Archive for अगस्त, 2010

हमारे अंगने में

अगस्त 23, 2010

ओणम पेशल विथ शुभकामनाएं

पूरे भारत में बारिश से जनता बेहाल है. कैसी विडम्बना है. जून और जुलाई के दोनों माह निकल गए और हम लोग बारिश की चंद बूंदों के लिए  भी तरसते रहे. इस माह भी उमड़ घुमड़ कर बदरा छाते रहे परन्तु न जाने क्यों उनमें बड़ी बेरुखी देखी गयी. बिना बरसे ही आगे बढ़ जाते. हाँ बदली के कारण गर्मी से कुछ छुटकारा जरूर मिला परन्तु उमस  ने बेहाल कर रखा है.  अब कुछ दिनों से रुक रुक कर बौछारें पड़ रही हैं  जिसको  मीडिया झमाझम कह रही है जबकि औसत बारिश भी नहीं हुई है. झीलों की इस नगरी में बड़ी झील का जल स्तर कुछ सेन्टीमीटर ही बढ़ा है जब कि हमें कई फीट चाहिए.  जल प्रदाय का मुख्य स्रोत कोलार बाँध का जल स्तर भी कुछ सेन्टीमीटर ही बढ़ा है. आने वाले दिनों में यदि बारिश न हो तो अगली गर्मी के दिनों में यहाँ से भागना ही पड़ेगा.

बागीचों के पेड़ पौधे भी सूख गए थे और यही हाल हमारे आँगन की बगिया का भी था. परन्तु कुछ बौछारों से प्रसन्न हो सभी पौधों में फिर से प्राण आ गए हैं. उनके द्वारा व्यक्त की जा रही ख़ुशी की  अभिव्यक्ति निम्न चित्रों में है.

अडेनियम या डेज़र्ट रोस

यह एक भारी बेल है, नाम का पता नहीं हैयह गुडहल की बहुत ही छोटी किस्म है

अंग्रेजी में नाम इक्सोरा है.यह अभी अध खिला है. गोलाकार लिए हुए पुष्प गुच्छ बहुत सुन्दर होता है.

यह बहुत ही छोटे फूल हैं. हमें नाम नहीं मालूम है

यहाँ इसे मधुकामिनी  कहते है. बेहद सुगन्धित.

यह बटन गुलाब है. बहुत छोटा परन्तु प्यारा सा

पारिजात – हरसिंगार

नोट:  इन चित्रों में से  कोई भी चुराए हुए नहीं हैं. सब हमारे ही हैं और चुराए जाने की पूरी छूट प्रदत्त है

बस एक शार्क चाहिए!

अगस्त 20, 2010

जापानी, मछलियों के हमेशा से शौकीन रहे हैं. परन्तु उनके समुद्र तट के निकट मछलियां दशाब्दियों से विलुप्त हो चुकी थीं. अतः जापान की आबादी को मछली सुलभ कराने के लिए बड़े बड़े नाव बने जो समुद्र में दूर तक आखेट के लिए जाया करतीं. वापसीयात्रा में नाव भर कर मछली लाते. आने में काफी वक्त लग जाता और मछलियों  की ताजगी खो चुकी होती . इस समस्या के समाधान के लिए मछली पकड़ने वाली कंपनियों ने  अपनी नावों में फ्रीज़र लगवा दिया.  मछुवारे फ्रीज़र में मछलियों को ठूंस ठूंस कर भर लाते. जापानियों को ताजे और फ्रीज़र में रखे मछलियों के स्वाद का अंतर समझ में आ रहा था. उन्हें ताजे के अतिरिक्त कुछ और पसंद नहीं आया. अब कंपनियों ने फ्रीज़र के स्थान पर पानी से भरी टंकियों का प्रयोग शुरू किया. टंकी में मछलियाँ कुछ समय तक तो अपने जोश में रहतीं फिर थक कर सुस्त पड जातीं. मृतप्राय सी.जापानियों को ऐसी मछलियाँ भी रास नहीं आयीं क्योंकि उनके स्वाद में वो ताजगी नहीं थी. मछली उद्योग के सामने विपत्ति सी आ गयी. परन्तु अब जापानियों को उनकी पसंद के अनुरूप एकदम ताज़ी मछलियाँ उपलब्ध करायी जा रही है. क्या किया गया होगा?  हालाकि अब भी कंपनियों द्वारा टंकियों का प्रयोग ही हो रहा है परन्तु टंकी में एक छोटे शार्क को डाल दिया गया. अब मछलियों के सामने एक चुनौती थी, वे  फुर्तीले हो गए और अपने बचाव के लिए चलायमान रहने लगे. यह चुनौती ही उन्हें जीवित और ताजगी से परिपूर्ण रखने लगी.

क्या हमें इस बात का एहसास नहीं है कि हम में से बहुत सारे ऐसे ही टंकियों (कूप) में वास कर रहे होते हैं, थके हुए, ढीले ढाले. मूलतः हमारे  जीवन में ये शार्क ही हमारी चुनौतियां भी हैं. जो हमें सक्रिय रखती हैं. यदि हम निरंतर चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर रहे होते हैं तो हम सुखी होते हैं. हमारी चुनौतियां ही हमें ऊर्जावान बनाये रखती हैं. हमारे पास संसाधनों, कौशल और क्षमताओं की कमी नहीं है. बस एक शार्क चाहिए!

मूल लेख अंग्रेजी में. लेखक अनाम

सभी चित्र इंद्रजाल ओह सॉरी अंतर्जाल से चुराए गए हैं.

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