एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में पुरी (जगन्नाथ पुरी) का उल्लेख सर्वप्रथम महाभारत के वनपर्व में दृष्टिगोचर होता है और इस क्षेत्र की पवित्रता का बखान कूर्म पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, आदि में यथेष्ट रहा है. पुरी के सांस्कृतिक इतिहास के ठोस प्रमाण ७ वीं सदी से ही उपलब्ध हैं जब “इंद्रभूति” ने बौद्ध धर्म के “वज्रायन” परंपरा की नीवं डाली थी. कालांतर में पुरी वज्रायन परंपरा का पूर्वी भारत में एक बड़ा केंद्र बन गया. इंद्रभूति ने बुद्ध स्वरुप जगन्नाथ की आराधना करते हुए ही अपने प्रसिद्द ग्रन्थ “ज्ञानसिद्धि” की रचना की थी. इसी ग्रन्थ में अन्यत्र भी जगन्नाथ का उल्लेख हुआ है. इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि उन दिनों जगन्नाथ का संबोधन गौतम बुद्ध के लिए ही किया जाता रहा है. इंद्रभूति ने वज्रायन पर कई अन्य महत्त्व पूर्ण ग्रंथों की भी रचना की थी. जगन्नाथ के बुद्ध होने का एहसास जन मानस पर बहुत ही गहराई से उतरा हुआ था. विद्वानों का मत है कि जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा वास्तव में बौद्ध धर्म के “बुद्ध”, “संघ” और “धर्म” (धम्म) के परिचायक हैं. १५ से लेकर १७ वीं सदी के मध्य भी ओडिया साहित्य में इसकी अभिव्यक्ति हुई है.
आध्यात्मिक विजय यात्रा पर निकले आदि शंकराचार्य (सन ७८८ – ८२०) का पुरी में आगमन हुआ. अपनी विद्वत्ता से उन्होंने वहां के बौद्ध मठाधीशों के दांत खट्टे कर दिए और उन्हें सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में सफल रहे तथा आत्मसात कर लिए गए. शंकराचार्य जी ने यहाँ अपना एक पीठ भी स्थापित किया जिसे गोवर्धन पीठ कहते हैं. इस पीठ के प्रथम जगतगुरु के रूप में, शंकराचार्य जी के चार शिष्यों में से एक, पद्मपदाचार्य (नम्पूतिरी ब्राह्मण) को नियुक्त किया गया था. शंकराचार्य जी ने ही जगन्नाथ की गीता के पुरुषोत्तम के रूप में पहचान घोषित की थी. संभवतः इस धार्मिक विजय के स्मरण में ही श्री शंकर एवं पद्मपाद की मूर्तियाँ जगन्नाथ जी के रत्न सिंहासन में स्थापित की गयीं थीं. मंदिर द्वारा ओडिया में प्रकाशित अभिलेख “मदलापंजी” से ज्ञात होता है कि पुरी के राजा दिव्य सिंह देव द्वितीय (१७९३ – १७९८) के शासन काल में उन दो मूर्तियों को हटा दिया गया था.
१२ वीं सदी में पुरी में श्री रामानुजाचार्य जी का आगमन हुआ. उनके आगमन तथा उनकी विद्वत्ता का असर यह हुआ कि तत्कालीन राजा चोलगंग देव जिसके पूर्वज ६०० वर्षों से परम महेश्वर रहे, उनकी आसक्ति वैष्णव धर्म के प्रति हो गयी. कई वैष्णव आचार्यों ने पुरी को अपनी कर्मस्थली बनायीं, मठ स्थापित किये और शनै शनै पूरा ओडीसा ही वैष्णव होता गया.
यहाँ एक बात जो महत्वपूर्ण है, शंकराचार्य जी ने चार पीठों की स्थापना की थी. उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन तथा पश्चिम में द्वारका. चार धामों की परिकल्पना किंचित भिन्न है. चार धामों में तीन तो उन्हीं में से हैं केवल श्रृंगेरी के बदले रामेश्वरम को एक धाम माना जाता है.
एक कहानी के अनुसार जगन्नाथ की आराधना एक सबर आदिवासी “विश्वबसु” के द्वारा “नील माधव” के रूप में की जाती रही. साक्ष्य स्वरुप आज भी जगन्नाथ पुरी के मंदिर में अनेकों सेवक हैं जो “दैतपति” नाम से जाने जाते हैं. इन्हें आदिवासी मूल का ही माना जाता है. ऐसी परंपरा किसी अन्य वैष्णव मंदिर में नहीं है.
बलभद्र, सुभद्रा और जगन्नाथ का निम्न चित्र विकिपीडिआ से है
एक दूसरी कहानी के अनुसार राजा “इन्द्रद्युम्न” को स्वप्न में जगन्नाथ जी के दर्शन हुए और निर्देशानुसार समुद्र से प्राप्त काष्ट से मूर्तियाँ गढ़ी गयी थी. उस राजा ने ही जगन्नाथ पुरी का मंदिर बनवाया था. ऐतिहासिक प्रमाण कुछ और ही कहते हैं. मूलतः पुरी के वर्त्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण वीरराजेन्द्र चोल के नाती और कलिंग के शासक अनंतवर्मन चोड्गंग (१०७८ – ११४८) के द्वारा करवाया गया था. राजा आनंग भीम देव ने सन ११७४ में इस मंदिर के विस्तार का कार्य किया जो १४ वर्षों तक चला. मंदिर में स्थापित बलभद्र, जगन्नाथ तथा सुभद्रा की काष्ट मूर्तियों का पुनर्निर्माण १८६३, १८९३, १९३१, १९५०, १९६९ तथा १९७७ में भी किया गया था. पूर्व में उसी स्थल पर किसी जीर्ण शीर्ण जगन्नाथ (बौद्ध) मंदिर के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता.
जगन्नाथ मंदिर लगभग ४,००,००० वर्ग फीट के वृहद् क्षेत्र में व्याप्त है और इसके प्रांगण में ही १२० से अधिक दूसरे देवी देवताओं के आवास भी हैं. ओडिशा में यह सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है जिसके शिखर की ऊँचाई १९२ फीट है. मंदिर के चारों तरफ की दीवारे २० फीट ऊंची हैं. साधारणतया हर मंदिर में एक मंडप और फिर गर्भ गृह रहता है. यहाँ कुछ विशिष्ट है. एकदम बाहर की तरफ भोगमंदिर, उसके बाद नट मंदिर (नाट्यशाला) फिर जगमोहन अथवा मंडप जहाँ श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और अंत में देउल (गर्भगृह) जहाँ जगन्नाथ जी अपने भाई बलभद्र (बलराम) और बहन सुभद्रा के साथ विराजे हुए हैं.
पुरी में हर वर्ष जुलाई के महीने में जो विश्व प्रसिद्द रथ यात्रा आयोजित की जाती है, यह भी एक बौद्ध परंपरा ही है. ऐसे ही गौतम बुद्ध के दन्त अवशेषों को लेकर रथ यात्रा का आयोजन होता है.
हम तो चले थे अपनी पुरी यात्रा के बारे में कुछ बताने परन्तु अपनी कमजोरी को नियंत्रित नहीं रख सके और आलेख खिंच गया. एक और पोस्ट का जुगाड़ बन गया!
अक्टूबर 2, 2011 को 6:19 पूर्वाह्न पर
इंतजार है आपकी पुरी यात्रा की पोस्ट का.
अक्टूबर 2, 2011 को 7:43 पूर्वाह्न पर
सुंदर चित्रों सही बढिया जानकारी मिली और अपनी पुरी यात्रा भी याद हो आई. बहुत शुभकामनाएं.
रामराम.
अक्टूबर 2, 2011 को 8:25 पूर्वाह्न पर
जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी भवतु मे।
अक्टूबर 2, 2011 को 8:34 पूर्वाह्न पर
पोस्ट का जुगाड़ नहीं, एक बहुत ही अच्छी पोस्ट हो गयी। आभार
अक्टूबर 2, 2011 को 8:45 पूर्वाह्न पर
सुंदर चित्रों सहित बढिया जानकारी
अक्टूबर 2, 2011 को 9:57 पूर्वाह्न पर
पुरी के पीछे की बौध्ध कहानी नहीं पता थी…आपके ब्लॉग पर हर बार कुछ नया पढ़ने को मिलता है. धन्यवाद.
अक्टूबर 2, 2011 को 10:00 पूर्वाह्न पर
एक बार पुनः महत्वपूर्ण खोजपरक जानकारी. यहाँ संभवतः ट्राईबल मान्यताओं के बौद्ध और उनके वैष्णव में रूपांतरित होने के संकेत भी छुपे हैं !
अक्टूबर 2, 2011 को 10:42 पूर्वाह्न पर
कई बातें मुझे नयी मालूम हुईं -आभार!
बलराम कृष्ण और सुभद्रा के चित्र इतने अलग से लगते हैं कि उन पर किसी विजातीय संस्कृति के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता…लगता है बौद्ध प्रभाव में कुछ तांत्रिक शैली में ये चित्र बने ….किसी भी भारतीय देवी देवता के ऐसे चित्र पूरे भारत में शायद कहीं नहीं हैं -इस पर कुछ प्रकाश डाल सकते हैं?
बाकी तो एक पोस्ट अपने बसते में डाल ही लिया हैं आपने
अक्टूबर 2, 2011 को 11:08 पूर्वाह्न पर
बढ़िया ऐतिहासिक सचित्र जानकारी के लिए धन्यवाद!
“हरी ॐ तत सत”!
ध्वनि ऊर्जा के तीन साकार रूप, सृष्टि कर्ता-पालक-संहारक = ब्रह्मा-विष्णु-महेश / राम-भरत-लक्षमन / बलराम-जगन्नाथ-सुभद्रा?
अक्टूबर 2, 2011 को 11:10 पूर्वाह्न पर
पूरी का मंदिर देखने कई बार जा चूका हूँ …. पर यह जानकारी दिलचस्प रही ..
अक्टूबर 2, 2011 को 11:46 पूर्वाह्न पर
Heard a lot about this place… I wish I can visit this place someday by myself
Lovely post with information n beautiful pictures !!!
अक्टूबर 2, 2011 को 12:10 अपराह्न पर
पुरी की पूरी कहानी एक सांस में पढ़ गए…आप भी ऊँगली पकड़ पकड़ कर जाने कहाँ-कहाँ घुमाते हैं! इस बार दक्षिण से पूरब की और मुड गए!
अक्टूबर 2, 2011 को 12:24 अपराह्न पर
जगन्नाथ मंदिर के बारे में सारगर्वित फोटो सहित बढ़िया जानकारी प्रदान की है … आभार
अक्टूबर 2, 2011 को 4:56 अपराह्न पर
ओडिशा कभी जैनधर्म का गढ़ भी रहा है. मैंने सुना है कि जगन्नाथ के अवतारों में एक ऐसा अवतार भी है जो मुसलमान था. उसके बारे में उडिया में एक भजन है- ‘एका तो भकता जीवनो, भगत हितारे तोरा शंखा चोक्रे चिन्हा’. एक
और कथा के अनुसार इस मंदिर के निर्माण के दौरान कबीर-भक्ति की सहायता ली गई थी.
बढ़िया आलेख.
अक्टूबर 2, 2011 को 5:33 अपराह्न पर
चलिये इसी बहाने एक और पोस्ट पढ़ने का मौका मिला…..
अक्टूबर 2, 2011 को 6:09 अपराह्न पर
मूर्तियां अपने स्वरुप में amorphic हैजो सपष्ट ही आदिवासी प्रभाव है.आपकी इस तरह की पोस्ट्स में समग्रता और संतुलन आकर्षित करते हैं.
अक्टूबर 2, 2011 को 8:05 अपराह्न पर
Puri ki yatra Kai bar ki hai kuchh tathy pata the vistrit jakari pakar achha laga
अक्टूबर 2, 2011 को 9:55 अपराह्न पर
ऐतिहासिक जानकारी के साथ सुंदर पोस्ट,आभार.
अक्टूबर 2, 2011 को 10:57 अपराह्न पर
@समीरलाल/उड़नतश्तरी
“न बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूटी”
अक्टूबर 3, 2011 को 12:11 अपराह्न पर
jagannath puri ke vishay men sachitra janakari bahut achchhi lagi vaise to ham bhi bhagvan jagannath ke vishay men dheron kahaniyan bachpan se hi sunate chale aa rahe hain lekin mandir ke darshan ka saubhagya nahin mila tha chitra se hi sahi mandir ke darshan to mile. isake liye aapko bar bar saadhuvad.
अक्टूबर 3, 2011 को 6:48 अपराह्न पर
बहुत दिनों बाद इतिहास , पुराण , धर्म ,पर्यटन ,स्थापत्य और लोक कथाओं का समेकित और सुन्दर पोस्ट पाया .बहुत बहुत शुक्रिया साहब जी .
इसी तरह का आनंद केरल के क्रिश्चियन चर्च वाले पोस्ट में आया था
अक्टूबर 4, 2011 को 8:08 अपराह्न पर
uttam jankari ke liye shukriya
renu
अक्टूबर 7, 2011 को 2:26 अपराह्न पर
प्रतीक्षा रहेगी सभी भागों की…
बहुत बहुत आभार इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए…
आपकी प्रविष्टियाँ हमें साक्षात उपस्थित करवा देती हैं उक्त स्थान पर…
अक्टूबर 13, 2011 को 1:33 पूर्वाह्न पर
अपनी कुछ जानकारियों की पुष्टि इस पोस्ट से पाकर अच्छा लगा।