उन दिनों मै चेन्नई में था. रात देर तक जागने के कारण कुछ देर से ही उठा था और सोफे पे बैठ उस दिन के अखबार को देख रहा था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी और दरवाजा खोलने वाले ने बताया “ईश्वर” आये हैं. हम उठ बैठे. और ससम्मान अतिथि को आसन ग्रहण करने कहा. उन्होंने बड़े स्नेह से उनके कविता संग्रह (‘पंक्तियों में सिमट गया मन’) की दो प्रतियाँ हमें सौंप दीं. कविताओं से अपने बाल काल के (पाठ्यपुस्तकों में)सानिध्य के अतिररिक्त कभी कोई लेना देना नहीं रहा. हाँ अपने ब्लॉग पर टिप्पणियों के खातिर कुछ नर नारियों के ब्लॉग पर जाना होता है जहाँ कविताओं की वर्षा होती रहती है. भई यह तो मजबूरी है. शायद जब वे हमारे ब्लॉग पर टिपियाते हैं तो यही बात उनपर भी लागू होती होगी. अब जाने भी दें, ज्यादा लिखना नुकसान दायक हो सकता है.
ईश्वर जी की बात कर रहे थे. हमरे पास मिलने आ गए इसका मतलब यह नहीं कि वे कोई ऐरे गैरे हैं. उनकी लम्बी सी शैक्षणिक उपाधियों को यहाँ तवज्जो नहीं देता बस इतना ही कहूँगा कि वे विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि से सम्मानित हैं. तामिलनाडू हिंदी अकादेमी के महासचिव और न जाने क्या क्या. देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कथा, लघु कथा, कविता, लेख, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत आदि विधाओं में हजार से ऊपर रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. सम्मान तो हमें भी करना ही होगा ना. आखिर हमही तो गए थे उन्हें लिवा लाने जब वे भोपाल में सुभद्रा कुमारी चौहान जन्म शताब्दी समारोह के उदघाटन के लिए पधारे थे. तब से हम उनके “मामा” बन गए.
श्री ईश्वर करुण (झा), सन ५७, अट्ठारह सौ नहीं उन्नीस सौ में जन्में, जिनका हृदयस्थल मोहिउद्दीन नगर (समस्तीपुर) बिहार में है, आजकल चेन्नई में ही एक बीमा कम्पनी के वरिष्ट अधिकारी हैं. अपनी कार्यालयीन व्यस्तताओं के रहते भी हिंदी के प्रचार प्रसार में जी जान से जुटे हुए हैं. बातचीत तो होनी ही थी. ऐसा असामान्य स्नेही तथा संवेदनशील व्यक्तित्व किसे नहीं भायेगा. हमने वार्तालाप को कविताओं से कन्नी काटते हुए, मैथिलि, वज्जिका, उनकी सांस्कृतिक विशेषताओं आदि पर केन्द्रित रखा क्योंकि वे मैथिल जो ठैरे और बड़ी संतुष्टि हुई. मिथिला की विरासत पर तो दो चार पंक्तियों में कुछ भी नहीं कहा जा सकेगा लेकिन इतना जान लें की मिथिला वासी ही हैं जो चेन्नई के विभिन्न महाविद्यालयों में संस्कृत का ज्ञान बाँट रहे हैं. यह बात उन्होंने ही बताई थी.
होली का पर्व दहलीज पर है इसलिए हमने उनकी होली पर लिखे एक गीत को चुना है, आपको परोसने के लिए.
कोयल की कूक जब गूंजे अमराई रे
पछुवा से गले मिले जब पुरवाई रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आयी रे
लग जाए पंख जब मन के उमंग को
जब ‘कुछ-कुछ’ होने लगे अंग-अंग को
चकवा-चकेवा जब उड़े संग-संग को
धूल भी तरसने लगे गुलाबी रंग को
गोरी पढ़े ‘दोहा’ और सजन ‘चौपाई’ रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आयी रे
चूड़ियाँ पड़ोसिनों की आधी रात खनके
अंगना में भौजी जब चले तन-तन के
तानाशाही मचे चारों ओर ‘जीवन’ के
छोरे बन घूमे जब बूढ़े पचपन के
अच्छी लगे जब और की लुगाई रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आयी रे
तोता-मैना चोंचले लडावें एक डाल पर
ओंठ लिखे प्रीत की कहानी किसी गाल पर
काढ़े कोई नाम प्यारा अपनी रूमाल पर
घर छोड़ मन चला जाये ससुराल पर
आईने में साली जब लेवे अंगडाई रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आयी रे
सुबह की चाय जब लगे फीकी-फीकी
मन करे रूप की समीक्षा तकनीकी
प्रीत करे जब मनुहार सजनी की
सोया मन इच्छा करे बस पीकी-पीकी
सैंयां करे जब पके बाल की रंगाई रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आई रे

मार्च 2, 2012 को 9:37 पूर्वाह्न पर
आम तौर पर कविता को गले से उतारना मेरे लिये भी मुश्किल है। साथ मे द्रव्य विशेष हो न हो तो कवि के मनोभाव मे उतरना बड़ा मुश्किल है और उसके बिना कविता का आनंद नही लिया जा सकता। इसलिये कवियो के साथ टिपियाने का खेल भी नही खेल पाता। लेकिन होली की इस बयार मे सरल भाषा और भाव से लिखी यह कविता निश्चित ही गले से उतर हृदय को छू गयी।
मार्च 2, 2012 को 10:37 पूर्वाह्न पर
सुब्रमणियन जी, मानो या न मानो, एक कवि तो हरेक के ह्रदय में निवास करता है, और उसे आम भाषा में कृष्ण कहा जाता है
और, फाल्गुन मास में उत्तर भारत के गंगा-यमुनी क्षेत्र के बदलते मौसम में (ठण्ड से गर्मी में बदलते) सारी प्रकृति (इन्द्रधनुष समान) रंगीन हो जाती है और मानव मन भी…
होली तो कृष्ण (काले) खेल गए और ऐसा पक्का रंग लगा गए जो छूटता ही नहीं है! देख लीजिये अंग्रेजों के गोरे चेहरे, अमरीकन के लाल, चीनी-जापानियों के पीले, अफ्रीकन के काले, आदि आदि,,, और सभी को प्रतिबिंबित करते ‘भारतीयों’ के सभी मिलेजुले रंग (जबसे यह आभास हुआ हमने होली खेलनी ही बंद कर दी…:)…
मार्च 2, 2012 को 11:02 पूर्वाह्न पर
अरे बाप रे, यह क्या लिख दिया ढा साहब ने. लगता है कि कोई बहुत बड़ी सामाजिक आपदा आने वाली है
वैसे कविता रस भरी है.
मार्च 2, 2012 को 11:03 पूर्वाह्न पर
क्षमा. कृपया ‘ढा’ के स्थान पर ‘झा साहब’ पढ़ा जाए.
मार्च 2, 2012 को 12:36 अपराह्न पर
कैलाश गौतम जी की पंक्तियां याद आईं-
लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख,
कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख.
मुझ (आप भी?) जैसे कविता अरसिक को भाने वाली है, झा जी की यह फगुनाई.
मार्च 2, 2012 को 2:27 अपराह्न पर
लोग ईश्वर को पिता मानते हैं, तो आप हो गए पिता के मामा जो हुए, पितामह या दादा.
पके बाल की रंगाई तो होली के रंग करते हैं.
ईश्वर जी से मिलवाने के लिए आभार.
घुघूतीबासूती
मार्च 2, 2012 को 3:50 अपराह्न पर
रंगीली होली आयी रे
मार्च 2, 2012 को 6:16 अपराह्न पर
कल 03/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
मार्च 2, 2012 को 6:55 अपराह्न पर
वाह मामा जी, बहुत खूब! भांजे द्वारा लिखा जोरदार गीत पढ़वाया, धन्यवाद।
मार्च 2, 2012 को 6:56 अपराह्न पर
Holi mubarak ke sath kavita utari..
मार्च 2, 2012 को 8:57 अपराह्न पर
इन दिनों मेरा भी मन कुछ ऐसे ही हो रहा है
क्या जोरदार होलियान मूड की कविता पढाई आपने ..कवि यशस्वी हों!
मार्च 3, 2012 को 7:34 पूर्वाह्न पर
रंग-बिरंगी कविता पढ़वाने के लिये आभार। एक उत्सुकता है, दक्षिण में होली का स्वरूप कैसा होता होगा…।
मार्च 3, 2012 को 8:27 पूर्वाह्न पर
@संजय जी:
दक्षिण में होली मनाये जाने की परंपरा नहीं है. पूर्व संध्या के दिन घर के कचरे को इकठ्ठा कर जलाया जाता है और इस आयोजन को “भोगी/बोगी” कहते हैं. चेन्नई के कुछ एक इलाकों में जहाँ गुजरातियों, मारवाड़ियों आदि का जमावड़ा है, वे ही मनाते हैं.
मार्च 3, 2012 को 9:16 पूर्वाह्न पर
ईश्वरजी के साहित्यिक पक्ष से साक्षात्कार कराने का आभार…
मार्च 3, 2012 को 1:13 अपराह्न पर
समसामयिक कविता.
मार्च 3, 2012 को 3:14 अपराह्न पर
होली पर सुंदर कविता परोसी है …. होली की शुभकामनायें
मार्च 4, 2012 को 11:08 पूर्वाह्न पर
सर्वशक्तिसम्पन्न ईश्वर कुछ भी कर सकते हैं।
मार्च 5, 2012 को 12:23 पूर्वाह्न पर
aap sab ko holi ke sandarbh mein likhi meri kavita mama ji dwara pahunchi aur aap sabhi ko achhi lagi,bahut bahut abhar.mama ji ko main namaskaram karta hun.
ishwar karun,
chennai
मार्च 5, 2012 को 8:29 पूर्वाह्न पर
“कोयल की कूक जब गूंजे अमराई रे
पछुवा से गले मिले जब पुरवाई रे……………”
तो समझो प्रकृति बौराई रे
बहुत सुंदर, समय के अनुरूप अभिव्यक्ति
मार्च 7, 2012 को 7:51 अपराह्न पर
ईश्वर” के मामाजी को नमस्कार … आज यह जान कर बहुत ख़ुशी हुई के ब्लॉग के ज़रिये , कुछ दूर का ही सही, पर हमारा भी सम्बन्ध ईश्वर के साथ जुडा. .. सुंदर कविता है.. एक मेधावी कवि से हमारा परिचय करवाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद…. होली की शुभकामनायें…”
मार्च 7, 2012 को 9:54 अपराह्न पर
सुन्दर प्रस्तुति….बहुत बहुत बधाई…होली की शुभकामनाएं….
मार्च 7, 2012 को 11:40 अपराह्न पर
सुन्दर पोस्ट, पोस्ट का नायक सुन्दर और सुन्दर नायक की कविता उससे भी अधिक सुन्दर। देर से पढने का फायदा यह कि होलिका दहन के ठीक बाद यह कविता पढ रहा हूँ। सुन्दर। अति सुन्दर।
मार्च 8, 2012 को 12:50 पूर्वाह्न पर
Fagun ka mausam aya hai,yauvan fir se gadaraya hai,
Kamdev ke kandhe chadh kar booddha chhora bauraya hai,holi ki subh kamnayen. ishwar karun.
मार्च 8, 2012 को 1:19 पूर्वाह्न पर
.
रोचक पोस्ट रोचक संस्मरण …
आभार एवं बधाई !
मार्च 8, 2012 को 1:20 पूर्वाह्न पर
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♥ होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार ! ♥
♥ मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !! ♥
आपको सपरिवार
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
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मार्च 9, 2012 को 5:28 अपराह्न पर
सैंयां करे जब पके बाल की रंगाई रे
तब ये समझ लो रंगीली होली आई रे
रोचक पोस्ट और रंगीन कविता ।