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	<title>मल्हार Malhar</title>
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	<description>पुरातत्व, मुद्राशास्त्र, इतिहास, यात्रा आदि पर Archaeology, Numismatics, History, Travel and so on</description>
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		<title>मल्हार Malhar</title>
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		<title>हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं</title>
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		<pubDate>Fri, 13 Nov 2009 01:00:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
				<category><![CDATA[Moral]]></category>

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		<description><![CDATA[यह शिल्प महाबलीपुरम से  तनुश्री पोद्दार ने लिया है
आश्रम के प्रातःकालीन सत्र में संत ने अपने शिष्यों  से पूछा &#8220;हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं. लोगों का मन जब खिन्न हो उठता है तो  बौखलाकर एक दूसरे से बड़ी ऊंची आवाज़ में बोलने लगते हैं”. ऐसा क्यों होता  है?
शिष्यों ने बहुत सोचा और [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1737&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><img class="aligncenter size-full wp-image-1738" title="guru-shishya" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/guru-shishya.jpg?w=450&#038;h=299" alt="guru-shishya" width="450" height="299" /><span style="color:#3366ff;">यह शिल्प महाबलीपुरम से  तनुश्री पोद्दार ने लिया है</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:medium;">आश्रम के प्रातःकालीन सत्र में संत ने अपने शिष्यों  से पूछा &#8220;हम गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं. लोगों का मन जब खिन्न हो उठता है तो  बौखलाकर एक दूसरे से बड़ी ऊंची आवाज़ में बोलने लगते हैं”. ऐसा क्यों होता  है?</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:medium;">शिष्यों ने बहुत सोचा और फिर एक ने उत्तर दिया  &#8220;क्योंकि हम अशांत हो जाते हैं इसलिए चिल्लाते हैं&#8221;</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:medium;">चिल्लाने की आवश्यकता ही कहाँ है जब दूसरा व्यक्ति  एकदम पास ही हो. क्या यह संभव नहीं है कि हम कोमल शब्दों का प्रयोग करते हुए अपनी  बात कहें. हम नाराज होने पर ही क्यों चिल्लाने लगते है. शिष्यों ने बहुत सारे कारण  ढूँढ निकाले परन्तु संत किसी भी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए. </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:medium;">अंत में संत ने ही साम्झाया &#8220;जब दो व्यक्ति आपस में  नाराज हो उठते हैं तो उनके दिलों की दूरी बढ़ जाती है. अब इतनी दूरी से सुनाई पड़े  इसलिए ऊंची आवाज़ का प्रयोग करना पड़ता है. नाराजगी जितनी अधिक होती है यह दूरी भी  बढ़ जाती है और सुनने सुनाने के लिए चिल्लाना ही पड़ता है&#8221; फिर संत ने पूछा &#8220;क्या  होता है जब दो व्यक्तियों में प्रेम हो जाता है&#8221; ऐसे में ये एक दूसरे पर चिल्लाते  नहीं अपितु वार्तालाप बड़ी शालीनता से मृदु शब्दों में करते हैं. जानते हो क्यों? क्योंकि उनके दिल  करीब रहते हैं और उनके बीच की दूरी भी कम. संत ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा &#8220;जब  दोनों का आपसी प्रेम बढ़ जाता है तो उन्हें तो बोलने की भी जरूरत नहीं पड़ती, केवल  फुसफुसाते है. और आगे जाकर यह फुसफुसाना भी बंद हो जाता है. वे एक दूसरे को देखते  भर हैं. और संवाद पूरा हो जाता है. वे प्यार करते हुए एक दूसरे के एकदम करीब हो जाते  हैं.</span></p>
<p><span style="color:#800080;">नंदिता प्रभु से प्राप्त इमेल पर आधारित (हिंदी रूपांतर)</span></p>
Posted in Moral  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/mallar.wordpress.com/1737/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/mallar.wordpress.com/1737/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/mallar.wordpress.com/1737/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/mallar.wordpress.com/1737/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/mallar.wordpress.com/1737/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/mallar.wordpress.com/1737/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/mallar.wordpress.com/1737/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/mallar.wordpress.com/1737/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/mallar.wordpress.com/1737/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/mallar.wordpress.com/1737/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1737&subd=mallar&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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	</item>
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		<title>नालसोपारा (मुंबई), एक प्राचीन बंदरगाह और बौद्ध स्तूप</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 00:30:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Maharashtra]]></category>
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		<description><![CDATA[हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि मुंबई प्रवास में  कुछ आस पास की जगहों को देखने गए थे. वज्रेश्वरी के गरम पानी के कुन्ड भी उनमे एक  थे. वहां से लौटते समय पुनः वीरार आना ही था जहाँ हम ५ बजे शाम ही पहुँच गए. बचे  हुए समय का पूर्ण दोहन [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1718&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">हमने पिछली पोस्ट में बताया था कि मुंबई प्रवास में  कुछ आस पास की जगहों को देखने गए थे. वज्रेश्वरी के गरम पानी के कुन्ड भी उनमे एक  थे. वहां से लौटते समय पुनः वीरार आना ही था जहाँ हम ५ बजे शाम ही पहुँच गए. बचे  हुए समय का पूर्ण दोहन करने के लिए साल्वे जी ने &#8220;नालसोपारा&#8221; चलने का प्रस्ताव रखा.  (नालसोपारा दादर स्टेशन से वेस्टर्न सबर्बन रेलमार्ग पर लगभग ४८ किलोमीटर दूर अंतिम  पड़ाव &#8220;वीरार&#8221; के पहले पड़ता है). हमने झट हामी भर दी परन्तु पूछा कि वहां क्या है.  उन्होंने समुद्र तट की बात की तो हमने एक अलग जगह बताई. वे चकित हुए. उन्हें नहीं  मालूम था कि सोपारा गाँव में सम्राट अशोक द्वारा ईसा पूर्व तीसरी सदी में निर्मित  कोई स्तूप भी है. वे बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि वे स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी थे.  १५-२० मिनट में ही हम लोग पूछते पाछते ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा  संरक्षित उस स्मारक तक पहुँच ही गए.</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">वास्तविकता तो यह है कि &#8220;नाल&#8221; और &#8220;सोपारा&#8221; दो अलग  अलग गाँव थे. रेलवे लाइन के पूर्व &#8220;नाल&#8221; है तो पश्चिम में &#8220;सोपारा&#8221;. अब यह एक बड़ा  शहर हो गया है और बहु मंजिले इमारतों की बस्ती बन गयी है. लेकिन जब हम लोग पुराने  सोपारा गाँव के करीब पहुंचे तो भूपरिदृश्य एकदम बदला हुआ लगा. चारों तरफ हरियाली  थी. बहुत सारे पेड़ थे परन्तु उनमे ताड़ की अधिकता मनमोहक थी. सड़क के एक किनारे  सरोवर था <img class="aligncenter size-full wp-image-1720" title="Lake opposite stupa" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/lake-opposite-stupa.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Lake opposite stupa" width="450" height="337" />तो दूसरी ओर  एक टीला. ASI का सूचना फलक भी लगा था. जब हम लोग अन्दर  प्रवेश कर रहे थे तो बारिश होने लगी और हमने एक बड़े पेड़ का सहारा लिया. सामने ही  वह प्राचीन बौद्ध स्तूप नीले रंग के तिरपाल से ढंका हुआ था. चारों तरफ ईंट और पत्थर  लाकर रखे गए थे जिनसे स्तूप के वास्तविक स्वरुप को मूर्त रूप दिया जाने वाला है.  सदियों से क्षरण झेलता वह स्तूप अब कहीं संरक्षित हो रहा है, यह जान कर ख़ुशी हुई  परन्तु दुःख भी हुआ कि हम उसे उसके वर्त्तमान<img class="aligncenter size-full wp-image-1722" title="Stupa" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/stupa.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Stupa" width="450" height="337" /> स्थिति में नहीं देख सके. वहां बुद्ध   और साथ ही किसी बौद्ध भिक्षु की मूर्ती भी थी. हमें बताया गया कि यहाँ से निकली  मूर्तियाँ, शिलालेख आदि औरंगाबाद के संग्रहालय में प्रर्दशित हैं. वहां तैनात  चौकीदार सेना से सेवानिवृत्त होकर पुनः ASI की सेवा में आया था. रहने वाला तो उत्तर  प्रदेश का था परन्तु उसने हमें उस स्तूप के बारे में यथा संभव जानकारी प्रदान  की.<img class="aligncenter size-full wp-image-1723" title="DSC04308" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/dsc04308.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04308" width="450" height="337" /><br />
</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">वर्षों पूर्व क्षेत्र में किये गए उत्खनन से पता  चलता है कि सोपारा में बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म स्थलों की बहुलता थी जो प्राकृतिक  एवं मानवीय कारणों से अब लुप्त हो चली है. स्वर्गीय डा. भगवानलाल इन्द्रजी ने सन  १८९८ में मुंबई के रोयल येशिअटिक सोसाइटी को सोपारा में बौद्ध स्तूप के अतिरिक्त कई  हिन्दू मंदिरों के खंडहरों की जानकारी दी थी. डा. भगवानलाल इन्द्रजी के ही शब्दों  में: </span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">&#8220;That ancient Hindu temples did exist in this part  of the country is without doubt, the many fragments found in the villages around  testifying to this, but so complete has been their destruction at the hands of  the Muhammadans and Portuguese that their very sites have become obliterated. It  was then with a great deal of satisfaction that I discovered and unearthed the  foundations of a large Hindu temple at Sopara itself.”</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">कुछ मंदिरों का निर्माण पूर्ण ही नहीं हुआ था. वहां  की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ब्रह्माजी के एक विलक्षण आदमकद (६ फीट) मूर्ती की थी और  मूर्तिकार इसे भी पूरा नहीं कर पाए थे. मूर्ती का अपूर्ण हिस्सा लगभग एक फीट का नीचे है जो अब सीमेंट से जड़ दिया गया है. क्या वहां ब्रह्मा जी का मंदिर बन रहा था या  केवल किसी अन्य मंदिर में अलंकरण के लिए उसे बनाया गया, यह अभी प्रश्न ही बना हुआ  है. कुछ मंदिर अधूरे ही क्यों रह गए यह भी अज्ञात है. सोपारा के समुद्र तट पर  बंदरगाह को तलाशने की कोई कोशिश की गयी हो यह भी नहीं मालूम. अतः बंदरगाह का  वास्तविक स्थल अज्ञात ही है.<img class="aligncenter size-full wp-image-1735" title="Creater" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/creater.jpg?w=450&#038;h=862" alt="Creater" width="450" height="862" /><br />
</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span style="font-size:small;">जिस प्रकार दक्षिण भारत के पश्चिमी तट पर ईसा पूर्व  से ही &#8220;मुज़रिस&#8221; (कोडूनगल्लूर) विदेश व्यापर के लिए ख्याति प्राप्त बंदरगाह रहा उसी  प्रकार उत्तर भारत के पश्चिमी तट पर उसी कालक्रम में सोपारा भी भारत में प्रवेश के  लिए एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था. इस बंदरगाह का संपर्क विभिन्न देशों से रहा है.  सोपारा को सोपारका, सुर्परका जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता था. प्राचीन अपरानता  राज्य की राजधानी होने का भी गौरव सोपारा को प्राप्त है. इस्राइल के राजा सोलोमन के  समय से ही बड़ी मात्रा में उनके देश से व्यापार का उल्लेख मिलता है. कदाचित बाइबिल  में उल्लेखित भारतीय बंदरगाह &#8220;ओफिर&#8221; सोपारा ही था. बौद्ध साहित्य &#8220;महावंश&#8221; में  उल्लेख है कि श्रीलंका के प्रथम राजा, विजय ने “सप्पारका” से श्रीलंका के लिए  समुद्र मार्ग से प्रस्थान किया था. प्राचीन काल में सोपारा से नानेघाट, नासिक,  महेश्वर होते हुए एक व्यापार मार्ग उज्जैन तक आता था. इस बात की पुष्टि नानेघाट में  सातवाहन वंशीय राजाओं के शिलालेख से होती है, जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद  हावी हो गए थे. सोपारा इनके आधीन आ गया था. नानेघाट में तो बाकायदा चुंगी वसूली एवं  भण्डारण  हेतु प्रयुक्त पत्थर से तराशा हुआ कलश आज भी विद्यमान है.<img class="alignleft size-full wp-image-1728" title="Toll Pot" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/toll-pot.jpg?w=449&#038;h=255" alt="Toll Pot" width="449" height="255" /><br />
</span></p>
<p><span style="font-size:small;">बौद्ध स्तूप के चारों तरफ अच्छे से देख लेने के बाद  हम लोग लौट पड़े. रास्ते में चक्रेश्वर महादेव जी का प्राचीन मंदिर एक बड़े ताल के  बगल से था. यहाँ दर्शन तो पिंडी के हुए परन्तु वहीँ बेचारे ब्रह्माजी भी थे जिनकी  चर्चा ऊपर की है.</span></p>
Posted in Archaeology, Community, Culture, History, Iconography, Maharashtra, Social, Travel  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/mallar.wordpress.com/1718/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/mallar.wordpress.com/1718/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/mallar.wordpress.com/1718/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/mallar.wordpress.com/1718/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/mallar.wordpress.com/1718/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/mallar.wordpress.com/1718/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/mallar.wordpress.com/1718/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/mallar.wordpress.com/1718/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/mallar.wordpress.com/1718/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/mallar.wordpress.com/1718/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1718&subd=mallar&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>वज्रेश्वरी देवी का मंदिर और गरम पानी के कुंड</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 01:00:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
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		<category><![CDATA[History]]></category>
		<category><![CDATA[Maharashtra]]></category>
		<category><![CDATA[Travel]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे मुंबई प्रवास के समय आस पास घूमने लायक जगहों में वज्रेश्वरी के  गरम पानी के कुंडों की बात चली थी. पता चला कि वहां वज्रेश्वरी देवी का एक मंदिर भी  है. ज्वालामुखी से निर्मित पर्वतीय क्षेत्र है. विरार तो हमें जाना ही था सो सबर्बन  (पश्चिमी) रेल द्वारा निकल पड़े थे [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1704&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;">हमारे मुंबई प्रवास के समय आस पास घूमने लायक जगहों में वज्रेश्वरी के  गरम पानी के कुंडों की बात चली थी. पता चला कि वहां वज्रेश्वरी देवी का एक मंदिर भी  है. ज्वालामुखी से निर्मित पर्वतीय क्षेत्र है. विरार तो हमें जाना ही था सो सबर्बन  (पश्चिमी) रेल द्वारा निकल पड़े थे और विरार भ्रमण के बाद भोजन कर एक मित्र,  सल्वेजी, के वाहन में उनके साथ ही चले गए. विरार से १० किलोमीटर चलकर मुंबई से  अहमदाबाद जाने वाले एक्सप्रेस हाईवे से जा मिले. इस हाईवे पर २ किलोमीटर उत्तर   चलकर दाहिनी ओर एक सड़क भिवंडी की ओर जाती है. इसी रास्ते पर २० किलोमीटर की दूरी पर  है वज्रेश्वरी देवी का भव्य मंदिर.<img class="aligncenter size-full wp-image-1707" title="Outside Vajreshwari" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/outside-vajreshwari.jpg?w=347&#038;h=500" alt="Outside Vajreshwari" width="347" height="500" /></span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">मन्दाकिनी पर्वत की तलहटी के सुरम्य वादियों में, एक  छोटी पहाडी पर कुल ५२ सीढियों को चढ़कर, सिंह द्वार को पार कर मंदिर के प्रांगण में  प्रवेश करते हैं. वहां से चारों तरफ की नैसर्गिक छटा बड़ी लुभावनी लगी. दाहिनी तरफ  दूर एक नदी (तनसा) प्रवाहित हो रही थी. एक बड़े मंडप (हाल) के आगे गर्भगृह है.  जिसमें तीन देवियाँ विराजमान हैं. रेणुका, वज्रेश्वरी और कालिका.<img class="aligncenter size-full wp-image-1706" title="Three Devis" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/three-devis.jpg?w=450&#038;h=304" alt="Three Devis" width="450" height="304" /> तीनों ही  मूर्तियाँ संगेमरमर की बनी हुई हैं. वहां के पुजारी बड़े ही मृदुभाषी थे. उनसे ही  पता चला कि वे गिरी गोसाईं सम्प्रदाय के हैं और इसी सम्प्रदाय द्वारा मंदिर की  गतिविधियाँ संचालित होती हैं. <img class="aligncenter size-full wp-image-1708" title="DSC04298" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/dsc04298.jpg?w=450&#038;h=600" alt="DSC04298" width="450" height="600" />दर्शन कर हम लोगों ने मंदिर की परिक्रमा की. वहां एक  हनुमान मंदिर तथा दत्त मंदिर भी है. पीछे कुछ दूरी पर गोसाईं सम्प्रदाय के कुछ  संतों की समाधियाँ भी हैं. चारों तरफ का प्रांगण साफ़ सुथरा, पत्थर के फर्श से युक्त  है. कुछ कुछ जगहों पर टूटा फूटा भी है. मंदिर के बाएं तरफ ही एक नाट्य मंच (योगिनी रंगमंच) भी बना हुआ है जिसे बेलों  से आच्छादित किया हुआ है. यहाँ समय समय पर नृत्य नाटिकाएं, नाटक, गायन, प्रवचन आदि  का कार्यक्रम होता रहता है.<img class="aligncenter size-full wp-image-1709" title="DSC04299" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/dsc04299.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04299" width="450" height="337" /><br />
</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">इस मंदिर के बारे में अनेकों जनश्रुतियां मिलती हैं.  पेशवाओं की राजधानी पूना (वर्त्तमान पुणे) हुआ करती थी. बाजीराव पेशवा (१) के छोटे  भाई <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Chimnaji_Appa">चीमाजी अप्पा</a> ने <a href="http://mallar.wordpress.com/2008/09/22/%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE/">पुर्तगालियों के गढ़ वसई</a> के किले की घेराबंदी कर रखी थी. स्वयं  वज्रेश्वरी के निकट गणेशपुरी/अकलोली के पास पड़ाव डाला हुआ था. यह जगह पुणे से वसई  जाने वाले मार्ग पर ही पड़ता है. यहाँ से वसई मात्र ३० किलोमीटर की दूरी पर ही है.  वसई की घेराबंदी किये दो वर्ष होने को हो गए परन्तु विजय हाथ नहीं लग रही थी.  चिमाजी अप्पा निराश हुआ जा रहा था.एक दिन निकट ही प्रवाहित होने वाले तनसा नदी के  किनारे अपने प्रातः भ्रमण के समय  उसने पाया कि कोई एक संत जैसा दिखने वाला नदी से  जल लेकर निकट के पहाडी पर जाया करता. उसे कौतूहल हुआ. दूसरे दिन वह उस संत के पीछे  पीछे हो लिया. पहाडी पर पहुँचने पर संत ने अपनी कुटिया से कोई मूर्ति निकाली और  अपने द्वारा लाये गए जल से अभिषेक किया. चीमाजी अप्पा धार्मिक प्रवृत्ति का होने के  कारण वहां दंडवत हो गया और उस संत के साथ उसने भी देवी प्रतिमा की आराधना की. यह  सिलसिला कुछ दिन चला. कहते हैं देवी प्रसन्न हो गयी और चीमाजी अप्पा के अभियान में  परोक्ष रूप से मार्ग दर्शन देते रहने का आश्वासन भी दिया.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">सन १७३९ में चीमाजी अप्पा अपने अभियान में सफल रहा  और वसई का किला अंततः मराठों के कब्जे में आ गया. चीमाजी अप्पा ने इस विजय को  वज्रेश्वरी देवी की अनुकम्पा मानते हुए, नव नियुक्त गवर्नर शंकर केशव फडके को आदेश  दिया कि गणेशपुरी के निकट पहाडी पर ही वज्रेश्वरी देवी के लिए एक किलेनुमा मंदिर का  निर्माण किया जावे. मंदिर में नित्य पूजा के लिए पुणे से गिरी सम्प्रदाय के  पुजारियों को नियुक्त किया गया. यह गिरी गोसाई सम्प्रदाय का पेशवा दरबार में अच्छा  दबदबा रहा है तथा इन्हें उच्च पदों पर भी रखा जाता था.<img class="aligncenter size-full wp-image-1710" title="DSC04303" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/dsc04303.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04303" width="450" height="337" /><img class="aligncenter size-full wp-image-1711" title="DSC04302" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/dsc04302.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04302" width="450" height="337" /></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">देवी दर्शन के बाद अब गरम पानी के कुंडों की बारी  थी. पता चला कि इस क्षेत्र में भूगर्भीय परिस्थितिजन्य, गरम पानी के जल स्त्रोत  अनेकों हैं, यहाँ तक की तनसा नदी में भी. हम लोग २/३ किलोमीटर चलकर अकलोली पहुंचे  यहाँ बाकायदा सीमेंट के कुंड बने हैं. मुख्य कुंड से जहाँ का पानी अत्यधिक गरम है,  जल प्रवाहित होकर तीन अलग अलग कुंडों में आता है. इन कुंडों के गरम पानी में औषधीय  गुण के पाए जाने तथा अनेकों चर्म रोगों के लिए गुणकारी होने की मान्यता है. छुट्टी  का दिन न होने पर भी वहां अच्छी खासी भीड़ थी. हमने जब चित्र लेना चाहा तो कई  महिलाएं कुंड के बाहर आ गयीं. हम लोगों ने भी अपने पैर डुबोकर कुछ क्षणों का आनंद  प्राप्त किया. सामने रामेश्वर महादेव का एक मंदिर है. यहाँ भी दर्शन कर आगे बढ़  गए.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">गणेशपुरी जो निकट ही था, एक बड़ा आध्यात्मिक केंद्र  बन गया है (गुरुदेव सिद्ध पीठ). स्वामी मुक्तानंद जी यहाँ सन १९५६ में आये और उनके  प्रयास से ७५ एकड़ में एक बहुत ही विशाल आश्रम बन गया है जहाँ अनेकों विदेशी आधुनिक  सुख सुविधाओं से परिपूर्ण आवासों में रह रहे हैं और अपना भी आध्यात्मिक उद्धार करने में लगे हैं. यह क्षेत्र सर्वसाधारण के लिए वर्जित है. सड़क के किनारे ही  मुक्तानंद जी के गुरु रहे स्वामी नित्यानंद जी की समाधि है. समीप ही भीमेश्वर गणेश  मंदिर भी है परन्तु वे सब बंद थे अतः बिना उन सबके दर्शन किये ही वापस लौट आये.  यहाँ भी गरम पानी के कुंड होने की बात बताई गयी थी. लौटते हुए रास्ते में हमने देखा  कि सैलानियों के लिए अनेकों रेसोर्ट्स बने हुए हैं. विदित हो कि वज्रेश्वरी देवी एक  योगिनी है इसलिए कदाचित तंत्र साधना के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त माना जाता हो. </span></p>
<p align="justify">
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		<title>सर्वतोभद्र स्तम्भ – कालंजर</title>
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		<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 00:30:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
				<category><![CDATA[Archaeology]]></category>
		<category><![CDATA[Community]]></category>
		<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[History]]></category>
		<category><![CDATA[Iconography]]></category>
		<category><![CDATA[Mythology]]></category>
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		<category><![CDATA[Uttar Pradesh]]></category>

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		<description><![CDATA[ श्री जी. एल. रायकवार  एवम्  डा. एस. एन. यादव
यह पुरास्थल उत्तर प्रदेष के बांदा जनपद में 240 59’  50’’ उत्तरी अक्षांष 800 29’ 15’’ पूर्वी देषान्तर पर जिला मुख्यालय से लगभग 60  किलोमीटर दक्षिण में बाघै नदी के किनारे एक समतल पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कालंजर  दुर्ग की [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1693&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="right"><span style="font-size:x-small;"></span> <span style="color:#0000ff;">श्री जी. एल. रायकवार  एवम्  डा. एस. एन. यादव</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह पुरास्थल उत्तर प्रदेष के बांदा जनपद में 240 59’  50’’ उत्तरी अक्षांष 800 29’ 15’’ पूर्वी देषान्तर पर जिला मुख्यालय से लगभग 60  किलोमीटर दक्षिण में बाघै नदी के किनारे एक समतल पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कालंजर  दुर्ग की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 408 मीटर है, तथा दुर्ग का विस्तार लगभग 6-8  किलोमीटर परिधि में है। कालंजर दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चन्देलों के शासन काल  में प्राप्त हुई। कालंजर का चन्देल इतिहास में महत्व इस कथन से सत्यापित होता है कि  चन्देलों का सम्पूर्ण इतिहास कालंजर एवं थोड़ा सा कम अजयगढ़ दुर्ग के चारों ओर ही  केन्द्रित रहा। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">भारतीय कला परंपरा के बृहत परिप्रेक्ष्य में  सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों का रूपांकन तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं और संस्कृति की एक  धारा के रूप में दृष्टिगोचर है। भारतीय स्थापत्य कला शिल्पशास्त्रों से अनुशासित है  तथापि मौलिक कल्पना से अधिकाधिक प्रयोगात्मक तथा ओजस्वी है। सर्वतोभद्र  शिल्पकृतियों में स्थापत्य कला, के अनुसरण के साथ-साथ अल्पतम अभिप्रायों के साथ  पौराणिक कथाओं के रूपांकन में विविधताएं और विषिष्टताएं विषेष रूप से दर्शनीय होती  है। इनमें प्रतिमा लक्षण के आवश्यक तत्वों का पालन कुछ अंशों में ही दिखाई पड़ता है  तथापि कथा वस्तु का पूर्व ज्ञान होने से समस्त घटनायें तथा क्रम उद्घाटित होने लगती  है। एक प्रकार से सर्वतोभद्र शिल्प में देषज कला (ब्वनदजतल ।तज) का प्रवाह प्रतिमा  शास्त्रों के लक्षण और बंधनों से उन्मुक्त स्थिति में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण  में केन्द्रित और गतिशील होती है। जिसमें शिल्पी की कल्पना अल्पतम अभिप्रायों के  साथ कथा के प्रारंभ और समापन का सर्जन करती है। तालमान, और काल (क्रमबद्धता) से  हटकर वण्र्य विषय के प्रस्तुतिकरण में सूक्ष्मता, भाव-भंगिमा की सार्थकता और शिल्पी  की मौलिक कल्पना सर्वतोभद्र कृतियों को रोचक स्वरूप प्रदान करती है। इनमें वण्र्य  विषय प्रधान होता है तथा अलंकरण पक्ष न्यूनतम रहता है। ब्राह्मण धर्म के अंतर्गत  देवाचर्ना हेतु स्थापित सर्वतोभद्र में निम्न देव समुदाय-शिव, विष्णु, सूर्य, गणेष  और महिषमर्दिनी में से कोई चार, चारों दिषाओं में रूपायित होते हैं। अनुष्ठानात्मक  सर्वतोभद्र में मन्दिर वास्तु की परिकल्पना पर आधारित अधिष्ठान, जंघा तथा शिखर का  संयोजन निहितार्थ रहता है। इसके प्रत्येक खंड, भूमि अथवा विमान के परिचायक हैं।  सबसे ऊपर के भाग पर आमलक तथा कलष निर्मित रहता है। जैन शिल्पकला में भी <a href="http://mallar.wordpress.com/2009/01/30/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A4%BC-%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D/">सर्वतोभद्र  शिल्प </a>मिलते हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं संपूर्ण वैशिष्ट्य और लांछन के साथ  रूपायित रहती हैं। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">मध्य भारत में परमार, कलचुरि और चन्देल कालीन  सर्वतोभद्र शिल्प अधिकांषतः ज्ञात हैं। परवर्ती काल में लगभग 16 वीं-17वीं सदी ईसवी  तक इनकी परंपरा दिखाई पड़ती है। सर्वतोभद्र का अभिप्राय चारों दिषाओं में दैवी सत्ता  की व्यापकता और प्राणियों के लिए मंगल कामना निहित है। इसमें चारों ओर से देव  प्रतिमाओं के सम्मुख दर्शन किये जा सकने के कारण परिक्रमा का पुण्यलाभ भी  अप्रत्यक्षतः प्राप्त होता है। इनके निर्माण में किसी यशस्वी व्यक्ति की स्मृति  अथवा मनोकामना की पूर्ति होने पर अनुष्ठानात्मक शिल्प रचना और देवार्पण की मनोभूमि  भी है। शैव एवं वैष्णव प्रतीकों से संयोजित एक तल से लेकर सात तल तक के सर्वतोभद्र  शिल्प मिलते है। यह अवश्य सत्य है कि पूजित सर्वतोभद्र शिल्प अत्यल्प है। छत्तीसगढ़  अंचल में सर्वतोभद्र चतुष्टिका अकलतरा-कोटगढ़ के सन्निकट स्थित ग्राम महमदपुर में  पाये गये है। यह भी उल्लेखनीय है कि शिव मंदिर गंडई (राजनांदगांव जिले) के अधिष्ठान  में कृष्ण के कालिय दमन लीला का अंकन है जिसमें कृष्ण कालिय के ऊपर बैठे हैं।  विवेच्य सर्वतोभद्र क्रमांक-1 के द्वितीय क्रम में प्रदर्षित दृष्य में अदृभुत  समानता है। छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा जिले के महेशपुर के सन्निकट स्थित ग्राम  लक्ष्मणगढ़ से प्राप्त पाषाण फलक ने कृष्ण को बाल लीलाओं से संबंधित दृष्य में कंस  के कारागार में कृष्ण का जन्म और पूतनावध का अंकन ज्ञात हुआ है जिसमें शिल्पियों की  मौलिक कल्पना रूपायित है। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">सर्वतोभद्र की परिकल्पना युक्त कालिंजर से प्राप्त  शिल्पकृति विशेष महत्वपूर्ण है। हल्का पीलापन रंग के बलुए पाषाण से निर्मित इन  शिल्पकृतियों में दशावतार एवं कृष्ण लीला से संबंधित कथायें प्रर्दशित  है।</span></p>
<p><span style="font-size:small;">सर्वतोभद्र -क्रमांक –1 </span></p>
<div style="text-align:0;"><span style="line-height:normal;font-size:x-small;"></p>
<p><span style="font-size:small;">.<img class="aligncenter size-full wp-image-1692" title="Falak1" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/falak1.jpg?w=450&#038;h=166" alt="Falak1" width="450" height="166" /><br />
</span></p>
<p></span></div>
<p><img class="aligncenter size-large wp-image-1694" title="Stambh" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/stambh1.jpg?w=271&#038;h=1024" alt="Stambh" width="271" height="1024" /></p>
<p><span style="font-size:small;">शिल्पकृतियों की संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार प्रस्तुत  है:</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">विवेच्य सर्वतोभद्र, विष्णु के दशावतार तथा कृष्ण  लीला के अंकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें सबसे ऊपर की पंक्ति में गोलाकार और  एक दूसरे से सटे हुये तीन शिवलिंग चारों ओर रूपायित हैं। इस प्रकार की संरचना को  कुछ विद्वानों ने स्मार्तलिंग की संज्ञा प्रदाय की है। उनका ऐसा मानना है कि इसमें  पाँच पिण्ड होते है और यह पाँच गोलाकार पिण्ड पंचदेवों, शिव, विष्णु, गणेष, सूर्य  एवं शक्ति के प्रतीक हैं। लिंगरूप में शिव की उपासना सदैव से लोकप्रिय रहा है। शिव  के निराकार स्वरूप की अभिव्यक्ति का माध्यम भी शिव लिंग है। पौराणिक कथानकों के  परिप्रेक्ष्य में शिवलिंग ज्योति का प्रतीक है। यह अनादि, अनन्न और असीम है।  शिवलिंग की उपासना से चारों पुरूषार्थों की प्राप्ति होती है। शिव और विष्णु दोनों  ही परमतत्व है तथा दोनों की उपासना सदैव से जन-मानस में लोकप्रिय रही है। पुराणों  में शिव और विष्णु के एकत्व सिद्ध करने के अनेक प्रसंग तथा कथाएं मिलती है।  प्रतिमाशास्त्र में हरिहर की अवधारणा शिव और विष्णु के एकत्व को निरूपित करते है।  ऐतिहासिक काल में शिव के साथ विष्णु की उपासना अधिकाधिक लोकप्रिय रही है। लिंग के  माध्यम से शिव की सत्ता तथा महत्व को सदैव से स्वीकार किया जाता रहा है। अतः प्रथम  क्रम में शिवलिंग रूपायित है। विष्णु के दशावतारों में से क्रमषः कूर्म, मत्स्य,  वराह, नृसिंह, वामन और बलराम को रूपायित किया गया है परन्तु राम, परषुराम, बुद्ध  तथा कल्कि इस शिल्प कृति में छोड़ दिये गये है। इनके स्थान पर कृष्ण की कुछ  महत्वपूर्ण बाल लीलाओं को सम्मिलित किया गया है। इनमें असुरों के वध से संबंधित  लीलाओं में सहज नाटकीयता और भाव भंगिमा दर्शनीय है। अपेक्षित कथासार को प्रर्दशित  करने के लिये कथा के उपसंहार में नाटकीयता के तत्व अत्यधिक रोचक हैं। इन प्रतिमाओं  में अलंकरण का अभाव है तथापि भाव-भंगिमा और प्रस्तुति में मौलिकता का संप्रेषण है।  अभिनयात्मक अंकन से संपूर्ण कथा प्रवाह लीला के प्रारंभ और विस्तार को प्रकट करने  में सक्षम है। दृष्य संयोजन में शिल्पी की कल्पना, शास्त्रों में वर्णित विवरणों का  अनुसरण करती है और अल्पतम अभिप्रायों के साथ संपूर्ण कथा को अभिनयात्मक रूप में  प्रर्दशित करती है। इस शिल्पकृति में शिल्पी की कल्पना साधना की अंतिम सीमा को  स्पर्श करते दिखाई देती है। विशालकाय अंशतः खुले हुये किवाड़ के माध्यम से कंस के  कारागार में कृष्ण का जन्म तथा गोकुल गमन की पूरी कथा आंखों के सामने घट जाती है।  यह अंकन भारतीय कला में कृष्ण जन्म से संबंधित चित्रणों में सबसे अनूठी कल्पना है।  अमूर्त के माध्यम से संबंधित घटना क्रम को स्मृतिपटल में प्रकाशित करने के लिये  इनके नीचे के खंड में पूतनावध रूपायित है। पूतनावध कृष्ण की प्रथम बाल लीला है। इस  लीला के पूर्व मथुरा के बंदी गृह में उनका जन्म, विशाल आकार के बंद दरवाजे के  माध्यम से इंगित है। इस रूपांकन में शिल्पी की मौलिक कल्पना और मेधा अपौरूषेय है।  अन्यंत्र ऐसी मौलिक कल्पना अज्ञात है। विवेच्य शिल्पकृति में विविध कल्पों में  विष्णु के अवतार से प्रारंभ होकर द्वापर युग तक की वैष्णवी लीलाओं का रूपांकन  शिल्पी का ध्येय रहा है। यह शिल्पकृति लगभग 12वीं-13वीं सदी ईस्वी में निर्मित  ज्ञात होती है। कृष्ण की लीलाओं से संबंधित प्रस्तुतियाँ गूढ़तम अभिप्रायों के साथ  बोध गम्य है।</span></p>
<p><span style="font-size:small;">सर्वतोभद्र क्रमांक –2 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह शिल्पकृति भी कांलजर से प्राप्त है। तथा हल्के  पीलापन रंग के बलुआ पाषाण से निर्मित है। इसके ऊपरी भाग में गवाक्ष अलंकरण सहित  आमलक कलष निर्मित है। इसमें भद्र जैसे तीन प्रकोष्ठ शेष हैं तथा नीचे का भाग अंषतः  भग्न है। इसके सबसे ऊपर के खंड में तीन गोल शिवलिंग आपस में जुड़े हुये निर्मित है  तथा इनके मध्य में चक्र के सदृष्य वलय निर्मित है। प्रतिमा शास्त्र की दृष्टि से  इसका अभिज्ञान मार्तण्ड लिंग यथोचित है। बीच की गोलाकार वलय सूर्य का प्रतीक है।  शिवपुराण में सूर्य को शिव से अभिन्न मानते हुये तादात्म्य स्थापित किया गया है  आकाष लिंग के रूप में सूर्य की उपासना की जाती है। इस सर्वतोभद्र में अंकित दृष्य  निम्नानुसार है:<img class="aligncenter size-full wp-image-1700" title="Falak2" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/falak2.jpg?w=450&#038;h=145" alt="Falak2" width="450" height="145" /></span></p>
<p align="justify"><img class="aligncenter size-full wp-image-1688" title="stambh2" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/stambh2.jpg?w=450&#038;h=863" alt="stambh2" width="450" height="863" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">शिल्पकृति में अंकित दृष्यों का संक्षिप्त विवरण :</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">शिल्पकृति के प्रथम खंड में चारों ओर गोलाकार तीन शिवलिंग निर्मित है।  इनके मध्य में वलयाकार चक्र निर्मित है। चक्र सूर्य का प्रतीक है। इस दृष्टि से यह  शिव और सूर्य का संयुक्त रूप व्यक्त करना है। शिल्पकृति के प्रथम क्रम पर द्वितीय  क्रम में शैय्या पर आसीन शिषु तथा माता, देवकी और कृष्ण के परिचायक हैं एवं इसके  नीचे कारागार से कृष्ण को गोकुल ले जाते हुये वसुदेव दृष्टिगोचर हैं । यह संपूर्ण  दृष्य कृष्ण जन्म से संबंधित है। द्वितीय क्रम में दूसरे खण्ड में असुर चाणूर को  पटक कर हल से प्राणांत करते बलराम एवं नीचे के खण्ड में कंस के कुवलय पीड़ नामक  दुर्दान्तः गजराज के दांत को उखाड़कर उसे धराषायी करते हुये कृष्ण प्रदर्षित हैं।  तृतीय क्रम के द्वितीय खंड में आसन पीठिका पर शिषु सहित माता एवं उसके नीचे के  प्रकोष्ठ पर शिषु सहित दो मानव आकृतियां उत्खचित हैं। सीमित दृष्यांकन तथा अन्य  विस्तार एवं लांछन के अभाव में इस शिल्पकृति का वास्तविक अभिज्ञान कठिन है, साथ ही  साथ संषय युक्त है। महाभारत की कथा के आधार पर उल्लेखित दृष्य का समीकरण गंगापुत्र  भीष्म के जन्म से किया जाना समुचित है। उपरोक्त आधार पर निम्न विवेचन प्रस्तुत है।  गंगापुत्र भीष्म- भीष्म अपनी माता गंगा के सान्निध्य में रहकर शस्त्र विद्या सीखते  रहे। किसी अवसर पर गंगा के तट पर शस्त्राभ्यास करते हुये बालक भीष्म का अदभुत  शर-कौषल देख कर शान्तनु विस्मित हुये। उसी अवसर पर गंगा वहां प्रकट हुई और भीष्म का  परिचय देकर उसे शांतनु को सौंप दिया।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">शिल्पकृति में ऊपर के खंड में गंगा तथा बालक भीष्म  का अंकन है। नीचे के दृष्य में मध्य में सरिता प्रवाहित है। सरिता के दांये तट में  स्थित गंगा अपने हाथ में शिषु को लिये हुई सम्मुख उपस्थित मानव आकृति को सौंप रही  है, और दूसरे ओर स्थित शांतनु गंगा से शिषु को प्राप्त कर अपने अंक में ले रहे है।  यह पाषाणकृति अभिनयात्मक भंगिमाओं के कारण विषिष्ठ है। भारतीय कला परंपरा में  पौराणिक कथाओं और चरित्रों पर मौलिक कल्पना पर आधारित अनेक षिल्प निर्मित हैं। यह  षिल्पकृति महाभारत की कथा पर आधारित भीष्म के बाल्यकाल की कथानक को अल्पतम अभिप्राय  के साथ प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">विवेच्य सर्वतोभद्र प्रतिमाओं के अध्ययन से भारतीय  कला परंपरा और पौराणिक ग्रंथों का अनन्योश्रित संबंध दृष्टिगोचर होता है। ऐसा  प्रतीत होता है कि महाभारत एवं श्रीमदभाग्वत गीता के अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों  में वर्णित दशावतार , कृष्ण लीला तथा विविध प्रसंगों की गूढ़ जानकारी शिल्पियों को  रहती थी जिससे अल्पतम अभिप्रायों के साथ वांछित चरित्र को अधिकाधिक स्पष्ट करने और  जन-सामान्य को परिचित कराने में वे सफल रहे। भारतीय कला में विष्णु एवं शिव के  विभिन्न रूप सदैव से आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। महाकाव्यों पर आधारित चरित्र नायक  यथा राम, कृष्ण आदि से संबंधित प्रतिमायें अत्यल्प हैं। स्थापत्य कला में  शिल्पशास्त्रों पर आधारित प्रतिमायें निर्माण किये जाने की परंपरा रही हैं। लोक  जीवन को अधिकाधिक स्पंदित करने वाली कलाकृतियाँ शिल्पियों के मौलिक चिन्तन और  कल्पना से ज्ञानवर्धक और मनोरंजक तत्वों से परिपूर्ण है। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">सर्वतोभद्र शिल्पकृतियाँ , शास्त्रीय मर्यादा और  लौकिक परंपरा से प्रसूत भारतीय कला परंपरा के चिरंतन संवाहक के रूप में लोक जीवन  में व्याप्त रही हैं। प्राचीन देवालयों में धर्मशास्त्र और शिल्प शास्त्र का  अक्षरषः प्रभाव दिखाई देता है। धर्मशास्त्रों में मानव जीवन के लिये चारों  पुरूषार्थों का विधान है। धर्म की सिद्धि के लिये देवालयों का निर्माण भी एक सोपान  है। सर्वतोभद्र शिल्प का निर्माण एवं समर्पण की परंपरा से धर्म के साथ साथ कला का  पोषण भी होता रहा है। लोक पंरपरा और जन-सामान्य की अभिरूचि, शिल्पी की साधना एवं  मौलिक कल्पना से समृद्ध सर्वतोभद्र शिल्प परवर्ती काल में भी भारतीय कला को नवीन  दिशा देती रही है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">सर्वतोभद्र शिल्प के सम्यक अध्ययन से पौराणिक कथाओं  से संबंधित अनेक कथाएं प्रकाष में आयेंगी। सांस्कृतिक धरोहर और पुरावशेष के रूप में  चिन्हित इन अवशेषों के संरक्षण के प्रयास में इनका विस्तृत अध्ययन कला के क्षेत्र  में अपेक्षित योगदान होगा, क्योंकि हमारी विरासत बहुत मूल्यवान और महान है, उनकी  हमें रक्षा करनी चाहिए।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">सन्दर्भ-ग्रन्थ:</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">01. सुल्लेरे, सुशील कुमार; अजयगढ़ और कालंजर की देव  प्रतिमाएं, रामानन्द विद्या भवन, कालकाजी 1987. </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">02. श्रीमद्भागवत गीता; सम्पादक गीता प्रेस गोरखपुर  संवत् 2037. </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">03. पुराभारती, खण्ड 1 बी.आर. मणि एवं एस. सी. सरन,  शारदा पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 2006 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">04. यादव, शम्भू नाथ, कालिंजर क्षेत्र का पुरातत्व,  शोध प्रबन्ध अप्रकाषित लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-2007. </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">05. महाभारत, क्रिटिकल एडिषन, पूना-1942. </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">06. महाभारत, अनुवादक पण्डित रामनारायण दत्त  शास्त्री पांडे, राम, गीताप्रेस, गोरखपुर संवत् 2025 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">07. गोपीनाथ राव, टी.ए. एलीमेन्ट्स आफ हिन्दू  आइकोनोग्राफी, वाराणसी 1971 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">08. बनर्जी जे.एन., दि डेवेलपमेंट आफ हिन्दू  आइकोनोग्राफी, कलकत्ता 1968 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">09. खजुराहों की देवप्रतिमायें, रामाश्रय अवस्थी  आगरा 1967 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:xx-small;">10. छायाचित्र, सौजन्य से भारतीय पुरातत्व  सर्वेक्षण, लखनऊ मण्डल, लखनऊ</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> </span><span style="font-size:x-small;"> उपसंचालक संस्कृति एवं  पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन  सहायक पुरातत्वविद् भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण,  रायपुर मण्डल, रायपुर (छत्तीसगढ़) </span></p>
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		<title>महाकवि कालिदास कृत रघुवंश के द्वितीय सर्ग पर केन्द्रित &#8211; दुर्लभ कलाकृति</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 00:30:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
				<category><![CDATA[Archaeology]]></category>
		<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Iconography]]></category>
		<category><![CDATA[Mythology]]></category>
		<category><![CDATA[Travel]]></category>
		<category><![CDATA[Uttar Pradesh]]></category>

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		<description><![CDATA[ जी.एल.रायकवार
 शंभुनाथ यादव
भारतीय स्थापत्य कला के वृहद परिदृश्य में प्रतिमाओं  का विशेष महत्व है। प्राचीन प्रतिमाएं युग विशेष की कला-संस्कृति, चिंतन और  पारंपरिक ज्ञान विज्ञान के प्रमाणिक स्त्रोत हैं। प्रतिमाओं के माध्यम से शिल्पियों  ने वण्र्य विषय को अपनी मौलिक कल्पना से अधिकाधिक रोचक और मनोविनोदात्मक तत्वों के  साथ रूपायित [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1676&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:right;"><span style="color:#0000ff;"> जी.एल.रायकवार</span></p>
<p style="text-align:right;"><span style="color:#0000ff;"> शंभुनाथ यादव</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">भारतीय स्थापत्य कला के वृहद परिदृश्य में प्रतिमाओं  का विशेष महत्व है। प्राचीन प्रतिमाएं युग विशेष की कला-संस्कृति, चिंतन और  पारंपरिक ज्ञान विज्ञान के प्रमाणिक स्त्रोत हैं। प्रतिमाओं के माध्यम से शिल्पियों  ने वण्र्य विषय को अपनी मौलिक कल्पना से अधिकाधिक रोचक और मनोविनोदात्मक तत्वों के  साथ रूपायित किया है जिससे पाषाणों में अभिनयात्मक गति संचरित होने से सहज ढंग से  आत्मसात होने लगते हैं। शिल्प ग्रंथों के निर्देशों को स्वीकार करते हुये वण्र्य  विषय में रस को उद्दीप्त करने में सहायक दृश्य अथवा अलंकरण की योजना में शिल्पियों  की साधना और दक्षता शैव प्रतिमाओं में विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। ऐसी प्रतिमायें  अत्यल्प हैं और इन्ही कलाकृतियों में भारतीय कला की लोक-धारा प्रकट है। भारतीय  स्थापत्य कला के अंतरंग में धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक तत्व सन्निहित है। इसीलिये  हमारे देश में कला की साधना और उपासना होती है। शिल्प शास्त्रों में विभिन्न देव  प्रतिमाओं की रूपाकृति, आयुध, वाहन, तालमान आदि के निर्देश हैं जिसके अनुसार  प्रतिमाओं के निर्माण की परंपरा रही है। इन्हीं के साथ-साथ लौकिक जीवन से  संबंधित-नृत्य, संगीत, श्रृंगार, वन्य पशु-पक्षी, वनस्पति आदि अलंकरणात्मक  प्रयोजनों से युक्त अभिप्रायों को सम्मिलित कर अधिकाधिक आकर्षण उत्पन्न किया गया  हैं। भारतीय स्थापत्य कला के विश्व प्रसिद्ध स्मारक-सांची, अजंता, एलोरा, एलिफेंटा,  कोणार्क, खजुराहो, देवगढ़, उदयगिरि, मामल्लपुरम, पुरी आदि, कलात्मकता, मौलिकता और  भव्यता की दृष्टि से अपूर्व हैं। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है। पौराणिक  संदर्भों के कलात्मक निरूपण के अतिरिक्त मानव जीवन के पुरूषार्थ की अभिपूर्ति का  लक्ष्य स्थापत्य विधा में सन्निहित है। पौराणिक कथायें मानव जीवन के अंतस् को  प्रकाशित करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना भी  करते हैं। नटराज, अर्धनारीश्वर, महिषासुर मर्दिनी, वामन, नृसिंह, उमा-महेश्वर,  तीर्थकंर, बुद्ध आदि की प्रतिमाएं कला की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इन देव  प्रतिमाओं के साथ भावनात्मक आस्था और उपासना जुड़ी हुई हैं। दृष्य अथवा श्रव्य कला  के साथ-साथ भावनात्मक संबंध और एकाग्रता से आंतरिक उर्जा उत्सर्जित होती है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> भारतीय  मूर्ति शिल्प में रामायण और महाभारत के कुछ विशिष्ट प्रसंगों से संबंधित कलाकृतियां  प्राप्त होती हैं। कथा नायकों के विभिन्न लीलाओं अथवा घटनाओं से संबंधित तथा लोक  में व्यापक रूप से प्रचलित असीम शौर्य अथवा संवेदना से संबंधित प्रसंगों का  शिल्पांकन देवालयों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के शिल्पकृतियों में महाभारत  से संबंधित कृष्ण की बाल लीलाओं का अंकन सर्वाधिक लोकप्रिय रहा है। कर्ण और अर्जुन  की प्रतिमायें भी शिल्प कला में उपलब्ध होती है। रामायण से संबंधित शिल्पकृतियों  में शूर्पणखा प्रसंग, पंचवटी में भिक्षुवेश में रावण का आगमन, मारीचवध, बालि-वध  सेतु निर्माण आदि शिल्पियों के प्रिय विषय रहे हैं। शिल्पकृतियों से जन जीवन में  प्रचलित धार्मिक आस्था और लोक रूचि के साथ-साथ शिल्पियों की दक्षता का ज्ञान होता  है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य संस्कृत वाङ्गमय का सुप्रसिद्ध ग्रंथ है।  इस ग्रंथ का बीजांकुर राजा दिलीप की निःसंतान होने की व्यथा से प्रारंभ होता है।  महाकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप के द्वारा नन्दिनी गौ की सेवा, नन्दिनी गौ  के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है।  कथावस्तु की दृष्टि से यह सर्ग अत्यन्त मार्मिक तथा प्रभावोत्पादक है। कथा के  अनुसार भू-मंडल का स्वामी होते हुये भी राजा दिलीप पुत्र विहीन होने के कारण संतप्त  होकर राजकाज मंत्रियों को सौंपकर तपोवन में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें  अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने तपोबल से इसका कारण जानकर राजा दिलीप को बताया  कि कामधेनु की पुत्री नंदिनी गौ की आराधना करने से यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है। अपने  गुरू की आज्ञा स्वीकार कर राजा दिलीप अपनी धर्मपत्नी सुदक्षिणा के साथ नंदिनी गौ की  सेवा-आराधना में तत्पर हो गये। इस प्रकार इक्कीस दिन व्यतीत होने के पश्चात् एक दिन  नंदिनी राजा दिलीप की परीक्षा लेने हेतु घने वन में चली गयी और वहां माया निर्मित  सिंह से आक्रांत होकर प्राण रक्षा के लिए चिल्लाने लगी। वन की शोभा देखने में भाव  विभोर राजा नंदिनी की आवाज सुनकर सिंह को मारने के लिये अपने तूणीर से बाण निकालने  लगे परन्तु उनके हाथ बाण के पंखों से चिपक गये। असहाय राजा को मनुष्य वाणी से  विस्मित करते हुये सिंह ने बताया कि वह इस वन की रक्षा में नियुक्त शिव का अनुचर है  तथा इस वन में बलात् प्रवेश करने वाले प्राणी उसके आहार हैं। उसके द्वारा सुरक्षित  क्षेत्र में प्रवेश करने के कारण गौ उसका भक्ष्य हैं और शिव की कृपा से वह अजेय है।  उसका वध करने में कोई समर्थ नहीं है। फलस्वरूप शर संधान के लिये तत्पर हाथ स्वतः  बाणों से चिपक गयें हैं। सिंह के वचन सुनकर राजा दिलीप ने नंदिनी की रक्षा करने के  दृढ़ संकल्प को दुहराते हुये उसे (नंदिनी गौ) मुक्त करने की प्रार्थना करते हुये  स्वयं को उसके (सिंह के) आहार के लिए समर्पित कर दिया। कुछ अंतराल से नंदिनी ने  माया का निवारण कर दिया और राजा को इच्छित वर प्रदान किया। इस कथा में गौ सेवा,  गुरू भक्ति और नैतिक मूल्यों का अत्यन्त सरस श्लोकों में वर्णन है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> रघुवंश महाकाव्य  पर आधारित ‘सिंहाक्रमणम्’ का दृश्यांकन भारतीय कला में अत्यन्त दुर्लभ है तथा  अन्यंत्र प्रकाशित होने की जानकारी नहीं है। अंकित दृश्य के आधार पर धनुर्धर (राजा  दिलीप), गौ (नंदिनी) एवं सिंह की संयुक्त प्रदर्शन और भूमिका युक्त शिल्पकृति  भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रणाधीन कालंजर दुर्ग से ज्ञात हुई है एवं  छायाचित्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ मंडल के सौजन्य से प्राप्त हुई है।  प्राचीन काल में कालंजर उत्तर भारत का महत्वपूर्ण दुर्ग रहा है। इस दुर्ग को  सर्वाधिक प्रसिद्धि चंदेल राजाओं के शासन काल में मिली। कालंजर शैव तीर्थ के रूप  में भी विख्यात है।<img class="aligncenter size-full wp-image-1679" title="nilakanthatemple" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/nilakanthatemple.jpg?w=450&#038;h=298" alt="nilakanthatemple" width="450" height="298" /><span style="color:#0000ff;">कालिंजर किले के अन्दर नीलकंठ मंदिर के भग्नावशेष</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> अंशतः खंडित यह शिल्पकृति लाल भूरा बलुआ प्रस्तर से निर्मित है।  यह जैजाकभुक्ति के चन्देल शासकों के काल में निर्मित ज्ञात होती है। संभवतः इस  शिल्पकृति के अधोभाग में कथा से संबंधित अन्य दृश्य रहे होंगे। इस शिल्पकृति में  कथानक का चरमोत्कर्ष है। इस प्रसंग के मुख्य तीन पात्र-राजा दिलीप, नंदिनी एवं  मायावी सिंह की भाव-भंगिमा और चेष्टाओं के माध्यम से शिल्पी ने अल्पतम अभिप्रायों  से संपूर्ण कथा को साकार कर दिया है। निम्न श्लोकों में राजा दिलीप की मनः स्थिति  का चित्रण है-</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> जाताभिषंगो  नृपतिर्निषंगादुद्धर्तुमैच्छत् प्रसमोद्घृतारिः।।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> रघुवंश, सर्ग 2-30 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">अर्थ- (नंदिनी  को पछाड़कर खाने के लिये उद्यत) सिंह को देखकर मृगेन्द की तरह धीर गंभीर चाल वाला,  रक्षा करने में निपुण, शत्रुओं को बलपूर्वक दंड देने वाला (असहाय स्थिति में  अपमानित) राजा दिलीप ने सिंह को मारने के लिए तूणीर से बाण निकालने के लिये इच्छा  प्रकट की। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">वामेतरस्तस्य करः प्रहत्र्तुर्नख प्रमाभूषित कंकपत्रे। </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">शक्ताङ्गुलिः  सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे।।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> रघुवंश, सर्ग 2-31 </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">अर्थ- प्रहार करने के  लिए उद्यत, नखों की कांति से प्रकाशित राजा दिलीप के दायें हाथ की अंगुलियां  कंकपत्रो से सुशोभित तूणीर में स्थित बाणों के मूलप्रदेश में रखे हुये (बाण निकालने  के उद्योग में) चित्रवत (जड़) स्थिर हो गया।</span></p>
<p><img class="aligncenter size-full wp-image-1680" title="Kalidas" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/10/kalidas.jpg?w=360&#038;h=526" alt="Kalidas" width="360" height="526" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">प्रस्तुत चित्र में प्रसंग के अनुकूल  निम्न विशेषताएं दृष्टव्य हैं जिससे शिल्प में निम्नानुसार व्यंजनात्मक प्रभाव  उत्पन्न हैं -</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> 1. राजा दिलीप की आकृति वनवासी सदृश्य है। उनके अंगों में राजोचित  अलंकरण नहीं है। अतः आश्रमवासी अभिपे्रत हैं।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> 2. नन्दिनी गौ के ऊपर प्रहाररत सिंह  तथा भूमिष्ठ राजा दिलीप एक दूसरे के सम्मुख संभाषणरत रूपायित हैं। राजा दिलीप घुटने  मोड़कर धनुष-बाण पकड़े बैठे हैं, जो उनके असहाय और अपमानित स्थिति का परिचायक है।  अंततः वे सिंह का शरण ग्रहण करने के लिए विनयावनत है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> 3. नंदिनी गौ का सिर अवनत है  तथा नेत्र भयातुर हैं। 4. सिंह के वक्ष पर निष्प्रभावी बाण धंसा हुआ है जो लोक  मान्यता आधारित है तथा सिंह के वध के लिये राजा दिलीप की चेष्टा का परिचायक है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> उपरोक्त विशेषताओं के परिदृश्य में विवेच्य कलाकृति अद्वितीय है महाकवि कालिदास कृत  रघुवंश महाकाव्य के द्वितीय सर्ग पर आधारित यह कलाकृति भारतीय कला में अद्यतन ज्ञात  प्रथम कृति है तथा इसका अभिज्ञान ‘‘सिंहाक्रमणम्’’ समाधान कारक है।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;"> संदर्भ  ग्रन्थ:</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;"> 1. रघुवंश महाकाव्यम् &#8211; पंडित श्री हरगोविन्द शास्त्री चैखंबा संस्कृत  पुस्तकालय बनारस। तृतीय संस्करण सन 1953</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;"> 2. टी.ए.गोपीनाथ राव &#8211; इलीमेंटस आॅफ  दि-हिन्दू आइक्नोग्राफी वाराणसी-1971 </span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;">3. दि डेवलपमेंट आफ हिन्दू &#8211; जे.एन.बनर्जी  कलकत्ता-1968 आइक्नोग्राफी</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;"> 4. महाभारत &#8211; गीतापे्रस गोरखपुर</span></span></p>
<p align="justify">
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:small;"><span style="color:#ff0000;">&#8220;लेखक द्वय  द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित&#8221; अनुमति बिना अन्यत्र प्रकाशन वर्जित</span></span></span></p>
Posted in Archaeology, Culture, Iconography, Mythology, Travel, Uttar Pradesh  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/mallar.wordpress.com/1676/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/mallar.wordpress.com/1676/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/mallar.wordpress.com/1676/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/mallar.wordpress.com/1676/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/mallar.wordpress.com/1676/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/mallar.wordpress.com/1676/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/mallar.wordpress.com/1676/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/mallar.wordpress.com/1676/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/mallar.wordpress.com/1676/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/mallar.wordpress.com/1676/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1676&subd=mallar&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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		<title>कोंकण के यहूदी (बेने इसराइली) &#8211; अलीबाग और उसके आगे</title>
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		<pubDate>Sun, 27 Sep 2009 06:15:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
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		<description><![CDATA[

 विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष 

भारत में वैसे तो यहूदियों के कई समुदाय अलग अलग  प्रांतों में पाए जाते हैं परंतु कोच्चि के यहूदियों की चर्चा कुछ अधिक रही क्योंकि  उनकी संख्या अब मात्र दस या ग्यारह रह गयी है. कोच्चि के यहूदियों की गली में भ्रमण  के दौरान एक मृत यहूदी के घर [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1639&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="justify"><span style="font-size:small;"><br />
</span></p>
<p align="justify"><span style="color:#ff0000;"> विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष </span></p>
<p><img class="alignright size-medium wp-image-1642" title="Halegua" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/halegua1.jpg?w=233&#038;h=300" alt="Halegua" width="233" height="300" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">भारत में वैसे तो यहूदियों के कई समुदाय अलग अलग  प्रांतों में पाए जाते हैं परंतु कोच्चि के यहूदियों की चर्चा कुछ अधिक रही क्योंकि  उनकी संख्या अब मात्र दस या ग्यारह रह गयी है. <a href="http://mallar.wordpress.com/2009/03/25/%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%BF-cochin-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A4%B9%E0%A5%82%E0%A4%A6%E0%A5%80/">कोच्चि के यहूदियों</a> की गली में भ्रमण  के दौरान एक मृत यहूदी के घर जाना भी हुआ था जहाँ उसका शव इस इंतज़ार में था कि  उनके धार्मिक रस्मों के लिए आवश्यक गणपूर्ति हेतु निर्धारित १० व्यक्ति जुट सकें.  वहीं से हमें भी उनके बारे में कुछ जानने की इच्छा जागृत हुई. अभी अभी खबर मिली है  कि कोच्चि के यहूदी समाज के प्रमुख और वहाँ के धर्मस्थल के मुखिया रहे सेमुअल  हलेगूआ (७६ वर्ष) ने विगत १७ सितंबर को अंतिम साँस ली थी. उनके समाज के किस्से  कहानियाँ और इतिहास बताने के लिए उन्हें जाना जाता था. हम उनकी आत्मा की शांति के  लिए अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह संयोग ही है कि अपने मुंबई प्रवास के समय  महाराष्ट्र में बसे और बचे हुए यहूदियों के बारे में जानने का अवसर मिल ही गया.  हमें पहले से मालूम था कि मध्य कोंकण इनका मूल स्थान रहा है. हमने कार्यक्रम बनाया  &#8221;अलीबाग&#8221; चलने का. चालक सहित वाहन का प्रबंध तो हमारे लघु भ्राता के सौजन्य से उपलब्ध  था ही. हम, हमारी अर्धांगिनी उसके बड़े भाई और भाभी इस तरह चार लोग हो गये. अलीबाग,  मुंबई वासियों के सप्ताहांत में मस्ती करने के लिए एक प्रमुख स्थल है. इसलिए हम  लोगों ने ऐसा दिन चुना जब भीड़ भाड़ ना रहे. चेंबूर से २७ अगस्त, गुरुवार सुबह ही  रवाना हो गये. हमारे साथ नक्शा आदि भी था इसके बावजूद भटकना पड़ गया. हमें &#8220;पनवेल&#8221;  से,  &#8221;पेण&#8221; और यहाँ से दाहिनी और मुड़कर &#8220;वडखल&#8221; नाका होते हुए अलीबाग जाना था. वाहन चालक  की ग़लती से पनवेल पहुँच कर पुणे जाने वाली द्रुत गामी मुख्य मार्ग में गाड़ी  दौड़ने लगी और फँस गये चुंगी के चक्कर में. ८३ रुपये अदा करने पड़े और चुंगी वालों  ने बता दिया कि आगे से बाईं ओर मुड़ कर पेण के लिए रास्ता जाता है. ले देकर पेण  पहुँचे. वहाँ राज्य परिवहन के बस अड्डे के निकट हम लोगों ने नाश्ता किया और फिर  अलीबाग का रास्ता पूछते हुए चल पड़े.<img class="aligncenter size-full wp-image-1643" title="IMG_0220" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0220.jpg?w=450&#038;h=337" alt="IMG_0220" width="450" height="337" /><span style="color:#0000ff;">कोलाबा का किला<img class="aligncenter size-full wp-image-1647" title="Colaba Fort" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/colaba-fort.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Colaba Fort" width="450" height="337" />कोलाबा किले का एक हिस्सा</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">पेण से एक घंटे के सफ़र के बाद हम लोग अलीबाग में थे. मुंबई  से कुल दूरी १३५ किलोमीटर. वैसे समुद्री मार्ग से केवल ३० किलोमीटर ही पड़ता है  जिसके लिए मौसम अनुकूल नहीं था. हमें यह नहीं मालूम था कि अलीबाग, रायगड जिले का  मुख्यालय है. हमारी जानकारी में दो रायगढ़ हैं, एक तो छत्तीसगढ़ का “रायगढ़” और  दूसरा &#8220;रायगड&#8221; जो महाराष्ट्र में है. अब पता चला कि रायगड केवल किले का नाम है.  अलिगाब तो वैसे एक मुसलमान व्यापारी &#8220;अली&#8221; द्वारा बनवाए हुए बागीचों और कुंवों के  कारण नाम पड़ा था परन्तु वास्तविक ख्याति दिलाई शिवाजी महाराज के एक प्रमुख  सेनानायक रहे कान्होजी आंग्रे ने जिन्होंने पुर्तगालियों और अंग्रेजों को लोहे के  चने चबवाए. वे अलीबाग के ही रहने वाले थे और उनकी वहां समाधी भी है.  हमने पहले  ही कह दिया है, अलीबाग, मुंबई वासियों के लिए मौज मस्ती करने की जगह बन गयी है. बॉलीवुड  से जुड़े लोगों ने तो यहाँ आलीशान कोठियां बनवा रखी हैं.<img class="aligncenter size-full wp-image-1671" title="IMG_0229" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0229.jpg?w=450&#038;h=337" alt="IMG_0229" width="450" height="337" /><br />
</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><img class="aligncenter size-full wp-image-1646" title="IMG_0227" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0227.jpg?w=450&#038;h=337" alt="IMG_0227" width="450" height="337" /><span style="color:#0000ff;">समुद्र तट पर बैठने की व्यवस्था</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">समुद्र तट की ओर जाने के मार्ग का सूचना पटल भी  रास्ते में था और हम सीधे पहुँच गये समुद्र तट पर. सामने ही रेलवे की प्लॅटफॉर्म के  सदृश लोगों के बैठ्ने के लिए लंबी चौड़ी आधुनिक टाइल युक्त प्लॅटफॉर्म बनी हुई है  जिसके किनारे कुछ पेड़ लगाए गये हैं और बैठ्ने के लिए बेंचें भी बनी हैं. नीचे  उतरने पर समुद्र तट है और समुद्र के अंदर कुछ दूरी पर है कोलाबा का किला. हम लोग  लगभग ११ बजे दिन को वहाँ पहुँचे थे. समुद्र का पानी चढ़ा हुआ था इसलिए किले तक जाना  संभव नहीं था. सुबह और शाम को ही पानी उतार पर होता है जब घोड़ा गाड़ी में बैठ कर  या फिर पैदल ही किले तक जाया जा सकता है. अब जब किले की बात आई तो बता दें कि इसे  शिवाजी महाराज ने पुर्तगालियों, अँग्रेज़ों और पास ही बसे मुरुद जंजीरा के अफ्रीकी  सिद्धियों पर नज़र रखने के लिए एक नौसैनिक अड्डे के रूप में सन १६५२ में विकसित  किया था. किले के अंदर कई मंदिर भी हैं जिनमे प्रमुख है सिद्धि विनायक का मंदिर  जिसे राघोजी आंग्रे ने १७५९ में बनवाया. इसके अतिरिक्त जय भवानी और हनुमान मंदिर भी  है. एक और अजूबा जो है वह यह कि समुद्र के अंदर होते हुए भी किले के अंदर मीठे पानी  के कुवें हैं. विकिपेडिया से प्राप्त किले के चित्र से जो १८५५ की है, ऐसा प्रतीत  होता है कि संभवतः समुद्र के तट पर ही किला बना था और अब काफ़ी कुछ भूभाग समुद्र ने  छीन लिया है. हमें खेद था कि हम किले तक नहीं पहुँच पाए. हमारे साथियों को दुख था  कि सिद्धि विनायक के दर्शन नहीं हुए. तब हमने उन्हें आश्श्वस्त किया कि खाना खाने के  बाद एक दूसरे महत्व्पूर्ण विनायक को देखने चलेंगे जो वहाँ से लगभग २० किलो मीटर की  दूरी पर था.<img class="aligncenter size-full wp-image-1650" title="Colaba_Fort,_1855" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/colaba_fort_1855.jpg?w=449&#038;h=228" alt="Colaba_Fort,_1855" width="449" height="228" /><span style="color:#0000ff;">१८५५ में लिया गया किले का चित्र</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">समुद्र तट से लॉटते समय हमने सह यात्रियों से याचना  कर ली कि रास्ते में यहूदियों के मंदिर को भी देखते चलें. क्योंकि बात मंदिर की कही  थी इसलिए सबने हमारी बात रख ली. बहुत भटकने के बाद एक तिगड्डे पर कोने के दुकानदार  से मिले. यहीं से हम लोग पहले समुद्र तट के लिए मुडे भी थे. बड़ी प्रसन्नता हुई जब उसने बताया कि बगल की गली ही तो इसराइली लेन है और  आगे बाईं तरफ जाने पर आपको उनका प्रार्थना स्थल मिलेगा. उसने अपना कुछ मराठी नाम  बताया था जिसे हम याद नहीं रख सके थे. उसके निर्देशों का पालन करते हुए हम यहूदियों  के प्रार्थना स्थल (सिनेगॉग) तक पहुँच ही गये. गाड़ी को गली के कोने में रुकवा दिया  था. दो गेट बने थे. हमने पहले वाले गेट से प्रवेश किया जो वास्तव में पिछला दरवाज़ा  था. अंदर कुछ दूरी पर पाया कि एक वृद्ध नल में अपना हाथ मुह धो रहा है. हमने उससे  पूछा कि क्या यह सिनेगोग दर्शकों के लिए खुलता है. उसने अंग्रेजी में हमसे सामने  जाकर बैठने के लिए कहा. हमने गली के कोने में कार में बैठे अपने परिवार जनों को  बुलवा लिया. थोडी ही देर में वही वृद्ध पेंट शर्ट पहिने सर पर टोपी डाले चाभियों का  गुच्छा लिए आ गया और खोल दिया अपने प्रार्थना स्थल के पाट. हमने अन्दर घुसने के  पूर्व अपने सर पर रूमाल डाल लिया और अपने साथ आये महिलाओं से भी साडी से सर को ढक  लेने का आग्रह किया तो झट हमारी पत्नी ने कहा कि हमारी ऐसी परंपरा नहीं है. हमने  कहा चलो ठीक है जैसी आप लोगों की मर्जी. उस वृद्ध ने अन्दर की सभी बत्तियां जला दीं  ताकि हम लोग सब कुछ देख सकें. सामने एक चबूतरा सा बना था जिसके चारों तरफ रेलिंग  बनी थी. यहीं &#8220;रब्बी&#8221; (काजी) के लिए कुर्सी रखी थी. बन्दों के बैठने के लिए कई  बेंचें भी थी जो हमें किसी चर्च जैसा लगा. अन्दर के हाल में अलंकरण साधारण ही था.  हमने उनके धर्मग्रन्थ &#8220;तोरा&#8221; के बारे में पूछा तब विस्मय से उस वृद्ध ने एकदम सामने  बने आले को खोल दिया जहाँ तीन गोल डिब्बे दिख रहे थे. संभवतः उनका तोरा जो चमड़े में  लिखा गया होगा उन डिब्बों में सुरक्षित थे. उसके सामने एक छिद्रयुक्त पीतल के बर्तन  के अन्दर दिया भी जल रहा था. हमें बताया गया कि यह दिया २४ सों घंटे जला करता है और  दिए में नारियल तेल डाला करते हैं.<img class="aligncenter size-full wp-image-1648" title="IMG_0231" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0231.jpg?w=384&#038;h=512" alt="IMG_0231" width="384" height="512" /><span style="color:#0000ff;">अलीबाग में यहूदियों का प्रार्थनास्थल (सिनेगोग)</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">हमारे साथ आये लोगों को व्यस्त रखते हुए हमने उस  वृद्ध से बातचीत प्रारंभ की. उन्होंने अपना नाम बताया &#8220;जेकब इलैज़ा&#8221; (आयु ७२ वर्ष).  हमने जब उनसे पुनः नाम को दोहराने के लिए कहा तब उत्तर मिला &#8220;दांडेकर&#8221;.  हमने पूछा  कि क्या आप महाराष्ट्रियन हो तो कहा नहीं हम &#8220;बेने इस्राइली&#8221; हैं. हम लोगों का  उपनाम हम लोगों के द्वारा बसे हुए गाँव पर हुआ है. फिर उन्होंने उनके समाज की कहानी  भी बताई. हमें बताया गया कि अब अलीबाग में केवल चार परिवार बचे हैं. श्री जेकब जी  उस धर्मस्थल के मुखिया हैं और वे अकेले ही रोज तीन बार प्रार्थना करते हैं. उनका एक  बेटा है जो इस्राइल चला गया परन्तु पत्नी साथ में रहती है. उन्होंने यह भी बताया की  जिस कोने वाले दूकानदार ने हमें पता बताया था वह भी &#8220;बेने इस्राइली&#8221; है और उसका एक  १६ वर्षीय बेटा वहां का सबसे छोटा सदस्य है.<img class="aligncenter size-full wp-image-1649" title="IMG_0232" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0232.jpg?w=384&#038;h=512" alt="IMG_0232" width="384" height="512" /><span style="color:#0000ff;">सिनेगोग के संरक्षक जेकब इलैज़ा दांडेकर</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">इस समाज के लोगों की धारणा है कि वे भारत में ५००  वर्ष ईसा पूर्व आये थे जब इस्राइल में उनका दूसरा मंदिर नहीं बना था. उन्होंने अपनी  जान बचाने के लिए पलायन किया था और कोंकण के तट पर उनकी नाव ध्वस्त हो गयी थी. कुल  १४ लोग बच पाए थे जिनमे ७ पुरुष और उतनी ही महिलाएं थी. इन लोगों ने तैर कर &#8220;नगांव&#8221;  के समुद्री तट पर शरण ली. मृतकों को वहीँ दफना दिया और नगांव में बस गए. कालांतर  में जब इनकी आबादी बढ़ी तो कोंकण के अन्य भागों में बसते गए. आजीविका के लिए इन्होने  खेतों में काम किया और तेल की घनी चलाने लगे. इन लोगोंने स्थानीय बोली को अपनाया और  अपने उपनाम भी मराठियों की तरह बसे हुए गाँव के आधार पर रख लिया जैसे नवगाँवकर,  पन्वेलकर आदि. इनमें ऐसे १४२ उपनाम पाए जाते हैं. वे अपने आप को यहूदी न कहकर “बेने  इस्राइली” ही कहा करते थे. परन्तु कोंकण में उन्हें शनिवारी तेली के नाम से जाना  जाता था क्योंकि ये लोग शनिवार के दिन (सब्बाथ) कोई काम नहीं करते थे. उनकी धार्मिक  परम्पराओं से भी वे बहुत कुछ अनभिग्य थे परन्तु १७ वीं शताब्दी में कोच्ची के यहूदी  डेविड रहाबी ने इस समाज की कुछ परम्पराओं के आधार पर इन्हें यहूदियों के लुप्त हुए  १२ कबीलों में से एक के रूप में पहचान की. इन्हें उनकी भाषा (हेब्रू) तथा धार्मिक  परम्पराओं में प्रशिक्षित भी किया. ऐसा समझा जाता है कि भले यहूदियों से मुसलमानों  की दुश्मनी रही हो, &#8220;बेने इस्राइली&#8221; लोगों को कुरआन में अल्लाह के चहेतों में माना  गया है और यही एक बड़ा कारण था कि ये लोग अपने आप को यहूदी कहने से कतराते रहे.  हिन्दुओं की नाराजगी से बचने के लिए इन्होने गोमांस खाना भी अपने लिए वर्जित कर  रखा. आज महाराष्ट्र में इनकी आबादी लगभग ४००० है. पुणे में इनका धर्मस्थल सबसे खूबसूरत कहा जाता है परन्तु पनवेल के सिनागोग के बारे में मान्यता है कि वहां मन्नतें पूरी होती हैं</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">हम लोगों ने जेकब भाई से विदा ली तो उन्होंने एक  किताब पकडा दी जिसमे हमें अपनी प्रतिक्रिया लिखनी पड़ी. उनकी प्रशंशा के बाद लिखना  पड़ा कि सिनेगोग के सामने कुछ पेड़ पौधे लगवा दें क्योंकि वहां हरियाली बिलकुल भी  नहीं थी. एकदम कब्रस्तान जैसा लग रहा था. अब पेट पूजा का समय हो चला था. इसलिए एक  अच्छा सा होटल ढूँढ निकाला. गुजराती थाली की व्यवस्था थी परन्तु महँगी थी. सबसे  अच्छा छाछ रहा जिसे सब ने छक कर पिया. महिलाओं को निवृत्त होना था जिसकी व्यवस्था  भी वहां थी. इसके उपरांत हम लोग निकल पड़े बिरला जी के विनायक मंदिर की ओर जो वहां  से लगभग २० किलोमीटर दूर &#8221; रेवडंडा&#8221; नामक बस्ती के पास &#8220;अगरकोट&#8221; में था. यहाँ भी हमारा निहित  स्वार्थ था. खेतों के बीच से होकर रास्ता जाता था. चारों तरफ हरियाली थी. फिर  गाँवों में दाखिल हुए. घुमावदार रास्ते. सुन्दर सुन्दर गाँव. ऐसा लग रहा था जैसे  जंगल के अन्दर से जा रहे हों. नारियल, सुपारी, कटहल के पेडों से अच्छादित. लगा जैसे  केरल के किसी अंदरूनी भाग में हों. पूरा का पूरा माहौल वैसा ही. यहाँ तक कि घरों की  बनावट भी वैसी ही. केवल भाषा में अंतर था. रस्ते में ही हमें “नगांव” मिला उसके आगे  “छौल” जहाँ पुर्तगालियों का एक चर्च और खंडहरनुमा किला था. किले के पास से हमें &#8220;रेवडंडा&#8221; का समुद्री किनारा दिख रहा था. हमने अपने कैमरे से फोटो भी ली परन्तु शटर खुला  ही नहीं. इसलिए उधारी की तस्वीर दिखा रहे हैं. एक पुल को पार कर रेवडंडा के आगे निकल गए जबकि हमें वहां से &#8220;अगरकोट&#8221; जाना था. परन्तु जब तक हम लोग पूछ पाते, सामने एक पुराना सा मंदिर दिखा..<img class="aligncenter size-full wp-image-1654" title="IMG_0236" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/img_0236.jpg?w=450&#038;h=337" alt="IMG_0236" width="450" height="337" />हमने गाडी रुकवाई.  वह जगह चौल सराई थी और मंदिर सोमेश्वर महादेव का. आगे के रास्ते के बारे में पूछा  तो पता चला कि वह अलीबाग को जाता है. मतलब यह कि फिर भटक गए और वापस होना पड़ा.<img class="aligncenter size-full wp-image-1651" title="Revdanda" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/revdanda.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Revdanda" width="450" height="337" /><span style="color:#0000ff;">रेवडंडा का समुद्री किनारा<img class="aligncenter size-full wp-image-1652" title="Synagogue, Rewdanda" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/synagogue-rewdanda.jpg?w=450&#038;h=307" alt="Synagogue, Rewdanda" width="450" height="307" />रेवडंडा में यहूदियों का प्रार्थनास्थल</span></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">पुनः रेवडंडा आये और हमने यहूदियों के एक  प्रार्थनास्थल (सिनेगोग) को ढूँढ निकाला. वहां अधिक समय न बिताये ही, पूछते पाछते  बिरला के गणेश (विनायक) मंदिर की ओर बढ़ गए. दुबारा एक पुल को पार किया जो वास्तव  में समुद्री किनारा था और हमने यहाँ देखा कि बड़े बड़े जल पोत लौह अयस्क लेकर आ रहे  हैं और कन्वेयर बेल्ट से कच्चा माल कहीं जा रहा है. आगे बढे तो एक इस्पात संयंत्र (विक्रम इस्पात कंपनी  जो बिरला समूह का एक प्रयोजन है) भी दिखा जहाँ संभवतः इस्पात की चादरें बनायीं जाती हैं. इसके आगे ही एक छोटी पहाडी  पर बिरला मंदिर था. इसे विक्रम विनायक मंदिर भी कहते हैं. बहुत ही सुरम्य वातावरण.  मंदिर में सीढियों से जाना होता है परन्तु शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए  रियायत स्वरुप सड़क भी बनी हुई है. हम लोगोंने सड़क मार्ग का प्रयोग किया जिसके लिए  विशेष अनुमति दी गयी. हमारा पूरा परिवार इस मंदिर के दर्शन से अभिभूत हो गया.  संगेमरमर से बना मंदिर, विनायक के अतिरिक्त बाकी सभी देवी देवता वहां अलग अलग  प्रकोष्ठों में विराजमान थे. केमरा, या मोबाइल जिसमे केमरा हो ऊपर ले जाने पर मनाही थी और बड़े कडाई से इस नियम का पालन हो रहा था. हमें इसका औचित्य समझ में नहीं आया. यहाँ दर्शन के बाद तो बस एक ही काम रह गया था, घर  वापसी का, हलाकि, रेवडंडा और छौल में अनेकों जगह देखने योग्य थीं. परन्तु क्या करें  शाम हो चली थी. मुंबई वापस भी तो पहुंचना था.</span></p>
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		<title>माँ जीवदानी देवी, विरार, (मुंबई)</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Sep 2009 00:30:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Maharashtra]]></category>
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		<category><![CDATA[Travel]]></category>

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		<description><![CDATA[विरार, मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर जानेवाली सबर्बन रेलवे का अंतिम स्टेशन. हमें जाना था हमारे एक मित्र के मित्र साल्वे जी से मिलने.  उनसे दूरभाष पर बात हो गयी थी और उन्होने अपने घर का पता बता दिया था जो स्टेशन के पूर्वी ओर कुछ ही दूरी पर था. उन्होने [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1615&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p style="text-align:justify;"><img class="alignleft size-full wp-image-1633" title="Jivdani Maa" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/jivdani-maa.jpg?w=214&#038;h=280" alt="Jivdani Maa" width="214" height="280" />विरार, मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर जानेवाली सबर्बन रेलवे का अंतिम स्टेशन. हमें जाना था हमारे एक मित्र के मित्र साल्वे जी से मिलने.  उनसे दूरभाष पर बात हो गयी थी और उन्होने अपने घर का पता बता दिया था जो स्टेशन के पूर्वी ओर कुछ ही दूरी पर था. उन्होने स्टेशन पर आकर लिवा ले जाने की पेशकश की थी परंतु एक दूसरे को पहिचानने की समस्या, वह भी भीड़ भाड़ में, आड़े आ रही थी. इसलिए स्वयं चलकर उनके घर जाना ही हमें उचित जान पड़ा. जब विरार पास आने लगा तो दाहिनी ओर सुदूर पहाडियों की ऊँचाई पर एक बहु मंजिला भवन दिखने लगा. हमने सोचा कोई होटल वगैरह  होगा. दादर से एक द्रुतगामी ट्रेन में बैठ कर प्रातः  10.30 पर हम वीरार में थे. पूछते पाछते 10 मिनट में ही हम श्री विट्ठल महादेव साल्वे जी के घर  पहुँच गये. श्रीमती साल्वे ने हमें अपनी बैठक में आमंत्रित किया और यह जानकार  सुखद लगा कि हमारी प्रतीक्षा हो रही थी. चंद मिनटों में श्रीमान साल्वे जी अंतःपुर से निकल कर बैठक में आए और बड़ी गरम जोशी से मिले. जैसा सोचा था, वैसी ही कद काठी थी. बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ और उसी बीच हमने पहाड़  पर देखे हुए भवन के बारे में भी पूछ ही लिया.आश्चर्य तब हुआ जब हमें बताया गया कि वह “माँ जीवदानी देवी” का मंदिर है. खाना खाने के पूर्व उस मंदिर को देख आने का उनका आग्रह हम टाल न सके (वास्तविकता तो यह है कि हम स्वयं वहाँ जाना चाह रहे थे)<img class="aligncenter size-full wp-image-1627" title="DSC04293" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/dsc042931.jpg?w=449&#038;h=248" alt="DSC04293" width="449" height="248" /></p>
<p style="text-align:justify;">साल्वे जी के पास एक वेगन आर गाड़ी थी जिसे उनका पुत्र चला रहा था. साल्वे जी के अतिरिक्त उनकी पत्नी भी साथ हो ली. इस तरह हम चार लोग लगभग 3 किलोमीटर दूर उस पहाड़ी की तलहटी में पहुँच गये जिसपर जीवदानी  देवी का मंदिर था. ऊपर जाने के दो विकल्प थे. पहाड़ पर बनाए गये सीढ़ियों से या फिर उडनखटोले (रोपवे) से. साल्वे जी तो हमें सीढ़ियों से ऊपर ले जाने में उत्सुक दिखे. उन्होने हमसे पूछ भी लिया &#8220;क्यों 900 सीढ़ी चढ़ पाएँगे ना?&#8221;.  ऐसे में हम कैसे कह सकते थे कि हम ना जा पाएँगे. आत्म सम्मान की बात थी. हम लोगोंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए. आठ दस सीढ़ी चढ़ने पर बाईं तरफ एक गणेश जी का मंदिर था जिसकी प्रतिमा भी सुंदर थी. हमने अपने अंतःकरण से प्रार्थना की &#8211; आंतरिक शक्ति के लिए फिर आगे चल पड़े. सीढ़ियों के दोनों तरफ पहाड़ी पर वनस्पति बड़ी घनी थी और बड़ी लुभावनी लग रही थी. उनका आनंद लेते हुए हमने कुल 900 सीढ़ियाँ गिन लीं परंतु मंदिर का कहीं ओर छोर नहीं दिख रहा था. दर असल 1350 सीढ़ियाँ हैं परंतु हम से यह बात छुपाई गयी थी. हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए यह भी बताया गया कि हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता भी दो बार देवी की अनुकंपा प्राप्त करने उन सीढ़ियों पर चढ़ चुके हैं.<img class="aligncenter size-full wp-image-1628" title="DSC04292" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/dsc04292.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04292" width="450" height="337" /><img class="aligncenter size-full wp-image-1629" title="DSC04295" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/09/dsc04295.jpg?w=450&#038;h=337" alt="DSC04295" width="450" height="337" /></p>
<p style="text-align:justify;">ऊपर पहुँचने पर दूर से दिखाई देने वाला वह भव्य सात मंज़िलाभवन हमारे सामने था. सबसे ऊपर देवी का गर्भ गृह बताया गया जहाँ जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध थी. देवी की प्रतिमा निश्चित ही सुंदर परंतु आधुनिक थी. जनश्रुति के अनुसार उस पहाड़ी पर जीवदानी देवी का वास प्राचीन काल से ही रहा है. कहते हैं कि उन्होने एक कंदरा में अपने आपको छुपा लिया था और लोग वहाँ जाकर एक छेद में चढ़ावे के रूप में पान (तांबूल) डाला करते थे. वर्तमान में ऐसे किसी जन व्यवहार की पुष्टि नहीं हो सकी. वर्तमान मंदिर को बनवाने का श्रेय वीरार के किसी बाहुबली को दिया जाता है. यह मंदिर मुंबई तथा आसपास के उपनगरों के लोगों के लिया अपूर्व श्रद्धा का केन्द्रा बन गया है और यहाँ रविवार और मंगलवार के दिन हज़ारों श्रद्धालु दर्शनार्थ पहुँचते हैं. वसाई के कोली समाज के लिए तो यह उनकी कुलदेवी हैं. लोगों में विश्वास है कि माँ जीवदानी देवी, जैसा की नाम से ही बोध होता है, मरणासन्न लोगों को भी जीवन दान देने की क्षमता रखती हैं. कुछ समय पूर्व तक यहाँ भी बाकरों और मुर्गियों की बलि दिए जाने की परंपरा रही है जो अब सुनते हैं कि बंद कर दी गयी है.</p>
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		<title>एक नम्बूतिरि नारी का प्रतिशोध</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Aug 2009 00:30:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
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		<category><![CDATA[History]]></category>
		<category><![CDATA[Kerala]]></category>
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		<description><![CDATA[केरल समाज की पुरातन व्यवस्थाओं के बारे में हमने  इसके पहले भी लिखा है परन्तु किसी और सन्दर्भ में. देखें &#8220;स्त्री सशक्तीकरण – एक पुरानी परंपरा&#8220;. “एक अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता” वाली लोकोक्ति से  तो सभी अवगत होंगे ही परन्तु एक चने ने क्या कर दिखाया और उसका दूरगामी असर कैसा [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1598&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="justify"><span style="font-size:small;">केरल समाज की पुरातन व्यवस्थाओं के बारे में हमने  इसके पहले भी लिखा है परन्तु किसी और सन्दर्भ में. देखें &#8220;</span><a href="http://mallar.wordpress.com/2009/03/08/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE/" target="_blank"><span style="font-size:small;">स्त्री सशक्तीकरण – एक पुरानी परंपरा</span></a><span style="font-size:small;">&#8220;. <em>“एक</em> अकेला <em>चना</em> भांड नहीं फोड़ सकता” वाली लोकोक्ति से  तो सभी अवगत होंगे ही परन्तु एक चने ने क्या कर दिखाया और उसका दूरगामी असर कैसा  रहा जानने के पूर्व  आवश्यक हो गया है कि कुछ बातों को दुहराया जावे. केरल की वर्ण  व्यवस्था में सबसे ऊपर नम्बूतिरि ब्रह्मण थे. ये धनाठ्य वर्ग में आते थे. 8 वीं  शताब्दी से ही न केवल इन्हें राजाश्रय प्राप्त हुआ, उनपर राजा का वरद हस्त भी रहा.  दूसरी निचली जातियों के लोगों पर, नायर सहित, इन्हें बड़े विशेषाधिकार प्राप्त थे.  इन्हें बड़ी बड़ी जमींदारियां दे दी गयीं. वस्तुतः पूरा भूभाग ही इनके आधीन था.  इनके द्वारा पट्टा दिए जाने पर ही किसी और को भूमि मिल पाती थी, जिसके एवज में  उन्हें कर अदा करना होता था. ये लोग आलीशान &#8220;मना&#8221; में रहा करते थे जो इनका पारंपरिक  आवास था. उनके उत्तराधिकार के नियम पितृसत्तात्मक हुआ करते थे परन्तु अपनी संपत्ति  को विघटित होने से बचाए रखने के लिए इन्होने व्यवस्था कर रखी थी कि केवल परिवार का  ज्येष्ठ पुत्र ही विवाह कर सकता है. अब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि एक से अधिक  पुरुष संतान हों तो उनका क्या होगा. वे किसी नम्बूतिरि लड़की से शादी तो नहीं कर  सकते परन्तु किसी निम्न जाति की स्त्रियों से &#8220;सम्बन्ध&#8221; बना सकते थे. इस प्रकार के  &#8220;सम्बन्धम&#8221; से जो संतान उत्पन्न होंगे वे नम्बूतिरि कुल के नहीं माने जायेंगे.  क्योंकि:</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">ब्राह्मणों को छोड़ केरल का शेष हिन्दू समाज  &#8220;मातृसत्तात्मक&#8221; परिवारों का हुआ करता था. मातृसत्तात्मक परिवारों में विवाह नामकी  संस्था थी ही नहीं. यह एक ऐतिहासिक सत्य है. कुनबे में जिसे &#8220;तरवाड़&#8221; कहा जाता है,  घर का मुखिया (कर्णन)&#8221;मामा&#8221; हुआ करता था. घर की वास्तविक सत्ता महिलाओं की रही. घर  की कन्याओं के &#8220;सम्बन्धम&#8221; के लिए साधारणतया किसी ब्राह्मण को वरीयता दी जाती थीं और  यहीं उन बिन ब्याहे नम्बूतिरियों का प्रयोजन हुआ करता था. किसी ब्राह्मण के न मिलने  पर किसी दूसरे नायर &#8220;तरवाड&#8221; में ब्राह्मण के संसर्ग से जन्मे किसी युवा को पसंद  किया जाता था. &#8220;सम्बन्धम&#8221; बनाने के लिए भी कुछ औपचारिक्तायें हुआ करती थी. जैसे  किसी युवा के द्वारा युवती को एक वस्त्र (अंगोछा पर्याप्त था) भेंट में दिया जाना.  इसके बाद वह पुरुष युवती के घर रात बिताने जाया करता और सुबह होते ही अपने घर वापस  आ जाता. &#8220;सम्बन्धम&#8221; को तोड़ना भी बहुत आसान था. उस पुरुष के समक्ष महिला द्वारा  अंगोछे (वस्त्र) को दो भागों में फाड़ देना. किसी भी स्त्री के सम्बन्ध एक से अधिक  पुरुषों से भी हो सकते थे. यह व्यवस्था समाज के द्वारा सर्वथा मान्य थी और किसी भी  प्रकार से इसे हीन भावना से नहीं देखा जाता रहा.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">नम्बूतिरि परिवार की पूर्वोक्त  व्यवस्था के कारण  उनके लड़कियों की स्थिति बड़ी दयनीय थी. क्योंकि बहुत सी कन्यायें मातृत्व का सुख  भोगे बगैर बिन ब्याही ही रह जाती थीं. विवाह योग्य वर के होते हुए भी विवाह न हो  पाता. इसके समाधान के लिए ज्येष्ठ पुत्र को एक से अधिक विवाह करने की छूट थी जो  आंशिक रूप से समस्या का हल बनी. इस से यह भी हुआ कि १८ वर्ष की कन्या को ६० वर्ष के  बूढे नम्बूतिरि के साथ शादी करा दिया जाता था. वह कन्या उम्र भर घुटन भरा जीवन  व्यतीत करने के लिए वाध्य थी. कई कन्यायें तो जवानी में ही विधवा बन जाती और  प्रताड़ना के भागी बनती. विधवा विवाह का कोई प्रावधान नहीं था. इनके समाज में  स्त्रियों को &#8220;अन्तर्जनम&#8221; कहा जाता है अर्थात जो चहार दीवारी में ही रहती हो. बाहर  केवल मंदिर या अपने निकटस्थ सम्बन्धी के पास ही जा पातीं जिसके लिए साथ में दासी का  होना अनिवार्य था. किसी दूसरे व्यक्ति को अपना मुखडा नहीं दिखा सकती थीं जिसके लिए  हर मौसम में एक ख़ास प्रकार का ताड़ के पत्ते से बना छाता लेकर चला करतीं. सामने से  कोई आता दिखे तो अपने मुह के सामने छाता ओढ़ लेतीं.<img class="aligncenter size-full wp-image-1605" title="Ola Kuda-Nonee" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/08/ola-kuda-nonee2.jpg?w=383&#038;h=379" alt="Ola Kuda-Nonee" width="383" height="379" /></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">समाज में स्त्रियों को &#8220;साधनम्&#8221; अर्थात एक वस्तु या  सामग्री के रूप में परिभाषित किया गया जाता था लेकिन पूरी व्यवस्था उस  स्त्री रुपी  वस्तु के चरित्र को पावन बनाये रखने के लिए समर्पित थी. किसी भी प्रकार का  कलुषित/अनैतिक  आचरण असह्य हुआ करता था. जब कभी &#8220;मना&#8221; (नम्बूतिरि आवास) के किसी  &#8220;अन्तर्जनम&#8221; के चरित्र पर संदेह उत्पन्न होता तो सर्वप्रथम उस &#8220;अन्तर्जनम&#8221; की दासी  से पूछ ताछ की जाती, &#8220;दासिविचाराम&#8221; नाम की प्रक्रिया के तहत. जब भी इस पूछ ताछ में  कुछ मामला बनता तो फिर &#8220;अन्तर्जनम&#8221; के विरुद्ध अभियोग चलाने के लिए  &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221; (समाज के द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध न्यायाधिकरण) की प्रक्रिया  प्रारंभ किये जाने  हेतु प्रदेश के राजा से, आवश्यक शुल्क जमा कर, निवेदन किया  जाता. साधारणतया राजा की अनुमति मिल ही जाया करती थी. यह पूरी प्रक्रिया उस नारी के  प्रति दुर्भावना से ही भारित होती थी. अतः सम्बंधित महिला की दुर्गति सुनिश्चित की  हुई होती थी. अभियोजन  का कार्य कुछ दिनों तक और कभी कभी महीनों चलता. इस बीच उस  महिला को विचाराधीन कैदी की तरह एक अलग कमरे (अचनपुरा/पचोलापुरा) में बंद रखा जाता.  अंत में उसे &#8220;भ्रष्ट&#8221; घोषित कर दिया जाकर समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता. सम्बंधित  स्त्री को मृत मानकर उसका पिंडदान भी कर दिया जाता रहा.  उसकी स्थिति भिकारियों  जैसी हो जाती. ऐसी भ्रष्ट घोषित स्त्रियाँ किसी निम्न ज़ाति के पुरुष से विवाह कर  गुमनामी में जीवन व्यतीत करतीं या फिर उत्तर मालाबार के मन्नानर/चाकियार के यहाँ  आश्रय प्राप्त करतीं. अभियोजन के ऐसे मामले इस्लाम के शरिया कानून की तरह  &#8220;शंकरस्मृति अथवा लघु धर्म प्रकाशिका&#8221; के उपबंधों के तहत किया जाता रहा.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">अब हम १९०५ के उस ऐतिहासिक घटना पर केन्द्रित होते  हैं जब एक चने ने नम्बूतिरि समाज की छाती में मूंग दली. &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221; के इस  प्रकरण में अभियुक्त रही एक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति, साहित्य और कला (कथकली) का  गहन अध्ययन की हुई विदूषी &#8220;तात्री&#8221; (सावित्री). तात्री, मुकुंदपुरम तहसील के  कल्पकस्सेरी अष्टमूर्थी नम्बूतिरि की संतान थी. प्रारंभ से ही वह खुले विचारों की  (विद्रोही!) थी. यहाँ तक कहा जाता है कि उसके कुंडली के अनुसार वह परिवार के लिए  अनिष्ट लेकर ही जन्मी थी. यह भी कहा गया है कि उसके पिता और जीजा द्वारा उसका यौन  उत्पीडन भी हुआ था. खैर, १८ वर्ष की आयु में ही उसका विवाह ६० वर्ष के चेम्मनतट्ट  कुरीयडथ रामन नम्बूतिरि से कर दिया जाता है. संभवतः तात्री उस नम्बूथिरि के मना  (आवास) से भाग निकलती है और छद्म रूप में वहीँ कहीं नगर वधु की तरह रहने लगती है.  उसके अनुपम सौन्दर्य की चर्चा चल पड़ती है और दूर दूर से लोग पहुँचने लगते हैं.  परन्तु तात्री केवल अभिजात्य वर्ग के लिए ही उपलब्ध थी क्योंकि उसके मन में तो कुछ  और ही था. तात्री के सौन्दर्य की खबर उसके पति रामन नम्बूतिरि को भी मिलती है (या  पहुंचाई जाती है) और वह भी एक दिन निकल पड़ता है, रात के अँधेरे में, उससे संसर्ग  सुख प्राप्त करने के लिए. तात्री के घर पहुँचने पर रामन नम्बूतिरि की समुचित आव भगत  होती है और उसे शयन कक्ष में पहुंचा दिया जाता है जहाँ उसकी प्रतीक्षा की जा रही  थी. वहां यथोचित सत्कार के बाद जब रामन विदा हो रहा होता है तभी वह तात्री को ठीक  से देख पाता है. उसे एकाएक एहसास होता है कि यह तो उसकी पत्नी सावित्री ही थी. बात  समझ में आने पर वह वहां से भाग निकलता है.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">दुसरे ही दिन रामन नम्बूतिरि नें समाज के करता  धर्ताओं के समक्ष अपनी व्यथा बताई और सावित्री (तात्री) के विरुद्ध  &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221; गठित किये जाने हेतु राजा से निवेदन किया गया. परन्तु तात्री ने  भी अपनी चाल चली उसने राजा से निवेदन किया कि न्याय एक पक्षीय न होकर यदि कोई पुरुष  भी अनैतिक आचरण का दोषी पाया जाता हो तो उसे भी सामान दंड दिया जाना होगा. राजा  बड़ा न्याय प्रिय था. उसने तात्री की बात मान ली और उसे प्रथम अभियुक्त बनाया गया .  हलाकि &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221; की प्रक्रिया स्त्रियों के विरूद्ध ही किये जाने की परंपरा  थी परन्तु राजाज्ञा का विरोध नम्बूतिरि वर्ग के द्वारा किया नहीं जा सका. पेरुवनम  नामके एक ग्राम (जो प्राचीनतम नम्बूतिरि बसाहटों में से एक है) के जातवेदन  नम्बूतिरि को इस &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221; रुपी न्यायाधिकरण  का प्रमुख  बनाया गया जिनके  तीन और विद्वान नम्बूतिरि सहयोगी थे जिन्होंने तात्री से गहन पूछ ताछ करना प्रारंभ  किया. इस बीच उसे विचाराधीन कैदी की तरह अलग कमरे (अचनपुरा/पचोलापुरा) में रख  पहरेदार नियुक्त कर दिए गए.<img class="aligncenter size-full wp-image-1602" title="Smarthavicharanam" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/08/smarthavicharanam.jpg?w=432&#038;h=362" alt="Smarthavicharanam" width="432" height="362" /><br />
</span>
</p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">विवेचना में तात्री नें अपने ऊपर लगाये गए सभी आरोप  स्वीकार कर लिए. इसके बाद प्रारंभ हुआ उसकी ओर से प्रत्यारोपों का दौर. समाज के एक  से एक प्रतिष्टित लोगों का मुखौटा उतारा जाने लगा. नाम बताना ही पर्याप्त न था.  प्रमाण भी देने थे. अब उन गणमान्य पुरुषों की बारी थी. प्रति दिन नामित व्यक्ति को  एक समूह में शामिल कर शिनाख्ती परेड जैसा कार्यक्रम होता जिसमे व्यक्ति विशेष की  पहचान की जाती. एक एक कर वे भी कठघरे में खड़े किये गए. प्रत्येक के शरीर के अंदरूनी  भागों में पाए जाने वाले चिन्ह आदि के बारे में तात्री द्वारा विवरण दिया जाता और  पुष्टि की जाती. जैसे जैसे नैतिकता के कर्णधारों की गिनती बढती गयी, पूरे इलाके में  तहलका मच गया. कुछ लोग तो मारे भय के घर बार छोड़ परदेस भाग खड़े हुए और कुछोने पूजा  पाठ आदि करवाई जिससे तात्री याद न रख सके. लगभग 7 माह की अवधी में कुल 64 लोगों पर  आरोप लगा. जिसमे 30 नम्बूतिरि, 10 अय्यर,13 अम्बलावासी और 11 नायर शामिल थे. इस  संख्या को देख राजा स्वयं चिंतित हो उठा. उसे इस बात का भी भय था कि ६५ वां वह  स्वयं न बने इसलिए एन केन प्रकारेण ६४ की संख्या पहुँचने पर आगे की कार्यवाही रोक  दी गयी और 13 जुलाई 1905 की रात तात्री तथा  64 अन्य अभियुक्तों पर दंड की घोषणा कर  दी गयी. तात्री को चालकुडी नदी के किनारे किसी घर में नजरबन्द रखा गया परन्तु कहते  हैं कि वह वहां से भाग निकली थी. उसका क्या हुआ इस बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी  उपलब्ध नहीं है.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह बात उल्लेखनीय है कि इस अभियोजन में सह आरोपियों  पर न्याय डगमगाता नहीं दिखा. विशेषकर जब स्वयं न्यायाधिकरण के प्रमुख के दो भाई भी सम्मिलित थे. साधारणतया ऐसे प्रकरणों में सह आरोपी &#8220;स्मार्तविचाराम&#8221;  रुपी न्यायाधिकरण के प्रमुख &#8220;स्मार्तन&#8221; को भी प्रलोभन आदि देकर बच निकलते रहे हैं.   इस घटना ने  नम्बूतिरियों की अस्मिता को झकझोर दिया और उस समाज को आत्मचिंतन के लिए मजबूर कर  दिया. नम्बूतिरि समाज के कुछ लोगों ने &#8220;योगक्षेमम&#8221; नामक एक सभा गठित की जिसके  माध्यम से उन्होंने समाज में &#8220;सम्बन्धम&#8221; जैसे प्रावधानों को उखाड़ फेंकने और  नम्बूतिरि युवाओं के विवाह आदि के नियमों में शिथिलता बरते जाने के लिए सामाजिक  सुधारों हेतु संकल्प लिया. भारत की आजादी के बाद तो पूरा बदलाव आ ही गया, क्योंकि  हिन्दुओं के उत्तराधिकार सम्बन्धी कानून सामान रूप से हिन्दुओं के सभी वर्गों पर  लागू हो गयी. मातृसत्तात्मक व्यवस्था भी इसके साथ ही समाप्त हो गयी.</span></p>
<p align="justify">
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><a href="http://maddy06.blogspot.com/2009/07/kuriyedathu-thathriyude-smartavicharam.html">प्रेरणा: उल्लतिल मन्मधन</a></span></p>
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			<media:title type="html">Subram</media:title>
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			<media:title type="html">Ola Kuda-Nonee</media:title>
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			<media:title type="html">Smarthavicharanam</media:title>
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		<title>बैलाडीला का लौह अयस्क</title>
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		<pubDate>Mon, 03 Aug 2009 00:30:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
				<category><![CDATA[Chattisgarh]]></category>
		<category><![CDATA[History]]></category>
		<category><![CDATA[Travel]]></category>

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		<description><![CDATA[अभी कुछ ही दिनों पूर्व ही एक अन्य ब्लॉग “आरंभ” से पता चला था कि 11वीं सदी में ही दक्षिण के  चोल वंशीय राजाओं ने बैलाडीला पहाड़ियों से लोहे का दोहन कर अस्त्र शस्त्र बनाने का  कारखाना खोल रखा था. इसका मतलब यही हुआ कि उस समय से ही बैलाडीला में लोहे की [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1565&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="justify"><span style="font-size:small;">अभी कुछ ही दिनों पूर्व ही एक अन्य ब्लॉग “</span><a href="http://aarambha.blogspot.com/2009/07/11.html" target="_blank"><span style="font-size:small;">आरंभ</span></a><span style="font-size:small;">” से पता चला था कि 11वीं सदी में ही दक्षिण के  चोल वंशीय राजाओं ने बैलाडीला पहाड़ियों से लोहे का दोहन कर अस्त्र शस्त्र बनाने का  कारखाना खोल रखा था. इसका मतलब यही हुआ कि उस समय से ही बैलाडीला में लोहे की  उपलब्धता के बारे में जानकारी हो चली थी. बस्तर के आदिवासी भी बैलाडीला में पाए जाने वाले पत्थरों से लोहा निकालने में सिद्धहस्त हैं. उनके सभी औजार स्थानीय अयस्क से ही निर्मित होते आ रहे हैं. यदि आप भोपाल में मानव संग्रहालय आते हैं तो उन आदिवासियों के द्वारा लोहा बनाये जाने की विधि और लोहे से निर्मित कलात्मक कृतियों से भी साक्षात्कार कर सकते हैं. परंतु  विशाल पैमाने पर वहाँ के लौह अयस्क  के उत्खनन एवं निर्यात की कुछ अलग ही कहानी है.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">बैलाडीला की पहाड़ियाँ, जहाँ प्रचुर मात्रा में  उच्चतम कोटि के लौह अयस्क भंडार हैं, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित है. इस  औद्योगिक क्षेत्र के दो प्रमुख नगर हैं. पहला किरन्दुल और दूसरा बचेली. रायपुर से  किरन्दुल की दूरी 424 किलोमीटर है जबकि बचेली 12 किलोमीटर पहले पड़ता है. आज से सौ  वर्ष पूर्व ही लिखा गया था कि बैलाडीला पहाड़ बैल के डील के आकार का होने के कारण इस  नाम से पुकारा जाता है. ऊँचाई में यह पहाड़ समुद्र की सतह से 4133 फीट ऊँचा है. इस  पहाड़ के ऊपर दो रेंज बराबर मिली हुई चली गयी हैं जिनके बीचों बीच सॉफ कुदरती मैदान  है. यहाँ से तीन बड़ी नदियाँ निकलती हैं जिनके किनारे किनारे बेंत का सघन जंगल लगा  हुआ है. इन झरनों का पानी इतना ठंडा रहता है कि ग्रीष्म काल के दुपहरी में भी इनमे  स्नान किया जावे तो दाँत किटकिटाने लगते हैं. यहीं पर बस्तर रियासत के समय के कुछ  निर्माण आदि थे. यह जगह उनकी ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी. </span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">19वीं सदी के अंत में श्री पी एन. बोस, जो एक ख्याति  प्राप्त भूगर्भशास्त्री थे, खनिजों की अपनी खोज में बैलाडीला पहुँच गये थे और  उन्हें वहाँ मिला उच्च कोटि का लौह अयस्क. तदुपरांत भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण  (जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के श्री क्रूकशॅंक (crookshank) ने 1934-35 में पूरे  इलाक़े का सर्वेक्षण कर भूगर्भीय मान चित्र बनाया और 14 ऐसे पहाड़ी क्षेत्रों  (भंडारों-डेपॉज़िट्स) को जहाँ बड़ी मात्रा में लौह अयस्क उपलब्ध थे, क्रमवार  चिन्हित किया.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">भारत के लौह अयस्क पर अध्ययनरत टोक्यो विश्व  विद्यालय के प्रोफेसर एउमेऊरा (Eumeura) ने जापान के इस्पात उत्पादन करने वाले  मिलों के संघटन को बैलाडीला मे उच्च कोटि के लौह अयस्क की उपलब्धता के बारे में  अवगत कराया. उन दिनों जापान के इस्पात मिल उच्च कोटि के लौह अयस्क के निरंतर  आपूर्ति के लिए प्रयासरत थे. यह तो उनके लिए खुश खबरी थी. सन 1957 में उनका एक  प्रतिनिधि मंडल श्री असादा के नेतृत्व में भारत पहुँचा और विभिन्न लौह अयस्क  क्षेत्रों का भ्रमण किया. उनके इस अध्ययन और पूर्ण संतुष्टि ने ही भविष्य में भारत  और जापान के बीच होने वाले समझौते की बुनियाद रखी थी. मार्च 1960 में भारत सरकार  एवं जापानी इस्पात मिलों के संघठन के मध्य अनुबंध के तहत बैलाडीला से 40 लाख टन एवं  किरिबुरू (उड़ीसा) से 20 लाख टन कच्चे लोहे का निर्यात जापान को किया जाना तय  हुआ.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"><img class="aligncenter size-full wp-image-1577" title="Bailadila" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/bailadila.jpg?w=400&#038;h=268" alt="Bailadila" width="400" height="268" /></span></p>
<p align="justify"><img class="aligncenter size-full wp-image-1578" title="bailadila (1)" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/bailadila-1.jpg?w=436&#038;h=293" alt="bailadila (1)" width="436" height="293" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">इसके लिए आवश्यक था कि बैलाडीला के चयनित और भंडार  क्रमांक 14 के रूप में चिन्हित क्षेत्र में आवश्यक विकास तथा संयंत्रों की स्थापना  की जावे. इन बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए जापान की सरकार ने आवश्यक भारी  उपकरण, तकनीकी सहायता तथा धन राशि उपलब्ध कराई जिसका समायोजन निर्यात किए जाने वाले  लौह अयस्क के विरुद्ध होना था. योजना का क्रियान्वयन राष्ट्रीय खनिज विकास निगम  (NMDC) के द्वारा किया गया. उन दिनों अख़बार में खबर थी कि लौह अयस्क के निर्यात  किए जाने के लिए पूरा खर्च जापान वहन कर रही है और वह 20 वर्षों तक वहाँ के अयस्क  का दोहन करेगी. जून 1963 में वहाँ कार्य प्रारंभ किया गया और 7 अप्रेल 1968 को सभी  प्रकार से पूर्ण हुआ. लौह अयस्क का निर्यात इसके पूर्व से ही प्रारंभ हो गया था.  आजकल तो तीन भंडारों (डेपॉज़िट) से अयस्क का दोहन हो रहा है. डेपॉज़िट क्रमांक 5  में जनवरी 1977 से और डेपॉज़िट क्रमांक 11सी में जून 1987 से.<img class="aligncenter size-full wp-image-1575" title="loading" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/loading.jpg?w=450&#038;h=337" alt="loading" width="450" height="337" /></span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यहाँ पाए जाने वाला लौह अयस्क “फ्लोट ओर” कहलाता है.  अर्थात जो सतह पर ही मिलता हो और जिसके उत्खनन के लिए ज़मीन के अंदर नहीं जाना  पड़ता. उत्खनन की पूरी व्यवस्था तो हो गयी. अब बात आती है उसके निर्यात की. चूँकि  जापान के साथ अनुबंध हुआ था तो समुद्री मार्ग से ही अयस्क जाएगा. बैलाडीला के लिए  निकटतम बंदरगाह विशाखापट्नम था. सड़क मार्ग से अयस्क की ढुलाई लगभग असंभव बात थी.  इसलिए बैलाडीला के तलहटी से विशाखापट्नम को जोड़ने के लिए 448 किलोमीटर लंबे  रेलमार्ग के निर्माण का भी प्रावधान परियोजना में शामिल था. यही सबसे बड़ी चुनौती  भी रही. भारत के सबसे पुरानी पूर्वी घाट पर्वत शृंखला को भेदते हुए लाइन बिछानी थी.  भेदना (बोग्दे बनाना) भी उतना आसान नहीं था<img class="aligncenter size-full wp-image-1572" title="railway_tunnel_araku_vally by Debabrata" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/railway_tunnel_araku_vally-by-debabrata.jpg?w=450&#038;h=305" alt="railway_tunnel_araku_vally by Debabrata" width="450" height="305" /> क्योंकि पूर्वी घाट पर्वत शृंखला की  चट्टाने क्वॉर्ट्साइट श्रेणी की थी और वर्षों के मौसमी मार से जर्जर हो चली थीं.  ऊँचाई भी 3270 फीट, कदाचित् विश्व में इतने अधिक ऊँचाई पर ब्रॉड गेज की रेल लाइन की  परिकल्पना अपने आप में अनोखी थी. इसके लिए एक अलग परियोजना अस्तित्व में आई. नाम था  DBK रेलवे प्रोजेक्ट (दंडकारण्य बोलंगीर किरिबुरू रेलवे प्रॉजेक्ट). जापान के साथ  करार के तहत 20 लाख टन लौह अयस्क किरिबुरू (उड़ीसा) से भी निर्यात किया जाना था  इसके लिए तीन नये रेल लाइनों की आवश्यकता थी परंतु जहाँ तक बैलाडीला का सवाल है,  इसके लिए विशाखापट्नम से 27 किलोमीटर उत्तर में कोत्तवलसा से किरन्दुल तक 448  किलोमीटर लंबी लाइन बिछानी थी. परंतु जैसा हमने पूर्व में ही कहा है यह कोई बिछौना  नही था बल्कि यह कहें कि लाइन को लटकानी थी. हमें गर्व होना चाहिए की हमारे  इंजीनियरों ने असंभव को संभव बनाया  वह भी इतने कम समय में. 87 बड़े बड़े पुल जो  अधिकतर 8 डिग्री<img class="aligncenter size-full wp-image-1574" title="irfa.org" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/irfa-org.jpg?w=450&#038;h=279" alt="irfa.org" width="450" height="279" /></span></p>
<p align="justify">की मोड़ लिए और कुछ तो 150 फीट ऊंचे खम्बों पर बने, 1236 छोटे  पुलिए, 14 किलोमीटर से भी लम्बी सुरंगें (कुल लम्बाई). सबसे बड़ी कठिनाई थी कार्य  स्थल पर भारी उपकरणों को पहुँचाना. यहाँ तक  लोहे और सीमेंट को भी ले जाना भी  दुष्कर ही था. कार्य प्रारंभ हुआ था 1962 में और 1966 में यह रेलवे लाइन तैयार हो  गयी. लौह अयस्क की ढुलाई 1967 में प्रारंभ हुई. इस पूरे परिश्रम की लागत थी मात्र  55 करोड़ और आज होता तो 5500 करोड़ लगते क्योंकि तीन चौथाई तो लोग खा पी जाते. इस  रेलमार्ग के सफल निर्माण से ही प्रेरित होकर भारत के पश्चिमी तट पर कोंकण रेलमार्ग  बनाये जाने की बात सोची गयी थी.<img class="aligncenter size-full wp-image-1596" title="Map" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/08/map.jpg?w=450&#038;h=301" alt="Map" width="450" height="301" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">विशाखापट्नम से बैलाडीला (किरंदुल) रेल मार्ग को  KK  (कोत्तवलसा &#8211; किरंदुल) लाइन कहा गया था. आजकल विशाखापट्नम से एक्सप्रेस रेलगाडी  चलती है. सितम्बर 1980 से यह रेल मार्ग विद्युतिकृत है, जब की भारत के महत्वपूर्ण  लाईने भी विद्युतिकृत नहीं हुई थीं. ऊंचे पहाडियों पर से गुजरने के कारण भू  परिदृश्य अद्वितीय है. इतनी सुन्दर वादियों में यात्रा किसी<img class="aligncenter size-full wp-image-1579" title="Araku" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/araku.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Araku" width="450" height="337" /></span></p>
<p align="justify"><img class="aligncenter size-full wp-image-1580" title="araku-valley-" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/araku-valley.jpg?w=450&#038;h=337" alt="araku-valley-" width="450" height="337" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;"> अन्य ट्रेन की हो ही  नहीं सकती. यह गाडी अरकू घाटी (फूलों की घाटी) से जब गुजरता है तो सांस थम सी जाती  है. यहीं &#8220;<strong>बोर्र गुहालू</strong>&#8221; नाम की विख्यात गुफा भी है जिसके अन्दर बिजली से प्रकाश की  व्यवस्था की गयी है. इसी नाम का स्टेशन भी है. इस रेल लाइन से जुड़ा हमारा एक  रोमांचक अनुभव भी रहा है. विदित हो कि विशाखापट्नम में जापान के जहाज लंगर डाले खड़े  रहते थे. किरंदुल से लौह अयस्क रेलगाडी में पहुँचता और सीधे जहाज के गोदी में  डिब्बे उलट दिए जाते. ऐसी व्यवस्था वहां की गयी थी. एक जहाज में आठ रेलगाडियों का  माल समाता था. इसलिए एक बार पूरे आठ रेलगाडियों को एक साथ जोड़कर लौह अयस्क ले जाया  गया. मीलों लम्बी उस गाडी को देखने जनता उमड़ पड़ी थी. दुर्भाग्यवश यह प्रयोग सफल न  हो सका. गाडी के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए थे.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">बात हमने बैलाडीला के लौह अयस्क से प्रारंभ की थी.  अब जबकि जापान के साथ किया गया अनुबंध कालातीत हो चला है, अयस्क के खपत के लिए  विशाखापट्नम में एक इस्पात संयंत्र के स्थापित किये जाने का औचित्य समझ में आ रहा  है. इस पर भी उँगलियाँ उठी थीं कि बस्तर के विकास के लिए विशाखापट्नम के बदले बस्तर  में ही इस्पात कारखाने क्यों स्थापित नहीं किये गए. यह सोच अपनी जगह सही है परन्तु  उस रेलमार्ग की फिर कोई उपयोगिता नहीं रह जाती. अब क्योंकि बैलाडीला क्षेत्र के लौह  भंडार का पूरा उपयोग अकेले एक संयंत्र के बूते के बाहर है, इसलिए बस्तर के विकास को  ध्यान में रखते हुए NMDC, 14000 करोड़ रुपयों के निवेश से जगदलपुर के समीप नगरनार  में एक एकीकृत इस्पात संयत्र की स्थापना कर रही है. इसकी आधारशिला रखी जा चुकी है  और आवश्यक भूमि का भी अधिग्रहण हो गया है. कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी  इस्पात संयत्रों के लिए अनुज्ञा दी जा चुकी है. टाटा समूह के द्वारा चित्रकोट के  निकट लोहंडीगुडा में तथा एस्सार समूह को बचेली में. सबसे बड़ी समस्या वहां के माओ  वादियों/नक्सलियों द्वारा किया जाने वाला विरोध है. इस कारण सभी योजनायें अधर में  हैं. हाँ इस बीच एस्सार वाले बैलाडीला से लौह अयस्क को चूर्ण रूप में (पानी के  साथ) पाइप लाइन के माध्यम से विशाखापट्नम पहुँचाने मे सफल रहे हैं.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">न जाने कब जाकर इस नक्सल समस्या का समाधान हो  पायेगा. इन आयातित परभक्षियों के कारण बस्तर का विकास अवरुद्ध हो चला  है.</span></p>
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		<title>सर्पों की एक और क्रीडा स्थली</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Jul 2009 00:30:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पा.ना. सुब्रमणियन</dc:creator>
				<category><![CDATA[Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Environment]]></category>
		<category><![CDATA[History]]></category>
		<category><![CDATA[Iconography]]></category>
		<category><![CDATA[Kerala]]></category>
		<category><![CDATA[Mythology]]></category>
		<category><![CDATA[Travel]]></category>

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		<description><![CDATA[पाम्बू मेकाट्टू मना :



पिछले पोस्ट में हमने मन्नारशाला के बारे में जाना था. केरल में  सर्पों के लिए प्रख्यात एक दूसरी जगह भी है, “पाम्बू मेकाट्टू मना”. यह थ्रिस्सूर से दक्षिण में लगभग २५ किलोमीटर की दूरी पर माला नामके क़स्बे में है. &#8220;मना&#8221; वास्तव में कोई मंदिर नहीं है परन्तु नाम्बूदिरियों का पारंपरिक आवास है. इन्हें इल्लम भी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=mallar.wordpress.com&blog=4413245&post=1548&subd=mallar&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p align="justify"><span style="font-size:small;"><span style="font-size:medium;"><strong>पाम्बू मेकाट्टू मना :<br />
</strong></span></span></p>
<p><img style="display:block;margin-left:auto;margin-right:auto;border:0 initial initial;" title="Mekattumana" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/mekattumana.jpg?w=387&#038;h=159" alt="Mekattumana" width="387" height="159" />
</p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">पिछले पोस्ट में हमने <a href="http://mallar.wordpress.com/2009/07/20/जहाँ-सर्प-स्वछन्द-घूमते-ह/">मन्नारशाला</a> के बारे में जाना था. केरल में  सर्पों के लिए प्रख्यात एक दूसरी जगह भी है, “पाम्बू मेकाट्टू मना”. यह <strong>थ्रिस्सूर</strong> से दक्षिण में लगभग २५ किलोमीटर की दूरी पर <strong>माला</strong> नामके क़स्बे में है. &#8220;मना&#8221; वास्तव में कोई मंदिर नहीं है परन्तु नाम्बूदिरियों का पारंपरिक आवास है. इन्हें इल्लम भी कहा जाता है. साधारणतया नाम्बूदिरियों के आवास की बनावट एक विशेष प्रकार की होती है. उन्हें &#8220;नालू केट्टू&#8221; अर्थात चारों तरफ निर्माण और बीच में बड़ा सा दालान या आँगन. यहाँ इस पाम्बू मेकाट्टू मना में ऐसे दो निर्माण हैं इसलिए इसे &#8220;एट्टू केट्टू&#8221; कहा गया है. &#8220;एट्टू&#8221; आठ का पर्यायवाची शब्द है जब की &#8220;नालु&#8221; चार के लिए प्रयुक्त होता है. प्रवेश द्वार में विभिन्न सर्प आकृतियाँ उकेरी गयीं हैं.<img style="display:block;margin-left:auto;margin-right:auto;border:0 initial initial;" title="Mala Map" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/mala-map.jpg?w=358&#038;h=312" alt="Mala Map" width="358" height="312" /><br />
</span>
</p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह आवासीय परिसर ६ एकड़ के भूभाग पर फैला हुआ है और इस परिसर के अन्दर सर्पों के ५ &#8221;कावू&#8221; या चबूतरे हैं. बड़े बड़े वृक्षों, बेलों एवं अन्य जंगली वनस्पतियों से आच्छादित</span></p>
<p><img class="aligncenter size-full wp-image-1556" title="Kavu1" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/kavu1.jpg?w=450&#038;h=337" alt="Kavu1" width="450" height="337" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">. चमगादडों की भी भरमार है. जहाँ वास्तव में मंदिर का गर्भ गृह बताया जाता है वह परिसर के पूर्वी भाग में है. अन्दर दो कांसे से बने बड़े दीप अनवरत जलते रहते है. इन्हें &#8220;केडा विलक्कू&#8221; (अखंड ज्योति) कहा जाता है अर्थात कभी न बुझने वाला. ये जो दिए हैं वे वासुकी और नागयक्षी के प्रतीक स्वरुप हैं. वहां कोई प्रतिमा नहीं है. इस कक्ष में प्रवेश कुछ ख़ास दिनों में ही दिया जाता है. साधारणतया केवल उच्च वर्ण के लोग ही &#8220;कावू&#8221; के निकट जा सकते हैं. कुछ अवसरों पर सभी के लिए यह खुला रहता है. जैसे शबरी मला जाते हुए अय्यप्पा भक्तों के लिए नवम्बर के माह में परन्तु प्रवेश के पहले वहां के बावडी में स्नान कर गीले वस्त्रों को धारण कर ही जा सकते हैं.  यहाँ पर नैवेद्य के रूप में चांवल का आटा और दूध अथवा केले की एक स्थानीय प्रजाति &#8220;कदली&#8221; चढावे के रूप में भक्तों द्वारा दिया जाता है. &#8220;कदली&#8221; का अर्थ ही होता है केला परन्तु यह एक छोटे प्रकार का केला है जिसे हमने महाराष्ट्र में भी पाया है. नम्बूदिरी लोगों के पूजा विधान में मन्त्र की अपेक्षा तंत्र का प्रयोग अधिक होता है क्योंकि वे शक्ति साधना करते हैं अतः परिसर के अन्दर ही एक काली माता (भद्रकाली) का मंदिर भी है. वैसे साधारणतया हर &#8220;मना&#8221; में ऐसे मंदिर या तो परिसर के अन्दर ही होते हैं या फिर निकट ही. किसी नम्बूदिरी को पूजा संपन्न करते हुए देखना भी एक अलग अनुभव है. मंत्रों का उच्चारण कम परन्तु हस्त मुद्राओं से लगता है मानो कथकली कर रहे हों.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">अब इस स्थल से जुडी किंवदंतियों को देखें तो प्रमुखतया बताया जाता है कि किसी जमाने में यह &#8220;मना&#8221; आर्थिक रूप से विपन्न हो गया था. यहाँ के बुजुर्ग नम्बूदिरी से गरीबी बर्दाश्त नहीं हुई. उसने तिरुवंचिकुलम (कोडूनगल्लुर / Cranganore) के शिव मंदिर में (यह केरल के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक है) जो उनके &#8220;मना&#8221; से १५ किलोमीटर की दूरी पर ही था, तपस्यारत हो गया. १२ वर्षों के घोर तपस्या के बाद एक दिन जब वह नम्बूदिरी बावडी में जल लेने गया तो उसे दिव्यरुप में वासुकी</span></p>
<p><img style="float:left;border:0 initial initial;" title="Vasuki" src="http://mallar.files.wordpress.com/2009/07/vasuki.jpg?w=216&#038;h=300" alt="Vasuki" width="216" height="300" /></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">के दर्शन हुए. नम्बूदिरी के समर्पण से प्रसन्न होकर वरदान भी दे दिया. नम्बूदिरी ने वासुकी</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">से आग्रह किया कि वे उनके &#8220;मना&#8221; में हमेशा उपस्थित रहें. तथास्तु तो होना ही था. वासुकी ने कहा ठीक है तुम जावो और अपने &#8220;मना&#8221; में दो दीप सदैव जलाये रखो. मेरी संगिनी भी आएगी. नम्बूदिरी ने वैसा ही किया और तब से उस &#8220;मना&#8221; के भाग्य खुल गए और दीप भी जल रहे हैं. एक दूसरी किंवदंती के अनुसार नम्बूदिरी को वासुकी से एक अभूतपूर्व मणि की प्राप्ति होती है और जब तक वह मणि &#8220;मना&#8221; में रहेगी, वहां समृद्धि का वास होगा ऐसा वासुकी ने कहा था. खैर जो भी रहा हो.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">बचपन में हमने जिद की थी और अपने पिताश्री के साथ वहां गए भी. कहा जाता था कि वहां चारों तरफ सर्प घूमते रहते हैं. हम तो अपने ही घर में इन सर्पों को रोजाना देखने के आदी हो चले थे. यहाँ दो चार अधिक थे. वैसे वे होते तो हैं शर्मीले/डरपोक, वे अपने रस्ते चले जाते हैं. यहाँ की एक बड़ी विशिष्टता यह है कि यहाँ सर्पदंश से पीड़ित लोगों का उपचार भी किया जाता है. यहाँ के नम्बूदिरी विष शास्त्र के बड़े जानकार हैं और हमारे पारंपरिक चिकित्सा के द्वारा ही पीडितों की सहायता करते हैं. उस क्षेत्र के सभी लोग सर्प दंश से पीड़ित होने पर सर्वप्रथम यहीं आते हैं. कहा जाता है कि वहां के नम्बूदिरी वैद्य को पहले से आभास हो जाता है कि फ़लाने दिशा से कोई पीड़ित आज आएगा. अपने अधीनस्तों को वह आवश्यक सामग्री आदि जुटाकर तैयार रहने के निर्देश भी दे देता है. कभी कभी जब उसे मालूम हो जाता है कि जो  व्यक्ति  आने वाला है उसे बचाया नहीं जा सकता तो वह अपने कर्मियों को भिजवा कर रास्ते में ही सर्प दंश से पीड़ित व्यक्ति के बंधुओं को सूचित कर देता है कि यहाँ आने से कोई लाभ नहीं होगा. अन्तेय्ष्टि कर दें.</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:small;">यह सब तो सुनी सुनाई बातें हैं. आज के इस आधुनिक युग में जब हम हर चीज को विज्ञान के नजरिये से देखते हैं तो ऐसी बातें गले नहीं उतरतीं. संभवतः लोगों में आस्था जागृत करने और बनाये रखने के लिए किस्से कहानियां प्रचारित होती हैं. लेकिन एक बात अवश्य ही कहेंगे कि हमारी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली भी समृद्ध है. केरल में ऐसे कई जगह हैं जहाँ विष चिकित्सा में लोग पारंगत हैं. एंटी वेनम तो आधुनिक चिकित्सा के अर्न्तगत आता है परन्तु पहले हमारे ग्रामीण अंचलों में इन्हीं वैद्यों के उपचार से लोग ठीक हुआ करते थे. सर्प दंश के मामले में समय का बड़ा महत्त्व है. समय रहते चिकित्सा उपलब्ध हो जावे तभी पीड़ित व्यक्ति बच सकता है. यह बात तो आज के आधुनिक चिकित्सा प्रणाली पर भी लागू होती है.</span></p>
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