Archive for अक्टूबर, 2008

प्राचीन मूर्तियों की तस्करी

अक्टूबर 28, 2008
PV Gouri

Photo: PV Gouri

शास्त्री जी ने “सारथी” में लुप्त होते प्राचीन सिक्कों के बारे में अभी हाल ही में अपनी चिंता जताई थी. मैने भी अपनी टिप्पणी में कहा था कि प्राचीन सिक्के हमारे इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत हैं. कहना नहीं होगा कि इन्हे सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है. इसी प्रकार ना केवल सिक्के बल्कि हमारी पुरा संपदा हमसे संरक्षण की अपेक्षा रखती है. आए दिन हम अख़बारों में पढ़ते हैं कि फलाने जगह से मूर्ति चोरी हो गयी या फिर मूर्ति चोर धरे गये आदि.

मध्य प्रदेश का छतरपुर जिला अपने पुरा वैभव के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है. खजुराहो का नाम किसने नहीं सुना होगा. मऊसहानिया, जटकरा आदि के आस पास तो प्राचीन मूर्तियों का भंडार है. खेद का विषय है कि पिछले दो तीन माह के अंदर ही मूर्ति चोरी की लगभग आधा दर्जन मामले प्रकाश मे आए हैं. अनुमान है कि इस प्रकार की मूर्ति चोरी बड़े ही संघटित तरीके से की जाती है क्योंकि अंतराष्ट्रीय तस्करों से कुछ गिरोहों का समन्वय बना हुआ है. पर्यटकों के रूप में तस्कर खजुराहो आते हैं, नामी होटलों में रुकते हैं और अपने संपर्क सूत्रों के मध्यम से सौदा पटाते हैं. अक्सर ये सौदे लाखों, करोड़ों के होते हैं. मूर्तियों को बड़ी सफाई से पॅक कर नेपाल/बांग्लादेश के रास्ते भेज दिया जाता है.

प्रतिमाओं की तस्करी का यह मामला केवल छतरपुर जिले तक ही सीमित नही है. मध्य प्रदेश क्या देश के ही कई क्षेत्रों में पुरा संपदा बिखरी पड़ी है. राज्यों के पुरातत्व विभागों को अपने अपने क्षेत्र का गहन सर्वेक्षण करने के लिए कहा गया था ताकि संरक्षण करने योग्य स्मारकों/भग्नावशेषों को चिन्हित कर अग्रिम कार्रवाई की जा सके. जिन क्षेत्रों में कभी मंदिर, भवन आदि थे पर अब ज़मींदोज हो गयी है, वहाँ तो मूर्तियाँ उपेक्षित होंगे ही. योजना बद्ध तरीके से उन्हें इकट्‍ठा कर नज़दीक के संग्रहालय मे प्रदर्शित किया जा सकता है, बजाय इसके की उन्हे तस्करों के लिए छोड़ दिया जाता. शास्त्री जी की पूर्व अनुमति के बिना ही मै यहाँ एक चित्र दे रहा हूँ जिसे देख स्पष्ट हो जवेगा कि हालात कैसे हैं.

यह जान कर थोड़ी तसल्ली हो रही है कि छतरपुर की स्थानीय पुलिस तस्करों के गिरोह को जड़ से ख़त्म करने के लिए अभियान चलाए जाने की बात कर रही है. हमारी कामना है की वे अपने प्रयास में सफल रहें.

नोट: पाठकों से निवेदन है किसारथीमें प्रकाशित इन पूरक लेखों को भी पढें.
.  क्यों चोरी हो रही है प्राचीन संपदा?
. पाठकों से एक विशेष अनुरोध !

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राजू के चप्पल

अक्टूबर 21, 2008

अभी अभी की बात है. मैं मुंबई प्रवास पर था. चतुर्दशी का दिन था. आँटॉप हिल में कलपक एस्टेट.  नीचे बने क्रीड़ा कक्ष में गणपति बप्पा की पूरे विधि विधान से स्थापना की गयी थी. सांध्य पूजा अर्चना, भजन कीर्तन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात स्वरुचि भोज का आयोजन भी था. फ्लॅट क्र.१९/२४ में आए हुए दो अतिथि मूर्ति और राजू आरती में उपस्थिति जताने नीचे उतर कर आते है. मूर्ति नंगे पैर ही आ जाता है. (वैसे मद्रासी लोग नंगे पैर चलने के आदी होते हैं) राजू ने बाहर ही अपने चप्पल उतारे और दोनों हाल मे प्रवेश कर गये. आरती के पश्चात दोनों बाहर आते हैं. राजू अपने चप्पलों को ढूँढता है पर वे दिखते नहीं हैं. एक किनारे चप्पलों का जोड़ा देख राजू बड़ी बारीकी से उनका निरीक्षण करता है. पर वे एकदम नये थे. उसकी खुद की तो ५० रुपये वाली बरसाती थी. ज़रूर अदला बदली हो गयी होगी सोच कर उस जोड़े को दूसरी तरफ ले जाकर रख, उन्हें आरक्षित कर देता है. मूर्ति पूरे घटनाक्रम मे राजू के साथ ही था. उसने राजू से पूछा “अब तुम क्या करोगे, क्या इन चप्पलों को ले जाओगे”. राजू ने कहा “देखते हैं, यदि इनका मलिक नहीं आता तो समझो कि इन्हीं को पहनना पड़ेगा”. मूर्ति ने भी उस चप्पल को देखा और कहा “एक परेशानी होगी. मेरे चप्पल भी इससे मिलते हैं. हम दोनों क़ी चप्पल आपस में बदला करेगी”.

इतने में खाने का समय हो जाता है. खाना टेबुलों पर सज़ा है. पुरुषों और महिलाओं क़ी लंबी लाइन लग जाती है. मौका देख कर परेशान राजू एक एक कर हर व्यक्ति के पैरों का निरीक्षण करता है. संभव है किसी के पैरों में उसका चप्पल दिख जाए. राजू का छोटा भाई विस्सु पूछ बैठता है “भइया क्या बात है, लोगों के पैरों को क्यों देख रहे हो” उत्तर में राजू कहता है “क्या तूने सड़क के किनारे बैठे मोचियों को देखा है, उनकी नज़र कहाँ रहती है ? मै भी प्रॅक्टीस कर रहा हूँ”. विस्सु को अलग ले जाकर मूर्ति उसे मामले से अवगत करता है. राजू क़ी आँखें थक जाती हैं पर असली चप्पल किसी के पैरों में नहीं दिखती. शरलोक होम्स क़ी तर्ज पर राजू मूर्ति से कहता है  “जिसने भी मेरे चप्पल पहने हैं वह बड़ी जल्दी में रहा होगा. गणेशजी के दर्शन के बाद वह व्यक्ति कहीं बाहर चला गया”. फिर बड़ी मायूसी से कहता है, चलो खाना खा लेते हैं.  दोनो खाने क़ी लाइन में लग जाते है. आनमने  ढंग से राजू एक दो रोटी खा लेता है. उसके बाद एक बार फिर ढूँडने मे लग जाता है. कुछ देर में सब चले जाते हैं पर चप्पलों का एक जोड़ा बचा रहता है. वही जिसे राजू ने एक अलग कोने में रख दिया था. अब जब सब जा चुके थे, राजू नये चप्पल पाने क़ी खुशी में गद गदायमान था. बस उन्हे जल्दी जल्दी पहन लिया और जल्दी चलो कहते हुए मूर्ति को साथ लेकर वापस अपने अस्थाई घोंसले मे आ गया.

चप्पल को उतार कर दरवाज़े के किनारे रखते समय यह देख कर उसे आश्चर्य हुआ कि उसके खुद क़ी चप्पल तो वहीं रखी है. अब परेशानी बढ़ गयी. प्रश्न उठता है कि उसके द्वारा पहन कर लाए गये चप्पल किसके रहे होंगे. मूर्ति के मुहसे सहसा ठहाका फूट पड़ता है. अर्रे! यह तो मेरा ही है. मतलब सॉफ होता दिखा. मूर्ति तो नंगे पैर ही गया था लेकिन राजू ने मूर्ति क़ी चप्पल पहन ली थी. उसकी इक्षा तो हो रही थी कि  अपने सिर पर उन चप्पलो  को दे मारे पर खीज कर कहता है, मै थक गया हूँ अब मुझे सोने दो.