जी.एल.रायकवार
शंभुनाथ यादव
भारतीय स्थापत्य कला के वृहद परिदृश्य में प्रतिमाओं का विशेष महत्व है। प्राचीन प्रतिमाएं युग विशेष की कला-संस्कृति, चिंतन और पारंपरिक ज्ञान विज्ञान के प्रमाणिक स्त्रोत हैं। प्रतिमाओं के माध्यम से शिल्पियों ने वण्र्य विषय को अपनी मौलिक कल्पना से अधिकाधिक रोचक और मनोविनोदात्मक तत्वों के साथ रूपायित किया है जिससे पाषाणों में अभिनयात्मक गति संचरित होने से सहज ढंग से आत्मसात होने लगते हैं। शिल्प ग्रंथों के निर्देशों को स्वीकार करते हुये वण्र्य विषय में रस को उद्दीप्त करने में सहायक दृश्य अथवा अलंकरण की योजना में शिल्पियों की साधना और दक्षता शैव प्रतिमाओं में विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। ऐसी प्रतिमायें अत्यल्प हैं और इन्ही कलाकृतियों में भारतीय कला की लोक-धारा प्रकट है। भारतीय स्थापत्य कला के अंतरंग में धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक तत्व सन्निहित है। इसीलिये हमारे देश में कला की साधना और उपासना होती है। शिल्प शास्त्रों में विभिन्न देव प्रतिमाओं की रूपाकृति, आयुध, वाहन, तालमान आदि के निर्देश हैं जिसके अनुसार प्रतिमाओं के निर्माण की परंपरा रही है। इन्हीं के साथ-साथ लौकिक जीवन से संबंधित-नृत्य, संगीत, श्रृंगार, वन्य पशु-पक्षी, वनस्पति आदि अलंकरणात्मक प्रयोजनों से युक्त अभिप्रायों को सम्मिलित कर अधिकाधिक आकर्षण उत्पन्न किया गया हैं। भारतीय स्थापत्य कला के विश्व प्रसिद्ध स्मारक-सांची, अजंता, एलोरा, एलिफेंटा, कोणार्क, खजुराहो, देवगढ़, उदयगिरि, मामल्लपुरम, पुरी आदि, कलात्मकता, मौलिकता और भव्यता की दृष्टि से अपूर्व हैं।
भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है। पौराणिक संदर्भों के कलात्मक निरूपण के अतिरिक्त मानव जीवन के पुरूषार्थ की अभिपूर्ति का लक्ष्य स्थापत्य विधा में सन्निहित है। पौराणिक कथायें मानव जीवन के अंतस् को प्रकाशित करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना भी करते हैं। नटराज, अर्धनारीश्वर, महिषासुर मर्दिनी, वामन, नृसिंह, उमा-महेश्वर, तीर्थकंर, बुद्ध आदि की प्रतिमाएं कला की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इन देव प्रतिमाओं के साथ भावनात्मक आस्था और उपासना जुड़ी हुई हैं। दृष्य अथवा श्रव्य कला के साथ-साथ भावनात्मक संबंध और एकाग्रता से आंतरिक उर्जा उत्सर्जित होती है।
भारतीय मूर्ति शिल्प में रामायण और महाभारत के कुछ विशिष्ट प्रसंगों से संबंधित कलाकृतियां प्राप्त होती हैं। कथा नायकों के विभिन्न लीलाओं अथवा घटनाओं से संबंधित तथा लोक में व्यापक रूप से प्रचलित असीम शौर्य अथवा संवेदना से संबंधित प्रसंगों का शिल्पांकन देवालयों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के शिल्पकृतियों में महाभारत से संबंधित कृष्ण की बाल लीलाओं का अंकन सर्वाधिक लोकप्रिय रहा है। कर्ण और अर्जुन की प्रतिमायें भी शिल्प कला में उपलब्ध होती है। रामायण से संबंधित शिल्पकृतियों में शूर्पणखा प्रसंग, पंचवटी में भिक्षुवेश में रावण का आगमन, मारीचवध, बालि-वध सेतु निर्माण आदि शिल्पियों के प्रिय विषय रहे हैं। शिल्पकृतियों से जन जीवन में प्रचलित धार्मिक आस्था और लोक रूचि के साथ-साथ शिल्पियों की दक्षता का ज्ञान होता है।
महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य संस्कृत वाङ्गमय का सुप्रसिद्ध ग्रंथ है। इस ग्रंथ का बीजांकुर राजा दिलीप की निःसंतान होने की व्यथा से प्रारंभ होता है। महाकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप के द्वारा नन्दिनी गौ की सेवा, नन्दिनी गौ के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है। कथावस्तु की दृष्टि से यह सर्ग अत्यन्त मार्मिक तथा प्रभावोत्पादक है। कथा के अनुसार भू-मंडल का स्वामी होते हुये भी राजा दिलीप पुत्र विहीन होने के कारण संतप्त होकर राजकाज मंत्रियों को सौंपकर तपोवन में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने तपोबल से इसका कारण जानकर राजा दिलीप को बताया कि कामधेनु की पुत्री नंदिनी गौ की आराधना करने से यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है। अपने गुरू की आज्ञा स्वीकार कर राजा दिलीप अपनी धर्मपत्नी सुदक्षिणा के साथ नंदिनी गौ की सेवा-आराधना में तत्पर हो गये। इस प्रकार इक्कीस दिन व्यतीत होने के पश्चात् एक दिन नंदिनी राजा दिलीप की परीक्षा लेने हेतु घने वन में चली गयी और वहां माया निर्मित सिंह से आक्रांत होकर प्राण रक्षा के लिए चिल्लाने लगी। वन की शोभा देखने में भाव विभोर राजा नंदिनी की आवाज सुनकर सिंह को मारने के लिये अपने तूणीर से बाण निकालने लगे परन्तु उनके हाथ बाण के पंखों से चिपक गये। असहाय राजा को मनुष्य वाणी से विस्मित करते हुये सिंह ने बताया कि वह इस वन की रक्षा में नियुक्त शिव का अनुचर है तथा इस वन में बलात् प्रवेश करने वाले प्राणी उसके आहार हैं। उसके द्वारा सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने के कारण गौ उसका भक्ष्य हैं और शिव की कृपा से वह अजेय है। उसका वध करने में कोई समर्थ नहीं है। फलस्वरूप शर संधान के लिये तत्पर हाथ स्वतः बाणों से चिपक गयें हैं। सिंह के वचन सुनकर राजा दिलीप ने नंदिनी की रक्षा करने के दृढ़ संकल्प को दुहराते हुये उसे (नंदिनी गौ) मुक्त करने की प्रार्थना करते हुये स्वयं को उसके (सिंह के) आहार के लिए समर्पित कर दिया। कुछ अंतराल से नंदिनी ने माया का निवारण कर दिया और राजा को इच्छित वर प्रदान किया। इस कथा में गौ सेवा, गुरू भक्ति और नैतिक मूल्यों का अत्यन्त सरस श्लोकों में वर्णन है।
रघुवंश महाकाव्य पर आधारित ‘सिंहाक्रमणम्’ का दृश्यांकन भारतीय कला में अत्यन्त दुर्लभ है तथा अन्यंत्र प्रकाशित होने की जानकारी नहीं है। अंकित दृश्य के आधार पर धनुर्धर (राजा दिलीप), गौ (नंदिनी) एवं सिंह की संयुक्त प्रदर्शन और भूमिका युक्त शिल्पकृति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रणाधीन कालंजर दुर्ग से ज्ञात हुई है एवं छायाचित्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ मंडल के सौजन्य से प्राप्त हुई है। प्राचीन काल में कालंजर उत्तर भारत का महत्वपूर्ण दुर्ग रहा है। इस दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चंदेल राजाओं के शासन काल में मिली। कालंजर शैव तीर्थ के रूप में भी विख्यात है।
कालिंजर किले के अन्दर नीलकंठ मंदिर के भग्नावशेष
अंशतः खंडित यह शिल्पकृति लाल भूरा बलुआ प्रस्तर से निर्मित है। यह जैजाकभुक्ति के चन्देल शासकों के काल में निर्मित ज्ञात होती है। संभवतः इस शिल्पकृति के अधोभाग में कथा से संबंधित अन्य दृश्य रहे होंगे। इस शिल्पकृति में कथानक का चरमोत्कर्ष है। इस प्रसंग के मुख्य तीन पात्र-राजा दिलीप, नंदिनी एवं मायावी सिंह की भाव-भंगिमा और चेष्टाओं के माध्यम से शिल्पी ने अल्पतम अभिप्रायों से संपूर्ण कथा को साकार कर दिया है। निम्न श्लोकों में राजा दिलीप की मनः स्थिति का चित्रण है-
ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः।
जाताभिषंगो नृपतिर्निषंगादुद्धर्तुमैच्छत् प्रसमोद्घृतारिः।।
रघुवंश, सर्ग 2-30
अर्थ- (नंदिनी को पछाड़कर खाने के लिये उद्यत) सिंह को देखकर मृगेन्द की तरह धीर गंभीर चाल वाला, रक्षा करने में निपुण, शत्रुओं को बलपूर्वक दंड देने वाला (असहाय स्थिति में अपमानित) राजा दिलीप ने सिंह को मारने के लिए तूणीर से बाण निकालने के लिये इच्छा प्रकट की।
वामेतरस्तस्य करः प्रहत्र्तुर्नख प्रमाभूषित कंकपत्रे।
शक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे।।
रघुवंश, सर्ग 2-31
अर्थ- प्रहार करने के लिए उद्यत, नखों की कांति से प्रकाशित राजा दिलीप के दायें हाथ की अंगुलियां कंकपत्रो से सुशोभित तूणीर में स्थित बाणों के मूलप्रदेश में रखे हुये (बाण निकालने के उद्योग में) चित्रवत (जड़) स्थिर हो गया।

प्रस्तुत चित्र में प्रसंग के अनुकूल निम्न विशेषताएं दृष्टव्य हैं जिससे शिल्प में निम्नानुसार व्यंजनात्मक प्रभाव उत्पन्न हैं -
1. राजा दिलीप की आकृति वनवासी सदृश्य है। उनके अंगों में राजोचित अलंकरण नहीं है। अतः आश्रमवासी अभिपे्रत हैं।
2. नन्दिनी गौ के ऊपर प्रहाररत सिंह तथा भूमिष्ठ राजा दिलीप एक दूसरे के सम्मुख संभाषणरत रूपायित हैं। राजा दिलीप घुटने मोड़कर धनुष-बाण पकड़े बैठे हैं, जो उनके असहाय और अपमानित स्थिति का परिचायक है। अंततः वे सिंह का शरण ग्रहण करने के लिए विनयावनत है।
3. नंदिनी गौ का सिर अवनत है तथा नेत्र भयातुर हैं। 4. सिंह के वक्ष पर निष्प्रभावी बाण धंसा हुआ है जो लोक मान्यता आधारित है तथा सिंह के वध के लिये राजा दिलीप की चेष्टा का परिचायक है।
उपरोक्त विशेषताओं के परिदृश्य में विवेच्य कलाकृति अद्वितीय है महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य के द्वितीय सर्ग पर आधारित यह कलाकृति भारतीय कला में अद्यतन ज्ञात प्रथम कृति है तथा इसका अभिज्ञान ‘‘सिंहाक्रमणम्’’ समाधान कारक है।
संदर्भ ग्रन्थ:
1. रघुवंश महाकाव्यम् – पंडित श्री हरगोविन्द शास्त्री चैखंबा संस्कृत पुस्तकालय बनारस। तृतीय संस्करण सन 1953
2. टी.ए.गोपीनाथ राव – इलीमेंटस आॅफ दि-हिन्दू आइक्नोग्राफी वाराणसी-1971
3. दि डेवलपमेंट आफ हिन्दू – जे.एन.बनर्जी कलकत्ता-1968 आइक्नोग्राफी
4. महाभारत – गीतापे्रस गोरखपुर
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October 12, 2009 at 6:34 am
मगर वह चित्र ही यहाँ दृष्टिगत नहीं है -वरन भूमिका और व्याख्याएं तो पढ़कर मजा आ ही गया !
October 12, 2009 at 6:35 am
चित्र दिखा -थोडा भग्न है तथापि संवाद समर्थ !
October 12, 2009 at 7:02 am
बढ़िया जानकारी |
October 12, 2009 at 7:12 am
सम्पूर्ण विवरण पढ़कर बहुत ज्ञान-वृद्धि हुई । इन पंक्तियों से भारतीय कला के प्रस्थान-बिन्दु का आभास हुआ.. “भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है। पौराणिक संदर्भों के कलात्मक निरूपण के अतिरिक्त मानव जीवन के पुरूषार्थ की अभिपूर्ति का लक्ष्य स्थापत्य विधा में सन्निहित है। …”
आलेख की प्रस्तुति का आभार ।
October 12, 2009 at 7:32 am
भारतीय साहित्य और मूर्तिकला के अल्पज्ञात पक्षों को प्रकाशित करने के लिये आभार।
October 12, 2009 at 7:57 am
मै यहाँ घंटों घूमा हूँ। इस परिसर में स्थापित ग़णेश की एक मूर्ति ने मुझे बहुत प्रभावित किया था।
मूर्ति चोर यहाँ भी सक्रिय हैं। सरकार ने नम्बर वगैरह डाल कर और एक संग्रहालय बना कर बचाने के प्रयास किए हैं, जाने कितनी सफलता मिलेगी।
अपने पुरखों की सृजन आस्था और शिल्पियों, श्रमिकों की कलाकारी से मुग्ध हो गया था।
रघुवंश की याद दिलाने के लिए आभार।
October 12, 2009 at 8:02 am
rochak aur durlabh jaankaaree ke liye dhanyawaad !
October 12, 2009 at 8:06 am
बहुत बेहतरीन जानकारी.
रामराम.
October 12, 2009 at 9:51 am
मैं तो यह कथा भूल चूका था . आप ने विस्तृत वर्णन सचित्र कर याद करा दिया . आपका बहुत बहुत धन्यवाद .
October 12, 2009 at 11:13 am
इस दुर्लभ कृति के बारे मे विस्तार से जानकारी के लिये धन्यवाद्
October 12, 2009 at 12:46 pm
नया क्या कहूं ? आपतो हमेशा जानकारियों के हीरे मोती परोसते ही हैं . अब जरा फुर्सत हुयी तो सब अगला पिछड़ा पढ़े जा रहा हूँ .
मेरा दुर्भाग्य ही था की आप तीन हफ्ते मुंबई में थे और दर्शन लाभ न हो पाया.माँ अभी भी मुंबई में ही हैं और एक छोटा ओपेरासन रह गया है . बहुत ही खुश हैं . मैं भी .मेरे ही साथ हैं. आपके स्नेह के लिए धन्यवाद . मिलना तो होगा ही . पर देखिये कब इश्वर प्रसन्न होते हैं .आशा और प्रार्थना दोनों शामिल हैं उस आनंद के लिए
October 12, 2009 at 4:36 pm
बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने कुछ अन्य चित्र ओर देते तो मजा दुगना हो जाता, यह चोर भी अजीब है हर जगह पहुच जाते है. धन्यवाद
October 12, 2009 at 4:45 pm
इस उत्तम जानकारी के लिए साधुवाद. हालांकि भूमिका बेवजह बहुत लम्बी हो गई. अगर आपने कालिंजर तक पहुंचने के उपायों पर भी प्रकाश डाल सके होते तो बहुत अच्छा होता.
October 12, 2009 at 6:34 pm
भारतीय वांग्मय – प्राचीन साहित्य की यही शक्ति है
जो मध्य युग से होती हुई
२१ वीं सदी तक,
अक्षुण्ण रही है –
सुन्दर आलेख के लिए आभार
- लावण्या
October 12, 2009 at 11:12 pm
भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है। पौराणिक संदर्भों के कलात्मक निरूपण के अतिरिक्त मानव जीवन के पुरूषार्थ की अभिपूर्ति का लक्ष्य स्थापत्य विधा में सन्निहित है। पौराणिक कथायें मानव जीवन के अंतस् को प्रकाशित करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना भी करते हैं
ऐसे महान भारत पर हमे गर्व है |
इस कथा में गौ सेवा, गुरू भक्ति और नैतिक मूल्यों का अत्यन्त सरस श्लोकों में वर्णन है।
ज्ञानवर्धक पोस्ट के लिए आभार \
October 13, 2009 at 1:59 am
बहुत ही बढिया ज्ञानवर्धक पोस्ट……
आभार इस बेशकीमती जानकारी का ।
October 13, 2009 at 11:24 am
राजा दिलीप की कथा जानी.
nayab jankariyan bhi milin.
abhaar.
October 13, 2009 at 9:05 pm
वाह… क्या बात है….. बेहतरीन प्रस्तुति….. सुरुचिपूर्ण….
October 14, 2009 at 11:33 am
अब तक इन सारी चीजों से अनजान ही था.
October 14, 2009 at 1:55 pm
दुर्लभ कृति के बहाने कुछ महत्वपूर्ण जानकारी हाथ लगी। आभार।
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October 15, 2009 at 4:19 pm
आपने रघुवंश को लेकर जो लिखा है वो आपके शोध कार्य की मेहनत को दिखता है…..कभी कालिंजर जाने का अवसर मिला तो इसी नज़रिए से देखूंगा. पुरातत्व और साहित्य के अभूतपूर्व मिश्रण में पगे लेख को पोस्ट करने के लिए बधाई.
October 15, 2009 at 6:59 pm
आपको धनतेरस और दिवाली की हार्दिक शुभकामना
October 17, 2009 at 5:01 pm
दीवाली की ढेर सारी शुभकामनायें.
October 18, 2009 at 9:24 am
आपका हर लेख अपने पीछे मेहनत और शोध को दर्शाता है । राजा दिलीप की कहानी तो पढी और सुनी भी है पर जिस तरह आपने इसके श्लोक और शिल्प की भाव भंगिमा का बारीकी से वर्णन किया है वह प्रशंसनीय है ।