिल खुश हो गया…मनमोहक है आज की पोस्ट. कई सारी पुरानी यादें ताजा हो गयीं मेरी भी. शुक्रिया.
June 15, 2009 at 2:04 pm
bahut achhi lagi ye jankari aur chitra…
June 15, 2009 at 2:06 pm
कई बार देखा है इस किले को.. पर इतना सुन्दर है ये फोटो देख कर पता चला… बहुत सुन्दर फोटो..
June 15, 2009 at 3:12 pm
बाहरी फोटो सुंदर है और महलों के भीतर को दिखाने वाले दृश्य विलास औए ऐश्वर्य दर्शाते हैं. इन्हें कोई सुंदर माने तो माने.
June 15, 2009 at 3:57 pm
सभी के सभी बिल्कुल मुँह बोलते चित्र…….लाजवाब। आज आपके इन चित्रों नें तो हमारी वर्षों पहले की गई यात्रा को आंखों के सामने पुन: जीवन्त कर डाला। धन्यवाद………
June 15, 2009 at 3:58 pm
badhiya chitr hain ji,
ham jayenge to ham bhi kheechenge.
June 15, 2009 at 4:43 pm
Thanks,
It’s really breath-taking beauty ! The good quality of pictures is fantastic.
June 15, 2009 at 5:45 pm
शायद ये सब से नायाब तोह्फा है आपकी तरफ से बहुत ही अद्भुत और सुन्दर अभार
June 15, 2009 at 7:28 pm
अरे वाह , ये किला इतना सुन्दर है
लगता है मानो
धरती का कोइ गहना ही है !
आभार …इन चित्रोँ का और आलेख का भी
- लावण्या
June 15, 2009 at 7:38 pm
बहुत बढ़िया चित्र और जानकारीपूर्ण आलेख.
June 15, 2009 at 9:26 pm
First of all thanks a lot to Mr.Zil ,who clicked so beautiful and amazing photographs and shared with us.
Amer का किला इतने ध्यान से aur उस की कलाकारी को इतनी बारीकी से तब भी नहीं देखा था जब आँखों देखि थी यह जगह.
आज चित्रों में इतने मनोरम लग रहे है ये दृश्य जैसे खुद एक बार फिर से घूम रहे हों.
पूरे अंतर जाल पर इतना सुन्दर collection नहीं है..पहेल आप की एक पोस्ट में ‘ फतहपुर सिकरी के किले ‘और अब यह आमेर की किले की तस्वीरें बेजोड़ संग्रह है.
बहुत बहुत शुक्रिया इन्हें शेयर करने के लिए.
और हाँ ,अब उन अलन्करनो से प्लास्टर उतर रहा है तो असली नक्काशी /चित्र नजर आने लगी /लगे है ,ऐसा भी सुना है.
[धन्यवाद Sir,मेरे लेख को yahan link करने के लिए.]
June 15, 2009 at 9:29 pm
Amer का किला इतने ध्यान से ,उस की कलाकारी को इतनी बारीकी से तब भी नहीं देखा था जब आँखों देखि थी यह जगह.
आज चित्रों में इतने मनोरम लग रहे है ये दृश्य जैसे खुद एक बार फिर से घूम रहे हों.
पूरे अंतर जाल पर इतना सुन्दर collection नहीं है..पहेल आप की एक पोस्ट में ‘ फतहपुर सिकरी के किले ‘और अब यह आमेर की किले की तस्वीरें बेजोड़ संग्रह है.
बहुत बहुत शुक्रिया इन्हें शेयर करने के लिए.
और हाँ ,अब उन अलन्करनो से प्लास्टर उतर रहा है तो असली नक्काशी /चित्र नजर आने लगी /लगे है ,ऐसा भी सुना है.[धन्यवाद Sir, मेरे लेख को yahan link करने के लिए.]
[Also,Thanks a lot MR.Zill for sharing these valuable pictures with us.]
June 16, 2009 at 11:03 am
Amer का किला इतने ध्यान से ,उस की कलाकारी को इतनी बारीकी से तब भी नहीं देखा था जब आँखों dekhi थी यह जगह.
आज चित्रों में इतने मनोरम लग रहे है ये दृश्य जैसे खुद एक बार फिर से घूम रहे हों.
पूरे अंतर जाल पर इतना सुन्दर collection नहीं है..पहेल आप की एक पोस्ट में ‘ फतहपुर सिकरी के किले ‘और अब यह आमेर की किले की तस्वीरें बेजोड़ संग्रह है.
बहुत बहुत शुक्रिया इन्हें शेयर करने के लिए.
और हाँ ,अब उन अलन्करनो से प्लास्टर उतर रहा है तो असली नक्काशी /चित्र नजर आने लगी /लगे है ,ऐसा भी सुना है.[धन्यवाद Sir, मेरे लेख को yahan link करने के लिए.]
[Also,Thanks a lot MR.Zill for sharing these valuable pictures with us.]
June 16, 2009 at 12:30 pm
फतेहपुर सिकरी के चित्रों के बाद आमेर के चित्रों ने मन मोहा है …करीब एक माह बाद सभी से मुखातिब भी …राइट हेंड मैं हेयर क्रेक की वजह से सब कुछ मुश्किल था अब थोडी राहत है …पिछली पोस्ट भी देख कर कमेंट्स कर पाऊं लगता है १८ साल पहले आमेर देखा था अब लग रहा है मानो कल की ही बात हो …जीवंत चित्रों के लिए बधाई…
June 16, 2009 at 8:29 pm
haal hi me amber ka kila ghoom ke aaya hoon lekin itna sundar to ye tab nahi laga tha jitna aaj is post pe padh-sun ke laga. AAbhar
June 16, 2009 at 9:53 pm
बहुत समय से बिना कमेण्ट किये इसे फीडरीडर में स्क्राल करता था और चित्र मेस्मराइज करते प्रतीत होते थे।
June 17, 2009 at 2:23 am
आमेर का किला उसके चित्र और अलंकरण बेहद सुन्दर । अलंकरण तो मुगलों के किलों और ताजमहल की याद दिलातेहैं । चित्र इतने जीवन्त कि लगता है खुले दरवाज़े में से अभी कोई राजकुमारी पायल की रुनझुन के साथ प्रवेश करेंगी । या कोई राजा जी रत्नज़डित मोज़डी पहने दाखिल हो जायेंगे ।
June 17, 2009 at 11:12 am
Is anupam jhanki ke liye aabhar.
June 17, 2009 at 5:02 pm
अदभुत किला है। जितनी तारीफ की जाए कम है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
June 18, 2009 at 9:43 am
Waah do baar yahan gaya hoon par itne behtareen chitron ko ek sath dekhne se ye kila to pahle se bhi jyada sundar lagne laga hai.
aabhar gil sahab ka itni sundar photography ke liye aur aapko is prastuti ke liye.
June 20, 2009 at 4:41 pm
बहुत सुन्दर।हमें घुमवाने के लिए आभार।
घुघूती बासूती
June 24, 2009 at 10:34 am
हिन्दू वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है यह किला, फोटोग्राफी बहुत बढ़िया की गयी है ! शुभकामनायें !
June 25, 2009 at 10:03 am
बेहद सुंदर और मनमोहक चित्र है । हम तो नब्बे के दशक मे घूमने गए थे आपने पुरानी यादें ताजा कर दी ।
June 27, 2009 at 8:28 pm
Wow! This is the full story!! Hope the comments are nice!! I’m sorry I can’t read them…
Have a great weekend!
Gil
August 10, 2009 at 3:37 pm
बेहद सुंदर और मनमोहक चित्र है
जयपुर रहकर पढाई करता था कई बार गया हु आज फिर से यादे तजा हो गयी
September 12, 2009 at 8:17 pm
इतना सुंदर महल .. कमाल की कलाकारी .. पर आजकल आप पोस्ट नहीं लिख रहे .. कोई खास वजह तो नहीं ?
October 16, 2009 at 3:07 am
Wah
WAh
WAH
A D B H U T
दीवाली हर रोज हो तभी मनेगी मौज
पर कैसे हर रोज हो इसका उद्गम खोज
आज का प्रश्न यही है
बही कह रही सही है
पर इस सबके बावजूद
थोड़े दीये और मिठाई सबकी हो
चाहे थोड़े मिलें पटाखे सबके हों
गलबहियों के साथ मिलें दिल भी प्यारे
अपने-अपने खील-बताशे सबके हों
———शुभकामनाऒं सहित
———मौदगिल परिवार
October 23, 2009 at 4:13 pm
aamer ka kila hindu aur muslim sabhyta ka ek nayab pratibimb hai jo sadiyo se hai aur kai sadiyo tak rahega. iska bhraman karne ke baad esa lagta hai kash ham bhi iske itihaas ka ek hissa hote.
November 1, 2009 at 2:00 pm
प्रचंड सुंदर प्रस्तुती.