छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से लगभग ७५ किलोमीटर पूर्व में एक शहर है जयपुर (Jeypore). वहां के स्थानीय लोग जोयोपुर कहते हैं. वैसे उड़िया भाषियों को “ओ” से बड़ी आत्मीयता है. यह है तो उडीसा के कोरापुट जिले में, परन्तु यह कोरापुट से काफी बड़ा है. दक्षिणी उडीस का यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र भी है. समुद्र की सतह से २१६५ फीट की ऊँचाई पर, पूर्वी घाट श्रृखला के हरे भरे पहाड़ों से, घोड़े की नाल की तरह तीन ओर से घिरा यह एक सुन्दर शहर है. यहाँ एक बहुत ही बड़ा तालाब है जिसे जगन्नाथ सागर कहा जाता है.
जगन्नाथ सागर
आज़ादी के पूर्व यह एक देसी रियासत की राजधानी भी रही. यहाँ पुराने किले के खँडहर तथा रजवाड़ा इस बात के द्योतक हैं कि इस शहर का इतिहास भी संपन्न रहा है.इस शहर को राजा विनायक देव द्वारा सन १४५० में बसाये जाने का उल्लेख मिलता है जब कि वास्तव में यह उससे कहीं अधिक प्राचीन है.
रजवाड़े का सिंहद्वार
८ वर्ष की अवस्था में हमें यहाँ आना पड़ा था और यहाँ की स्थानीय भाषाओँ को सीखना पड़ा. वैसे उडीसा में होने के कारण यहाँ ज्यादातर लोग उड़िया बोलते हैं परन्तु तेलुगु बोलने वालों की भी बहुत बड़ी आबादी है. हिंदी बोलने वाले भी कम नहीं हैं. अतः इस नगर को कास्मोपोलिटन कह सकते हैं. यहाँ हर व्यक्ति तीनों भाषाओँ में वार्तालाप करने में सक्षम है.
इस शहर से भी मेरे बाल काल के बहुतेरे अनुभव जुड़े हैं. इस शहर के पूर्व में एक बड़ा पहाड़ है. शीर्ष पर एक लोहे का खम्बा भी था, किसी राजा के द्वारा लगाया गया, परन्तु अब दिख नहीं रहा. हम अपने कुछ साथियों के साथ दुपहर में निकल पड़े थे उसी पहाड़ की तरफ. चाह रहे थे कि उस खम्बे को छू आयें. रास्ते में खाने के लिए अंग्रेजी इमली (गंगा इमली) के कंटीले पेड़ भी बहुत सारे थे. तो पत्थर या किसी डंडे को फ़ेंक फ़ेंक कर बहुत सारी इमलियाँ तोड़ ली थीं. बहुत चलने के बाद हम उस पहाड़ की तलहटी में थे. चढ़ाई भी शुरू कर दी. कुछ ऊपर जाने के बाद समतल सी जमीन भी मिली. वहां खजूर के पेड़ों का झुरमुट भी था. पेड़ भी पुराने और बहुत सारों के तने तो खोखले हो गए थे. मटरगश्ती करते आगे बढ़ ही रहे थे. जमीन में मानव के अस्ति पंजर बिखरे पड़े थे. कई खोपड़ियाँ भी दिखीं. अचानक एक खजूर के खोखले तने पर नज़र पड़ी. हमारी पेंट गीली हो गयी. पेड़ के खोल में एक मानव था. लाश ही रही होगी. हम सब वहां से दौड़ पड़े और पहाड़ के दाहिनी ओर से सोमरतोटा के शिव मंदिर जा पहुंचे. देर शाम घर भी आ गए थे. ज्वर से पीड़ित. दो दिनों तक बुखार नहीं उतरा था.
यकीनन वह स्थल वहां के आदिवासियों का श्मशान ही था. अब समझ में आया है कि यह Tree Burial ही था परन्तु वहां के आदिवासियों में ऐसे किसी परंपरा की जानकारी नहीं है. वह कोई अपवाद स्वरुप किसी विशेष परिस्थिति में किया गया होगा.
एक बार अस्पताल जाते हुए पुलिस थाने के ठीक सामने सड़क के उस पार कुछ पुलिस वाले कबूतर को थामे हुए थे. एक कबूतरखाना खम्बे पर बना हुआ था. मेरे लिए तो यह कौतूहल का विषय था ही, सो हम भी उस कम्पौंड में घुस गए परन्तु हमें भगा दिया गया. वहां कबूतरों के माध्यम से जिला मुख्यालय कोरापुट तक सन्देश पहुंचाए और प्राप्त किये जाते थे. मैंने कई बार उनकी प्रक्रिया को जानने की कोशिश की थी. कबूतर के पाँव में कुछ बाँधा जाता था और दो कबूतर एक साथ उड़ जाते थे. कबूतरों के माध्यम से संदेशों के आदान प्रदान को देखने का यह मेरा पहला और अंतिम अवसर रहा है.
जीवन में सबसे पहले इसी शहर में मुझे कुत्ते ने काटा था. गिरिजेश जी यदि पढेंगे तो बड़े प्रसन्न होंगे. संयुक्त परिवार था. घर में किसी की बीमारी के लिए मुझे अस्पताल से दवा लाने के लिए कहा गया. पर्ची तो पहले से बनी थी. मुझे केवल वहां दिखाना भर था और कॉमपाउंडर द्वारा दवा दी जाती थी. हुआ यों कि रस्ते में पुलिस थाने के पास बड़े इमलियों के पेड़ के नीचे कुछ सोडा बेचने वाले खड़े थे. एक दो पहिये वाली गाडी जिसमे अनेकों बोतल रखने के खांचे बने होते थे. उसमें हत्ता बना होता था जिसे पकड़ कर वे कहीं भी ठेलते हुए जा सकते थे. एक कुत्ता ठेले के पास आकर बोतलों को सूंघने लगा. मैं पास से गुजर रहा था. ठेले वाले ने कुत्ते को भगाने की बहुत कोशिश की और अंत में नीचे पड़े एक ईंट के टुकड़े से कुत्ते को दे मारा. ईंट का टुकड़ा कुत्ते को जम कर लगा और मेरे पास ही आ गिरा. मैं अपने आप को बचाने के लिए कुछ भागा इतने में कुत्ते ने मेरी टांग दबोच ली. मांस का एक बड़ा टुकड़ा उसने बेरहमी से उखाड़ दिया. मैंने हाथ में पकडे हुए बोतल से उसके सर पर कई प्रहार किये तब कही उसने मुझे छोड़ा लेकिन तुरंत ही फिर जांघ पर हमला कर दिया. इस बीच लोग आ गए. मैं सड़क पर गिर पड़ा था, लहू लुहान. अस्पताल पास ही था तो लोगोंने मुझे वहां पहुंचा दिया. प्राथमिक चिकित्सा से काम नहीं बना तो मुझे अन्दर टेबल पर उलटे लिटा कर कटे फटे हिस्से की सिलाई कर दी. सुई में घोड़े के बाल का प्रयोग हुआ था. अब १४ इंजेक्शन का सवाल था. वह दवा जयपुर में उपलब्ध नहीं थी. हमारे एक मामाजी हमें बस में बिठा कर कोरापुट ले गए, वहां के जिला अस्पताल में. उनके सुई के आकार को देखकर ही मेरे होश उड़ गए. हम लंगडाते हुए भाग खड़े हुए लेकिन सफल नहीं हो सके. पहली सुई तो पेट में नाभि के पास लगी परन्तु जैसा हम सोच रहे थे उतना दर्द नहीं हुआ. यह सिलसिला हर रोज चला. केवल १३ इंजेक्शन ही लग पाए. दवा ख़त्म हो गयी. क्योंकि एक लगना रह गया था, कभी कभी अपना असर दिखा देता है.


जनवरी 21, 2011 को 7:19 पूर्वाह्न पर
जोयोपुर ही ठीक है -राजस्थान वाले से गलतफहमी तो नहीं होगी !
आदिवासियों का सामूहिक बरियल -क्या बात रही होगी ?
कबूतरों से सन्देश प्रेषण यहाँ से भी -वाह क्या जानकारी दी आपने
गिरिजेश जी दुखी होंगें न -पुराना दर्द उभर नहीं आयेगा ?
बाप रे आप भी चौदह सुई वाले निकले
जनवरी 21, 2011 को 7:50 पूर्वाह्न पर
आपके निजी अभिलेखागार का एक और कीमती दस्तावेज. पोस्ट की अंतिम पंक्ति … चलिए, यह मुद्दा बातचीत के लिए बचा रखते हैं.
जनवरी 21, 2011 को 8:34 पूर्वाह्न पर
बचपन के दिन स्मृतिपटल पर अब भी स्पष्ट।
जनवरी 21, 2011 को 10:54 पूर्वाह्न पर
आप के बचपन के साथ हम अपने बचपन में भी हो आए। यूँ आपके और हमारे बचपन में सालों का फ़ासला है।
कुत्ते के काटने और पहाड़ वाला प्रसंग रोचक है।
जनवरी 21, 2011 को 11:42 पूर्वाह्न पर
रोचक!
जनवरी 21, 2011 को 12:06 अपराह्न पर
आपकी खोजी प्रकृति और जीवट बचपन में भी ऐसा था. देख कर खुशी हुई. कुत्तों के बारे में माना जाता है कि यह समझदार जानवर है. परंतु सभी जानवरों (मनुष्य सहित) के बारे में यह सच है कि- ‘रीझे तो चाटे, खीजे तो काटे’
जनवरी 21, 2011 को 2:20 अपराह्न पर
आपके वर्णन करने के तरीके में ही शायद कुछ ऐसा है कि हर जगह अपने आप में ख़ूबसूरत और अद्वितीय लगने लगती है और वहाँ एक बार जाने का मन करने लगता है… काश आपके ब्लॉग के जैसा कोइ प्रामाणिक और वास्तविक जानकारी देने वाला ब्लॉग अंग्रेजी में भी होता तो विदेशी लोग भी भारत की महान विरासत और अद्वितीय सौंदर्य को जान और समझ पाते…
जनवरी 21, 2011 को 2:53 अपराह्न पर
@ सतीश चन्द्र सत्यार्थी:
आपके इस सुन्दर टीप के लिए आभार. हम अंग्रेजी में भी लिखते हैं परन्तु यदा कदा. यहाँ देखें:
http://paliakara.blogspot.com
जनवरी 21, 2011 को 4:39 अपराह्न पर
अनपने काम के एक अंश( ग्रामीण विद्युतीकरण ) के सिलसिले में इस जिले का ज़िक्र आता है. आज इसके बारे में और जांकारी मिली तो अच्छा लगा .बचपन के संस्मरण सुनने सुनाने का मज़ा अलग ही है.
जनवरी 21, 2011 को 4:55 अपराह्न पर
नसीहत ये कि बचपन में कभी जगदलपुर से जयपुर ना जायें और अगर जाना ही पड़े तो पहाड़ से दूर रहें इसके बावजूद भी बुखार हो जाए तो सोडे वालों के ठेले की तरफ तो बिलकुल भी ना जायें
कुत्ता फिर भी काट ले तो चिंता मत कीजिये आजकल , आदरणीय सुब्रमनियन जी के ज़माने से वो बचा वाला एक ही इंजेक्शन लगता है
जनवरी 21, 2011 को 5:39 अपराह्न पर
वह सुब्रमण्यन साहब !
गंगा-इमली तो हमने भी बहुत खाई है ।
आज भी मेरे घर के सामने के बगीचे में
कोने में एक दो वृक्ष लगे हैं, लेकिन न जाने
क्यों आजकल के बच्चों को या तो वक्त नहीं,
या कोई बतलाता ही नहीं ।
सचमुच बहुत रोचक जानकारी है ।
अपने-आप पर हँसना तो कोई आपसे सीखे ।
इस जिन्दादिली के लिये आपकी तारीफ़ करना चाहूँगा ।
सादर,
जनवरी 21, 2011 को 9:19 अपराह्न पर
रोचक और सचित्र नई जानकारियों के लिए आपको धन्यवाद.
जनवरी 21, 2011 को 9:52 अपराह्न पर
आज तो मजा आ गया, किस मूड में थे आप! वाह.
जनवरी 22, 2011 को 12:56 पूर्वाह्न पर
भ्रमण के आपके शौक का बीजारोपण बचपन में ही हो गया था, यह कन्फर्म हो गया इस पोस्ट से
.
जनवरी 22, 2011 को 2:02 पूर्वाह्न पर
तय नहीं कर पा रहा हूँ कि पोस्ट की विषय वस्तु क्या है – जयपुर का परिचय या कुत्ते का आपको काटना। दोनों ही वर्णन रोचक और सॉंस रोक कर पढे जानेवाले।
चित्र तो सदैव की तरह लयनाभिराम हैं ही – आपके उत्कृष्ट चयन के परिचायक।
जनवरी 22, 2011 को 9:35 पूर्वाह्न पर
मेरा ख्याल था आपका बचपन जगदलपुर में बीता था!
जोयोपुर,,, बंगाल आदि प्रदेशों में, मुंह में अधिकतर पान रखा होने से, ‘जयपुर’ का उच्चारण जोयोपुर? असम में मैंने देखा कैसे वे औहम् उच्चारते थे! बचपन में हम भी अपने भाई-बहन को सूखे सूजी से बने प्रसाद को मुंह में रख फूफाजी कहने को बोलते थे !
जनवरी 22, 2011 को 11:59 पूर्वाह्न पर
बहुत ही रोचक विवरण और तस्वीरों के साथ सुन्दर पोस्ट। धन्यवाद।
जनवरी 22, 2011 को 1:53 अपराह्न पर
क्या कहें?
भूली हुई यादों…..
नहीं-नहीं
हमें तुम याद करना और………….
कुछ इसी टाइप का मामला है न!
अच्छा लगा.
जनवरी 22, 2011 को 4:16 अपराह्न पर
मेरी बात तो अरविन्द जी ने सबसे पहले ही कह दी . मैं भी १४ सुई वाला ………..:)
जनवरी 22, 2011 को 7:13 अपराह्न पर
आज तो पढ कर मजा आ रहा है पर उस दिन का सोच कर…….. उरी बाबा
जनवरी 23, 2011 को 6:44 अपराह्न पर
पढ़ कर सोच रहा था कि ये है क्या? भ्रमण, पर्यटन, नोस्तल्ज़िया, व्यंग्य या साथी ब्लॉगर्स को ध्यान से पढ़ते हैं, इसका सुबूत। जवाब है – सब कुछ। जैसा ऊपर एक टिप्पणीकार ने कहा, आप को पढ़ते हैं तो आपके द्वारा वर्णित हर जगह खूबसूरत लगती है, ऐसा ही है। हर जगह खूबसूरत, हर बात मजेदार। एक इंजैक्शन की कमी का असर , हा हा हा। और सर, ये श्वान पीडि़त अकेले गिरिजेश जी ही नहीं है, उनके कद के बराबर तो नहीं, लेकिन और भी हैं बिरादर:)
गज़ब पोस्ट।
जनवरी 24, 2011 को 10:04 पूर्वाह्न पर
जोयोपुर में रेलवे स्टेशन भी है ना?
जनवरी 24, 2011 को 10:28 पूर्वाह्न पर
राप्चिक पोस्ट है, एकदम मस्त।
जनवरी 24, 2011 को 8:06 अपराह्न पर
सुंदर चित्रों से सजा आलेख और बचपन कि यादें बहुत अच्छी लगीं . अरे मैं तो समझती थी कि कुत्ते कि मुझसे ही कोई पुरानी दुश्मनी है क्योंकि मुझे तो दो बार चख चुका है. आपका भी स्वाद ले चुका है.
जनवरी 24, 2011 को 10:10 अपराह्न पर
बहुत ही रोचक संस्मरण हैं….कई सारी नई जानकारियाँ मिलीं.
कबूतर के माध्यम से संदेश भेजा जाना….किस्से-कहानियों की बात लगती थी…पर अपने देखे भी हैं….क्या बात है.
और कुत्ते के काटनेवाला संस्मरण तो…बहुत ही डरावना है….फिर भी डरते डरते पढ़ ही डाला.
जनवरी 25, 2011 को 3:03 अपराह्न पर
आपके संस्मरण, जानकारी और अनुभूतियों का ऐसा खजाना होते हैं, जिन्हें जितनी बार पढा जाए, उतना आनन्द मिलता है।
और हां, क्या आपको मालूम है कि हिन्दी के सर्वाधिक चर्चित ब्लॉग कौन से हैं?
जनवरी 25, 2011 को 4:41 अपराह्न पर
घूम न पाने का गम आपका ब्लॉग पढ़ कर कुछ कम हो जाता है.
जनवरी 26, 2011 को 12:42 पूर्वाह्न पर
यह पोस्ट बहुत अलग लगी. पेड़ में शव! अजब गजब किस्सा है.
घुघूती बासूती
जनवरी 30, 2011 को 12:12 अपराह्न पर
एक इंजेक्सन नहीं लगना ठीक हुआ नहीं तो हम सारा कुछ पढने से वंचित होजाते और सैर का मजा भी नहीं आता.
जगन्नाथ सागर में भी मजा आया.आँखों के कारन नेट पर आना मना था सो देर से आ पाया.
जनवरी 30, 2011 को 12:14 अपराह्न पर
TREE BURIAL
FIRST TIME CAME TO KNOW IT.
फ़रवरी 1, 2011 को 4:37 अपराह्न पर
“कभी कभी अपना असर दिखा देता है….”
सच कहूँ,हंस हंस कर बुरा हाल हो गया है…आप कहेंगे कैसी असभ्यता है,निर्ममता है..पर क्या कहूँ ….है…
लाजवाब रोचक पोस्ट पढवाई आपने…
बहुत बहुत आभार.
फ़रवरी 3, 2011 को 11:45 पूर्वाह्न पर
अच्छी जानकारी दा आपने। धन्यवाद। मेरी उड़ीसा यात्रा बाकी है अभी।
फ़रवरी 3, 2011 को 11:50 पूर्वाह्न पर
कुत्ते के असर वाली बात तो अकेले में पागलों की तरह हंसने वाली साबित हुई।
फ़रवरी 3, 2011 को 11:53 पूर्वाह्न पर
अच्छी जानकारी दा आपने। धन्यवाद। मेरी उड़ीसा यात्रा बाकी है अभी।
फ़रवरी 3, 2011 को 11:56 पूर्वाह्न पर
कुत्ते वाली बात पढ़कर तो अकेले में पागल के हंसने जैसी साबित हुई। हास्यरस से परिपूर्ण प्रयास।
फ़रवरी 8, 2011 को 7:41 पूर्वाह्न पर
बेदर्द ज़माना क्या जाने ये दर्द भरा अफसाना!
जॉयपुर के बारे में जानकर अच्छा लगा। बस यह अंग्रेज़ी इमली के बारे में कुछ और जानकारी या चित्र मिल जाता तो अच्छा रहता।