हमारे परिसर में एक कुकुर है, शुद्ध देसी परन्तु सफ़ेद और भूरे रंग के कारण अच्छा ही दीखता है परन्तु उसकी आँखें कुछ डरावनी सी हैं. वैसे सीधा है. घरों में बची रोटियों पर उसका एकाधिकार बन गया है. किसी दूसरे कुत्तों को घुसने भी नहीं देता. अभी करीब छह महीने पहले वह एक नाबालिग कुतिया को भगा लाया. शायद कुतिया को भी सरक्षण की आवश्यकता रही होगी. अजीब बात यह रही की हमारा लालू हर घर में अपनी उस कुतिया को लाकर खड़ा कर देता मानो कह रहा हो देखो, मेरी दुल्हन को. फिर याचना का भाव लिए खड़ा रहता, शायद मुह दिखाई में कुछ मिले.
एक महीने के बाद ही उनकी प्रेम क्रीडा प्रारंभ हो गयी. परिसर वालों ने खूब मजे लिए. तीन माह के अन्दर ही कुतिया प्रसव के लिए तैयार थी. परिसर में ही एक वर्मा जी रहते हैं. उनका घर और आँगन दूसरों की अपेक्षा बड़ा है. आँगन के सामने और किनारे गमलों के अलावा जमीन पे ही पेड़ पौधे भी लगे थे. किनारे कोने में एक बोगनविलिया पेड़ बन चला था. एक सुबह जब वर्मा जी ने उठ कर जब अपने आँगन में देखा तो वह बोगनविलिया का पेड़ धराशायी हो गया था. जहाँ उसके जड़ें थी वहा एक गड्ढा बना था और वह कुतिया अपने चार बच्चों के साथ विश्राम कर रही थी. वर्मा जी की आहत सुनकर कुतिया ने भोंकना शुरू कर दिया. स्थल निरीक्षण से पता चलता था की रात में ही कुतिया घर में घुस आई थी और अपने पंजों के बल पेड़ के चरों तरफ की मिटटी खोद डाली और पेड़ को जड़ सहित उखाड़ दिया ताकि उसके प्रसव के लिए अनुकूल स्थल बन सके.
अब वर्मा जी परेशान की क्या किया जाए. उन्होंने परिसर के स्वीपर की सहायता से कुत्ते के पिल्लों को अपने घर से हटवा कर परिसर के बागीचे के एक कोने में रखवा दिया. ठण्ड का प्रकोप बढ़ गया था और बर्दाश्त न कर सकने के कारण दो पिल्लै अल्लाह को प्यारे हो गए. बागीचे के सामने एक भट्टाचार्यजी रहते हैं. वे बड़े ही पशु प्रेमी हैं. उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ. वे मेरे घर आये और हमारे यहाँ पड़े एक पुराने एक्वेरियम को उठा ले गए. हमने पुछा था की इसका क्या करोगे तो उन्होंने कहा की बचे हुए दोनों पिल्लों को उसमें रख देंगे और रात को उढ़ा दिया करेंगे. फिर हमने पुछा की कुतिया दूध कैसे पिलाएगी तो उन्होंने मुस्कुराके कहा आप देखते जाईये. हुआ यों की कुतिया भी एक्वेरियम में घुस गयी और अपने लिए जगह बना ली. हमारा लालू भी बाकायदा पहरेदारी किया करता. अब पिल्लै कुछ बड़े हो गए हैं और शैतान भी. कारों के नीचे बैठे रहते हैं और कोई भी बगल से गुजरा तो दौड़ कर बाहर आ जाते हैं. पीछे से पेंट पकड़ कर खींचते हैं. उनका स्तनपान भी अभी नहीं रुका है.
नोच कर दूध के स्तनों को,
क़त्ल माँ का किये जा रहे हो!
इस परिवार को देख कर ऐसा नहीं लगता की वे कुत्ते हैं. उनमे दिखने वाला लगाव और समर्पण भाव परिसर के लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गया है.
उधर दूसरी तरफ परिसर में ही एक पंडितजी भी रहते हैं जिन्हें किसी भी प्रकार की ध्वनि से ही परहेज है. उनके घर में बिजली की घंटी भी निकाल दी गयी है और रात को यदा कदा कुत्तों का भौकना बड़ा नागवार गुजरता है. हर किसी से शिकायत करते रहते हैं. उन्होंने भी इन पिल्लों को ठिकाने लगवाने की योजना बना ली है परन्तु परिसर के उस पशु प्रेमी के रहते वे शायद ही सफल हों.
हमारे ब्लोग्गर बंधुओं में बहुतेरे कुकुरों के प्रति अति संवेदनशील दिखे थे अतः एक पोस्ट ठेल दी. अब उनकी टिप्पणियां भी मिल ही जायेंगी. एक पंथ दो काज.

फ़रवरी 6, 2011 को 7:46 पूर्वाह्न पर
@@हमारे ब्लोग्गर बंधुओं में बहुतेरे कुकुरों के प्रति अति संवेदनशील दिखे थे अतः एक पोस्ट ठेल दी. अब उनकी टिप्पणियां भी मिल ही जायेंगी. एक पंथ दो काज.
सही है ,टिप्पणियां तो मिलेगी.
फ़रवरी 6, 2011 को 8:05 पूर्वाह्न पर
लो जी एक टिप्पणी…
बहुत अच्छी प्रणय गाथा है….
आज आपकी कलम नए विषय पर चली और आपने यहाँ भी अपनी धाक जमा दी ! शुभकामनायें !
फ़रवरी 6, 2011 को 8:28 पूर्वाह्न पर
पोस्ट पढता गया और मुस्कुराता चला गया …शीर्षक होना था एक कुक्कुर प्रणय कथा ….कमेन्ट और मिलते ….
चित्र कम लगाए
फ़रवरी 6, 2011 को 8:50 पूर्वाह्न पर
विस्तृत सर्वेक्षण और सूक्ष्म अध्ययनवाली अच्छी पोस्ट है। पिल्ले नवजात की अपेक्षा कुछ बडे लग रहे हैं।
फ़रवरी 6, 2011 को 10:13 पूर्वाह्न पर
आपके कॉलोनी वाले शायद इस कुत्ते को निकालने में सफल हो जाय … पर काश हम इसके एक हमनाम को इस देश से निकालने में सफल हो पाते …. इस कुत्ते ने तो केवल कुछ कॉलोनी वाले को परेशान किया है … पर उसके हमनाम ने तो पूरा देश को और खास करके एक राज्य को बर्बाद कर दिया है …
फ़रवरी 6, 2011 को 10:58 पूर्वाह्न पर
फ़रवरी 6, 2011 को 3:09 अपराह्न पर
कुत्ते संभवतः मनुष्यों से अधिक संवेदनात्मक होते हैं।
फ़रवरी 6, 2011 को 5:32 अपराह्न पर
उत्तम कुक्कुर पुराण..
फ़रवरी 6, 2011 को 7:56 अपराह्न पर
आप का लालू तो बहुत सुंदर हे जी, ओर पिल्ले भी खुब गोलमटोल लगे,इस का नाम लालू से बदल कर कुछ ओर रख दे, क्योकि कुत्तो मे वफ़ादारी होती हे, ओर यह जिस का खाते हे उन से गद्दरी नही करते, इस लिये लालू नाम से लगता हे हम इस की बेइज्जती कर रहे हो, क्योकि एक लालू के बारे सुना हे….. जो हद से ज्यादा….छोडो जी
फ़रवरी 6, 2011 को 9:41 अपराह्न पर
आपका लालू(भी) भैरी भैरी स्मार्ट है। उसकी दुल्हनिया का नाम नहीं बताया आपने। आपके प्रिय विषय से हटकर है, हमारा भी प्रिय विषय नहीं है फ़िर भी कमेंट कर रहे है, पोस्ट ही इतनी अच्छी लगी।
लालू, उसकी ब्घाकर लाई गई नाबालिग और बची संतान का घर संसार कायम रहे।
फ़रवरी 6, 2011 को 9:50 अपराह्न पर
बहुत ही अच्छी पोस्ट के लिए बधाई. आपकी वर्णन शैली तस्वीर की भी तस्वीर खींच देती है. वाह.
फ़रवरी 6, 2011 को 9:51 अपराह्न पर
बधाई लालू को ………वैसे नाबालिग कैसे है आपने कैसे जाना
फ़रवरी 7, 2011 को 12:33 पूर्वाह्न पर
आपकी संवेदनशील दृष्टि को भी दर्शाती काफी रोचक पोस्ट.
फ़रवरी 7, 2011 को 4:22 पूर्वाह्न पर
काजल कुमार से सहमत !
फ़रवरी 7, 2011 को 5:59 पूर्वाह्न पर
अगल-बगल घटती घटना और बनती कहानी को मानों बस आपकी निगाह और शब्दों की देर थी.
फ़रवरी 7, 2011 को 6:53 पूर्वाह्न पर
आदरणीय सुब्रमणियन,
वैसे तो पोस्ट रोचक है, और इसमें संदेह नहीं कि आपकी लेखनी भी बहुत अभ्यस्त है,
किसी भी वृत्तान्त को सुचारु रूप से प्रस्तुत करने में, किंतु ऐसे विषय आप नये ब्लॉगर्स
के लिये छोड़ दें तो अच्छा रहेगा,
सादर,
फ़रवरी 7, 2011 को 9:36 पूर्वाह्न पर
बढ़िया चित्रकथा है जी। लालू खुद तो कह नहीं सकता था, उसकी कहानी आप ने सुनाकर उसका भी भला कर दिया।
फ़रवरी 7, 2011 को 1:19 अपराह्न पर
चलिए इस नाम को आपने पवित्र कर दिया. धन्यवाद!!!
फ़रवरी 7, 2011 को 1:35 अपराह्न पर
रोचक कुकुर कथा।
फ़रवरी 7, 2011 को 3:00 अपराह्न पर
प्रयोग सफल है आपका..बहुत ही सुन्दर पोस्ट …..इस प्रकार की पोस्ट का क्रम बाधित न कीजियेगा…
मुझे तो संसार का प्रत्येक प्राणी मनुष्य से अधिक कर्तब्यनिष्ठ और संवेदनशील लगता है…
फ़रवरी 7, 2011 को 6:41 अपराह्न पर
वैसे भी मौसम प्रणय गाथाओं का है। एक से एक धांसू कथाएं आ रही है।
इसमें लालू की कथा ने चार चांद लगा दिए और आपने इस पर की बोर्ड खटखटा कर अमरता प्रदान की। आभार
शुभकामनाएं
फ़रवरी 9, 2011 को 7:41 अपराह्न पर
बस थोड़ी जल्दी कर दी, नहीं तो वैलेंटाइन डे आ रहा था उस पर पोस्ट करके समसामयिक हो जाती. अजी यह दिन तो सभी के लिए है.
वैसे ये जाति भी प्रेम और वफादारी के लिए के मिसाल है. हम से भले तो ये कुकुर हैं.
फ़रवरी 10, 2011 को 2:13 पूर्वाह्न पर
पा .ना.सु . जी,
आपकी इस अलग पोस्ट ने न जाने कितनी यादें ताजा कर दीं . वैसे मेरे गाँव के हमारे कुत्ते का नाम भी ‘ लालू ‘ है . उसके नामकरण का इतिहास भी बहुत ही रोचक है .बचपन से ही मैं भी श्वान प्रेमी रहा .मेरी छोटी बेटी आज भी न्यू योर्क में अनाथ हुए कुत्तों के लिए अभिभावक ढूँढने के स्वयंसेवी काम में लगी है .आप ‘ लगे हाँथ ‘ टिप्पणी की बात कर रहे थे . मैं अभिभूत हूँ . एक पोस्ट ही ‘ स्वान चर्चा ‘ कर आपको समर्पित करने का मन बन गया है . देखिये यह इक्षा कब पूरी होती है .
फ़रवरी 12, 2011 को 7:45 पूर्वाह्न पर
निसंदेह पशु प्रेमियों के रहते उनकी कोई योजना सफल नहीं हो सकेगी ।
फ़रवरी 15, 2011 को 5:23 अपराह्न पर
विद्वानों के कमेंट देख अभिभूत हूं, और अधिक क्या कहूं।
———
अंतरिक्ष में वैलेंटाइन डे।
अंधविश्वास:महिलाएं बदनाम क्यों हैं?
फ़रवरी 15, 2011 को 9:24 अपराह्न पर
nice
फ़रवरी 17, 2011 को 3:41 अपराह्न पर
सुब्रमनियम जी नमस्कार । वसंत के अवसर पर आपकी श्वान प्रणय कथा काफी रोचक लगी । नाबालिग कुतिया को भगा लाया पढ कर काफी हंसी आई । आपका लालू और उसकी लाली परिवार सहित आनंद से रहें ।
फ़रवरी 18, 2011 को 1:50 अपराह्न पर
vrey interesting expression of the great animal sir ……………
thank you…… take care
मार्च 1, 2011 को 7:11 अपराह्न पर
शब्द चयन बड़ा ही आनंददायक रहा.
अप्रैल 6, 2011 को 8:22 अपराह्न पर
रोचक कुत्ता पुराण !
अप्रैल 22, 2011 को 9:58 पूर्वाह्न पर
सुब्रमनियम साहब, आप के अबाव को समजती हऊँ परंतु लिखने से मन के दुक कम हो जायेंगे इसलिये लिखते रहिये ।
अप्रैल 22, 2011 को 9:59 पूर्वाह्न पर
सुब्रमनियम साहब, आप के अभाव को समजती हूँ परंतु लिखने से मन के दुख कम हो जायेंगे इसलिये लिखते रहिये ।
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