पुरी अथवा जगन्नाथ पुरी, ओडिशा प्रान्त में, पूर्वी समुद्र तट पर अवस्थित हिन्दुओं के आस्था का केंद्र है. इसे ओडिशा की सांस्कृतिक राजधानि भी माना जाता है. चार धामों में से एक, और आदि शंकराचार्य के चार पीठों में भी एक. हमलोग सपरिवार गए थे. यात्रा का उद्देश्य महिलाओं के लिए धार्मिक रहा हो, परन्तु पुरुष वर्ग के लिए पर्यटन तथा मौज मस्ती ही प्राथमिकता रही. अलबत्ता संतुलन बनाये रखने का पूरा प्रयास किया गया. भुबनेश्वर को हम लोगो ने अपना केंद्र बनाया था. एक सुबह चाय नाश्ते के बाद वहीँ से एक बोलेरो लेकर पुरी के लिए निकल पड़े. दूरी थी ७० किलोमीटर.
रास्ता ग्रामीण अंचलों में से होकर गुजरता है. वहां का ग्रामीण माहौल कुछ भिन्नता लिए था. तटीय क्षेत्र होने के कारण नारियल के पेड़, सुपारी के पेड़ आदि भी दिखे परन्तु वे उतने घने नहीं थे जितना हम पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में देखते हैं. धान के खेतों से एक अजब सोंधी सोंधी खुशबू आ रही थी. रास्ते में एक अच्छा सा ढाबा दिखा तो हम लोगोंने सोचा क्यों न यही खान पान भी हो जाए. गाडी रोक दी गयी और ढाबे के बागीचे में ही टेबल जमाकर विश्राम किया. आधे घंटे में ही खाना लग गया. रोटी, चावल, सब्जी, दाल सभी था.
ढाबे के प्रांगण में गाडी के ऊपर भतीजा “गिरीश”
खा चुकने के बाद कुछ आराम किया गया और फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले. ढाई बजे तक पुरी पहुँच चुके थे. वहां हमारे ठहरने की व्यवस्था एक बेंक के अवकाश गृह में कर रखी थी परन्तु जब वहां पहुंचे तो केयरटेकर महोदय नदारद. महिलायें रिसेप्शन में लगे 
सोफों में लुढ़क गयीं और हम लोग केयरटेकर के तलाश में लग गए. कुछ देर बाद महोदय का आगमन हुआ और बिना कुछ देखे दाखे कह दिया कि कोई कमरा आप लोगों के लिए बुक नहीं है. बड़ी खोफ्त हुई और तत्काल उनके स्थानीय अधिकारी से बात की गयी. हम लोगों के बात चीत को सुनकर ही केयरटेकर महोदय ने हमें कमरे सुलभ कराने की पेशकश की और इतने में उसे भी फोन आ गया और वह माफ़ी मांगने लगा. अंततः हम सबके लिए ए सी वाले कमरे आबंटित हो गए. कमरे तो बहुत ही स्वच्छ और सुन्दर थे. वैसे अवकाश गृह का भवन भी बड़ा शानदार था और एकदम समुद्र तट के करीब. शाम तक विश्राम कर हम लोग जगन्नाथ मंदिर के लिए निकल पड़े.
अवकाश गृह के छत पर भतीजी “गौरी” – टाईटानिक के केट की नक़ल करते हुए
मेरे लिए तो यह पहला अवसर नहीं था. हमने सबको आगाह कर दिया कि पंडों के मुह न लगें हम निपट लेंगे. जैसी आशंका थी वैसा ही हुआ. एक के बाद दूसरा कोई पंडा पीछे लग जाता. क्योंकि मुझे ओडिया आती थी, हमने उनसे कह दिया कि न तो हमें पूजा करानी है न ही तर्पण आदि. कल सुबह ही इस बारे में सोचेंगे. तब एक ने हमारे ठिकाने के बारे में जानना चाहा तो हमने कह दिया, सुबह यहीं मिलेंगे. उन पंडों से पिंड छुडाकर हम लोग अन्दर घुसे. जगमोहन (मंडप) में एक पंडा कुछ ऊँचाई पर बैठा हुआ था. फटे बांस का एक २ फीट लम्बा टुकड़ा अपने हाथ में रखा हुआ था. हर श्रद्धालु के सर पर वह उस बांस से मारता जिससे आवाज होती थी. यह हमें रास नहीं आया. हमारा जत्था जब आगे बढ़ रहा था तो हमने उस पण्डे पर नाराजगी प्रकट करते हुए वैसा करने से मना कर दिया था. दूसरे मंदिरों की तुलना में यहाँ का गर्भगृह काफी विशाल है. बलभद्र, सुभद्रा तथा जगन्नाथ की प्रतीकात्मक काष्ट मूर्तियों के दर्शन किये गए. कुछ पण्डे तो मूर्तियों के बगल ऐसे बैठे थे मानो वे भी मोक्षदाता ही हों. दर्शन से निपट कर बाहर आना हुआ और तीन बार मंदिर की परिक्रमा भी कर ली. चारों तरफ अनेकों छोटे छोटे मंदिर बने थे. बगैर रुके उनके सामने से निकलते समय शीश भर नवा लेते. जगन्नाथ एंड कम्पनी से इस अनौपचारिक मुलाक़ात के बाद, अपने ठिकाने लौट आये. रात के खाने के लिए अवकाश गृह में ही व्यवस्था कर ली गयी थी. रात सोने से पहले हम लोगोंने तय कर लिया था कि सूर्योदय के पहले, समुद्र तट पर चलेंगे.
दूसरे दिन प्रातः बिस्तर पर कोफ्फी उपलब्ध थी. हम लोगों के कमरे कुछ दूर दूर थे. सबको उठते उठाते समय लग ही गया. सूर्य देव हमारा इंतज़ार थोड़े ही करते. भागे भागे समुद्र तट पर पहुंचे. सूर्योदय तो कब का हो चला था. फिर भी क्षितिज को देख और ठंडी हवाओं के झोंकों का स्पर्श पा कर मन प्रफुल्लित ही हुआ.
दूर एक नाव रेत पर पड़ी थी. बच्चों ने उसे धकेल कर समुद्र में उतार दिया. इतने में वह मछुवारा आ पहुंचा जिसकी वह नाव थी. उसे बच्चों ने ही पटा लिया लेकिन माताओं द्वारा चिल्लपों किये जाने के कारण वे समुद्र में जाने का दुस्साहस नहीं कर सके. किनारे रेत पर टहलते हुए हमलोगों का सामना एक रेत की कलाकृति से हो गया जिसके लिए पुरी को सुदर्शन पटनायक नामके कलाकार ने ख्याति दिलाई. वैसे स्वयं पटनायक जी को अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है और अन्य देशों में जाकर भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया और पुरस्कार बटोरे.
हाय रे मुमताज, किसने बना दिया तुझे शूर्पनखा
वहां शाहजहाँ और मुमताजमहल बने थे. पीछे एक संगमरमर के ताज महल को भी प्रतीकात्मकता के लिए रखा गया था. वास्तव में कलाकृति तो बेहद सुन्दर थी. हमारे भाई साहब को वह देख जोश आ गया और अपनी कारीगरी में लग गए. कुछ देर के प्रयास से कुछ किलेनुमा निर्माण दिखा. उसकी पत्नी ने पूछा ये अन्दर गड्ढा क्यों बना दिया तो जवाब था “अपने लिय कब्र बना रहा हूँ”. बहू ने फिर पूछा “और मेरे लिए?” बात बढ़ने की गुंजाईश बन रही थी इसलिए हमने बहू को आगे कुछ न बोलने का आग्रह किया.
रेत से रेत पर कलात्मक अभिव्यक्ति के सम्बन्ध में पुरी में एक मिथक प्रचलित है. १४ वीं शताब्दी में बलराम दास नामके एक कवी हुए थे जिन्होंने “दण्डी रामायण” रचा था. रथ यात्रा के समय वे एक बार जगन्नाथ जी के रथ के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे ताकि प्रभु के दर्शन कर सकें. पंडों ने उन्हें अपमानित कर नीचे उतर जाने के लिए विविश कर दिया. उनका कवि ह्रदय विचलित हो गया. वे सीधे समुद्र तट पर (महोदधि) गए और रेत से जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की आकृतियाँ बनायीं और तल्लीन होकर अराधना करने लगे. उनकी भक्ति की शक्ति ही कहें, रथों के ऊपर रखे सभी विग्रह अचानक गायब होकर समुद्र तट पर बलराम दास के सम्मुख आ पहुंचे. लोगों का मानना है कि इस कला (रेत पर) का उद्भव वहीँ से हुआ था. चलिए मिथक ही तो है. जहाँ कहीं भी रेत की ढेर लगी हो, वहां हम बच्चों को घरोंदा या कुछ अपने तरीके से कलाकृतियाँ बानाते देखते ही हैं.
फिर भगवान् राम ने भी तो रामेश्वरम में रेत से शिव लिंग बनाकर उसकी पूजा की थी.
कुछ देर तक समुद्र तट की ठंडी हवाओं का आनंद प्राप्त कर लौट पड़े. इतने में महिलाओं ने दुबारा मंदिर जाने की जिद की. उनकी बात भी मान ली गयी और कह दिया कि वहां पंडा मिलेगा तो बोल देना साहब लोग अभी आने ही वाले हैं. हम लोग बाज़ार में घूम कर समय बिताते रहे. कहीं एक घंटे के बाद महिला वर्ग भी हमसे आ मिला. बाज़ार में कई प्रकार के हस्त शिल्प उपलब्ध थे. एक बहू पीतल के बर्तनों की दूकान में घुस गयी. वहां उसे एक पीतल का ४ फीट ऊंचा दिया दिख गया. उसके अलावा भी पीतल/कांसे की बनी बहुत सारी चीजें थीं. वहां सौदा नहीं पटा. अब क्योंकि पेट में चूहे कूद रहे थे, हम लोगों ने एक होटल में नाश्ता किया और अपने ठियां की ओर चल पड़े. धूप बड़ी तेज होने के कारण पसीना भी खूब छूट रहा था इसलिए और कहीं जाने की इक्षा ही नहीं हुई. दुपहर खाने के बाद हम लोग कोणार्क होते हुए रात तक भुबनेश्वर पहुँच गए.

अक्टूबर 11, 2011 को 7:16 पूर्वाह्न पर
रोचक यात्रा वृत्तान्त.
पिछले साल हम पुरी और भुवनेश्वर का तीन दिन का ट्रिप बनाकर चले थे लेकिन तीनों दिन पुरी में ही लग गए. एक दिन पूरा चिलिका लेक की सैर में लग गया. बहुत आनंद आया.
अक्टूबर 11, 2011 को 9:18 पूर्वाह्न पर
आनन्दपूर्ण व्याख्यान..
अक्टूबर 11, 2011 को 9:19 पूर्वाह्न पर
पंडों ने भारतीयता को जो नुक्सान पहुचाया है वह अक्षम्य है ! रोचक विवरण रहा यह भी ..रेत शिल्प के जन्म मिथक पर पहली बार पढ़ा -
अक्टूबर 11, 2011 को 9:48 पूर्वाह्न पर
यात्रा वृत्तांत की शैली मनमोहिनी है. मज़ा आ गया.
अक्टूबर 11, 2011 को 9:56 पूर्वाह्न पर
आपको वहां रेत की बनी कलाकृति भी देखने को मिल गई ‘सोने पे सुहागा’ ही है. वहां के सूर्योदय की काफी तारीफ सुनी है, खासकर चंद्रभागा की. शायद कोणार्क में आपको भी मौका मिला होगा!
अक्टूबर 11, 2011 को 12:47 अपराह्न पर
चलिए हम भी पुरी हो आए. यात्रा बढिया रही. सूर्योदय न देख पाने का मलाल रहेगा.
घुघूतीबासूती
अक्टूबर 11, 2011 को 2:45 अपराह्न पर
ऐसी पोस्ट्स और आने दीजिए.रोचक.बिना थके आद्योपांत पढ़ लिया.
अक्टूबर 11, 2011 को 9:55 अपराह्न पर
अनुपम कारीगरी है रेत पर और अद्भुत दृश्य ।
अक्टूबर 12, 2011 को 3:55 पूर्वाह्न पर
बहुत रोचक यात्रा वर्णन….तस्वीरें भी अच्छी लगी…आभार.
अक्टूबर 12, 2011 को 5:22 पूर्वाह्न पर
इतना सुन्दर यात्रा विवरण हमे अपनी कई साल पहले की गई यात्रा की याद दिला गया. तब हमे पुरी के समुद्र ने जैसे मोह लिया था. इतना सुंदर हरा नीला पानी मंदिर से ज्यादा वक्त हमारा तट पर गुजरा था. रेतशिल्प बहुत ही सुंदर लगे.
अक्टूबर 12, 2011 को 7:16 पूर्वाह्न पर
रोचक सचित्र यात्रा के बारे में पढकर मज़ा आ गया। गौरी को इतना किनारे खड़ा देखकर डर भी लगा।
अक्टूबर 12, 2011 को 7:38 पूर्वाह्न पर
तीर्थ सी ही तसल्ली.
अक्टूबर 12, 2011 को 12:00 अपराह्न पर
जगन्नाथ पुरी की तीर्थ यात्रा कराने के लिए धन्यवाद!
रेट की मूर्ती टीवी पर तो देखी थी, और मुंबई में एक मौल के प्रांगण में भी किसी कलाकार को बनाते, अपने चार वर्षीय नाती के साथ, देखने का अवसर प्राप्त हुआ था…
अक्टूबर 12, 2011 को 3:32 अपराह्न पर
पुरी जाने का अवसर दो बार मिला। पण्डों को लेकर मेरा अनुभव एकदम विपरीत है। हमें किसी ने परेशान नहीं किया। अलबत्ता, ‘साक्षी गोपाल’ में पण्डों ने प्राण लेने की पूरी-पूरी कोशिश की। ‘साक्ष गोपाल कृपा’ से सशरीर, वन पीस, जीवित लौटे।
फिर भी, पुरी और साक्षी गोपाल फिर जाने का मन हो रहा है।
चित्र सुन्दर हैं।
अक्टूबर 12, 2011 को 8:22 अपराह्न पर
पुरी तो हमें भी जाना है सरजी, बहुत समय से इच्छा है।
वैसे आपकी पोस्ट पढ़कर भूख मिटती भी है और बढ़ती भी है, दोनों काम एक साथ।
हमारे साथ ऐसी जानकारियाँ शेयर करने के लिये हार्दिक आभार।
अक्टूबर 12, 2011 को 9:51 अपराह्न पर
पंडों से पिंड छुड़ाना

जगन्नाथ एंड कम्पनी से अनौपचारिक मुलाकात
मुमताज महल को शूर्पनखा
गज़ब की जुमलेबाजी है
अनाध्यात्मिकता के इससे बेहतर ब्योरे पहले कभी नहीं देखे
अक्टूबर 13, 2011 को 11:16 अपराह्न पर
मेरा जाना बाकी है, ऐसा लगा की कुछ यात्रा हो गयी .
अक्टूबर 16, 2011 को 7:56 अपराह्न पर
रेत मूर्ति कला के आगाज़ से रूबरू हुए. आपके सहयात्री बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ…मनोरम दृश्य, रोचक वृतांत!
अक्टूबर 17, 2011 को 9:21 अपराह्न पर
रोचक,सचित्र यात्रा वृत्तांत बहुत ही बढ़िया लगा…रेत से बनी कलाकृतियाँ तो हमेशा अचरज से भर देती हैं.