वर्षों से एक तमन्ना थी कि कश्मीर घूम आयें परन्तु हालातों के मद्दे नज़र, जोखिम उठा न सके थे. एक मित्र ने बताया, अब तो आतंकवाद पर काफी हद तक नकेल कसी जा चुकी है. सपरिवार, एक जत्थे में चलने का प्रस्ताव जब आया तो अपने आपको रोक न सका. महीने भर तक इंतजामात किये गए और ठहरने,घूमने फिरने सबकी पूरी पुख्ता तैय्यारियाँ कर ली गयीं. सवाल यह था कि श्रीनगर तक के लिए हवाई मार्ग चुना जाए अथवा रेल द्वारा जम्मू तक जाकर वहां से बची हुई दूरी आरामदेयक कारों से किया जावे. हवाई यात्रा में भारी खर्च आ रहा था सो रेल से जाना तय हो गया और टिकटों की व्यवस्था कर ली गयी. श्रीनगर के होटल वाले से बातचीत हुई और एक छोटे से झटके में ही हम सब को वातानुकूलित कारों में जम्मू से श्रीनगर ले जाने की व्यवस्था भी कर दी.
इसी माह जून ५ को भोपाल से चलकर ६ तारीख की सुबह जम्मू पहुंचना हो गया. रेल की यात्रा सुखद ही रही और अपनों के साथ के अतिरिक्त सेना में कार्यरत एक अधिकारी के नन्हे से प्यारे बच्चे का साथ कोई भुला नहीं पायेगा.
जम्मू में गाडी विलम्ब से पहुंची परन्तु स्टेशन पर हमारे लिए दो गाड़ियाँ प्रतीक्षा कर रही थी. आगे श्रीनगर तक ३०० किलोमीटर का रास्ता तय करना था इसलिए जम्मू में समय गंवाना हम लोगों को ठीक नहीं लगा. तय कर लिया कि रास्ते में ही खा पी लेंगे. प्रातःकालीन क्रियाओं से मुक्ति तो रेलगाड़ी में ही कर ली गयी थी फिर भी कुछ शंकाएं हों तो रास्ते में व्यवस्था जो थी.
गाड़ियाँ हम सब को भर कर रवाना हुईं. गर्मी भी अच्छी पड़ रही थी परन्तु गाडी के अन्दर तो सब ठीक ठाक ही था. एक के बाद एक पहाड़ियों को घाटों के रास्ते लांघ रहे थे. कभी तावी नदी के साथ साथ चलते तो कभी आसमान में रहते. गर्मियों के मौसम के बावजूद चारों तरफ का दृश्य बड़ा लुभावना था.
यों ही कुछ घंटे बीत गए फिर अचानक पता चला आगे ट्राफिक जाम है. जम्मू से श्रीनागेर का मार्ग भैंसों का राजमार्ग है. जब वे चलते हैं तो बाकी सब उनके लिए अपनी गाड़ियाँ खड़ी कर देते हैं. रेंगते रेंगते ही जा पा रहे थे यह रेंगना भी लगभग २ घंटे से अधिक चला और अचानक हमारी दाहिनी तरफ एकदम गहराई में, हंसी वादियों में एक बाँध दिखाई दिया. वहीँ कुछ भोजनालय आदि भी दिखे. गाड़ियों को रुकवा कर खान पान कर लेने का निर्णय लिया. वहां सभी होटलों के पीछे से बाँध का सुन्दर दृश्य भी दिखाई पड़ रहा था. यह बाँध बगलीहार विद्युत् जल परियोजना का है.
हम सब ने बढ़िया कढी पकौड़ों के साथ तंदूरी रोटियों को उदरस्थ किया. रोटियां तवे की रोटी से भी छोटी थीं परन्तु लजीज. फिर काफिला आगे बढ़ा. इस बहाने भैंसों के जाम से भी निजात मिल गयी.
कोई २४० किलोमीटर के सफ़र के बाद पहाड़ों से भी मुक्ति मिल गयी. आगे की सड़क समतल थी. रात के ९.३० बजे होंगे. एक क़स्बा आया जिसे क़ाज़ी गुंड कहते हैं. वहां चहल पहल कुछ अधिक ही दिखी. दूकानों की लम्बी कतार और सभी जगमगाते हुए. चालक महोदय ने वहीँ खा लेने की सलाह दी परन्तु हम लोगों को उस जगह स्वच्छ शाकाहारी भोजन मिलने की कोई गुंजाईश नहीं दिखी इसलिए श्रीनगर में होटल वाले से ही बात कर रात के भोजन को सुनिश्चित करने कह दिया. हाँ इसपर एक बात याद आई. जम्मू पहुँचने के पहले से ही कोई भी प्रीपेड मोबाईल काम नहीं करते. इसके लिए होटल वाले ही व्यवस्था कर देते हैं. वहां के दो स्थानीय सिम वेटरों के माध्यम से सुलभ हो गए थे.
अपने होटल पहुँचने तक रात १०.३० से अधिक हो गए थे.
यह पोस्ट हम लोगों के कश्मीर भ्रमण पर महज एक भूमिका है. अगले पोस्टों में, वहां के वादियों, वहां के लोगों, उनकी संस्कृति, ग्रामीण जीवन आदि पर प्रकाश डाली जायेगी.






जून 23, 2012 को 7:01 अपराह्न पर
वाह एक सुंदर अनुभव बॉंटने के लिए आभार
जून 23, 2012 को 7:02 अपराह्न पर
sundar photos, badhiya bhoomika, sir aapne hamari kashmir trip ki yaad dila di.agle post me jaan bakers ka jikra aayega kya?
जून 23, 2012 को 7:08 अपराह्न पर
बरसों बाद आपकी नज़र से कश्मीर देखा …
आभार भाई जी !
जून 23, 2012 को 7:17 अपराह्न पर
भूमिका के आगे की आतुर प्रतीक्षा है ….
जून 23, 2012 को 7:18 अपराह्न पर
तो आप ‘ये हसीं वादियाँ, ये खुला आसमाँ’ की सैर कर आए हैं और उम्मीद है कि अब आप ‘भारत हम को जान से प्यारा है’ की शेष कथा भी सुंदर तरीके से सुनाएँगे. प्रतीक्षा रहेगी.
जून 23, 2012 को 7:25 अपराह्न पर
श्री संजय अनेजा जी से इमेल में प्राप्त:
हम तो गए थे ठेठ सत्तासी में, जब पूरे जोरों पर था आतंकवाद| जगह वाकई ख़ूबसूरत है और आपके माध्यम से जान रहे हैं तो और भी खूबसूरत लग रहा है सब|
जून 23, 2012 को 8:22 अपराह्न पर
बधाई सुबरमानियन जी… सपने को हक़ीक़त मे बदलने की। शीर्षक बढ़िया था…किताब की इंतज़ार रहेगी!!
जून 23, 2012 को 10:44 अपराह्न पर
मुझे लग ही रहा था कि इतनी लंबी अनुपस्थिति ? हो ना हो आप ज़रूर ब्लाग पोस्ट के जुगाड़ में निकले होंगे
जून 23, 2012 को 11:19 अपराह्न पर
भूमिका बहुत ही रोचक और जिज्ञासा जगानेवाली है। वर्णन की प्रतीक्षा रहेगी।
जून 24, 2012 को 12:37 पूर्वाह्न पर
उम्मीद है शांतिपूर्वक भ्रमण कर पाए होंगे, पर्यटन प्रदुषण से अप्रभावित रहते हुए…
जून 24, 2012 को 6:04 पूर्वाह्न पर
सुंदर शुरुआत.
जून 24, 2012 को 3:57 अपराह्न पर
अब जब पहुँच गये हैं तो आनन्द बरसेगा..
जून 24, 2012 को 5:18 अपराह्न पर
पुरानी यात्रा की याद हो आई, अब आपने सब देख लिया है तो आपके मार्गदर्शन में एक बार फ़िर जाने की इच्छा बलवती हो आई है वर्ना तो कश्मीर का नाम आते ही आतंकवाद याद हो आता है. अब मीडिया से भी पता चल रहा है कि हालात सामान्य हैं. आपकी अगली पोस्टों का बेसब्री से इंतजार रहेगा. शुभकामनाएं.
रामराम.
जून 24, 2012 को 8:13 अपराह्न पर
वाकई..बहुत सुन्दर तस्वीरें हैं.आप के चित्रों के माध्यम से हमने भी आज के कश्मीर की सैर कर ली .अगली पोस्ट और अन्य चित्रों का इंतज़ार रहेगा .
जून 25, 2012 को 8:06 पूर्वाह्न पर
पढकर बहुत अच्छा लगा। अगली कड़ियों का इंतज़ार है।
जून 25, 2012 को 11:06 पूर्वाह्न पर
आपने तो मुझे घर बैठे कश्मीर के दर्शन करवा दिए … फोटो बहुत अच्छे लगे… अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा….आभार
जून 25, 2012 को 12:49 अपराह्न पर
Kashmir is on the top of my places-to-visit list…
every year we make plans.. n it remain in plan form only
enjoyed this post as ever… n eagerly waiting 4 next ones..
जून 26, 2012 को 5:30 अपराह्न पर
वाह, तो आप कश्मीर में हैं. हम भी घर बैठे कश्मीर दर्शन कर लेते हैं.
घुघूतीबासूती
जून 29, 2012 को 3:51 पूर्वाह्न पर
हम गये थे 1983 में . तब आतंक वाद इतना था नही पर अब आपके लेख से लगता है दुबारा से जा सकते हैं । फोटो बहुत ही खूबसूरत हैं । आगाज़ इतना अच्छा है तो आगे तो और भी खूबसूरत नजारे देखेंगे ।