Archive for the ‘History’ Category

यह उपासक कौन है

मई 19, 2013

संग्रहालय में घूमते  समय एक शिल्प दिखा,  शिव और पार्वती अगल बगल बैठे हुए हैं और किसी  साधू या ऋषि को उनके सामने उलटे पाँव हाथ के बल खडे दर्शाया गया था.  उपासना की  इस विधि को देख मुझे हट योगियों  का ख़याल आया.  कोई सूचना फलक भी नहीं था जिससे पता चले कि वह ऋषि जैसा दिखने वाला आखिर कौन है.  तस्वीर खींच कर घर आ गए.   कुछ मित्रों से भी जानकारी चाही परन्तु वे भी कुछ बता सकने में असमर्थ रहे.  इतना ही पता चला था कि शिव पुराण में उपासना की ऐसी किसी पद्धति का उल्लेख नहीं दिखा.  बात आयी गयी हो गई.

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कुछ पुरानी तस्वीरों के लिए कंप्यूटर के भेजे को खंगाल रहा था और पुनः एक बार वही तस्वीर प्रकट हो गयी.  मंथन फिर शुरू हुआ और अंत में थक हार कर एक अमरीकी महिला मित्र को भी मेल द्वारा तस्वीर भेज दी.  एक घंटे में ही जवाब आ गया कि शिव के परम भक्तों (६३  नायनार) में एक महिला थी जिसने हिमालय में कैलाश तक ऐसा करतब किया था. यह जानकारी पर्याप्त थी और गुत्थी सुलझ ही गयी .  खेद है कि अब आप सब को भी झेलना पड़ेगा.

चेन्नई से ३०० किलोमीटर दक्षिण में पूर्वी समुद्र तट पर एक प्रमुख बंदरगाह है “कारैकल” जो कभी फ्रांसीसियों का उपनिवेश हुआ करता था। आज यह केंद्र शासित पुदुस्सेरी (पोंडिचेरी) के अंतर्गत आता  है. यहाँ अब भी फ्रांसीसी संस्कृति का एहसास किया जा सकता है.  यहाँ ९९ मंदिर हैं  परन्तु  इस नगर की प्रसिद्धि  दक्षिण के  एक मात्र शनि के देवालय के लिए है जहाँ शनि देव की प्रतिमा अभय मुद्रा में है. यह एक महत्वपूर्ण पहलू है. इस नगर में संत मस्तान सय्यद दावूद का दरगाह भी  है जिसकी  बड़ी  ख्याति है.  सन १८२८ में पुनः निर्मित  अवर लेडी ऑफ़ एंजिल्स का चर्च भी सुकून देता है.

संगम काल में भी कारैकल एक फलता फूलता बंदरगाह एवं व्यापारिक केंद्र रहा है.  इसी नगर में ६ वीं सदी में एक धनी परन्तु धर्मं परायण  व्यापारी हुआ करता था “दनादत्त”. उसकी  पत्नी धनलक्ष्मी बडी आज्ञाकारी थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। दोनों ने मिलकर ईश्वर से संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थनाएं की और ईश्वरीय  कृपा  से संतान के रूप में एक कन्या  ने जन्म लिया जिसका नाम था “पुनीतवती”. बालकाल से ही पुनीतवती में भगवान् शिव के प्रति  अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गयी थी जो शनै शनै प्रगाढ आसक्ति में परिणित हुई. वह शिव भक्तों की भी सेवा करना अपना कर्तव्य मानती थी. सदैव ही उसकी  ओंठों से “ॐ नमः शिवाय” निकलता रहता था. जब वह बडी हुई तो उसका विवाह एक धनी वैश्य (संभवतः चेट्टियार) “परमदत्त” से हो गई.  पति पत्नी दोनों सुखी थे और  एक आदर्श गृहस्थ जीवन जी रहे थे.

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एक दिन पुनीतवती के पति ने दो आम भिजवाये जिन्हें उसने संभाल कर रख दिया ताकि  दुपहर भोजन के साथ अपने पति को खिला  सके. थोडी देर में एक भूका शिव योगी आ टपका जिसकी पुनीतवती ने यथोचित आवभगत की और भिक्षा भी दिया. भोजन करवाने में वह असमर्थ थी क्योंकि तब तक तैय्यार नहीं हो पाया था इसलिए पति द्वारा भिजवाये गए आमों में एक योगी महाराज को देकर विदा कर दिया.  दुपहर  पति के आने पर भोजन के साथ बचे हुए आम को भी काट कर परोस दिया.  परमदत्त को आम अच्छी लगी तो उसने दूसरे आम की भी मांग की.  पुनीतवती दुविधा में पड गई और चौके में जाकर ईश्वर की मदद   मांगी.  प्रार्थना के पूरे होते ही उसकी  हथेली में आश्चर्यजनक रूप से एक आम आ गिरा. वह चकित रह गयी और ईश्वर का आभार मानते हुए उस आम को ले जाकर अपने पति को दे दिया. परमदत्त आम चख कर विस्मित था  बडी लज्ज़त दार थी और ऐसा आम उस ने कभी नहीं खाया था उसे पक्का विश्वास था कि वह आम उसके द्वारा भेजी हुई तो कतई  नहीं थी वह पत्नी से पूछ बैठा  कि वो आम कहाँ की है.   पुनीतवती के पास सत्य को जाहिर करने  के अलावा कोई चारा नहीं था सो  उसने पूरी घटना बता दी.  परमदत्त को विश्वास नहीं हुआ और उसने इसी प्रकार एक और आम प्राप्त करने की चुनौती दे दी. पुनीतवती दुखी मन से अन्दर गई और एक बार फिर प्रार्थना की. परिणाम स्वरुप आम उसके हथेली में आ पहुंचा जिसे उसने अपने पति को दे दिया. उसके पति ने आम को हथेली पर रख निरीक्षण किया ही था कि   अचानक  वह आम गायब हो गयी. परमदत्त हक्का बक्का रह गया. उसे अपने पत्नी की महानता समझ में आ गई. असाधारण दैवीय गुणों से संपन्न पुनीतवती के साथ पति के रूप में रहना महापाप होगा ऐसा मानते हुए जल्द ही  परमदत्त व्यापार के बहाने एक बडे नाव में माल भर कर किसी अज्ञात देश के लिए समुद्री यात्रा पर निकल पड़ा .  कुछ वर्षों बाद वापसी पर पांड्य राज्य के किसी नगर में जा बसा और व्यवसाय  में लग गया.  एक वैश्य कन्या से  विवाह भी कर ली . उसके घर एक कन्या जन्म लेती है। अपने पूर्व पत्नी की याद में अपनी  पुत्री का नाम  “पुनीतवती”  रखता है. पुनीतवती के घर वालों को जब दूसरे  नगर में परमदत्त के उपस्थिति की जानकारी मिलती है तो वे पुनीतवती को डोली में बिठा कर ले चलते हैं.  भनक लगते ही परमदत्त स्वयं अपनी दूसरी पत्नी और बच्चे सहित अगुवानी करने निकल पड़ता है और जाकर  पैरों पर गिर पड़ता है.  लोगों द्वारा स्पष्टीकरण मांगे जाने पर  बताता है कि वह पुनीतवती को एक पत्नी नहीं अपितु देवी मानता है.

पुनीतवती अपने पती की मनोदशा को समझते हुये भगवान् शिव से निवेदन करती है कि एक आकर्षक शरीर की जगह उसे राक्षसी जैसा कुरूप बना दिया जाए.  तथास्तु तो होना ही था और उसका शरीर एक  हड्डी का ढांचा बन कर रह गया, कुछ चामुंडा की तरह, निर्बल देह वाली.

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कुछ समय पश्चात वह  कैलाश की यात्रा पर निकल पडी. यह सोच कर कि उस पवित्र भूमि में पैर रखना गुनाह होगा, उसने अपनी  यात्रा सर के बल पूरी की और शिव जी के समक्ष उपासनारत  रही.  शिवजी ने स्नेह और सम्मान के साथ पुनीतवती का स्वागत किया और वर देने के लिए तत्पर हो गए.  पार्वती जी भी पुनीतवती को देख चकित थीं. तब शिवजी ने अपने उस भक्त को माता के रूप मे परिचय कराया.  पुनीतवती ने  कुछ भी नहीं माँगा.  केवल इतना कि वह सदैव शिवजी का ही गुणगान करती रहे और शिवजी द्वारा जब भी नृत्य किया जाता हो तो वह  भी चरणों में बैठकर असक्त हो सके. इस वजह से अक्सर  नृत्य करते नटराज के  पास भी पुनीतवती दृष्टिगोचर होती है.

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इसी पुनीतवती को  “कारैकल अम्मयार”  (शब्दार्थ कारैकल की माता) कहते हैं। उन्हें “पुनीतवाद्यार” भी संबोधित किया जाता है. प्राचीन तामिल साहित्य में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.  उनके दोहों के अंत में अपने लिए  “कारैकल की पिशाच”  शब्दों का प्रयोग देखा गया है. इसलिए कदाचित कई  शिल्पियों/कलाकारों ने उन्हें पिशाच जैसा भी  चित्रित किया  है.

वरदराज पेरुमाल मन्दिर, काँचीपुरम

मई 3, 2013

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काँचीपुरम में एकाम्बरनाथ के शिव मन्दिर के बाद जो दूसरा सबसे बड़ा मन्दिर है वह् है विष्णु का जिसे वरदराज पेरुमाल कहते हैं.  एकाम्बरनाथ के मन्दिर के अन्दर ही एक और छोटा सा मन्दिर विष्णु के लिए बनाया गया था लेकिन यह तो नाइंसाफी थी इसलिए लाज़मी था कि विष्णु के लिए भी एक भव्य मन्दिर बने.  द्वैत और अद्वैत  का चक्कर कोई नया थोड़े ही है.  यह मन्दिर एकबारगी नहीं बनाया गया था वरन्‌ इसका विकास कई सदियों में हुआ है.  मूलतः यह मन्दिर चोल राजाओं द्वारा सन् 1053 में बनवाया गया था.  सन् 1316 से कुछ समय के लिए काँचीपुरम काकतीय वंश के प्रताप रुद्र देव (वारंगल) के आधीन भी रहा. तथाकथित 1000  खम्बे से युक्त मंडप (दोमंजिला) उनकी दैन है.  (इसी के भाई अन्नम देव ने बस्तर राजवंश की स्थापना की थी).  कुलोतुंगा चोला और विक्रम चोला के शासनकाल में मन्दिर का विस्तार हुआ.  14 वीं शताब्दी में एक दीवार और गोपुरम का निर्माण हुआ.  विजयनगर राजाओं का भी मन्दिर के विस्तार में बड़ा योगदान रहा है. परन्तु लोगों का मानना है कि इस मन्दिर को सर्वप्रथम पल्लव नरेश नंदिवर्मन (द्वितीय) ने बनवाया था. एक बात रोचक लगती है. एकाम्बरेश्वर (शिव) तथा वरदराज पेरूमल (विष्णु) मन्दिर दोनों ही 23 एकड़ की जगह घेरे हुए हैं. लगता है बँटवारा बराबरी का हुआ था. सन् 1532 (अच्युतराय, विजयनगर) का एक शिलालेख इन दोनों ही मंदिरों में पाया जाता है.  अच्युतराय ने दोनों मंदिरों को अतिरिक्त भूमि प्रदान करने का आदेश दिया था. वीर नरसिंह राय जिसके संरक्षण में काँचीपुरम को रखा गया था, ने एकाम्बरेश्वर (शिव) मन्दिर को अधिक भूमि प्रदान कर दी थी.  शिकायत मिलने पर अच्युतराय ने भूमि के बँटवारे को संतुलित किया था. यह मन्दिर भी वैष्णवों के 108 दिव्य स्थलों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

(संदर्भवश वरदराजा पेरुमाल नामका एक प्रभावशाली व्यक्ति श्रीलंका के उत्तर पूर्वी राज्य का मुख्य मंत्री भी हुआ करता था. लिट्टे उसके जान की दुश्मन बन गयी थी अतः 1990 में भारतीय शान्ति सेना के वापसी के समय वह् भी  स्वनिर्वासित  हो सपरिवार भारत चला आया . भारत सरकार ने उसे सुरक्षा मुहय्या करायी थी तथा वह् चंदेरी (मध्य प्रदेश) के किले में रहने लगा था. यहाँ से उसे अजमेर ले जाया गया था जहाँ वह् लगभग एक दशक तक रहा.)

जैसे हम शिव के विभिन्न नामों के साथ “ईश्वर” (पातालेश्वर, महाकालेश्वर) का प्रयोग करते हैं लगभग वही “पेरुमाल” का भी आशय है परन्तु ऐसा प्रयोग दक्षिण में वैष्णव पंथ से जुड़ा है.  इसी प्रकार शैव, देवी माता के लिए “अम्मान” का प्रयोग करते हैं और वैष्णव “थायार” का.

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???????????????????????????????यह दूसरा गोपुरम है. सामने है ध्वज स्थम्भ और ऊँचा मंडप

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पश्चिम की तरफ़ से (मुख्य द्वार) मन्दिर के अन्दर जाने पर एक विशाल क्षेत्र में 100 खम्बे वाला मंडप है जिसमें एक से एक कलात्मक प्रतिमाओं की भरमार है. इसके छत के चारों कोने पर एक ही शिला को तराश कर बनायी गयीं जंजीरें लटकी हुई है. ऐसी ही जंजीरें कुछ छोटे परन्तु ऊँचे मंडपों में भी kanchiलगी हैं. यह भी अपने आपमें अद्भुत है. इस मंडप के पीछे एक तालाब है. विष्णु की मूल प्रतिमा गूलर की लकड़ी से बनी थी जो इस तालाब में दबाकर रखी गयी है.  40 वर्ष में एक बार उसे बाहर निकाला जाता है. मुख्य मन्दिर/गर्भगृह एक टीले पर बना है जिसे हस्तगिरि कहा जाता है.  गर्भ गृह के दो तल हैं.  भूतल  में नरसिंह हैं और ऊपर प्रथम तल में विष्णु की खड़ी प्रतिमा है. उनके चेहरे की मुस्कुराहट देख् भक्त गण अभिभूत हो उठते है. एक अलग खंड के छत पर दो छिपकलियाँ बनी हैं. एक रजत की और दूसरी स्वर्ण की.  लोग इन्हें छूते हैं और मान्यता है कि ऐसा करने पर उनके दुखों का निवारण होता है. इनके पीछे भी कई मिथक हैं.  नजदीक ही लक्ष्मी जी (जिन्हें “पेरुन देवी थायार” संबोधित किया जाता है) एक अलग प्रकोष्ठ में विराजमान हैं.  अँगरेजों के शासनकाल में मेजर जनरल लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव के द्वारा इस मन्दिर के लिए बहुमूल्य आभूषण भेंट किए गए थे जिनका प्रयोग विशेष अवसरों पर किया जाता है.

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हमने इस मन्दिर का अवलोकन पूर्व  में भी किया था तब बहुत भीड़ थी. इस बार भरी दुपहरी में जाना हुआ था यह सोच कर कि आराम से घूम फिर सकेंगे परन्तु मन्दिर के पट तो बंद थे इसलिए इधर उधर देख् दाख  कर संतुष्ट हो लिए. इस्कान के द्वारा अपने कुछ अनुयायियों को यहाँ लाया गया था. अधिकांश भारतीय वेश भूषा में विदेशी थे. एक मंडप में बैठकर उनके खाने का कार्यक्रम चल रहा था. उनसे बातचीत तो नहीं हो पायी परन्तु उनके चित्र ले लिए थे और लौट पड़े.

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शाम हमारे ड्राइवर की कुछ आवश्यकता के कारण उस मन्दिर की तरफ़ दुबारा जाना हुआ और देखा कि भगवान गाजे बाजे के साथ अपने सायंकालीन हवाखोरी के लिए निकले थे.  उनकी सवारी के पीछे पीछे मन्दिर के पंडितों का एक समूह मंत्रोच्चार करते हुए चल रहा था.  हमारा ड्राइवर डेनियल उनका रास्ता काटते हुए सड़क को पार कर रहा था  और मैंने देखा कि उनमें से एक दो पंडित बौरा गए थे लेकिन कोई हंगामा नहीं हुआ.


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