सर्वतोभद्र स्तम्भ – कालंजर

October 19, 2009 by पा.ना. सुब्रमणियन

श्री जी. एल. रायकवार एवम्  डा. एस. एन. यादव

यह पुरास्थल उत्तर प्रदेष के बांदा जनपद में 240 59’ 50’’ उत्तरी अक्षांष 800 29’ 15’’ पूर्वी देषान्तर पर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दक्षिण में बाघै नदी के किनारे एक समतल पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कालंजर दुर्ग की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 408 मीटर है, तथा दुर्ग का विस्तार लगभग 6-8 किलोमीटर परिधि में है। कालंजर दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चन्देलों के शासन काल में प्राप्त हुई। कालंजर का चन्देल इतिहास में महत्व इस कथन से सत्यापित होता है कि चन्देलों का सम्पूर्ण इतिहास कालंजर एवं थोड़ा सा कम अजयगढ़ दुर्ग के चारों ओर ही केन्द्रित रहा।

भारतीय कला परंपरा के बृहत परिप्रेक्ष्य में सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों का रूपांकन तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं और संस्कृति की एक धारा के रूप में दृष्टिगोचर है। भारतीय स्थापत्य कला शिल्पशास्त्रों से अनुशासित है तथापि मौलिक कल्पना से अधिकाधिक प्रयोगात्मक तथा ओजस्वी है। सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों में स्थापत्य कला, के अनुसरण के साथ-साथ अल्पतम अभिप्रायों के साथ पौराणिक कथाओं के रूपांकन में विविधताएं और विषिष्टताएं विषेष रूप से दर्शनीय होती है। इनमें प्रतिमा लक्षण के आवश्यक तत्वों का पालन कुछ अंशों में ही दिखाई पड़ता है तथापि कथा वस्तु का पूर्व ज्ञान होने से समस्त घटनायें तथा क्रम उद्घाटित होने लगती है। एक प्रकार से सर्वतोभद्र शिल्प में देषज कला (ब्वनदजतल ।तज) का प्रवाह प्रतिमा शास्त्रों के लक्षण और बंधनों से उन्मुक्त स्थिति में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण में केन्द्रित और गतिशील होती है। जिसमें शिल्पी की कल्पना अल्पतम अभिप्रायों के साथ कथा के प्रारंभ और समापन का सर्जन करती है। तालमान, और काल (क्रमबद्धता) से हटकर वण्र्य विषय के प्रस्तुतिकरण में सूक्ष्मता, भाव-भंगिमा की सार्थकता और शिल्पी की मौलिक कल्पना सर्वतोभद्र कृतियों को रोचक स्वरूप प्रदान करती है। इनमें वण्र्य विषय प्रधान होता है तथा अलंकरण पक्ष न्यूनतम रहता है। ब्राह्मण धर्म के अंतर्गत देवाचर्ना हेतु स्थापित सर्वतोभद्र में निम्न देव समुदाय-शिव, विष्णु, सूर्य, गणेष और महिषमर्दिनी में से कोई चार, चारों दिषाओं में रूपायित होते हैं। अनुष्ठानात्मक सर्वतोभद्र में मन्दिर वास्तु की परिकल्पना पर आधारित अधिष्ठान, जंघा तथा शिखर का संयोजन निहितार्थ रहता है। इसके प्रत्येक खंड, भूमि अथवा विमान के परिचायक हैं। सबसे ऊपर के भाग पर आमलक तथा कलष निर्मित रहता है। जैन शिल्पकला में भी सर्वतोभद्र शिल्प मिलते हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं संपूर्ण वैशिष्ट्य और लांछन के साथ रूपायित रहती हैं।

मध्य भारत में परमार, कलचुरि और चन्देल कालीन सर्वतोभद्र शिल्प अधिकांषतः ज्ञात हैं। परवर्ती काल में लगभग 16 वीं-17वीं सदी ईसवी तक इनकी परंपरा दिखाई पड़ती है। सर्वतोभद्र का अभिप्राय चारों दिषाओं में दैवी सत्ता की व्यापकता और प्राणियों के लिए मंगल कामना निहित है। इसमें चारों ओर से देव प्रतिमाओं के सम्मुख दर्शन किये जा सकने के कारण परिक्रमा का पुण्यलाभ भी अप्रत्यक्षतः प्राप्त होता है। इनके निर्माण में किसी यशस्वी व्यक्ति की स्मृति अथवा मनोकामना की पूर्ति होने पर अनुष्ठानात्मक शिल्प रचना और देवार्पण की मनोभूमि भी है। शैव एवं वैष्णव प्रतीकों से संयोजित एक तल से लेकर सात तल तक के सर्वतोभद्र शिल्प मिलते है। यह अवश्य सत्य है कि पूजित सर्वतोभद्र शिल्प अत्यल्प है। छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वतोभद्र चतुष्टिका अकलतरा-कोटगढ़ के सन्निकट स्थित ग्राम महमदपुर में पाये गये है। यह भी उल्लेखनीय है कि शिव मंदिर गंडई (राजनांदगांव जिले) के अधिष्ठान में कृष्ण के कालिय दमन लीला का अंकन है जिसमें कृष्ण कालिय के ऊपर बैठे हैं। विवेच्य सर्वतोभद्र क्रमांक-1 के द्वितीय क्रम में प्रदर्षित दृष्य में अदृभुत समानता है। छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा जिले के महेशपुर के सन्निकट स्थित ग्राम लक्ष्मणगढ़ से प्राप्त पाषाण फलक ने कृष्ण को बाल लीलाओं से संबंधित दृष्य में कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म और पूतनावध का अंकन ज्ञात हुआ है जिसमें शिल्पियों की मौलिक कल्पना रूपायित है।

सर्वतोभद्र की परिकल्पना युक्त कालिंजर से प्राप्त शिल्पकृति विशेष महत्वपूर्ण है। हल्का पीलापन रंग के बलुए पाषाण से निर्मित इन शिल्पकृतियों में दशावतार एवं कृष्ण लीला से संबंधित कथायें प्रर्दशित है।

सर्वतोभद्र -क्रमांक –1

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शिल्पकृतियों की संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार प्रस्तुत है:

विवेच्य सर्वतोभद्र, विष्णु के दशावतार तथा कृष्ण लीला के अंकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें सबसे ऊपर की पंक्ति में गोलाकार और एक दूसरे से सटे हुये तीन शिवलिंग चारों ओर रूपायित हैं। इस प्रकार की संरचना को कुछ विद्वानों ने स्मार्तलिंग की संज्ञा प्रदाय की है। उनका ऐसा मानना है कि इसमें पाँच पिण्ड होते है और यह पाँच गोलाकार पिण्ड पंचदेवों, शिव, विष्णु, गणेष, सूर्य एवं शक्ति के प्रतीक हैं। लिंगरूप में शिव की उपासना सदैव से लोकप्रिय रहा है। शिव के निराकार स्वरूप की अभिव्यक्ति का माध्यम भी शिव लिंग है। पौराणिक कथानकों के परिप्रेक्ष्य में शिवलिंग ज्योति का प्रतीक है। यह अनादि, अनन्न और असीम है। शिवलिंग की उपासना से चारों पुरूषार्थों की प्राप्ति होती है। शिव और विष्णु दोनों ही परमतत्व है तथा दोनों की उपासना सदैव से जन-मानस में लोकप्रिय रही है। पुराणों में शिव और विष्णु के एकत्व सिद्ध करने के अनेक प्रसंग तथा कथाएं मिलती है। प्रतिमाशास्त्र में हरिहर की अवधारणा शिव और विष्णु के एकत्व को निरूपित करते है। ऐतिहासिक काल में शिव के साथ विष्णु की उपासना अधिकाधिक लोकप्रिय रही है। लिंग के माध्यम से शिव की सत्ता तथा महत्व को सदैव से स्वीकार किया जाता रहा है। अतः प्रथम क्रम में शिवलिंग रूपायित है। विष्णु के दशावतारों में से क्रमषः कूर्म, मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन और बलराम को रूपायित किया गया है परन्तु राम, परषुराम, बुद्ध तथा कल्कि इस शिल्प कृति में छोड़ दिये गये है। इनके स्थान पर कृष्ण की कुछ महत्वपूर्ण बाल लीलाओं को सम्मिलित किया गया है। इनमें असुरों के वध से संबंधित लीलाओं में सहज नाटकीयता और भाव भंगिमा दर्शनीय है। अपेक्षित कथासार को प्रर्दशित करने के लिये कथा के उपसंहार में नाटकीयता के तत्व अत्यधिक रोचक हैं। इन प्रतिमाओं में अलंकरण का अभाव है तथापि भाव-भंगिमा और प्रस्तुति में मौलिकता का संप्रेषण है। अभिनयात्मक अंकन से संपूर्ण कथा प्रवाह लीला के प्रारंभ और विस्तार को प्रकट करने में सक्षम है। दृष्य संयोजन में शिल्पी की कल्पना, शास्त्रों में वर्णित विवरणों का अनुसरण करती है और अल्पतम अभिप्रायों के साथ संपूर्ण कथा को अभिनयात्मक रूप में प्रर्दशित करती है। इस शिल्पकृति में शिल्पी की कल्पना साधना की अंतिम सीमा को स्पर्श करते दिखाई देती है। विशालकाय अंशतः खुले हुये किवाड़ के माध्यम से कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म तथा गोकुल गमन की पूरी कथा आंखों के सामने घट जाती है। यह अंकन भारतीय कला में कृष्ण जन्म से संबंधित चित्रणों में सबसे अनूठी कल्पना है। अमूर्त के माध्यम से संबंधित घटना क्रम को स्मृतिपटल में प्रकाशित करने के लिये इनके नीचे के खंड में पूतनावध रूपायित है। पूतनावध कृष्ण की प्रथम बाल लीला है। इस लीला के पूर्व मथुरा के बंदी गृह में उनका जन्म, विशाल आकार के बंद दरवाजे के माध्यम से इंगित है। इस रूपांकन में शिल्पी की मौलिक कल्पना और मेधा अपौरूषेय है। अन्यंत्र ऐसी मौलिक कल्पना अज्ञात है। विवेच्य शिल्पकृति में विविध कल्पों में विष्णु के अवतार से प्रारंभ होकर द्वापर युग तक की वैष्णवी लीलाओं का रूपांकन शिल्पी का ध्येय रहा है। यह शिल्पकृति लगभग 12वीं-13वीं सदी ईस्वी में निर्मित ज्ञात होती है। कृष्ण की लीलाओं से संबंधित प्रस्तुतियाँ गूढ़तम अभिप्रायों के साथ बोध गम्य है।

सर्वतोभद्र क्रमांक –2

यह शिल्पकृति भी कांलजर से प्राप्त है। तथा हल्के पीलापन रंग के बलुआ पाषाण से निर्मित है। इसके ऊपरी भाग में गवाक्ष अलंकरण सहित आमलक कलष निर्मित है। इसमें भद्र जैसे तीन प्रकोष्ठ शेष हैं तथा नीचे का भाग अंषतः भग्न है। इसके सबसे ऊपर के खंड में तीन गोल शिवलिंग आपस में जुड़े हुये निर्मित है तथा इनके मध्य में चक्र के सदृष्य वलय निर्मित है। प्रतिमा शास्त्र की दृष्टि से इसका अभिज्ञान मार्तण्ड लिंग यथोचित है। बीच की गोलाकार वलय सूर्य का प्रतीक है। शिवपुराण में सूर्य को शिव से अभिन्न मानते हुये तादात्म्य स्थापित किया गया है आकाष लिंग के रूप में सूर्य की उपासना की जाती है। इस सर्वतोभद्र में अंकित दृष्य निम्नानुसार है:Falak2

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शिल्पकृति में अंकित दृष्यों का संक्षिप्त विवरण :

शिल्पकृति के प्रथम खंड में चारों ओर गोलाकार तीन शिवलिंग निर्मित है। इनके मध्य में वलयाकार चक्र निर्मित है। चक्र सूर्य का प्रतीक है। इस दृष्टि से यह शिव और सूर्य का संयुक्त रूप व्यक्त करना है। शिल्पकृति के प्रथम क्रम पर द्वितीय क्रम में शैय्या पर आसीन शिषु तथा माता, देवकी और कृष्ण के परिचायक हैं एवं इसके नीचे कारागार से कृष्ण को गोकुल ले जाते हुये वसुदेव दृष्टिगोचर हैं । यह संपूर्ण दृष्य कृष्ण जन्म से संबंधित है। द्वितीय क्रम में दूसरे खण्ड में असुर चाणूर को पटक कर हल से प्राणांत करते बलराम एवं नीचे के खण्ड में कंस के कुवलय पीड़ नामक दुर्दान्तः गजराज के दांत को उखाड़कर उसे धराषायी करते हुये कृष्ण प्रदर्षित हैं। तृतीय क्रम के द्वितीय खंड में आसन पीठिका पर शिषु सहित माता एवं उसके नीचे के प्रकोष्ठ पर शिषु सहित दो मानव आकृतियां उत्खचित हैं। सीमित दृष्यांकन तथा अन्य विस्तार एवं लांछन के अभाव में इस शिल्पकृति का वास्तविक अभिज्ञान कठिन है, साथ ही साथ संषय युक्त है। महाभारत की कथा के आधार पर उल्लेखित दृष्य का समीकरण गंगापुत्र भीष्म के जन्म से किया जाना समुचित है। उपरोक्त आधार पर निम्न विवेचन प्रस्तुत है। गंगापुत्र भीष्म- भीष्म अपनी माता गंगा के सान्निध्य में रहकर शस्त्र विद्या सीखते रहे। किसी अवसर पर गंगा के तट पर शस्त्राभ्यास करते हुये बालक भीष्म का अदभुत शर-कौषल देख कर शान्तनु विस्मित हुये। उसी अवसर पर गंगा वहां प्रकट हुई और भीष्म का परिचय देकर उसे शांतनु को सौंप दिया।

शिल्पकृति में ऊपर के खंड में गंगा तथा बालक भीष्म का अंकन है। नीचे के दृष्य में मध्य में सरिता प्रवाहित है। सरिता के दांये तट में स्थित गंगा अपने हाथ में शिषु को लिये हुई सम्मुख उपस्थित मानव आकृति को सौंप रही है, और दूसरे ओर स्थित शांतनु गंगा से शिषु को प्राप्त कर अपने अंक में ले रहे है। यह पाषाणकृति अभिनयात्मक भंगिमाओं के कारण विषिष्ठ है। भारतीय कला परंपरा में पौराणिक कथाओं और चरित्रों पर मौलिक कल्पना पर आधारित अनेक षिल्प निर्मित हैं। यह षिल्पकृति महाभारत की कथा पर आधारित भीष्म के बाल्यकाल की कथानक को अल्पतम अभिप्राय के साथ प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।

विवेच्य सर्वतोभद्र प्रतिमाओं के अध्ययन से भारतीय कला परंपरा और पौराणिक ग्रंथों का अनन्योश्रित संबंध दृष्टिगोचर होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत एवं श्रीमदभाग्वत गीता के अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित दशावतार , कृष्ण लीला तथा विविध प्रसंगों की गूढ़ जानकारी शिल्पियों को रहती थी जिससे अल्पतम अभिप्रायों के साथ वांछित चरित्र को अधिकाधिक स्पष्ट करने और जन-सामान्य को परिचित कराने में वे सफल रहे। भारतीय कला में विष्णु एवं शिव के विभिन्न रूप सदैव से आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। महाकाव्यों पर आधारित चरित्र नायक यथा राम, कृष्ण आदि से संबंधित प्रतिमायें अत्यल्प हैं। स्थापत्य कला में शिल्पशास्त्रों पर आधारित प्रतिमायें निर्माण किये जाने की परंपरा रही हैं। लोक जीवन को अधिकाधिक स्पंदित करने वाली कलाकृतियाँ शिल्पियों के मौलिक चिन्तन और कल्पना से ज्ञानवर्धक और मनोरंजक तत्वों से परिपूर्ण है।

सर्वतोभद्र शिल्पकृतियाँ , शास्त्रीय मर्यादा और लौकिक परंपरा से प्रसूत भारतीय कला परंपरा के चिरंतन संवाहक के रूप में लोक जीवन में व्याप्त रही हैं। प्राचीन देवालयों में धर्मशास्त्र और शिल्प शास्त्र का अक्षरषः प्रभाव दिखाई देता है। धर्मशास्त्रों में मानव जीवन के लिये चारों पुरूषार्थों का विधान है। धर्म की सिद्धि के लिये देवालयों का निर्माण भी एक सोपान है। सर्वतोभद्र शिल्प का निर्माण एवं समर्पण की परंपरा से धर्म के साथ साथ कला का पोषण भी होता रहा है। लोक पंरपरा और जन-सामान्य की अभिरूचि, शिल्पी की साधना एवं मौलिक कल्पना से समृद्ध सर्वतोभद्र शिल्प परवर्ती काल में भी भारतीय कला को नवीन दिशा देती रही है।

सर्वतोभद्र शिल्प के सम्यक अध्ययन से पौराणिक कथाओं से संबंधित अनेक कथाएं प्रकाष में आयेंगी। सांस्कृतिक धरोहर और पुरावशेष के रूप में चिन्हित इन अवशेषों के संरक्षण के प्रयास में इनका विस्तृत अध्ययन कला के क्षेत्र में अपेक्षित योगदान होगा, क्योंकि हमारी विरासत बहुत मूल्यवान और महान है, उनकी हमें रक्षा करनी चाहिए।

सन्दर्भ-ग्रन्थ:

01. सुल्लेरे, सुशील कुमार; अजयगढ़ और कालंजर की देव प्रतिमाएं, रामानन्द विद्या भवन, कालकाजी 1987.

02. श्रीमद्भागवत गीता; सम्पादक गीता प्रेस गोरखपुर संवत् 2037.

03. पुराभारती, खण्ड 1 बी.आर. मणि एवं एस. सी. सरन, शारदा पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 2006

04. यादव, शम्भू नाथ, कालिंजर क्षेत्र का पुरातत्व, शोध प्रबन्ध अप्रकाषित लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-2007.

05. महाभारत, क्रिटिकल एडिषन, पूना-1942.

06. महाभारत, अनुवादक पण्डित रामनारायण दत्त शास्त्री पांडे, राम, गीताप्रेस, गोरखपुर संवत् 2025

07. गोपीनाथ राव, टी.ए. एलीमेन्ट्स आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, वाराणसी 1971

08. बनर्जी जे.एन., दि डेवेलपमेंट आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, कलकत्ता 1968

09. खजुराहों की देवप्रतिमायें, रामाश्रय अवस्थी आगरा 1967

10. छायाचित्र, सौजन्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, लखनऊ मण्डल, लखनऊ

 उपसंचालक संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन  सहायक पुरातत्वविद् भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रायपुर मण्डल, रायपुर (छत्तीसगढ़)

महाकवि कालिदास कृत रघुवंश के द्वितीय सर्ग पर केन्द्रित – दुर्लभ कलाकृति

October 12, 2009 by पा.ना. सुब्रमणियन

जी.एल.रायकवार

शंभुनाथ यादव

भारतीय स्थापत्य कला के वृहद परिदृश्य में प्रतिमाओं का विशेष महत्व है। प्राचीन प्रतिमाएं युग विशेष की कला-संस्कृति, चिंतन और पारंपरिक ज्ञान विज्ञान के प्रमाणिक स्त्रोत हैं। प्रतिमाओं के माध्यम से शिल्पियों ने वण्र्य विषय को अपनी मौलिक कल्पना से अधिकाधिक रोचक और मनोविनोदात्मक तत्वों के साथ रूपायित किया है जिससे पाषाणों में अभिनयात्मक गति संचरित होने से सहज ढंग से आत्मसात होने लगते हैं। शिल्प ग्रंथों के निर्देशों को स्वीकार करते हुये वण्र्य विषय में रस को उद्दीप्त करने में सहायक दृश्य अथवा अलंकरण की योजना में शिल्पियों की साधना और दक्षता शैव प्रतिमाओं में विशेष रूप से दिखाई पड़ती है। ऐसी प्रतिमायें अत्यल्प हैं और इन्ही कलाकृतियों में भारतीय कला की लोक-धारा प्रकट है। भारतीय स्थापत्य कला के अंतरंग में धर्म, दर्शन और आध्यात्मिक तत्व सन्निहित है। इसीलिये हमारे देश में कला की साधना और उपासना होती है। शिल्प शास्त्रों में विभिन्न देव प्रतिमाओं की रूपाकृति, आयुध, वाहन, तालमान आदि के निर्देश हैं जिसके अनुसार प्रतिमाओं के निर्माण की परंपरा रही है। इन्हीं के साथ-साथ लौकिक जीवन से संबंधित-नृत्य, संगीत, श्रृंगार, वन्य पशु-पक्षी, वनस्पति आदि अलंकरणात्मक प्रयोजनों से युक्त अभिप्रायों को सम्मिलित कर अधिकाधिक आकर्षण उत्पन्न किया गया हैं। भारतीय स्थापत्य कला के विश्व प्रसिद्ध स्मारक-सांची, अजंता, एलोरा, एलिफेंटा, कोणार्क, खजुराहो, देवगढ़, उदयगिरि, मामल्लपुरम, पुरी आदि, कलात्मकता, मौलिकता और भव्यता की दृष्टि से अपूर्व हैं।

भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है। पौराणिक संदर्भों के कलात्मक निरूपण के अतिरिक्त मानव जीवन के पुरूषार्थ की अभिपूर्ति का लक्ष्य स्थापत्य विधा में सन्निहित है। पौराणिक कथायें मानव जीवन के अंतस् को प्रकाशित करने के लिये मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की स्थापना भी करते हैं। नटराज, अर्धनारीश्वर, महिषासुर मर्दिनी, वामन, नृसिंह, उमा-महेश्वर, तीर्थकंर, बुद्ध आदि की प्रतिमाएं कला की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। इन देव प्रतिमाओं के साथ भावनात्मक आस्था और उपासना जुड़ी हुई हैं। दृष्य अथवा श्रव्य कला के साथ-साथ भावनात्मक संबंध और एकाग्रता से आंतरिक उर्जा उत्सर्जित होती है।

भारतीय मूर्ति शिल्प में रामायण और महाभारत के कुछ विशिष्ट प्रसंगों से संबंधित कलाकृतियां प्राप्त होती हैं। कथा नायकों के विभिन्न लीलाओं अथवा घटनाओं से संबंधित तथा लोक में व्यापक रूप से प्रचलित असीम शौर्य अथवा संवेदना से संबंधित प्रसंगों का शिल्पांकन देवालयों में प्राप्त होते हैं। इस प्रकार के शिल्पकृतियों में महाभारत से संबंधित कृष्ण की बाल लीलाओं का अंकन सर्वाधिक लोकप्रिय रहा है। कर्ण और अर्जुन की प्रतिमायें भी शिल्प कला में उपलब्ध होती है। रामायण से संबंधित शिल्पकृतियों में शूर्पणखा प्रसंग, पंचवटी में भिक्षुवेश में रावण का आगमन, मारीचवध, बालि-वध सेतु निर्माण आदि शिल्पियों के प्रिय विषय रहे हैं। शिल्पकृतियों से जन जीवन में प्रचलित धार्मिक आस्था और लोक रूचि के साथ-साथ शिल्पियों की दक्षता का ज्ञान होता है।

महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य संस्कृत वाङ्गमय का सुप्रसिद्ध ग्रंथ है। इस ग्रंथ का बीजांकुर राजा दिलीप की निःसंतान होने की व्यथा से प्रारंभ होता है। महाकाव्य के द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप के द्वारा नन्दिनी गौ की सेवा, नन्दिनी गौ के द्वारा राजा दिलीप की परीक्षा और पुत्रोत्पत्ति के वर प्राप्ति का वर्णन है। कथावस्तु की दृष्टि से यह सर्ग अत्यन्त मार्मिक तथा प्रभावोत्पादक है। कथा के अनुसार भू-मंडल का स्वामी होते हुये भी राजा दिलीप पुत्र विहीन होने के कारण संतप्त होकर राजकाज मंत्रियों को सौंपकर तपोवन में वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचकर उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। महर्षि वशिष्ठ ने तपोबल से इसका कारण जानकर राजा दिलीप को बताया कि कामधेनु की पुत्री नंदिनी गौ की आराधना करने से यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है। अपने गुरू की आज्ञा स्वीकार कर राजा दिलीप अपनी धर्मपत्नी सुदक्षिणा के साथ नंदिनी गौ की सेवा-आराधना में तत्पर हो गये। इस प्रकार इक्कीस दिन व्यतीत होने के पश्चात् एक दिन नंदिनी राजा दिलीप की परीक्षा लेने हेतु घने वन में चली गयी और वहां माया निर्मित सिंह से आक्रांत होकर प्राण रक्षा के लिए चिल्लाने लगी। वन की शोभा देखने में भाव विभोर राजा नंदिनी की आवाज सुनकर सिंह को मारने के लिये अपने तूणीर से बाण निकालने लगे परन्तु उनके हाथ बाण के पंखों से चिपक गये। असहाय राजा को मनुष्य वाणी से विस्मित करते हुये सिंह ने बताया कि वह इस वन की रक्षा में नियुक्त शिव का अनुचर है तथा इस वन में बलात् प्रवेश करने वाले प्राणी उसके आहार हैं। उसके द्वारा सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने के कारण गौ उसका भक्ष्य हैं और शिव की कृपा से वह अजेय है। उसका वध करने में कोई समर्थ नहीं है। फलस्वरूप शर संधान के लिये तत्पर हाथ स्वतः बाणों से चिपक गयें हैं। सिंह के वचन सुनकर राजा दिलीप ने नंदिनी की रक्षा करने के दृढ़ संकल्प को दुहराते हुये उसे (नंदिनी गौ) मुक्त करने की प्रार्थना करते हुये स्वयं को उसके (सिंह के) आहार के लिए समर्पित कर दिया। कुछ अंतराल से नंदिनी ने माया का निवारण कर दिया और राजा को इच्छित वर प्रदान किया। इस कथा में गौ सेवा, गुरू भक्ति और नैतिक मूल्यों का अत्यन्त सरस श्लोकों में वर्णन है।

रघुवंश महाकाव्य पर आधारित ‘सिंहाक्रमणम्’ का दृश्यांकन भारतीय कला में अत्यन्त दुर्लभ है तथा अन्यंत्र प्रकाशित होने की जानकारी नहीं है। अंकित दृश्य के आधार पर धनुर्धर (राजा दिलीप), गौ (नंदिनी) एवं सिंह की संयुक्त प्रदर्शन और भूमिका युक्त शिल्पकृति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियंत्रणाधीन कालंजर दुर्ग से ज्ञात हुई है एवं छायाचित्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण लखनऊ मंडल के सौजन्य से प्राप्त हुई है। प्राचीन काल में कालंजर उत्तर भारत का महत्वपूर्ण दुर्ग रहा है। इस दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चंदेल राजाओं के शासन काल में मिली। कालंजर शैव तीर्थ के रूप में भी विख्यात है।nilakanthatempleकालिंजर किले के अन्दर नीलकंठ मंदिर के भग्नावशेष

अंशतः खंडित यह शिल्पकृति लाल भूरा बलुआ प्रस्तर से निर्मित है। यह जैजाकभुक्ति के चन्देल शासकों के काल में निर्मित ज्ञात होती है। संभवतः इस शिल्पकृति के अधोभाग में कथा से संबंधित अन्य दृश्य रहे होंगे। इस शिल्पकृति में कथानक का चरमोत्कर्ष है। इस प्रसंग के मुख्य तीन पात्र-राजा दिलीप, नंदिनी एवं मायावी सिंह की भाव-भंगिमा और चेष्टाओं के माध्यम से शिल्पी ने अल्पतम अभिप्रायों से संपूर्ण कथा को साकार कर दिया है। निम्न श्लोकों में राजा दिलीप की मनः स्थिति का चित्रण है-

ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः।

जाताभिषंगो नृपतिर्निषंगादुद्धर्तुमैच्छत् प्रसमोद्घृतारिः।।

रघुवंश, सर्ग 2-30

अर्थ- (नंदिनी को पछाड़कर खाने के लिये उद्यत) सिंह को देखकर मृगेन्द की तरह धीर गंभीर चाल वाला, रक्षा करने में निपुण, शत्रुओं को बलपूर्वक दंड देने वाला (असहाय स्थिति में अपमानित) राजा दिलीप ने सिंह को मारने के लिए तूणीर से बाण निकालने के लिये इच्छा प्रकट की।

वामेतरस्तस्य करः प्रहत्र्तुर्नख प्रमाभूषित कंकपत्रे।

शक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे।।

रघुवंश, सर्ग 2-31

अर्थ- प्रहार करने के लिए उद्यत, नखों की कांति से प्रकाशित राजा दिलीप के दायें हाथ की अंगुलियां कंकपत्रो से सुशोभित तूणीर में स्थित बाणों के मूलप्रदेश में रखे हुये (बाण निकालने के उद्योग में) चित्रवत (जड़) स्थिर हो गया।

Kalidas

प्रस्तुत चित्र में प्रसंग के अनुकूल निम्न विशेषताएं दृष्टव्य हैं जिससे शिल्प में निम्नानुसार व्यंजनात्मक प्रभाव उत्पन्न हैं -

1. राजा दिलीप की आकृति वनवासी सदृश्य है। उनके अंगों में राजोचित अलंकरण नहीं है। अतः आश्रमवासी अभिपे्रत हैं।

2. नन्दिनी गौ के ऊपर प्रहाररत सिंह तथा भूमिष्ठ राजा दिलीप एक दूसरे के सम्मुख संभाषणरत रूपायित हैं। राजा दिलीप घुटने मोड़कर धनुष-बाण पकड़े बैठे हैं, जो उनके असहाय और अपमानित स्थिति का परिचायक है। अंततः वे सिंह का शरण ग्रहण करने के लिए विनयावनत है।

3. नंदिनी गौ का सिर अवनत है तथा नेत्र भयातुर हैं। 4. सिंह के वक्ष पर निष्प्रभावी बाण धंसा हुआ है जो लोक मान्यता आधारित है तथा सिंह के वध के लिये राजा दिलीप की चेष्टा का परिचायक है।

उपरोक्त विशेषताओं के परिदृश्य में विवेच्य कलाकृति अद्वितीय है महाकवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य के द्वितीय सर्ग पर आधारित यह कलाकृति भारतीय कला में अद्यतन ज्ञात प्रथम कृति है तथा इसका अभिज्ञान ‘‘सिंहाक्रमणम्’’ समाधान कारक है।

संदर्भ ग्रन्थ:

1. रघुवंश महाकाव्यम् – पंडित श्री हरगोविन्द शास्त्री चैखंबा संस्कृत पुस्तकालय बनारस। तृतीय संस्करण सन 1953

2. टी.ए.गोपीनाथ राव – इलीमेंटस आॅफ दि-हिन्दू आइक्नोग्राफी वाराणसी-1971

3. दि डेवलपमेंट आफ हिन्दू – जे.एन.बनर्जी कलकत्ता-1968 आइक्नोग्राफी

4. महाभारत – गीतापे्रस गोरखपुर

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