पुराने साहित्य एवं इतिहास में अवन्ती का नाम सुन रखा था परन्तु वह तो एक महान जनपद था (प्राचीन १६ जनपदों में). जिसकी एक राजधानी उज्जैनी हुआ करती थी. वस्तुतः अवन्ती या अवंतिका, आजकल के मालवा क्षेत्र का ही प्राचीन नाम था. इसके पूर्व के एक पोस्ट में पहलगाम जाते हुए अवन्तीपुर में रुकने की बात कही थी जो श्रीनगर से लगभग ३० किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है. बहुत पहले कभी सुन रखा था कि यहीं कश्मीर की कभी राजधानी हुआ करती थी.
जब हमारी गाडी मंदिर के सामने रुकी, सामने ही अपने अतीत की भव्यता को संजोये, खँडहर ने हमारा स्वागत किया. वहीँ एक चौकीदार खड़ा था जिसने कहा कि “आप लोगों को टिकट लेनी होगी, यहीं बायीं तरफ, साहब बैठे हैं”. हम टिकट खिड़की की ओर बढ़ गए. वहां साहब के रूप में एक सरदारजी बैठे थे. सरदारजी ने हमारा परिचय जानना चाहा और बातों ही बातों में हमने उन्हें जाहिर कर दिया कि हम भी एक पुरा प्रेमी हैं. शायद हमने अंग्रेजी का शब्द Amateur Archaeologist का प्रयोग किया था. सरदारजी ने क्या समझा नहीं मालूम लेकिन बड़े गदगद होकर उन्होंने टिकट देने से इनकार कर दिया. प्राजी आपके लिए सब फ्री. हमने कहा हम अकेले नहीं हैं, दस लोग हैं. सरदार जी ने कहा “तो क्या हुआ जी, आप हमारे आदमी हैं”. टिकट खिड़की में कैमरे का भी १० रूपया और विडियो कैमरे का २५ रूपया लिखा देखा. पूछने पर कहा वह भी माफ़. प्रसन्न हो हमने अपने दूसरे साथियों को भी बुला लिया और अन्दर प्रवेश कर गए.
१२ वीं सदी कश्मीर के एक महान संस्कृत कवि एवं विद्वान् “कल्हण” की रचना राजतरंगिनी (राज वंशों का इतिहास) में उल्लेख है कि उत्पल राजवंश के राजा अवन्तिवर्मन के द्वारा विश्वैकसरा नामके स्थल पर अवन्तीपुर नामके नगर की स्थापना की गयी थी. संभवतः यहाँ मृत्यु पश्चात आत्माओं के स्वर्गारोहण के लिए विशेष कर्मकांड किये जाते थे. इससे अनुमान लगता है कि अवन्तीपुर की स्थापना/नामकरण के पूर्व ही से यह कोई धार्मिक स्थल रहा है. नजदीक ही झेलम (प्राचीन नाम वितस्ता) नदी की उपस्थिति भी अनुकूल है. अवन्तिवर्मन मृत्यु पर्यंत एक परम वैष्णव बना रहा. ९ वीं सदी में उसी ने इस नगर में एक विष्णु का भव्य मंदिर बनवाया और गर्भगृह में विष्णु महाराज अवन्तिस्वमिन के नाम से प्रतिष्ठित हुए. राजा का मंत्री “सुरा” शिव का आराधक था इसलिए लगभग एक किलोमीटर दूरी पर एक और भव्य मंदिर, जिसे अवन्तीश्वर कहा जाता है, शिवजी के लिए भी बनवाया गया. अब दोनों ही अपनी अतीत की याद में आंसू बहा रहे हैं. शिव मंदिर के भग्नावशेष इतने करीब होंगे, नहीं मालूम था. अन्यथा उसे भी देख आते.
अपने आध्यात्मिक गुरु मीर सैय्यद अली हमादानी की प्रेरणा एवं उन्हें खुश करने के लिए कश्मीर के १४ वीं सदी के शासक सुल्तान सिकंदर बुतशिकन ने पूरे कश्मीर में क्रूरता की सभी हदें पार कर दीं. बुतशिकन का शाब्दिक अर्थ ही होता है मूर्ति भंजक. आजकल के तालिबान भी उसके सामने फीके पड़ जायेंगे. बड़े व्यापक रूप से धर्मांतरण हुए और साथ ही कत्ले आम भी. नृत्य, संगीत, मदिरा पान पूरी तरह प्रतिबंधित थे. चुन चुन के सभी मंदिरों को धराशायी कर दिया. अवन्तिपुर का विष्णु मंदिर भी इसी कारण अन्य मंदिरों की तरह वर्तमान अवस्था में है. लेकिन मंदिर इतना मजबूत था कि उसे तोड़ने में एक साल लग गया था. किन्तु संयोग से सिकंदर का द्वितीय पुत्र जैन-उल-अबिदीन (१४२३ -१४७४) जो अपने बड़े भाई के मक्का रवानगी के बाद सुलतान बना था, अपने पिता के स्वभाव के विपरीत अत्यधिक सहिष्णु था. परन्तु उसके आते तक तो सभी हिन्दू धर्मस्थल जमींदोज़ हो चुके थे.
एक विहंगम दृश्य – यह चित्र चुराया हुआ है
मंदिर के प्रवेश द्वार तक जाने के लिए एक सुन्दर रेलिंग युक्त पक्का मार्ग बना हुआ है. प्रवेश करने के लिए सीढियां बनी हैं. लगभग ५ फीट ऊपर पहुँचते ही खंडित खम्बे और पत्थर पर अलंकरण स्पष्ट होने लगता है. यह द्वार अपने समय में बड़ा ही आकर्षक रहा होगा. यहाँ एक प्रकार के चूने का पत्थर प्रयुक्त हुआ है और तोड़ फोड़ के अतिरिक्त प्राकृतिक क्षरण के कारण भी शिल्पों की पहचान आम आदमी के लिए काफी कठिन हो चला है. मंदिर आयताकार है (१७०.६ x १४७.६ फीट). मुख्य दरवाजे से नीचे उतरने पर एक बड़ा भारी आँगन मिलता है. बीचों बीच ही गर्भ गृह बना है जो कुछ पिरामिड नुमा है. नीचे काफी चौड़ा है जो उत्तरोत्तर सकरा होते जाता है. संभव है कि गर्भ गृह ६’ x ६’ का रहा हो. मंदिर के चारों तरफ कुछ ऊँचाई लिए कई कक्ष बने है जिनमें खम्बे भी लगे थे. यह कहना कठिन है कि उन कक्षों का क्या प्रयोजन रहा होगा. निवास के लिए तो उपयुक्त नहीं है. बौद्ध विहारों की तर्ज पर यहाँ बैठ कर ध्यानमग्न हुआ जा सकता है या फिर इनके अन्दर भी भिन्न भिन्न देवी, देवताओं की प्रतिष्ठा रही हो. आँगन के अन्दर ही चारों कोनों पर छोटे मंदिरों के भग्नावशेष स्पष्ट दिख रहे हैं. संभवतः और भी छोटे मंदिर रहे हों. बताया गया कि यहाँ से प्राप्त मूर्तियों को श्रीनगर के संग्रहालय में रखा गया है.
इस मंदिर के स्थापत्य के बारे कुछ जानकारों का मत है कि तुलनात्मक दृष्टि से मंदिर निर्माण कला उस समय अपने चरम पर थी और गांधार शैली का प्रभाव दिखता है. कुछ इस मंदिर के निर्माण को यूनानी प्रभाव युक्त भी मानते हैं. उदाहरणों को उद्धृत करूँ तो बात बहुत आगे बढ़ जायेगी. इतना ही कहना मेरे लिए यथेष्ट होगा कि यह मंदिर अपनी सम्पूर्णता में अपने समय का अद्भुत एवं अद्वितीय निर्माण रहा होगा.
यहाँ एक बात और बताना चाहूँगा कि अवन्तिपुर में ही एक दूसरा जो अवन्तीश्वर (शिव) का मंदिर है वह भी लगभग इसी प्रकार का है. अनंतनाग (इस्लामाबाद) से ८ किलोमीटर की दूरी पर ललितादित्य द्वारा ८ वीं सदी में निर्मित मार्तंड सूर्य मंदिर के खँडहर हैं. वह भी अवन्तिपुर के मंदिर जैसा ही विशाल था और बनावट भी मिलती जुलती है. इन दोनों मंदिरों को देखने का हमें सौभाग्य नहीं मिला.












सितम्बर 8, 2012 को 9:08 पूर्वाह्न पर
आदरणीय
सुंदर लेख की जानकारी के लिए धन्यवाद
भविष्य में भी जानकारी देते रहें
शुभकामनाओं के साथ गुड्डोदादी दादी चिकागो अमरीका से
सितम्बर 8, 2012 को 12:14 अपराह्न पर
आप भारत में स्थित इस्लामाबाद (अनंतनाग) तक गए. बधाई. आपका विवरण चित्रों से सुसज्जित हो कर बहुत निखर गया. कल्हण की राजतरंगिणी में मेघ सुमुदाय का उल्लेख है. आपके आलेख से सब याद हो आया. आपके आलेख से प्राप्त जानकारी काफी संकेत देती है. आपका आभार.
सितम्बर 8, 2012 को 1:01 अपराह्न पर
मेरे लिए तो रुचिकर और ज्ञानवर्धक भी रहा यह.
“कल्हान” = कल्हण.
सितम्बर 8, 2012 को 5:01 अपराह्न पर
वाह ! और आह ! की भावनाएं एक साथ उभरती हैं इस पोस्ट को देखने व पढ़ने के बाद. इतिहास को सहेजकर न रख पाए हम !!!
सितम्बर 8, 2012 को 10:02 अपराह्न पर
लेख पढ़ मन में हूक उठती है. जब भी इन टूटे हुए मंदिरों, कलाकृतियों को देखती हूँ तो बहुत उदासी घेर लेती है.
घुघूतीबासूती
सितम्बर 8, 2012 को 11:27 अपराह्न पर
गौरवशाली इतिहास का अंदाजा लगाकर ही गौरव का अहसास होता है, वहीं तालिबानी मानसिकता द्वारा किया गया ध्वंस देखकर शर्म, क्षोभ भी महसूस होते हैं|
अभी आप टूर पर हैं, लौटकर फुर्सत में ‘आलसी का चिट्ठा’ पर कोणार्क सीरिज़ देखिएगा| सुदूर उत्तर और पूर्वी तट के मंदिरों पर एक जैसी सामग्री, जबरदस्त काकटेल का सामान है|
सितम्बर 9, 2012 को 6:30 पूर्वाह्न पर
अवन्तीपुर कश्मीर में?! यह मेरे लिये नई जानकारी। धन्यवाद।
सितम्बर 9, 2012 को 8:40 पूर्वाह्न पर
अवन्ति हमें तो अब तक उज्जयिनी का ही नाम पता था, आज नई जानकारी मिली ।
सितम्बर 9, 2012 को 12:15 अपराह्न पर
Fascinating history of little know place, to people , from this part of India.
Thanks sir.
सितम्बर 9, 2012 को 5:51 अपराह्न पर
उम्दा जानकारी- बहुत अच्छी लगी पोस्ट- तस्वीरें भी.
सितम्बर 9, 2012 को 7:26 अपराह्न पर
संस्कृति का उत्कर्ष बताते हुये खंडहर..
सितम्बर 10, 2012 को 8:29 पूर्वाह्न पर
बिलकुल भी नीरस नहीं है यह पोस्ट -जानकारी भरी है …..और चोरी भी खूबसूरत है
सितम्बर 10, 2012 को 7:02 अपराह्न पर
मंदिर के अवशेष भी चित्रों के माध्यम से अपनी भव्यता बिखेर रहे हैं..जानकारीपरक आलेख.
सितम्बर 11, 2012 को 6:55 अपराह्न पर
कश्मीर यात्रा का सिलसिला बहुत शानदार रहा. मैं यहाँ ये भी कहना चाहूँगा कि मैं भी सपरिवार कुछ दिन पहले ही कश्मीर घूम आया हूँ.और जाने से पहले आपका पहलगाम तक का विवरण पढ़ चुका था.अवंतीपुरा के रुइंस तो एक दम रास्ते पर ही हैं और मेरे पास भी इसके बेहतरीन चित्र हैं.इसके अलावा मट्टन के पास बुम्जू का गुफा मंदिर भी देखने का मौका मिला.हो सका तो इसके चित्र अपने ब्लॉग पर लगाता हूँ.
अफ़सोस कि मार्तंड के खंडहर नहीं देख पाया.
क्या सर, आप भी मार्तंड नहीं जा पाए?
इस विवरण के लिए शुक्रिया.
सितम्बर 11, 2012 को 11:37 अपराह्न पर
अद्भुत !अद्भुत!अद्भुत!
खंडहर बता रहे हैं कि मंदिर की इमारत कितनी भव्य रही होगी.
बहुत ही अच्छा लगा इस पोस्ट को पढ़ कर.
सितम्बर 21, 2012 को 2:12 पूर्वाह्न पर
आपको नमन कि आप कितनी कितनी जगह घूम कर उसके पुरातत्व इतिहास के बारे में हमारा ज्ञान बढाते हैं । यह मंदिर अपनी सम्पूर्णता में अपने समय का अद्भुत एवं अद्वितीय निर्माण रहा होगा खंडहर भी .ही बता रहे हैं . आप की कश्मीर यात्रा शानदार जा रही है ।
नवम्बर 30, 2012 को 3:24 पूर्वाह्न पर
यह सब पढ़ कर और अपनी संस्कृति के इन पुरावशेषो को देख कर दुखी हो लेना ही पर्याप्त नहीं है. इस भू.पू.महादेश की समृद्ध संस्कृति,(जिसमें धर्म ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन एवं प्रयोगशालायें आदि ,तथास्थात्य-कला भी शामिल है ) के ऐसे बेजोड़ उदाहरण धीर्मिक विद्वेष के कारण किस-किस के द्वारा भग्न किये गये.इसका पूरा विवरण होना चाहिये .
एक सांस्कृतिक पर्यवेक्षण कर सारे विवरण एक जगह एकत्र किया जाएँ जो
उन कालों के सांस्कृतिक इतिहास का निरूपण करे .अपने प्राचीन(सांस्कृतिक) इतिहास को जानना भी ,हर भारतवासी का अधिकार है .
यह जानने की भी उत्सुकता है कि ,उस धर्म में क्या कोई विचारशील संतुलित व्यक्ति नहीं था जो इस धार्मिक उन्माद ,और आतंकवाद को सही मार्ग दिखाता .सब उसकी खूबियों के कसीदे पढ़नेलाले ही थे वास्तव में क्या हो रहा है उस ओर से पीठ फेर लेना ही उनकी खासियत थी ?.