Archive for सितम्बर, 2008

ज़ीरो फिगर

सितम्बर 29, 2008

आज्ञ बालिका दिवस है, इस बात का बोध हमें एक हिन्दी ब्लॉग “उडन तश्तरी” को पढ़कर ही हुआ. उसमे जीरो साईज़  का उल्लेख देख हमें भी कुछ लिख डालने की सूझी आख़िर प्रेरणा जो मिली है. बात ज़्यादा पुरानी नहीं है. मेरी पत्नी बंबई (ना बाबा मुंबई – ठाकरे खा जाएगा) जाने की सोच रही थी, उसका मायका जो ठैरा. मुझे साथ देना ही पड़ेगा, जिसका मुझे लेश मात्र भी मलाल नहीं था, क्योंकि मेरे दो भाई वहीं रहते हैं. एक के दो बेटे और दूसरे के दो बेटियाँ हैं १२ और १४ वर्ष की. भतीजियों से मुझे बड़ा प्रेम है या यों कहें कि सभी सुंदर कन्याओं से है. सोच रहा था कि उनके लिए क्या ले जाऊं.

शॉपिंग कॉंप्लेक्स (मेरा लेख “सामाजिक उत्तरदायित्व” देखें) के कॉरिडर में हम अक्सर कन्याओं को जीन्स पहने विंडो शॉपिंग करते देखा करते. इस ट्रेंड के चलते हमने सोचा अपनी भतीजियों के लिए जीन्स ही ले चलें. उनका नाप तो मालूम था नहीं लेकिन उन्हें पहले से बताना भी नहीं चाहते थे. वे दोनो एकदम दुबली पतली पर उँचे कद की थी. पर उनका कमर ? ढूंडते रह जाओगे. कुछ दूकानों में गया पर मुझे उनके लायक कोई जीन्स दिखी ही नहीं. निराशा हुई पर क्या करता. एक दिन एक चश्मे की दूकान में बैठा हुआ था. सामने कॉरिडर से हमने दो कन्याओं को जीन्स पहने गुज़रते देखा. उनमे एक थी ऊँची, दुबली पतली सुंदर सी. कमरिया देखो तो मुट्ठी में समा जाए. हमें तो ऐसी ही किसी की तलाश थी. सोचा पूछ लूँ  “बेटे तुम्हें ऐसी जीन्स कहाँ से मिली या खरीदी”. पर झिझक गया. पूछें कैसे, बेचारी क्या सोचेगी. मैं उन्हें निहारता ही रह गया. एक और दिन पुनः इन दो लड़कियों से मुलाकात हो गयी. मैं उनके पीछे हो लिया और अपनी हथेली से उस लंबी लड़की के कमर का अंदाज़ा लगाता रहा. यह सिलसिला कुछ दिनों तक चला.

एक दिन हमने हिम्मत की. चश्मे की दूकान में ही बैठे थे. वह लड़की अपनी सहेली के साथ कॉरिडर में पुनः दिखी. हमने उसे रोक लिया. मैने उसका नाम पूछा और पता चला कि वह “प्रेरणा” है और पास के कॉलोनी में ही रहती है. ८ वीं में पढ़ती है. मैने उसे बता दिया कि मेरी एक भतीजी उसी के कद काठी की मुंबई में रहती है. मुझे उसके लिए जीन्स ले जाना है. मैने पूछा कि उसने कहाँ से खरीदी है. उसने हंसते हुए कहा “अंकल मेरे नाप की तो कहीं नहीं मिलती. कमर के साइज़ की देखूं तो लंबाई कम पड़ती है. लंबाई को देखूं तो कमर एकदम बड़ी रहती है. इसलिए सिलवाती हूँ.” अब मुझे पता चल गया था. मैने धन्यवाद दिया. हमारी दोस्ती हो चली थी. वह मुझे घर आने का निमंत्रण देकर आगे बढ़ जाती है. पर मैं उसके कमर की साइज़ नहीं पूछ सका. हारकर मैने अपने भतीजियों को फ़ोन किया और उनके जीन्स की लंबाई, कमर आदि का नाप मंगवा लिया. कपड़ा ख़रीदकर सिलवा भी लिया. मुंबई जाकर यह देख खुशी हुई कि मेरे द्वारा सिलवाए गये जीन्स एकदम ठीक ठाक रहे.

यहाँ अब  “प्रेरणा” नवयुवती हो चली है. बहुत ही सुंदर सा चेहरा, दुबली पतली पर उँची ज़ीरो फिगर लिए हुए. अब भी पहले की तरह शॉपिंग कॉंप्लेक्स में अपने सहेली के साथ आती जाती है.  शाम जब हम मित्रों के साथ बैठे होते हैं, उधर से गुज़रते हुए मुझे देख दोनों हाथ जोड़ कर, प्रसन्न मुद्रा में नमस्ते करना कभी नहीं भूलती. एक बार  घुटने तक की तंग जीन्स, बगुले जैसी टाँगें,  कटी बाहों वाली पीठ को प्रदर्शित करती टॉप आदि में उसे देख हमसे नहीं रहा गया. टोकने पर बड़े सहज रूप से हंसते हुए उसने कहा “अंकल ज़ीरो फिगर, – यही आजकल का फॅशन है”. मेरे मित्र मंडली के चेहरों पर कुटिल मुस्कुराहट थी. एक तो पूछ ही बैठा, यार चक्कर क्या है. रोज तुमको नमस्ते करती है. हमने कहा तुम नहीं समझोगे. यह अंदर की बात है.

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वसाई का किला

सितम्बर 22, 2008

 बसाई, बसीन या आजकल का वसाई , मुंबई से लगभग 50 कि.मी. उत्तर क़ी ओर अरब महासागर तट पर एक खूबसूरत गाँव है. वैसे तो मुंबई समुद्र तट पर बहुत सारे किले हैं पर यहाँ का किला अपने आप में महत्वपूर्ण है. एक लंबे समय से मै वहाँ जाने क़ी सोचा करता था पर विभिन्न कारणों से किसी का साथ नहीं मिल पाया. इस बार जब मै मुंबई गया तो ठान ही लिया कि भले अकेले जाना पड़े, मै तो जाऊँगा ही. 31 अगस्त को मुझे मौका मिल गया. एक मित्र को साथ लेकर हम दादर से वीरार जाने वाली ट्रेन मे चढ़ गये. वसाई रोड स्टेशन लगभग एक घंटे में आ गया. हम लोग वहीं उतर गये. बस स्टॅंड नज़दीक ही था. पता चला कि सीधे किले को जाने वाली बस के आने मे अभी देर है. एक दूसरी बस वसाई गाँव तक ही जा रही थी. लोगों ने कहा कि चढ़ जाओ, वहाँ से ऑटो कर लेना. हम निकल पड़े और थोड़ी ही देर में वसाई गाँव पहुँच गये. बस स्टॅंड मे उतर कर इधर उधर देखा. सड़क के उसपार के एक होटेल पर नज़र पड़ी. सोचा पहले पेट पूजा कर लेते हैं. खाना बढ़िया था और महँगा भी नहीं. बाहर निकल कर थोड़ी सी चहलकदमी क़ी. चारों तरफ हरियाली थी. गाँव सॉफ सुथरा और सुंदर आधुनिक मकानों से भरा था. मुझे लगा कि बसने के लिए इससे सुंदर जगह क्या होगी. ऑटो क़ी कमी नहीं थी. हमने एक को रोका और किले तक जाने के लिए 20 रुपये में उसे पटा लिया. उसने हमें गाँव के अंतिम छोर में उतार दिया और कहा कि किला बगल में ही है. हमने देखा सामने समुद्र क़ी खाड़ी थी और बहुत सारे नाओं का जमघट था. पलट कर बाईं तरफ देखा तो किले का बड़ा दरवाज़ा दिखाई दिया.

इस बीच एक नज़र, संक्षेप में ही सही, इस किले के इतिहास पर भी डाल लें.  बहुत पहले से ही वसाई पश्चिमी तट पर व्यापार का एक बड़ा केन्द्र रहा है. यहाँ का किला गुजरात के सुल्तान, बहादुर शाह के आधीन था. अपने व्यापार के सन्दर्भ में पुर्तगालियों क़ी नज़र गुजरात तट पर स्थित दिऊ द्वीप पर थी. अपनी नौसैनिक बेड़े के बूते वे तटीय क्षेत्रों में बार बार आक्रमण कर अपार क्षति पहुँचाया करते. आख़िरकार उन्होंने वसाई किले पर अपना अधिकार जमा ही लिया. गुजरात सुल्तान के साथ संपन्न, 23 दिसंबर 1534 के एक संधि के द्वारा मुंबई सहित पूरा तटीय क्षेत्र पुर्तगालियों के कब्ज़े में आ गया. फिर उन्हों ने नये सिरे से एक विशाल किला बनवाया. इतना बड़ा कि पूरी बस्ती परकोटे के अंदर ही समा गयी थी. सुरक्षा के लिए किले के चारों ओर 11 बुर्ज बने थे. यह किला अपने भव्य भवनों और कलात्मक चर्चों के लिए विख्यात था. वसाई, भारतीय उपमहाद्वीप में पुर्तगालियों के व्यापारिक गतिविधियों का मुख्यालय बन गया.

सन 1665 में पुर्तगाल की राजकुमारी की शादी इंग्लेंड के राजकुमार से हुई. दहेज में मुंबई का द्वीप समूह और आस पड़ोस के क्षेत्र अँग्रेज़ों को हस्तांतरित किए गये. वसाई का महत्व इस से जाता रहा. लगातार 200 वर्षों तक वसाई का किला पुर्तगाली अधिपत्य में रहा. सन 1739 में मराठा शासक बाजीराव पेशवा के छोटे भाई चीमाजी अप्पा ने वसाई को अपने कब्ज़े में ले लिया. भारी लूटपाट हुई थी. भवनों एवं चर्चों को अपार क्षति पहुँची. चर्च के घंटों को हाथियों पर लाद कर ले जाया गया और उन्हे मंदिरों में स्थापित कर दिया गया. सन 1801 में बाजीराव द्वितीय के निरंकुश शासन से तंग आकर यशवंत राव होलकर ने बग़ावत कर दी. बाजीराव (द्वितीय) परास्त हुआ और भाग कर उसने इसी वसाई के किले में शरण ली. इसके पश्चात कुछ समय के लिए वसाई का नाम बाजीपुर भी रहा है. सन 1802 में बाजीराव और अँग्रेज़ों के बीच एक संधि (बसीन संधि) हुई जिसके तहत बाजीराव को पुनः पेशवा की गद्दी में बिठाने का वचन अँग्रेज़ों ने दिया. अंततोगत्वा वसाई का किला ही नहीं, बल्कि पूरा क्षेत्र अँग्रेज़ों के प्रभुत्व में आ गया.  इस किले को अँग्रेज़ों के द्वारा बसीन पुकारा जाता रहा.

चलिए इतिहास को छोड़ वर्तमान की ओर बढ़ते हैं. बोट जेट्टी की ओर से हमे किले का द्वार दिखता है. जैसा हर किले मे होता है, यहाँ पर भी जीरणावस्था में कील लगे दरवाज़े थे जो खुले मिले. अंदर दाहिनी ओर बने दूसरे दरवाज़े से प्रवेश करने पर लगा कि हम जंगल में आ गये हैं.  वसाई गाव में तो हमे सैकड़ों नारियल के पेड़ दिखे थे. पर यहाँ उनको छोड़ कई अन्य प्रकार के पेड़ दिखे. खजूर के पेड़ों का तो जंगल ही था. लगता है यहाँ के वाशिंदे खजूर के प्रेमी रहे होंगे और जो बीज फेंक दिए गये, सभी अंकुरित हो गये. सामने झाड़ियों के बीच से एक चौड़ी पगडंडी थी.  हम आगे बढ़ते गये. एक के बाद एक भवनों के खंडहर अगल बगल दिखते रहे. चर्चों के भी खंडहर मिले. कुछ का अग्र भाग बहुत ही सुंदर था. कुछ की हालत ठीक ठाक थी, जहाँ तराशे गये पत्थरों का प्रयोग किया गया था.  कुछ चलने के बाद हमे एक छत वाली चर्च भी दिखी. कोई शक नहीं, वे बड़े कलात्मक रहे होंगे. हमे बताया गया था कि बुज़ों पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ बनी है पर झाड़ झनकाड को देख हिम्मत नहीं हुई. कुछ बड़ी बड़ी इमारतों के पास भी नहीं जा सके. लगा कि हमने ग़लत समय चुना. संभवतः अगस्त का महीना अनुकूल नहीं है. चलते चलते एक दूसरे   दरवाज़े से हम लोग बाहर ही पहुँच गये.

हमे यह समझ नहीं आया कि आरकेलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, जिसके आधीन यह किला है, कर क्या रहा है. कोई देख रेख नहीं और कोई रख रखाव नहीं. यही कारण रहा होगा कि रविवार होने के बावज़ूद हमे कोई पर्यटक नहीं दिखा.

स्थानीय जन जीवन और लोगों क़ी संस्कृति पर 200 वर्षों के पुर्तगाली शासन का प्रभाव देखने के लिए किले के आस पास एवं निकट के वसाई गाँव का भ्रमण आवश्यक लगा पर समयाभाव के कारण लाचार था. घूमने के लिए भी पास ही कई स्थल, जैसे सामुद्री तट (बीच), जलप्रपात आदि हैं.

छाया चित्र: श्री हिमांशु सरपोत्दार
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