“मार्कज्ही” का तामिल माह जो उत्तर में मार्गशीर्ष या अगहन कहलाता है, दक्षिण में अति महत्वपूर्ण माह होता है. प्रातः पौ फटने के पूर्व ही मंदिरों के पट खुल पड़ते हैं और दर्शनार्थियों का तांता लग जाया करता है. मंदिरों की घंटियों की आवाज और संगीत लहरी पूरे वातावरण को एक प्रकार से आध्यात्मिक बना देती है. महानगरों में कोलाहल के कारण इस बात की अनुभूति उतनी तीव्र नहीं होती है परन्तु अन्य कस्बों और ग्रामीण अंचलों में तो एक अलग ही जज्बा होता है. चेन्नई में दिसंबर – जनवरी के बीच की यह अवधि पूर्णतः संगीतमय हो जाती है. आलेख के शीर्षक में “संगीत संध्याओं” का उल्लेख किया है जबकि वास्तविकता तो यह है कि यह “संगीत” और “संध्या” तक सीमित नहीं हैं. विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम यथा गायन, वादन, नृत्य, नाटक आदि प्रातःकाल से ही प्रारंभ हो जाते हैं और दिनभर चलते रहते हैं. संगीत/नृत्य का यह वृहद् समारोह विश्व भर में सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है.
एक ही गायक/वादक द्वारा ढाई से से तीन घंटे तक चलने वाला शाश्त्रीय गायन/वादन कार्यक्रम यहाँ कचेरी (कचहरी का पर्याय) कहलाता है. मेरे भाई के पास इस संगीत के मौसम में हो रहे कई “कचेरियों” के “पास” पड़े थे. आखिर क्यों न हो. अपनी संस्था से कार्यक्रमों को प्रायोजित करवाने में उसकी अहम् भूमिका जो रही होगी. हमने कह दिया ठीक है, चले चलेंगे. थोड़ी बहुत गोताखोरी हम भी कर ही लेते हैं. बातों ही बातों में हमने पूछ डाला “भैय्या यह तो बताओ कि संगीत के कार्यक्रम को यहाँ कचेरी क्यों कहते हैं, कचेरी तो कोर्ट को कहते हैं” इसपर उसका कहना था “कोर्ट तो कई प्रकार के हो सकते हैं. जैसे बेडमिन्टन का कोर्ट, टेनिस का कोर्ट, या ला कोर्ट, वैसे ही यहाँ “कचेरी” का प्रयोग संगीत के कोर्ट के लिए हो रहा है”. कुछ कुछ तर्क संगत बातें थीं इसलिए हमने हथियार डाल दिए.
जैसा सभी जानते ही हैं, दक्षिण में “कर्णाटक संगीत” का प्रचलन है जबकि उत्तर के शाश्त्रीय गायन शैली को “हिंदुस्थानी” कहा जाता है. हमारी स्थिति तो बीन के आगे भैंस की है. मजबूरी में सुन लेते हैं. ऐसा नहीं है कि संगीत से हमने “खिट्टी” कर ली हो, “बुल्ले शाह” जैसे सूफियाना किस्म की गायकी हमें बड़ी प्रिय है. यहाँ के संगीत प्रेमियों में हिंदुस्थानी पद्धति के प्रति कोई दुर्भावना नहीं दिखती क्योंकि राग रागिनियों में बहुत सारी समानताओं को वे स्वीकार करते हैं. उनसे पूछा जाए तो यही कहते हैं कि हिंदुस्थानी गायन की परंपरा “राज दरबार”, “कोठों” आदि को समर्पित रही और मूलतः मन बहलाने के लिए हुआ करती थी जबकि कर्णाटक संगीत आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है. उत्तर वाले एक ही स्वर भाव में घंटों गाते रहते हैं जबकि यहाँ स्वरों के बीच डोलते रहते हैं. एक संगीत प्रेमी का कहना है कि हिंदुस्थानी संगीत भी कभी निर्मल और शुद्धता से परिपूर्ण रही परन्तु मुगलों के आगमन के पश्चात उसका कौमार्य जाता रहा. पंडित जसराज जी की यहाँ वाले बड़ी सराहना करते हैं यह कह कर कि वे ही हैं जिन्होंने हिंदुस्थानी संगीत की गरिमा को पुनर्स्थापित किया.
अभिशेख रघुराम द्वारा प्रस्तुति
संजय सुब्रमण्यम की प्रस्तुति
चेन्नई की कुछ पत्रिकाओं आदि से ज्ञात हुआ कि यहाँ संगीत प्रेमियों की बहुत बड़ी संख्या है और संगीत की गहराईओं में जाने की क्षमता भी. यहाँ ४० से ऊपर सभा गृह (आडिटोरियम) हैं जहाँ १४० से अधिक संघठनों द्वारा उनके चयनित सभा गृहों में ख्याति प्राप्त और अल्प ख्याति वाले कलाकारों की प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं. इन सभी आयोजनों के बारे में विस्तृत जानकारी युक्त पुस्तकों का
प्रकाशन भी कई संघठनों द्वारा किया जाता है और संगीत रसिकों के बीच वितरित होती हैं. सभा गृह में लोगों के हाथों में इन पुस्तिकाओं को देख कर लगा कि कार्यक्रम को “कचेरी” इस लिए कहते हैं क्योंकि जानकारों के सम्मुख बेचारे कलाकार को शायद यह प्रमाणित करना पड़ता है कि उसकी प्रस्तुति दोष रहित है.
नित्यश्री महादेवन द्वारा प्रस्तुति
कर्णाटक संगीत में संत त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री, स्वाति तिरुनाल, पुरंदर दास, जयदेव, मीराबाई, कबीरदास, सुब्रमनिया भारती आदि की रचनाओं/कृतियों की निर्दिष्ट रागों में गायन/वादन होता है. भाषा का कोई बंधन नहीं है. मसलन त्यागराज की रचनाएं तेलुगु में हैं (उनके पूर्वज आन्ध्र से तामिलनाडू आ बसे थे), पुरंदर दास जी ने कन्नड़ में लिखा है, सुब्रमनिया भारती की तामिल में, स्वाति तिरुनाल, जयदेव, कबीर आदि की संस्कृत और हिंदी में हैं. हरेक कचेरी में गायकों के द्वारा गायन के लिए चयनित सूची में उपरोक्त रचनाकारों की कृतियों का समावेश रहता है. संत त्यागराज जी सबके इष्ट हैं. सन १७६७ में तामिलनाडू के तिरुवारुर में जन्मे संत त्यागराज ने लगभग २४००० कृतियों (गीतों) की रचना की थी जिनमे से अब ७०० कृतियाँ उपलब्ध हैं. गायकों को संगत देने के लिए मृदंगम, वायोलिन, घटम (मटका), ढपली तथा तानपुरा का प्रयोग साधारणतया होता है परन्तु हारमोनियम कर्णाटक संगीत में निषिद्ध है.
अब तक इस वर्ष के कई सायंकालीन कचेरियों में सम्मिलित होने और उस माहौल के रसास्वादन का अवसर मिला. कचेरी अधिकतर ढाई से तीन घंटे की रहती है और शाम ६.०० या फिर ६.३० को प्रारंभ होती है. किसी भी हाल में रात ९.३० बजे तक समाप्त हो ही जाती है. यहाँ देर रात (अपवादों को छोड़ कर) तक कार्यक्रम चलाने की परंपरा नहीं है. आयोजकों द्वारा समय की पाबन्दी का कठोरता से पालन होता है. कचेरी के प्रारंभ होने के पूर्व ही सभी अपना अपना स्थान ग्रहण कर लेते हैं और उनमें से बहुत सारे
अपनी अपनी किताबें भी खोल लेते हैं. स्टेज के परदे खुलते हैं और तालियों की गडगडाहट फिर एकदम शांति. सुई पटक सन्नाटा. गायन अलापना से प्रारंभ होता है. सामने स्टेज पर गाने वाले, गाने के अलावा ताल को बनाए रखने के लिए, अपनी हथेली का कई प्रकार से प्रयोग करते हैं. कभी हवा में हथेलियाँ हिलाई जाती हैं तो कभी अपने ही हाथों में थाप देते हैं और कभी अपनी जंघा पर प्रहार. कुछ अपनी आँखें बंद कर लेते हैं तो कभी एक कान को उँगलियों से बंद कर लेते हैं. कभी कभी इतने ज्यादा हिलते डुलते हैं कि उनके आवेश को देख उनके उठ खड़े हो जाने की आशंका हो जाती है. रसिक श्रोताओं का भी कुछ कुछ ऐसा ही हाल रहता है. हम भी लोगों का अनुकरण करते हुए अपने सर को ताल के अनुसार हिलाते हुए झटके भी दे देते थे. एक बार तो नींद ही आ गयी परन्तु तालियाँ की गडगडाहट ने खलल डाल दिया. तत्काल हमने भी ताली बजा दी और सोचा कि शायद कचेरी समाप्त हो गयी है. परन्तु ये न हुआ. तालियाँ तो केवल एक अलापना के लिए बजाई गयी थी. फिर शुरू हुआ वायोलिन वादक द्वारा पूरे आलाप को दोहराया जाना. अभी उसने अपना वादन बंद ही किया था तो मृदगम बज उठा वह भी उतनी ही देर फिर घटम (मटका). मैंने इस आलेख को लिखे जाने तक कुल सात कचेरियों को झेल लिया है और तीन कचेरियों में मृदंगम वादक एक श्री पत्री सतीशकुमार ही थे. लगता है वे काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए उन्हें ही बुलाया जाता है. वैसे हुनरमंद लगे. तिरुपति के बालाजी मंदिर के कुछ पर्वों को विषय बनाकर भरतनाट्यम शैली में १८ कन्यायों द्वारा एक न्रित्य नाटिका भी देखने का अवसर मिला जो चित्ताकर्षक रहा.
सुश्री चारुलता मणि का गायन सुनकर मन बड़ा प्रफुल्लित हो गया क्योंकि ऐसा लग रहा था मानो कोल्हापुर में बैठ कर संगीत का आनंद ले रहे हों. हाल में स्थान ग्रहण करने के बाद स्टेज पर देखा तो तबला और हारमोनियम वादक दिखे थे, कुछ अन्य वाद्य भी थे, जो यहाँ के आयोजनों में आम नहीं है. कर्नाटक संगीत में भी उन वाद्यों का प्रयोग हुआ परन्तु बात बाद में समझ आई जब अभंग गाये गए. संत तुकाराम की रचना “सांवरी सुन्दर रूप मनोहर” के गायन से तो गदगदायमान हो गए. पंडित भीमसेन जी को सुना है परन्तु यहाँ की प्रस्तुति बेहद प्यारी लगी.
एक कार्यक्रम की समाप्ति पर श्रोताओं द्वारा तालिओं से गायक का सम्मान
सभा विसर्जन
स्त्रियाँ (यहाँ उन्हें आदर से “मामी” कह कर संबोधित किये जाने की परंपरा है) कांजीवरम (रेशमी) परिधान में सज धज कर आती हैं मानो किसी शादी/विवाह में आ रही हों. इस प्रकार के आयोजनों का एक सामाजिक पहलू यह भी है कि नए लोगों से मुलाक़ात/पहचान हो जाती है और कभी कभी रिश्ते बनाने में भी सहायक रहती है. लगभग सभी सभा गृहों के परिसर में केन्टीन भी होते हैं जहाँ
चित्र डेकन क्रोनिकल से साभार
अपेक्षित गुणवत्ता के पारंपरिक व्यंजन उपलब्ध रहते हैं. संगीत सभाओं में नियमित जाने वालों को इस बात का पता रहता है कि किस सभा भवन में कौन सी चीज लज़ीज़ होती है. यहाँ तक कहा जाता है कि बहुत सारी मामियां तो केंटीनों के सहारे रहकर महीने भर अपना चौका बंद रखती हैं.
हाल के बाहर सीडियों (CDs) की खरीददारी
अब सब घर चले
चलते चलते एक बात और बताना होगा. इस आलेख में जिन कचेरियों के बारे में कहा गया है, वे सब तथाकथित अभिजात्य वर्ग के लिए ही आयोजित किया गया प्रतीत होता है. बताया गया है कि सुबह और दिन के आयोजन निःशुल्क होते हैं. परन्तु इन आयोजनों में उदयीमान कलाकारों की प्रस्तुतियां ही रहती हैं. नामी गिरामी कलाकारों द्वारा आम आदमी के लिए विशेष आयोजन खुले में, मंदिरों के प्रांगण, बागीचों और क्रिकेट मैदान आदि में होते हैं.


फ़रवरी 11, 2012 को 10:26 पूर्वाह्न पर
अच्छा लगा जानकर की चेन्नई में ऐसी प्रस्तुतियां होती रहती हैं…. टीवी ,फिल्मों के दौर में यह बहुत सराहनीय है….
फ़रवरी 11, 2012 को 12:28 अपराह्न पर
दक्षिण की ऐसी संगीत सभाओं का मैंने खूब आनंद उठाया है. ‘एमि सेतुरा लिंगा’ मैं बहुत भावुक हो कर गाया करता था. एक और बात कि मीरा को जैसा एम.एस. सुब्बलक्ष्मी ने गाया है वैसा अभी तक किसी अन्य ने नहीं गाया. आपका विस्तृत ब्यौरा काफी जानकारी देता है. अंत में केवल इतना ही कि हमारे नॉर्थ में लोक संगीत को छोड़ दें तो केवल एग्रीकल्चर बाकी बचता है, कल्चर साऊथ में है
)
फ़रवरी 11, 2012 को 12:30 अपराह्न पर
बहुत आनंद आया आपकी आँखों से देखी और कान से सुने कर्नाटिक अर्थात पुरातन काल से चली आ रही दक्षिण भारतीय परंपरा के विषय में पढ़… धन्यवाद!
एक वैज्ञानिक और हिन्दू होने के कारण, मैं बताना चाहूँगा कि आधुनिक वैज्ञानिकों ने सूर्य से और (उस के पुत्र!) शनि से प्रसारित होते संगीत को कुछ ही वर्ष पूर्व (रिकोर्ड भी कर) जान लिया है कि सूर्य से प्रसारित होती ध्वनि पश्चिमी तार-वाद्य हार्प समान सुनाई पडती है, और शनि ग्रह से ध्वनि ‘पंछियों की चहचहाट’, ‘घंटियों की टुन टुन’, और ‘ढोल पीटने’ समान प्रतीत होती है (ताल-वाद्य कचेरी समान? और मान्यता रही है की नादबिन्दू विष्णु ने साकार सृष्टि की रचना ध्वनि ऊर्जा, ब्रह्मनाद से की)…
उपरोक्त के माध्यम से, और इस ज्ञान के आधार पर कि खगोलशास्त्र में उच्चतम स्तर प्राप्त ‘सनातन धर्म’ वाले जाने-माने ‘हिन्दुओं’, जिन्होंने ‘गंगाधर ‘ शिव (अर्थात पृथ्वी, एक पदा, यानि उत्तर-दक्षिण धुरी पर नाचते) के मस्तक पर इन्दू अर्थात चंद्रमा दर्शाया (उन का दूसरा पैर),,, और मानव को नटराज शिव (अर्ध-नारीश्वर) के दाहिने पैर के नीचे धूलि-कण समान पड़े आदमी को ‘अपस्मरा पुरुष’ कह दर्शाया, शायद यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने सूर्यकिरणों को ज्ञान की देवी सरस्वती (हाथ में तार-वाद्य वीणा लिए श्वेत-साड़ी-धारी दर्शाई जाती, लाल कमल पर बैठ, जैसे सूर्य सुबह सवेर प्रतीत होता है)… इत्यादि, इत्यादि
फ़रवरी 11, 2012 को 3:27 अपराह्न पर
बहुत ही अच्छा लगा ये जानकर ..कि आज के युग में भी इस तरह के आयोजन होते हैं…और लोग इसका भरपूर रसास्वादन भी करते हैं.
अन्य शहरों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए.
फ़रवरी 11, 2012 को 3:39 अपराह्न पर
संगीत का आनन्द आ गया आपके विवरण में…
फ़रवरी 11, 2012 को 4:20 अपराह्न पर
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच ।
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
–
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर की जाएगी!
सूचनार्थ!
फ़रवरी 11, 2012 को 5:35 अपराह्न पर
क्या लय मिली है पोस्ट को, कचेरी का असर है…
यहां उत्तर में ‘ताल कचहरी ही प्रचलित है.’
संगीत- नृत्य (जिसमें नाट्य या अभिनय शामिल है), वादन और गायन का मेल ही है.
फ़रवरी 11, 2012 को 5:35 अपराह्न पर
ये परम्पराएँ बरक़रार रहनी चाहिये. यही तो है जो हमारे गरिमामय अतीत को हमसे जोड़ती हैं.
फ़रवरी 11, 2012 को 7:24 अपराह्न पर
संगीत संध्या\यें देखकर आनंद आया। भैंस-बीन वाली बात पर हमारा प्रोटैस्ट नोट किया जाये – आपके द्वारा कुछ माह पहले फ़ारवर्ड किया गया रेकॉर्ड आपके ललित कला के प्रेमी और पारखी होने का सुबूत खोजने पर अब भी मिल जायेगा।
कई साल पहले चंडीगढ़ में रात में अकेले आवारगी करते हुये कहीं दूर कुछ स्वर लहरियाँ सुनाई दीं और मैं उनसे खिंचता हुआ दूर चला गया। लोक संगीत का वह कार्यक्रम नि:शुल्क था लेकिन वैसा आनंद अनमोल था। पुरानी एक याद ताजा करवा दी आपकी पोस्ट ने, आभार।
मामियों को तो आजकल चौका बंद करने का बहाना चाहिये:)
फ़रवरी 11, 2012 को 7:49 अपराह्न पर
वाह! वाह! …आपकी पोस्ट पर खड़े हो कर ताली पीटने का मन कर रहा है!! कर्णाटक संगीत से हारमोनियम को देश निकाला क्यों मिला हुआ है, समझ में नहीं आया। कचेरी की व्याख्या युक्तिसंगत लगी। हमने भी गुरुवायुर मंदिर के प्रांगण में जनसाधारण के लिए कचेरी देखी है…
फ़रवरी 11, 2012 को 8:07 अपराह्न पर
यह बहुत अच्छा लगा – “यहाँ तक कहा जाता है कि बहुत सारी मामियां तो केंटीनों के सहारे रहकर महीने भर अपना चौका बंद रखती हैं.”
काश हमें भी यह आनन्दलहरी का मौका मिले और केण्टीनों में दक्षिण भारतीय व्यंजन भी – लम्बे अर्से तक!
फ़रवरी 11, 2012 को 9:46 अपराह्न पर
कभी मौका लगे शायद शामिल होने का…अच्छा लगा जानकर.
फ़रवरी 11, 2012 को 10:47 अपराह्न पर
@संजय जी:
शास्त्रीय गायन के सन्दर्भ में अब भी अपनी बात पे अडिग हैं. भैंस ही हैं, वह भी मरियल.
फ़रवरी 12, 2012 को 8:34 पूर्वाह्न पर
bahut hi sunadar post..badhai…bahut jankari mili
फ़रवरी 12, 2012 को 9:08 पूर्वाह्न पर
वाह सुब्रमनियम जी बहत अच्छी लगी यह संगीत कचेरी । उत्तर की मामियों को शायद यह कचोरी की याद दिलाये । उत्तर में इसे ही महफिल कहते हैं शायद पर ये भोर तक चलती है । आप का वर्णन इतना जीवंत है कि सब कुछ आंखों के सामने घटित होता सा लग रहा था । सावळे सुंदर रूप मनोहर अभंग मुझे भी बहुत प्रिय है ।
फ़रवरी 12, 2012 को 11:42 पूर्वाह्न पर
पत्र-पत्रिकाओं के संस्कृति सम्वाददाताओं को आपका यह लेख अवश्य पढना चाहिये क्योंकि संगीत सन्ध्यायों का विवरण भी ऐसा ही संगीतमय होना चाहिये जैसा आपने लिखा। कचेरी पर विमर्श भी अच्छा रहा।
फ़रवरी 12, 2012 को 5:55 अपराह्न पर
सुंदर चित्रमय प्रस्तुति. काफी नयी जानकारी मिली. बधाई.
फ़रवरी 13, 2012 को 8:01 पूर्वाह्न पर
संगीत की अविरल धारा बहाती पोस्ट -कर्नाटक सगीत मुझे थोडा अजीब सा लगता है सुनाने में -हाँ सुबलक्ष्मी का भज गोविन्दम का तो क्या कहिये -मन भावातीत तरंगों को जा छूता है
फ़रवरी 13, 2012 को 3:00 अपराह्न पर
आपकी पोस्ट से यह आयोजन हम ने भी देख लिया.यह सच है कि दक्षिण भारत में शाष्त्रीय संगीत के प्रति लोगों में काफी रूचि है.और घर में बेटी को वह इसकी शिक्षा अवश्य ही देते /दिलवाते हैं.जबकि उत्तर भारत में यह बीते समय की बात सा हो चला है.
फ़रवरी 13, 2012 को 4:57 अपराह्न पर
बहुत बढिया लेख. दक्षिण के संगीत प्रेम को मैंने देखा है किन्तु कभी कचेरी को नहीं. आपका यह ट्रिप अभी तक बहुत अच्छा रहा लगता है आगे के लिए शुभकामनाएँ.
घुघूतीबासूती
फ़रवरी 15, 2012 को 11:08 पूर्वाह्न पर
हिन्दुस्तानी संगीत मैंने सीखा है यहाँ दोनों तरफ के संगीत का जिक्र सुन कर अच्छा लगा. हमारे तरफ संगीत के लिए किसी भी तरह का डेडिकेशन देखने को शायद ही मिले…ऐसी संगीत संध्याएं तो कहीं नहीं होतीं.
जान के बेहद अच्छा लगा. शुक्रिया.
फ़रवरी 15, 2012 को 1:01 अपराह्न पर
सुन्दर और जानकारी से भरा हुआ .शायद कभी जा पायें , तब आपसे आपके भाईसाहेब का पता लेना पडेगा .ताकि पास का इंतज़ाम हो जाये .
फ़रवरी 15, 2012 को 1:59 अपराह्न पर
हिंदुस्थानी संगीत भी कभी निर्मल और शुद्धता से परिपूर्ण रही परन्तु मुगलों के आगमन के पश्चात उसका कौमार्य जाता रहा.
हम भी ऐसा ही कहते आए हैं जी.
असली भारत तो दक्षिण में ही बचा है. उत्तर वाला वर्ण-सकर हो गया है.
फ़रवरी 15, 2012 को 4:15 अपराह्न पर
खेमे बंदिया कहां नहीं रहीं अब संगीत ही सही
मुझे नहीं लगता कि विशुद्ध संगीतज्ञ , कौमार्य भंग जैसे कमेन्ट कर सकते हैं यह अधिकार तो संगीत प्रेमियों ने हथिया रखा है
मेरा कहने का मतलब यह है कि विशेषज्ञ / पंडित / उस्ताद खुद बखुद कोई भेदभाव नहीं करते ! यह खुराफात प्रेमियों के हिस्से का आयोजन है ! ठीक वैसे ही जैसे कि ईश्वर एक हो , तो होता रहे , उसके प्रेमियों ने उसके जितने हिस्से किये, उसे जितने सीढ़ीदार खांचों में बांटा , जितना आदर और जितनी घृणा परोसी , वो तो प्रेमीजनो का ही कमाल है ना
मेरा अभिमत यह है कि संगीत केवल संगीत है उसे प्रेमियों ने शैलियों और क्षेत्रीयता में बांटा ! शैलियों से घराने बने ! अब देखिये ना , जे.सी.जोशी साहब ने संगीत की पैदाइश के वक़्त पे ही उसकी जाति और धर्म भी फिक्स कर दिया
दिक्कत यही है कि हम स्वरों पे भी टैगिंग करने लगे हैं ठीक वैसे ही जैसे कि इंसानों में सदियों पहले से कर चुके हैं
आपका आलेख पढकर आनंद की अनुभूति हुई ,फिर चाहे वहां भैस पगुराई हो या मामियों ने चूल्हे बंद कर डाले हों
आपकी लेखनी का प्रेमी…मेरा मतलब फैन होने के कारण ही मैं भी आपको ब्लॉग जगत की अलग और विशिष्ट किस्म की कचेहरी मानता हूं और यह भी कि ब्लागिंग की मौलिकता / शुद्धता / सार्थकता हो तो आदरणीय सुब्रमनियन जी के कीबोर्ड से निकले हर्फों जैसी वर्ना … ब्लागर्स ने तो गंद मचा कर रखी हुई है ! यह बात मैं सीरियसली कह रहा हूं
फ़रवरी 15, 2012 को 5:19 अपराह्न पर
कुछ पॉडकास्टिंग भी होती सर, तो हम भी मजे ले लेते!
फ़रवरी 15, 2012 को 5:20 अपराह्न पर
सुन्दर विवरण
फ़रवरी 15, 2012 को 5:22 अपराह्न पर
अली सैयद साहब से विकट सहमति है. बधाई!
फ़रवरी 15, 2012 को 6:18 अपराह्न पर
सराहनीय प्रस्तुति
फ़रवरी 16, 2012 को 7:01 अपराह्न पर
जीवन्त प्रस्तुति। पहली बार “संगीत की कचरी” के बारे मे पता चला।
आभार।
आजकल आपका इधर आना कम हो गया है।
फ़रवरी 17, 2012 को 5:05 अपराह्न पर
बड़ा ही सुखकर लगा…पर आपका “झेल गए” कहने पर मुझे आपत्ति है…
आपने ऐसा वर्णन किया है कि सबकुछ जैसे नयनाभिराम हो उठा..
हाँ, थालियों में रखे व्यंजनों ने जो ललचा कर छोड़ा, उससे कष्ट हो गया…
आभार सुन्दर पोस्ट के लिए…
फ़रवरी 24, 2012 को 12:44 पूर्वाह्न पर
आपकी यह पोस्ट तो ‘कचेरियों’ का सन्दर्भ आलेख है।
अप्रैल 3, 2012 को 9:22 अपराह्न पर
हिंदुस्थानी गायन की परंपरा “राज दरबार”, “कोठों” आदि को समर्पित रही और मूलतः मन बहलाने के लिए हुआ करती थी जबकि कर्णाटक संगीत आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है. उत्तर वाले एक ही स्वर भाव में घंटों गाते रहते हैं जबकि यहाँ स्वरों के बीच डोलते रहते हैं. एक संगीत प्रेमी का कहना है कि हिंदुस्थानी संगीत भी कभी निर्मल और शुद्धता से परिपूर्ण रही परन्तु मुगलों के आगमन के पश्चात उसका कौमार्य जाता रहा. पंडित जसराज जी की यहाँ वाले बड़ी सराहना करते हैं यह कह कर कि वे ही हैं जिन्होंने हिंदुस्थानी संगीत की गरिमा को पुनर्स्थापित किया. — Do not agree with this statement + or Sentiments — Tansen’s GURU JI = Haridas ji, Surdas ji , Meera, Tulsidas , are ALL from North India. There were many more Great Classical Singers of NORTH INDIA .
SOUTH INDIAN Karnatak Sangeet is excellant — but please don’t insult North Indian Sangeet by saying it was only for — > “राज दरबार”, “कोठों”! ;-((