मेरे भाई के घर बहू का चचेरा भाई कहलाने वाला एक भद्र पुरुष आया हुआ था. कर्मकांडी प्रवृत्ति का और अपने शहर के समाज में कर्ता धर्ता. उन्हें कांचीपुरम के मठाधीश (शंकराचार्य) से मिलने और सलाह मशविरा करने जाना था जिसके लिए व्यवस्था कर दी गयी थी. बहू ने मुझसे कहा, आप भी चले जाओ, भाई तो अकेला ही जा रहा है. हमने पूछा कब जाना है और कब तक आना है तो बताया गया कि सुबह ९ बजे निकलेंगे और दुपहर खाने तक वापस आ जायेंगे क्योंकि वो भैय्या बाहर नहीं खाता. हमने उत्तर दिया हम चलने को तो तैयार हैं परन्तु रात तक ही लौट पायेंगे. भैय्या मोटा है न, एक दिन भूखा रह लेगा. बात भैय्या तक पहुंची और भद्र पुरुष ने बाहर खाने पर सहमती दे दी. हमने भी वार्तालाप में उन्हें बता दिया कि हमारी प्राथमिकता वहां के मंदिरों में जो आसीन हैं उनसे मिलने की होगी. उन्हें वहां छोड़ कर हम निकल पड़ेंगे और दुपहर भोजन के लिए उन्हें ले लेंगे. उन्होंने एक बात कही, हाँ आरती के बाद तो वे निकल ही सकते हैं. अब हमें थोड़े ही मालूम था कि वहां आरती दुपहर को होती है.
चेन्नई से कांचीपुरम की दूरी लगभग ८० किलोमीटर है. बंगलूरु जाने वाले राजमार्ग एन एच 4 पर लगभग ७० किलोमीटर चलने के बाद बायीं तरफ कांचीपुरम के लिए रास्ता कटता है. हम लोग अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सुबह नाश्ता कर ९ बजे निकल पड़े थे. करीब ४५ किलोमीटर चलने पर ही अपने भूत पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गाँधी की स्मृति में बनाए गए बड़े बड़े खम्बे दिखे. यही श्रीपेरुम्बदूर था.
लगभग १५ किलोमीटर और आगे चलने पर एक विशाल परन्तु सुन्दर शिव जी की प्रतिमा नंदी सहित शोभायमान थी. जगह का नाम पूछा तो था परन्तु अब याद नहीं रहा.
वहां पांच मिनट रुकते हुए आगे बढ़ लिए. इस बीच संक्षेप में कांचीपुरम के बारे में भी बताता चलूँ . वैसे साल भर में भी वहां के किस्से कहानियों को बता पाना मुश्किल है.क्योंकि यह नगर वाराणसी के बाद भारत का बहुत बड़ा शैक्षणिक केंद्र रहा. पतंजलि के २ री सदी ईसा पूर्व के महाभाष्य में “नगरेशु कांची” का उल्लेख हुआ है. सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य के परामर्शदाता चाणक्य यहीं का माना गया है. बहुत सारे बौद्ध विद्वान् जैसे बुद्धघोष, धर्मपाल और चीन में जाकर ध्यान आधारित बौद्ध सम्प्रदाय का झंडा गाड़ने वाले ‘बोधिधर्म’ की भी कांची ही जन्मस्थली थी. कांचीपुरम ९ वीं शताब्दी तक तो पल्लवों की राजधानी रही. १० वीं से १३ वीं तक चोल साम्राज्य का हिस्सा बना फिर १७ वीं शताब्दी तक विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत था.
आगे चलकर कांचीपुरम का मोड़ आ गया और १०.४० तक हम कांची के कामकोटि मठ के सामने थे. वहां हमने भद्र पुरुष को उतार दिया और उनसे उनका मोबाइल नंबर लेकर सीधे कांचीपुरम के कामाक्षी अम्मन (माता पार्वती) के दरबार में पहुँच गए. हालाकि मैं स्वयं यहाँ पहले भी एक बार आ चुका हूँ परन्तु यहाँ के कामाक्षी माता के दर्शन नहीं कर पाए थे. गाडी खडी करने की सुविधा के अनुरूप दक्षिणी प्रवेश द्वार से अन्दर गए थे.
मुख्य प्रवेश तो पूरब की ओर से हैं. अन्दर घुसने पर हमें मंदिर का पवित्र कहलाने वाला जल कुंड दिखा. वैसे मंदिर ५ एकड़ के भूभाग में फैला है. दर्शनार्थियों के कतार में हम भी शामिल हो गए और चक्कर लगाते हुए मंदिर के अन्दर थे. देवी के दर्शन भी भरपूर कर पाए और फिर वहां से खिसकना हुआ. अन्दर रौशनी की कमी थी और गर्भ गृह के बाहर चारों तरफ का निर्माण कुछ अटपटा लगा संभवतः इसलिए कि मंदिर का विस्तार कई चरणों में अनेकों राजवंशों के द्वारा करवाया जाता रहा. एक प्रकार से भूल भुलैय्या ही थी. हम तो बस दूसरे श्रद्धालुओं का अनुगमन करते चले गए. अन्दर के शिल्पकला का रसास्वादन भी नहीं हो पाया. ऊपर से केमरे का प्रयोग तो वर्जित ही था. इस मंदिर की गणना सिद्ध पीठों में होती है और आदि शंकराचार्य से सम्बंधित बताया जाता है. परन्तु वास्तव में बौद्ध धर्म के तारा देवी का यह स्थल है जिसे शनै शनै लगभग ११/१२ वीं सदी में अपने मूल तांत्रिक स्वरुप से सौम्य रूप में परिवर्तित किया गया. 
बाहर आने के बाद एक चक्कर लगा देखा. प्रांगण में ही एक सुन्दर मंडप बना है. यहाँ चित्र लिए जा सकते थे. खम्बों में नाना प्रकार के किस्से कहानियों को उकेरा गया था. यह कुछ विशिष्ठ लगी. 
६३ विख्यात शिव भक्तों में जिन्हें नायनार कहा जाता है (जिनकी कतारबद्ध मूर्तियाँ शिव मंदिर के गलियारों में पायी जाती हैं) एक कन्नप्पा नायनार भी हुआ है. कन्नप्पा मूलतः एक नीची जाति का शिकारी था परन्तु जंगल से एक शिव लिंग की प्राप्ति के बाद वह उसकी आराधना अपने तरीके से किया करता. भगवान् शिव ने उसकी परीक्षा लेनी चाही. एक दिन कन्नप्पा ने देखा कि शिव लिंग की एक आँख से खून और पानी टपक रहा है. उसने तत्काल अपने तीर से अपनी एक आँख निकाल कर शिव लिंग में चिपका दी. खून का रिसाव तो बंद हो गया परन्तु अब दूसरी आँख की भी वही स्थिति हो गयी. कन्नप्पा ने अपनी दूसरी आँख भी निकालनी चाही परन्तु उसे भान था कि यदि वैसा करेगा तो खुद अँधा हो जावेगा और फिर अपनी आँख को सही जगह नहीं लगा सकेगा. इसलिए उसने पैर के एक अंगूठे को शिव लिंग की बहती दूसरी आँख पर रखा ताकि अपनी खुद की दूसरी आँख निकालने के बाद सही जगह रखा जा सके. खैर भगवान् तो परीक्षा ले रहे थे. कन्नप्पा पास हो गया और भगवान् उसके समक्ष प्रकट हो गए थे. आगे क्या हुआ नहीं मालूम. उपरोक्त चित्र जो मंडप के एक खम्बे में खुदा है, इसी कहानी को बता रहा है.
वास्तव में कांचीपुरम का मूल कामाक्षी का मंदिर यह नहीं है. जिस मंदिर में आदि शंकराचार्य ने श्रीचक्र की स्थापना की थी वह तो पीछे है और वर्त्तमान मंदिर से कुछ ही दूर. इन्हें यहाँ आदि पीठेश्वरी कहा जाता है. हम वहां भी पहुँच गए थे परन्तु बाहर से दरवाज़ा बंद हो चला था.
वहां से सीधे वरदराज पेरूमल (महाविष्णु) मंदिर होते हुए शंकराचार्य जी के मठ पहुँच गए. वहां भी तस्वीर लेना प्रतिबंधित था. एक चक्कर लगा कर देखा. पीछे गौशाला थी. एक गौमाता ने हमें पोस दे दिया और हमने भी सोचा तेरा ही सही. फिर मुख्य हाल में भद्र पुरुष दिखे और वहां आरती का समय हो चला था. हम भी शरीक हुए और उसके बाद खाना खाने उनके कहे एक भोजनालय चले गए. 
नोट: सनद रहे तामिलनाडू में कहीं भी “होटल सरवन भवन” में खान पान करना जेब पर भारी पड़ेगा. एक घी में बना सादा दोसा के ९२.०६ रुपये लगे थे.

अप्रैल 10, 2012 को 9:17 पूर्वाह्न पर
अच्छी जगह है, परंतु दक्षिण में हर जगह मंदिरों में दर्शन करने के लिये धन का बोलबाला है, जिससे मंदिर मंदिर ना लगकर व्यावसायिक प्रतिष्ठान नजर आने लगता है।
शिवजी की भक्ति की कहानी अद्भुत है।
सरवाना भवन लगता है कि काफ़ी महंगा हो गया है चैन्नई में हमने खाया था, तब भाव ठीक ठाक था।
अप्रैल 10, 2012 को 9:21 पूर्वाह्न पर
बढि़या किस्सा, लाजवाब चित्र.
अप्रैल 10, 2012 को 9:27 पूर्वाह्न पर
वाह वाह, वाह वाह! पत्थरों की जुबानी, ईंट-ईंट मे लिपटी कहानी! कामाक्षी कांची वाली के दर्शनों से दिन की बढ़िया शुरुआत…
अप्रैल 10, 2012 को 9:35 पूर्वाह्न पर
भद्र पुरुष का एक भी चित्र नहीं? ये होटल सरवन भवन क्या है? इसके बारे में बताएँ..
अप्रैल 10, 2012 को 10:31 पूर्वाह्न पर
कुछ भी कहना याने पहले ही, बार-बार कही अपनी बातों को दुहराना। आप अनुपम हैं।आपको सलाम।
अप्रैल 10, 2012 को 10:32 पूर्वाह्न पर
कांचीपुरम के निकट से दर्शन कराने का आभार!
अप्रैल 10, 2012 को 11:19 पूर्वाह्न पर
हाल ही में यात्रा कर के आएं है और आप जैसा लिखना चाहते है. प्रयास किया मगर लगता है जानकारी एकत्र करने में गचा खा गए. उस समय ब्लॉग लिखना दिमाग में नहीं था…
सुन्दर पोस्ट…
अप्रैल 10, 2012 को 11:59 पूर्वाह्न पर
हमेशा की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक !
अप्रैल 10, 2012 को 12:56 अपराह्न पर
अधिकतर जगह मंदिरों में फोटोग्राफी वर्जित है…मुझे इसका कारण ठीक ठीक ज्ञात नहीं…पर मज़ा किरकिरा तो हो ही जाता है.
कांचीपुरम के बारे में जान के अच्छा लगा…इधर हम भी सोच रहे हैं कि बंगलौर में हैं ही तो आसपास की जगहें देख डालें…ऐसे में इस ब्लॉग से काफी मार्गदर्शन मिलेगा
अप्रैल 10, 2012 को 6:32 अपराह्न पर
कुछ पुरानी यादें ताजा हुईं ..हम भी इसी रूट से दर्शन को गए थे ..एक विशालकाय स्वर्णिम छिपकली दिखी थी जिसे छूना होना था ! और शंकराचार्य का मूल स्थान भी पास ही है ?
अप्रैल 10, 2012 को 6:41 अपराह्न पर
डा.अरविन्द मिश्रा:
एक साथ कई मंदिरों को देख आने से भ्रम की स्थिति निर्मित हो जाती है. स्वर्णिम छिपकली “वरदराज पेरुमाल” (विष्णु) मंदिर में है. वैसे शंकराचार्य जी का मूल (?) स्थान वहां नहीं है. एक मठ जरूर है लेकिन शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित मठों में से नहीं.
अप्रैल 10, 2012 को 7:07 अपराह्न पर
अब कभी उस तरह भी रुख करना पड़ेगा, आपकी पोस्ट तब मार्गदर्शन करेगी।
अप्रैल 11, 2012 को 9:00 पूर्वाह्न पर
ख्याल रहेगा …… बहुत सुंदर चित्रों से सजी पोस्ट …..
अप्रैल 12, 2012 को 9:47 अपराह्न पर
an another awesome travel post…
lil details and images and warnings all make it more fun to read !!!
अप्रैल 15, 2012 को 1:37 अपराह्न पर
भाई साहब यह पोस्ट भी हमेशा की तरह आपके मस्त रंग में रँगी है. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं सोच में पड़ गया हूँ कि परीक्षाएँ पास करने के लिए अपने अँगूठे और आँखें देने परंपरा आदिवासियों में ही क्यों दर्शाई जाती है
(
अप्रैल 15, 2012 को 1:40 अपराह्न पर
ऊपर meghnet के नाम पर मैं वर्ड प्रैस के झांसे में आ गया था. मेरे ब्लॉग का पता इस प्रकार है-
http://meghnet.blogspot.in/2012/04/blog-post_15.html
अप्रैल 15, 2012 को 10:55 अपराह्न पर
बहुत साल पहले हम भी इस स्थान के दर्शन कर के आये हैं.
कुछ नयी जानकारियाँ भी मिलीं.
आभार.
अप्रैल 18, 2012 को 6:35 अपराह्न पर
नमस्कार सर, वर्डप्रेस के किसी ब्लॉग पर कमेंट करने में दिक्कत हो रही है। एक तो यूँ ही इतनी देर से पढ़ पाया, उस पर वर्डप्रेस की ये गुंडागर्दी।
“पी.एन. सर,
घर बैठे ऐसी खूबसूरत जानकारी, आप हमें ऐसी पोस्ट पढ़वाते रहिये और फ़ी पोस्ट ९२.०६ की दर से अनलिमिटेड डोसा हमारे नाम लिखते रहिये, भोपाल आना होगा तो आपके दर्शन भी कर लेंगे और हिसाब कर लेंगे:)
कभी साऊथ में जाना हुआ तो आपके ब्लॉग का प्रिंट साथ लेकर जाऊंगा, अग्रिम आभार स्वीकार करें।
सादर”
संजय
http://mosamkaun.blogspot.com/
अप्रैल 19, 2012 को 7:28 अपराह्न पर
आपके चित्र अद्भुत होते हैं। राजीवजी की समाधी पहली बार देखी। आभार।
अप्रैल 25, 2012 को 6:33 अपराह्न पर
कन्नप्पा नायनार की कहानी तो अद्भुत है ही चित्र नें उसमें चार चांद लगा दिये । ऐसे भक्त हों तो शिवजी क्यूं ना प्रकट हों । कामाक्षी कांची वाली के बारे में जानकर अच्छा लगा ।
दूसरे भी सारे चित्र बहुत ही सुंदर हैं ।