बरतिया भाटा

उन दिनों मुझे काफ़ी दौरे करने पड़ते थे . दौरे में, मै हमेशा अपने क्षेत्र क़ी, बड़े पैमाने वाली, “टोपो शीट” (सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित) साथ में ही रखता था. इन मान चित्रों में बड़ी सूक्ष्म जानकारियाँ होती हैं. पुराने खंडहर, मंदिर, बाँध, तालाब, नदी, नाले, पुल, टीले आदि. यह मेरे लिए बहुत उपयोगी साबित हुए थे. आजकल तो गूगल अर्थ भी यही सब जानकारी देता है पर उसमे जगहों का विवरण नहीं होता. ऊपर से उपग्रह द्वारा लिया गया एक छाया चित्र मात्र. “विकीमापिया” भी उसी पर आधारित है परंतु हम स्वयं स्थलों का नामकरण कर सकते हैं.

एक बार मुझे रायपुर से एक दूरस्थ ग्राम “गाताडीह” जाना था. रायपुर से संबलपुर जाने वाले राजमार्ग (ग्रेट ईस्टार्न रोड) पर 145 क़ि.मी. चलने के बाद सरायपाली नामक कस्बे से बाईं ओर एक सड़क जाती है. कभी यह मार्ग डामरीकृत था. परंतु शनै शनै रख रखाव के आभाव में जर्जर हो चला था. उस रास्ते पर लगभग 30 क़ि.मी. चलने के बाद शरीर क़ी हड्डियाँ चरमरा गयीं पर गाताडीह पहुँच गये. रास्ते भर गड्ढे ही गड्ढे थे. वाहन चालक के लिए गड्ढों से बचना असंभव था. सरायपाली से आने में 2 घंटे से ज़्यादा समय लग गया था.

ग्राम में स्थित कार्यालय का निरीक्षण कर आवश्यक निर्देश आदि दिए. मै यह सोच कर मन ही मन दुखी था क़ि अब वापसी में सरायपाली होकर ही जाना है. फिर मुझे अपने टोपोशीट की याद आई. मैने उसे बाहर निकाल कर फैला लिया. मुझे एक मार्ग दिख रहा था जो बिना सरायपाली गये रायपुर की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग से बसना नाम की बस्ती के पास मिलता था. इस रास्ते से कुल दूरी भी कम ही लग रही थी. स्थानीय लोगों से पूछ ताछ करने पर पता चला कि रास्ता कच्चा है. मैने सोचा गड्ढे वाली डामर सड़क से तो जान बचेगी. मैने चालक महोदय से पहली दाईं मोड़ पकड़ कर सीधे बसना चलने को कहा. क्योंकि हमारी गाड़ी “जीप” थी इसलिए मै आश्वस्त था.

लगभग आधी दूरी तय करने के बाद दाईं तरफ एक मैदान सा दिखा (छत्तिसगढ़ में बंजर ज़मीन को “भाटा” कहते हैं) जिसमे सैकड़ों ग्रेनाइट के पत्थर गडे हुए थे. मैने गाड़ी रुकवाई और पत्थरों के समूह के बीच पहुँच गया. स्पष्ट दिख रहा था कि उन पत्थरों को गाड़ा गया था. भू सतह की वह प्राकृतिक संरचना नहीं थी.  उन्हें सुदूर दिखनेवाले पहाड़ियों से लाया गया होगा. सभी पत्थर सतह से लगभग 4 फीट ऊपर एक ओर झुके हुए थे. ज़मीन के अंदर भी 2/3 फीट होने का अनुमान मैने लगाया. सहसा एक अजीब सी अनुभूति हुई. यह तो पाशाण कालीन श्मशान है जिसके बीच मै खड़ा था. मेरी स्टेफी (फॉक्स टेरियर ब्रीड की कुतिया) भौंकने लगी मानो कह रही हो, कहाँ आ गये हो चलो यहाँ से. 2 कि.मी. कि दूरी पर ही भंवरपुर नाम का एक बड़ा गाँव था और वहाँ से बसना क़ी दूरी 16 कि.मी. थी. इस तरह हमे मुख्य मार्ग तक पहुँचने के लिए 18 कि.मी. और चलने थे.

पास में ही किनारे एक भवन बना था. मालूम हुआ कि यह एक आदिवासी क्षात्रावास है. वहाँ एक सज्जन से मैने बात चीत की. ग्रामवासियों की धारणा है कि किसी जमाने में बारात में आए लोग अग्यात कारणों से मर कर पत्थरों में बदल गये. इसी कारण ग्रामवासी उस जगह को “बरतिया भाटा” के नाम से पुकारते हैं. प्रचलित किंवदंती क़ी वजह से ग्रामीण इन पत्थरों को कभी छेड़ते नहीं. यहाँ तक कि उखड़ चुके पत्थर अपने स्थान पर यथावत पड़े हुए हैं.

ऐसे पत्थरों को महाश्म कहते हैं और इस प्रकार के श्मशान दुर्ग और धमतरी के पास भी पाए गये है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि छात्रावास भवन की नीव की खुदाई करते समय इन महाश्मों के नीचे विभिन्न प्रकार की लोहे की सामग्री जैसे – भाला, बरछी, चाकू तथा तीर का अग्र भाग, आदि प्राप्त होने की सूचना है और इन्हे लगभग दो से तीन हज़ार वर्ष पुराना माना गया है. जिला पुरातत्व संघ की एक बैठक में मैने इनके संरक्षण की बात उठाई थी और उसके बाद एक पुरातत्ववेत्ता ने खोजबीन भी की थी. इस स्थल की विस्तृत खुदाई किए जाने की आवश्यकता है जिससे तत्कालीन जानजातीय संस्कृति का अध्ययन हो सके.

कैसे पहुँचें : रायपुर से संबलपुर जाने वाले मुख्य मार्ग पर 137 कि.मी. चलने पर बसना नाम क़ी बस्ती आएगी. वहाँ से बाईं ओर भंवरपुर जानेवाली सड़क है. भंवरपुर वहाँ से 16 कि.मी. क़ी दूरी पर है. बरतिया भाटा भंवरपुर से केवल 2 कि.मी. दूर है.

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8 Responses to “बरतिया भाटा”

  1. satish pancham Says:

    रोचक विवरण के साथ अच्छी जानकारी दी, अच्छा लगा।

  2. काली हवा Says:

    …और वे पत्थरों में तबदील हो गए! हमारे समाज में ये बहुत ही प्रचलित मिथक पैदा करने की परम्परा है. नहुत ही रोचक विवरण. धन्यवाद

  3. Brijmohanshrivastava Says:

    सर आप जिन दिनों टूर पर होते थे तभी डायरी में वाकया लिखते रहते थे या अब फुर्सत के क्षणों [ मुझे पता नहीं आप अभी भी व्यस्त हैं या फुर्सत में ] याद कर कर के लिखते रहते हैं =एक निवेदन करूं= जब हम पुराने पन्ने पलट कर बीती घटनाओं को याद कर अब लिखते हैं तो उसका आनंद ही कुछ और है =जब मैंने राग दरबारी पढा तब भी मैं यही सोचा करता था कि श्रीलाल शुक्ल जी ने जब वे कलेक्टर थे तभी से उपन्यास के लिए घटनाएं लिखना शुरू कर दिया होगा और चूंकि प्रशासन पर व्यंग्य था इसलिए रिटायर्मेंट के बाद प्रकाशित कराया होगा = आपकी रचनाओं से भी कुछ एसा ही आभास हो रहा है हालाँकि आपका पूरा ब्लॉग यानी जून ,जुलाई ,ऑगस्ट और सितम्बर की पूरी रचनाएं तो पढी भी नहीं है = पढूंगा जरूर =और आपकी रचनाओं पर कुछ लिखने की कोशिश करूंगा जरूर

  4. राज भातिया Says:

    वाह क्या बात हे वह सब पत्थरो मे बदल गये, सब सुनी सुनाई बाते करते हे, यह भी एक तरह से अंध विशवास ही तो हे, आप ने अपने लेख मे इस छोटी सी यात्रा को बहुत ही मधुर शव्दो मे बांध दिया, पढने मए मजा भी आया ओर रोमांच भी.
    धन्यवाद

  5. समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’ Says:

    रोचक विवरण…आभार जानकारी के लिए.

  6. मनीष Says:

    vaah bhai shukriya is gumnaam si jagah se humari jaan pehchaan karane ka

  7. विजय हिन्दुस्तानी Says:

    सर जी प्रणाम । आप कौन है मै नि जानता पर आपने जो जानकारी दि ओ सत्य है ऐसा सब कहते है… मै भंवरपुर का हुं 🙂

  8. विजय हिन्दुस्तानी Says:

    सब गुगल बाबा कि क्रिपा है कि मै खुद भंवरपुर निवासी अपने गांव के बारे मे पड़ रहा हु धन्यवाद जी

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