विरार, मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर जानेवाली सबर्बन रेलवे का अंतिम स्टेशन. हमें जाना था हमारे एक मित्र के मित्र साल्वे जी से मिलने. उनसे दूरभाष पर बात हो गयी थी और उन्होने अपने घर का पता बता दिया था जो स्टेशन के पूर्वी ओर कुछ ही दूरी पर था. उन्होने स्टेशन पर आकर लिवा ले जाने की पेशकश की थी परंतु एक दूसरे को पहिचानने की समस्या, वह भी भीड़ भाड़ में, आड़े आ रही थी. इसलिए स्वयं चलकर उनके घर जाना ही हमें उचित जान पड़ा. जब विरार पास आने लगा तो दाहिनी ओर सुदूर पहाडियों की ऊँचाई पर एक बहु मंजिला भवन दिखने लगा. हमने सोचा कोई होटल वगैरह होगा. दादर से एक द्रुतगामी ट्रेन में बैठ कर प्रातः 10.30 पर हम वीरार में थे. पूछते पाछते 10 मिनट में ही हम श्री विट्ठल महादेव साल्वे जी के घर पहुँच गये. श्रीमती साल्वे ने हमें अपनी बैठक में आमंत्रित किया और यह जानकार सुखद लगा कि हमारी प्रतीक्षा हो रही थी. चंद मिनटों में श्रीमान साल्वे जी अंतःपुर से निकल कर बैठक में आए और बड़ी गरम जोशी से मिले. जैसा सोचा था, वैसी ही कद काठी थी. बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ और उसी बीच हमने पहाड़ पर देखे हुए भवन के बारे में भी पूछ ही लिया.आश्चर्य तब हुआ जब हमें बताया गया कि वह “माँ जीवदानी देवी” का मंदिर है. खाना खाने के पूर्व उस मंदिर को देख आने का उनका आग्रह हम टाल न सके (वास्तविकता तो यह है कि हम स्वयं वहाँ जाना चाह रहे थे)
साल्वे जी के पास एक वेगन आर गाड़ी थी जिसे उनका पुत्र चला रहा था. साल्वे जी के अतिरिक्त उनकी पत्नी भी साथ हो ली. इस तरह हम चार लोग लगभग 3 किलोमीटर दूर उस पहाड़ी की तलहटी में पहुँच गये जिसपर जीवदानी देवी का मंदिर था. ऊपर जाने के दो विकल्प थे. पहाड़ पर बनाए गये सीढ़ियों से या फिर उडनखटोले (रोपवे) से. साल्वे जी तो हमें सीढ़ियों से ऊपर ले जाने में उत्सुक दिखे. उन्होने हमसे पूछ भी लिया “क्यों 900 सीढ़ी चढ़ पाएँगे ना?”. ऐसे में हम कैसे कह सकते थे कि हम ना जा पाएँगे. आत्म सम्मान की बात थी. हम लोगोंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए. आठ दस सीढ़ी चढ़ने पर बाईं तरफ एक गणेश जी का मंदिर था जिसकी प्रतिमा भी सुंदर थी. हमने अपने अंतःकरण से प्रार्थना की – आंतरिक शक्ति के लिए फिर आगे चल पड़े. सीढ़ियों के दोनों तरफ पहाड़ी पर वनस्पति बड़ी घनी थी और बड़ी लुभावनी लग रही थी. उनका आनंद लेते हुए हमने कुल 900 सीढ़ियाँ गिन लीं परंतु मंदिर का कहीं ओर छोर नहीं दिख रहा था. दर असल 1350 सीढ़ियाँ हैं परंतु हम से यह बात छुपाई गयी थी. हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए यह भी बताया गया कि हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता भी दो बार देवी की अनुकंपा प्राप्त करने उन सीढ़ियों पर चढ़ चुके हैं.

ऊपर पहुँचने पर दूर से दिखाई देने वाला वह भव्य सात मंज़िलाभवन हमारे सामने था. सबसे ऊपर देवी का गर्भ गृह बताया गया जहाँ जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध थी. देवी की प्रतिमा निश्चित ही सुंदर परंतु आधुनिक थी. जनश्रुति के अनुसार उस पहाड़ी पर जीवदानी देवी का वास प्राचीन काल से ही रहा है. कहते हैं कि उन्होने एक कंदरा में अपने आपको छुपा लिया था और लोग वहाँ जाकर एक छेद में चढ़ावे के रूप में पान (तांबूल) डाला करते थे. वर्तमान में ऐसे किसी जन व्यवहार की पुष्टि नहीं हो सकी. वर्तमान मंदिर को बनवाने का श्रेय वीरार के किसी बाहुबली को दिया जाता है. यह मंदिर मुंबई तथा आसपास के उपनगरों के लोगों के लिया अपूर्व श्रद्धा का केन्द्रा बन गया है और यहाँ रविवार और मंगलवार के दिन हज़ारों श्रद्धालु दर्शनार्थ पहुँचते हैं. वसाई के कोली समाज के लिए तो यह उनकी कुलदेवी हैं. लोगों में विश्वास है कि माँ जीवदानी देवी, जैसा की नाम से ही बोध होता है, मरणासन्न लोगों को भी जीवन दान देने की क्षमता रखती हैं. कुछ समय पूर्व तक यहाँ भी बाकरों और मुर्गियों की बलि दिए जाने की परंपरा रही है जो अब सुनते हैं कि बंद कर दी गयी है.
September 14, 2009 at 6:23 am
बड़े जीवट के निकले आप तो -१३५० सीढियां चढ़ गए और पुण्य कमाने की आशा भी नहीं ! अनुकरणीय ! मंदिर भव्य लग रहा है !
मैं बिरार को सीधी जाती ठसा ठस भरी लोकल ट्रेनों को अपलक निहारा करता था जब मुम्बई में था !
September 14, 2009 at 7:10 am
हम तो विरार लोकल में चढ़ने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते हैं, पर चलो आज आपने मंदिर के दर्शन करवा दिये। तो कभी प्लान भी बना लेंगे।
September 14, 2009 at 7:54 am
जय माता दी…….
September 14, 2009 at 8:16 am
आपने तो हमें घर बैठे ही दर्शन करवा दिए | आभार |
September 14, 2009 at 8:58 am
सुबह सुबह माँ के दर्शन कराने और सुन्दर आलेख का आभार….
regards
September 14, 2009 at 9:52 am
बहुत बढ़िया जानकारी
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामना . हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार का संकल्प लें . आभार.
September 14, 2009 at 10:37 am
एक बड़े अन्तराल के बाद आप की नयी पोस्ट आई ..मुम्बई में ऐसा भी कोई स्थान है ..जानकारी नहीं थी.
सुबह सुबह आप ने माता के दर्शन करा दिए..बहुत बहुत आभारी हैं और इतनी अच्छी जानकारी व् चित्र भी दिए..
१३५० सीढियाँ चढ़कर दर्शन करने पहुंचे…रोपवे के ज़माने में !यह तो सच में काबिले तारीफ़ है.वापस भी सीढियों से आये या रोपवे से?जीवदानी माता के बारे में जाना ..पुनः आभार.
September 14, 2009 at 10:40 am
आप ९०० तक सीढियां गिन के चढ़े! लौटे भी सीढियों से ही या उड़न खटोला कर लिया? कहाँ कहाँ चले जाते हैं आप भी, वाकई गज़ब का जज्बा है, १३५० सीढियां चढ़ने का.
धन्यवाद इस रोचक मंदिर के बारे में बताने के लिए.
September 14, 2009 at 10:53 am
बहुत आभार आपका इस देवी दर्शन के लिये. बीच मे आप कहां चले गये थे? बडे दिनों बाद पोस्ट आई आपकी?
रामराम.
September 14, 2009 at 11:00 am
सुन्दर जगह है.
September 14, 2009 at 12:24 pm
बोलो जीवदानी माता की जय. बहुत बढिया वृत्तांत. बधाई.
September 14, 2009 at 1:55 pm
bahut dino bad aapki post aai .mai 17 sal mumbai me rhi par kbhi bhi is mandir ke bare me nhi suna .aapne itna sundar sjeev varnan kiya hai ab to jana hi hoga .achhi post ke liye abhar .
September 14, 2009 at 2:19 pm
सुन्दर वृतांत । विवरण रोचक है । आभार ।
September 14, 2009 at 2:53 pm
Bahut lambe antraal ke baad apki post dikhi aur humesha ki tarah lajwab post rahi…
September 14, 2009 at 2:56 pm
तात्पर्य यह कि आत्मसम्मान रखा तो सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ेगी, वो भी उम्मीद से दुगनी
बहुत दिनों बाद प्रविष्टी डाली है. शायद यात्रा पर थे.
अच्छी सुन्दर जानकारी.
September 14, 2009 at 4:01 pm
बहुत सुन्दर विवरण। यह जान और अच्छा लगा कि बलि देने की प्रथा वहां बन्द कर दी गई है।
September 14, 2009 at 5:06 pm
भाई बहुत सुंदर लगी आप की यह पोस्ट, वेसे हम भी अभी तक सीढिया ही प्रयोग मै लाते है, मां के कहने से नेना देवी मंदिर गये थे, तो पता नही कितनी सिढिया थी हम बच्चो ओर इकलोती बिबी के संग चढ गये थे सब सीढियां, मां से चलना मुश्किल था इस कारण वो पालकी मै चली गई.
ओर जब यह मंदिर किसी “बाहुबली” ने बनबाया होगा तो जरुर अन्य मदिंरो से अलग होगा.
धन्यवाद
September 14, 2009 at 5:10 pm
कल आपको याद ही कर रहा था और आज ही भेट हो गई वह भी माँ जीवदानी के दरवार में . आप के द्वारा ही तो मैं भी अपने को पर्यटक महसूस करता हूँ .
September 14, 2009 at 5:30 pm
अरसे बाद आपकी नयी पोस्ट पढने को मिली. लौकिक विश्वासों की बड़ी परंपरा है भारत के कोने कोने में.बिना सीढियां चढ़े दर्शन लाभ कराने का आभार.
September 14, 2009 at 6:52 pm
Jeewdanee devi ka mandir aapane ekdam naee jankaree dee kabhee mauka laga to jaroor darshan karenge. Shrawan mas men maharashtra me har shukrawar ko Jeewantika devi kee pooja hotee hai aur bachchon wali Suhagin ko khana khilaye jata hai khin ye wahee to nahee. Aapka lekh sunder aur wistrut, hamesha kee tarah.
September 14, 2009 at 8:41 pm
बहुत दिनो बाद आये, पर क्या चीज लाये, वाह।
वैसे भी तीर्थ स्थलों में पैदल जाने से जो सकून मिलता है उसका ब्यान नहीं किया जा सकता।
September 14, 2009 at 9:02 pm
ापकी इतने दिन अनुपस्थिती इसी लिये खलती रही कि हमे अच्छी -2 जगह के दर्शन करने को नहीं मिले।अप जैसी जानकारी शायद कहीं नहीं मिलती देवी दर्शन के लिये बधाई और आभार मैं तो इतनी कठिन यात्रा का सोच भी नहीं सकती
September 16, 2009 at 12:03 am
अति सुन्दर यात्रा वृ्तान्त…..आपके माध्यम से धर बैठे ही देवी भगवती के दर्शन हो गये!!!
लेकिन १३५० सीढियों के बारे में पढकर ही हमारी तो साँस फूलने लगी है:)
आप तो बडे जीवट निकले……..
September 16, 2009 at 2:04 am
सुन्दर आलेख का आभार….माँ जीवदानी को नमन
– लावण्या
September 17, 2009 at 10:52 pm
अच्छी प्रस्तुति….बहुत बहुत बधाई…
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग “मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी”में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है…
September 18, 2009 at 11:20 am
माँ जीवनदानी के बारे में, मै पहली बार आपके द्वारा जानकारी ले रहा हूँ। आपका बहूत धन्यवाद की आपने इस मन्दिर के बारे में जानकारी दी। मै भी अब माँ जीवनदानी के दर्शन के बारे में आने को सोच रहा हूँ।
September 23, 2009 at 10:45 pm
लगता है आपभी कहीं ज्यादा व्यस्त हो गये हैं। पोस्टों की आवृत्ति काफी कम हो गयी है। मैं भी आजकल निष्क्रिय होता जा रहा हूँ। आजीविका अर्थात् नौकरी को प्राथमिकता देना मजबूरी है। फिर परिवार, बच्चे और दोस्त मित्र…। ब्लॉगरी के हिस्से में सन्नाटा ही है शायद।:(
वैसे विरार की जीवदानी देवी मैहर वाली शारदा माँ की तरह ही सीढ़ियाँ चढ़वाती हैं। मैं वहाँ दो-तीन बार हो आया हूँ। विरारा जाने का मौका कब मिलेगा नहीं मालूम। आपकी पोस्ट का शुक्रिया।
September 27, 2009 at 1:54 pm
thanks
September 27, 2009 at 6:35 pm
१३५० सीढियों के बारे में पढकर मेरी भी साँस फूलने लगी है !