आजकल की माताएँ

alexandralee हमारे जमाने क़ी माओं और आज क़ी माओं में मैने बहुत बड़ा अंतर पाया है. पहले अपने यहाँ संयुक्त परिवारों क़ी व्यवस्था थी. एकल परिवार बिरले थे. संयुक्त परिवार में बच्चे एक उन्मुक्त वातावरण में पलते हैं. घर गृहस्थी के अतिरिक्त माओं पर बच्चों से संबंधित दायित्व उतना ज़्यादा नहीं था जितना आज है. परिवार में दायित्व बहुओं में बँटा रहता था. मैं स्कूल में क्या करता हूँ, क्या पढ़ता हूँ, होमवर्क क्या है आदि क़ी मेरी मां ने कभी सुध नहीं ली. ले भी कैसे, बच्चों क़ी तो लाइन लगी थी. किस बच्चे की सोचे. या ये कहें कि ज़रूरत ही नहीं थी. भगवान ने दिया है तो सब वही संभालेगा. परीक्षा में ९८% अंक प्राप्ति क़ी कल्पना किसी ने क़ी थी क्या? लेकिन आज का परिदृश्य?

मैं रोज देखता हूँ, हर रोज सुबह होते ही, बच्चों को तय्यार करा कर हाथ पकड़ कर ले जाते हुए. स्कूल बस में चढ़ाने. बस्ते का बोझ भी मां ही ढोती है. बच्चों क़ी वापसी के समय पुनः माताएँ सड़क के किनारे खड़ी इंतज़ार करती रहती हैं. बच्चों के आने पर बस्ते को स्वयं कंधे पर लटका कर, घर लाती हैं. बच्चा नाचता गाता इठलाता हुआ आगे आगे चलता है, मां पीछे पीछे. बच्चे के घर पहुँचते ही शुरू हो जाता है, कल के होम वर्क क़ी खोज खबर.

कल ही क़ी बात है. एक दूसरे शहर मे पदस्थ अपने भाई से बात क़ी. बहू के बारे में पूछा. पता चला कि वह अचानक बेटे से मिलने कोडैकनाल अकेले ही चली गयी है. बार बार के तबादलों और बच्चों कि पढ़ाई पर उसके दुष्प्रभाव को ध्यान मे रख कर इसी साल मेरे एक भतीजे को वहाँ क़ी बोर्डिंग स्कूल में भर्ती कराया गया था. वहाँ ठंड कुछ ज़्यादा ही पड रही है और गरम कपड़े उसके पास उतने नहीं थे जितने क़ी ज़रूरत है. अपने इस बेटे के लिए गरम कपड़े लेकर गयी है. वहाँ यह भी देखेगी क़ी उसकी पढ़ाई कैसे चल रही है. सभी कापियों क़ी जाँच भी करेगी. उसका बस चलता तो बेटे के साथ साथ खुद भी होस्टल में ही रहती. एक दूसरा बेटा पास ही दूसरे शहर में इंजनीरिंग के अंतिम पड़ाव में है. पिछले सेमिस्टेर में दो विषयों में कम नंबर मिले. इस बात का टेन्षन भी है. इसलिए उसके पास जाना भी ज़रूरी है.

मेरा एक दूसरा भाई (हम अनेक हैं) कनाडा में पदस्थ था, चार साल के लिए. दो बच्चियाँ है. बड़ी हुनरमंद. वहाँ क़ी पढ़ाई मस्ती भरी होती है. बहू ने भारतीय सीबीएससी क़ी किताबें मंगवाली. बच्चों को स्कूल से आने के बाद इन किताबों को पढ़ना पड़ता था. इस का फ़ायदा यह हुआ कि उनके वापस आने के बाद यहाँ पढ़ाई जारी रखने में कोई दिक्कत नहीं हुई. १० वीं में छोटी को ९४.५% अंक मिले. माता अप्रसन्न थी. उसने बेटी से पूछा – बचे हुए ५.५ किसे दे आई. बड़ी वाली इंजनीरिंग कर रही है और कॉलेज में हमेशा अव्वल.

हमारी एक तीसरी बहू ने भी  बच्चों की पढ़ाई के साथ किसी किस्म का समझौता नहीं किया. तंग हालातों में भी अपने पुत्रों की पढ़ाई को सर्वोपरि समझ, वही सब कुछ किया जो आजकल की माताएँ करती हैं. परिणाम स्वरूप बड़े लड़के ने आई.आई.टी. चेन्नई से टॉप कर कॅलिफॉर्निया से एम.एस. कर ली. अब भूगर्भ विज्ञान में वहीं से डॉक्टरेट कर रहा है, वह भी वज़ीफ़े पर. छोटे बेटे की अभी पढ़ाई जारी है.

तीनों ही घरों में केबल टीवी तथा इंटरनेट के कनेक्शन पढ़ाई के चरम में बंद कर दी जातीं ताकि बच्चों का ध्यान भंग ना हो. खुद भी साथ बैठतीं. कुल मिलाके पढ़ाई को प्रोत्साहित किया जाता और कभी कभी तो मजबूर भी किया जाता रहा. पढ़ाई का टेन्षन बच्चों से ज़्यादा माताओं पर था. एक बहू ने माइग्रेन को गले लगाया और दूसरी ने उच्च रक्तचाप.

लगता है कि विश्व में बौद्धिक संपदा पर भारतीय एकाधिकार का मार्ग प्रशस्त करने में हमारी माताओं की अहम भूमिका रहेगी.

 

चित्र by alexandralee                                                 मूलतःमाँमें प्रकाषित

2 Responses to “आजकल की माताएँ”

  1. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    हम आप से सहमत हैं। वे भविष्य का निर्माण कर रही हैं।

  2. नितिन Says:

    “विश्व में बौद्धिक संपदा पर भारतीय एकाधिकार का मार्ग प्रशस्त करने में हमारी माताओं की अहम भूमिका रहेगी.”

    इससे मैं पूर्णत: सहमत हूँ। आपके कई लेख पढे, अच्छ लगे

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