अभी कुछ ही दिनों पूर्व अपने ही गाँव के घर के अन्दर और बाहर बाड के आस पास उग आये विभिन्न बेलों, पौधों और उनमें लगे फल फूलों पर ध्यान गया. उन्हें हम लोगों ने हमेशा ही जंगली कह कर तिरस्कृत कर रखा था. कुछ अब इतने सुन्दर लग रहे थे कि उनकी तस्वीर ले लेने की चाहत हो गयी. क्या वे पहले सुन्दर नहीं रहे जो अब लगने लगे अथवा क्या बढती उम्र में प्रकृति के प्रति प्रेम उमड़ने लगता है. क्या पूर्व में ऐसा कोई सौन्दर्य बोध नहीं था. कुछ ऐसे प्रश्न जहन में उठ खड़े हुए.
मेरे अंतर्मन में उठे सवालों का जवाब दिया मेरे भतीजे रंजू द्वारा खींचे गए कुछ तस्वीरों ने. अब हम दो हो चले थे. एक खालिस युवा, इंजीनियरिंग का छात्र और एक मैं, जीवन की संध्या में. हम दोनों ने मिलकर सर्वेक्षण किया और ढेर सारी तस्वीरें ले डालीं. इनमें कुछ ऐसे फूल पौधे भी थे जो जाने पहचाने लगे. कुछ तो अपने बगीचे में भी हैं परन्तु यहाँ वाले सारे के सारे तथाकथित अछूत श्रेणी के हैं. इनको वनस्पति शास्त्रानुसार वर्गीकृत किये जाने का साहस हम नहीं कर पाए. 















जनवरी 28, 2012 को 7:19 पूर्वाह्न पर
आपकी बग़िया के अछूत पुष्प भी बहुत सुंदर हैं
) बहुत आकर्षक फोटोग्राफ्स.
जनवरी 28, 2012 को 7:20 पूर्वाह्न पर
सुन्दर फ़ूल हैं ये तो! फोटो अच्छी ली हैं आपने।
जनवरी 28, 2012 को 8:08 पूर्वाह्न पर
सौंदर्य, पिपासु-दृष्टि में ही रमता है.
जनवरी 28, 2012 को 8:16 पूर्वाह्न पर
Beautiful Pictures…
जनवरी 28, 2012 को 9:14 पूर्वाह्न पर
सुन्दर सुन्दर पुष्प खिले हैं…
जनवरी 28, 2012 को 9:19 पूर्वाह्न पर
पुष्प खिले हैं, सुन्दर बगिया…
जनवरी 28, 2012 को 9:29 पूर्वाह्न पर
सुंदरता कैसी भी हो ….आकर्षित करती है !
जनवरी 28, 2012 को 9:39 पूर्वाह्न पर
बसंत का तुमुलघोष करते पुष्प …..
जनवरी 28, 2012 को 9:56 पूर्वाह्न पर
जो पहला फूल है उसे हम पुटुश के नाम से जानते हैं…जंगल की गंध में बहुत से फूलों की खुशबू होती है पर उसका बेस हमेशा ये पुटुश ही होता है।
9 और 10 नंबर पर जो लाल रंग का फोटो है वो मेरे गाँव के कुद्रुम जैसा लगता है…इसकी हमारे गाँव में चटनी बनती है जो खट्टी-मीठी लगती है। इसे ऐसे ही तोड़ कर खाना भी बहुत अच्छा लगता था हमें। शायद वही है…हालांकि कह नहीं सकते…जंगली फल और फूल एक से दिखने पर भी अलग हो सकते हैं…जहरीले भी इसलिए खा के नहीं देखिएगा
आप की बगिया के फूल देखना सुंदर रहा।
जनवरी 28, 2012 को 10:08 पूर्वाह्न पर
कई फूल तो आसपास दिखाई दे जाते हैं. आपने इन्हें दिखाकर मन को प्रसन्न कर दिया.
जनवरी 28, 2012 को 11:10 पूर्वाह्न पर
बहुत सुन्दर! आभार!
जनवरी 28, 2012 को 1:34 अपराह्न पर
बहुत सुन्दर,सार्थक प्रस्तुति।
ऋतुराज वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
जनवरी 28, 2012 को 2:15 अपराह्न पर
तिरस्कार से सौंदर्य का मान नहीं घटता ! ये हमारा अपना वहम है कि जो पालतू है वही खूबसूरत …याकि जिसे हम चुने बस वो ही !
हमारी नज़रों और ख्याल के दायरे के बाहर भी चमन हो सकता है ये बात सिर्फ आदरणीय पा.ना.सुब्रमनियन ही साबित कर सकते हैं !
मेरा प्राणाम स्वीकारिये !
जनवरी 28, 2012 को 2:16 अपराह्न पर
प्राणाम = प्रणाम
जनवरी 28, 2012 को 6:30 अपराह्न पर
सुन्दर तस्वीरें.
जनवरी 28, 2012 को 7:56 अपराह्न पर
कभी कभी सोचता हूं कि कितने बदनसीब होते होंगे वे लोग भी जिनके यहां यूं वनस्पति होती ही नहीं…
जनवरी 28, 2012 को 9:04 अपराह्न पर
It is amazing how nature — very common around us — is so beautiful!!!
जनवरी 28, 2012 को 11:11 अपराह्न पर
बहुत ही सुन्दर फूल और तस्वीरें.
सबसे पहला चित्र जिस का है उसे हम कूरी का फूल कहते हैं..
…..
रही बात प्रकृति प्रेम की..तो वह हर उम्र में होता है लेकिन समय और जिम्मेदारियों के चलते हमारी प्राथमिकताएं अलग हो जातीहैं और अपनी रुचियों पर ध्यान ही नहीं दे पाते ..
जनवरी 29, 2012 को 12:09 पूर्वाह्न पर
सुन्दर पुष्प की सुन्दर तस्वीरें.
जनवरी 29, 2012 को 7:06 पूर्वाह्न पर
phoolon kee jati se unaki sundarta khatma nahin ho jati, balki phool to hamesh hi sundar hote hain. aapki phoolon ke vishay men itani gahan drishti achchhi lagi aur sundar lagi apaki sajai bagiya.
जनवरी 29, 2012 को 7:23 पूर्वाह्न पर
अति सुन्दर!
गुवाहाटी (‘सुपारी का बाज़ार’) में एक सहकर्मी ने अस्सी के दशक के आरम्भ में मुझे बताया था की कैसे वो एक तांत्रिक के पास गया था अपनी पत्नी की बिमारी के सिलसिले में… तो उसने ध्यान लगा उसे बताया कि उसके बगीचे में दो परवल समान दिखने वाली सब्जी लगी है, और उसकी सब्जी बना कर खिलाने से वो ठीक हो जायेगी… और वैसा कर वो ठीक हो गयी!
सहकर्मी को पता भी नहीं था कि उसके ‘किचन गार्डन’ में कोई ऐसा पौधा भी था!…
प्रकृति विचित्र है, और भारत में उपलब्ध ज्ञान भी…:)
जनवरी 29, 2012 को 2:02 अपराह्न पर
स्थिति, मन:स्थिति और समय की उपलब्धता हमारे सोच पर प्रभाव डालती है। इसी कारण कई बातें हमें बाद में नजर आती हैं – ऑंखों के सामने बनी रहने के बाद भी।
चित्रों के मामले में आप अप्रतिम हैं ही।
जनवरी 29, 2012 को 9:44 अपराह्न पर
फूल जंगली हैं, शायद इसीलिए और भी ज्यादा खूबसूरत हैं! इनकी खिलखिलाहट पर कोई बंदिश जो नहीं है!! हाँ, आपके कैमरे की आँख से देखो तो खूबसूरती बस कयामत ही ढा देती है।
जनवरी 30, 2012 को 2:48 अपराह्न पर
प्रकृति का वश चले तो सब जगह वैली ऑफ फ्लॉवर्स बना दे!
फ़रवरी 1, 2012 को 9:47 पूर्वाह्न पर
प्रकृति की खूबसूरती अनुपम है….
शुभकामनायें आपको …