Archive for मई, 2011

बूढ़ा कुत्ता

मई 30, 2011

मेरी पत्नी  के निधन के  बाद इस ग्रीष्म कालीन छुट्टियों में मेरी बिटिया मिलने आयी. मेरे  भी सेवानिवृत्त हुए लगभग एक दशक हो चले थे. मुझे बहलाए रखने में  उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. एक दिन कहा, संस्थाओं को अपने सेवानिवृत्त अधिकारियों को वापस बुलाकर, सलाहकार बना लेना चाहिए. आखिर उनके अनुभव का लाभ संस्था को मिलेगा न? सुनकर बड़ा अच्छा लगा. हमने उसे बता दिया कि हमारे संस्थान में एक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय स्तर पर कुछ प्रशिक्षकों को पंजीकृत किया गया है और उनमे से एक मै भी हूँ. प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रवचन देने का ३००० रुपये प्रति दिन तय है. यदि मुझे इसका लाभ लेना हो तो हर माह स्थानीय  प्रशिक्षण केंद्र के प्रमुख, जो हर मायने में  हमसे कनिष्ट ही होगा, को सलाम करने जाना होगा. मतलब अपनी मार्केटिंग. ग्लोबलाइसेशन के इस दौर में यह तो अपरिहार्य है.  हमें एक कुत्ते की याद आ गयी.

“एक मालदार आदमी,  अरे अपने वही भाटिया जी जो जर्मनी में रहते हैं, शिकार करने अफ्रीका गये. साथ के लिए अपने बूढ़े कुत्ते को भी ले लिया जिसका  नाम किल्लर था. एक दिन किल्लर खरगोशों का पीछा करते हुवे भटक गया. उसी समय उसने देखा कि एक तेंदुआ दौड़े चला आ रहा है, अपने नाश्ते के लिए. बूढा किल्लर घबराया परन्तु नजदीक ही पड़े हड्डियों में से एक को चबाने लगा. जब तेंदुआ पहुंचा तो उस बूढ़े किल्लर ने कहा बेटा आ गए!  देखो अभी ही इस तेंदुवे का स्वाद लिया है. सोच ही रहा था कि एक और  मिल जाए तो मजा आ जाता. यह सुन तेंदुवे की हालत ख़राब हो गयी. मन में यह सोच, साला, मुझे भी खा जाएगा, उल्टे पैर भाग खड़ा हुआ. पेड़ पर बैठा एक बन्दर इस पूरी घटना को देख रहा था. उसने सोचा चलो इस ज्ञान का प्रयोग कर अपना बचाव कर सकते हैं.  दौड़ा दौड़ा वह तेंदुवे तक पहुँच ही गया और उसने तेंदुवे को वास्तविकता से अवगत करा दिया.
तेंदुवा क्रोधित हो बोला चल मेरे पीठ में बैठ जा, उस दुष्ट कुत्ते को देख लेते हैं.
तेंदुआ वापस आया, अपने पीठ पर बन्दर को बिठाकर.
किल्लर ने देख लिया कि तेंदुआ बन्दर के साथ वापस आ रहा है. अब तो शामत ही है.  परन्तु किल्लर ने पीठ फेर ली मानो उसने कुछ देखा ही न हो और जोर से चिल्लाया, साला बन्दर, एक घंटे हो गए अब तक वापस नहीं आया. उससे कहा था कि दूसरा तेंदुआ ढून्ढ कर ला.”

कहानी सुनने के बाद बिटिया ने कहा, पापा आप बहुत इर्रेलेवेंट बात करते हो. प्रत्युत्तर में हमने कहा, देखो यह तुम्हारी समस्या है. रेलेवंस तुम्हें ढूँढना है.    इस कहानी में तेंदुए की जगह “मुर्गा” फिट कर लो. साधारण मुर्गा नहीं चलेगा, शुद्ध देसी होनी होगी. बूढ़े कुत्ते से कहा जाएगा, जा कडकनाथ लेकर आ.

घुघूती (पांडुक)

मई 23, 2011

एक लम्बे समय से “घुघूती” को  लेकर हम बड़े असमंजस में थे. आखिर  यह बला क्या है!   ब्लॉगजगत में उत्कृष्ट लेखन के लिए ख्याति प्राप्त एक घुघूती जी भी तो हैं. मुंबई प्रवास  के दौरान उनसे मिल लेने की इच्छा प्रबल हो गयी. उन्होंने भी पुलकित हो हमें  अपने घोंसले  में आने का निमंत्रण दे दिया. बड़े ऊंचे पेड़ पर अपना घोंसला बना रखा था. इतना ऊंचा कि ऊपर से नीचे का आदमी एकदम बौना लगे. वहां एक चौकीदार था. हमने उनसे पूछा, भैय्या १२ वीं डगाल पर जाना है और घुघूती  जी से मिलना है. उसने फिर पूछा १२ वें माले में जाना है? हमने कहाँ हाँ भैय्या. चौकीदार नाराज सा दिखा कहा हम भैय्या नहीं न हैं, हम  तो गारद हैं. फिर हमने कहा ठीक है न भैय्या हमें रास्ता तो बता दो.  तो आप भैय्या बोलना नहीं छोड़ोगे, गारद साहब गरजे. तो फिर हमने कहा अच्छा भैय्या, भाई साहेब तो चलेगा. खैनी वैनी कछु है तो खिला दो. गारद खुश, तुरंत पुडिया निकाली और हमें प्रसाद  देते हुए कहा, आप क्या नाम बोले थे, घूटी? ऐसा नामवाला तो वहां नहीं है. फोनवा का नंबर है? हमने कहा हाँ. तो नम्बरवा मिलाओ और बात करो न. हमने गारद महोदय के सलाह का अनुसरण किया और लिफ्त्वा में चढ़कर घुघूती जी के घोंसले के सामने पहुँच ही गए जहाँ घुघूती जी हमारी प्रतीक्षा कर रही थीं. बहुत सारी गुटुर्गू हुई और फिर हम लौट आये थे.

अभी हाल ही में “सिंहावलोकन” में श्री राहुल सिंह ने बताया कि उनके यहाँ घुघूती ने अंडे दिए हैं. हमने तुरंत रपट कर दी घुघूती जी को.  बड़ी नाराज़ हुईं, देखो लोग मेरी अनुमति के बगैर मेरे बारे में लिखे जा रहे हैं. कॉपी राईट तो मेरा ही है ना.

राहुल जी से ही पहली बार हमें ज्ञात हुआ कि घुघूती केवल उत्तराँचल में ही नहीं पायी जाती. पूरे भारत में है. छत्तीसगढ़ में पंडकी   कहते है और मै पंडकी को जानता था.

मुझे भी कभी पक्षी प्रेमी होने का गुमान था लेकिन उनके लिए दाना और पानी रखने के सिवा कुछ आगे नहीं बढ़ पाया. सही मायने में उनसे दोस्ती कभी न हो सकी. आज का दिन कुछ विशेष रहा. पिछले  २/३ महीनों से घर कुछ अव्यवस्थित हो चला था. चिड़ियों की परवाह कौन करे. परन्तु आज एक घुघूती घर में घुस आई. कनकी/चावल के बोरे के पास बैठी थी. हमें चिंता थी की कहीं वह चलते पंखों की चपेट में न आ जाए. घंटों की मशक्कत के बाद कहीं उसे पकड़ा जा सका और बाहर एक गमले में बिठा दिया. उसके लिए पीने के लिए एक कटोरे में पानी और जमीन पर ही चावल के दाने बिखेरे गए.

हमें तो लगता है कि कुछ पक्षी मानव प्रेमी भी होते हैं और उनमें पंडकी भी एक है. आज उसे शिकायत थी.


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