सर्पों का सानिध्य

बचपन से ही मुझे साँपों से बड़ा डर लगता था.  गाँव जाने पर तो मेरी हालत खराब हो जाती थी. हमारे घर से बाहर निकलते ही एक गली है. दोनों ओर लोगों ने बाड़ बना रखी है और बाड़ नाना प्रकार की वनस्पतियों से ढकी रहती है. अंधेरे में बाहर निकलने की बात तो मैं सोच भी  नहीं सकता था. मुझे यह देख बड़ा आश्चर्य होता था कि वहाँ के लोग बड़े आराम से आते जाते थे. अलबत्ता अंधेरे में टॉर्च के सहारे चलते समय पैर पटकते हुए या अन्य तरीके से आवाज़ करते हुए चलते. मैने ज़िद करी और काले वाले रबर के गम बूट्स खरीद लिए. शाम को बाहर जाते समय मैं फ़ुल पॅंट और गम बूट्स पहन, टॉर्च और डंडे से लैस होकर ही निकलता. गाँव वाले मुझे देख आपस में खुसुर पुसुर करते दिखते. उन दिनों वहाँ पॅंट पहनने का भी चलन नहीं था. सोचते रहे होंगे कि यह नमूना कहा से आया है. लेकिन अपने जूते आदि के कारण मैं अपने आप को सुरक्षित महसूस करता.

हमारा पुश्तैनी घर भी बाँस की कटीली टहनियों से बने बाड़ (फेन्सिंग) से घिरा है. डेढ़ एकड़ के बाग़ीचे के बीच खपरैल वाला दो मंज़िला मकान है. सामने  गाँव की गली की ओर से प्रवेश के लिए एक छोटा गेट है जो घर के आँगन से लगभग १५० फीट की दूरी पर है. वर्षों पूर्व मैने अपने पिता के ताऊ के घर से क्रोटन के कलम लाकर बाहर के गेट से आँगन तक दोनों ओर लगा दिए थे जो अब बढ़ कर सुंदर दिखने लगे थे. मैने एकबार इनकी छटाई कर दी थी जिससे सभी पौधों की उँचाई समान बन जाए. अपने काम से संतुष्ट होकर गेट से घर की ओर आते हुए पौधों के ऊपर हाथ से सहलाता आ रहा था. कुछ दूर यों ही हाथ फेरने के बाद मुझे ऐसा लगा मानो कोई रबर नुमा चीज़ हथेली में आ गयी हो. मैने ज़ोर से पकड़ लिया और मुड़कर देखा तो पाया कि हथेली में एक डेढ फीट लंबा हरे रंग का साँप लटक रहा है. उसका सर मेरे हथेली के अंदर और नॉकदार मुह बाहर था. अब क्योंकि साँप मेरे मुट्ठी में था मेरा डर जाता रहा. फिर भी मैं ज़ोर से चिल्लाया. मेरा छोटा भाई दौड़ कर आ गया और उसने भी नज़ारा देखा.  क्योंकि वह गाँव का ही पला बढ़ा था, वह डरा नहीं बल्कि कहा, भैया, रुक जाओ मैं अभी आया. थोड़ी ही देर में वह एक हारलिक्स की बोतल ले आया और हम दोनो ने मिलकर उस सुंदर साँप को बोतल में बंद कर दिया. ढक्कन में छोटे छोटे छेद भी बना दिए ताकि साँप को हवा मिले. बोतल को हम लोगों ने घर के अंदर रेडियो के ऊपर रख दिया जैसे कोई शो पीस . साँप के खाने के लिए छोटे छोटे मेंढक और मच्छर भी बोतल के अंदर डाल दिए.

दूसरे दिन सुबह ही हमने बोतल में बड़े कौतूहल से देखा कि सभी मेंढक फुदक रहे थे. साँप ने कुछ भी नहीं खाया था. तीसरे दिन जाकर पिताजी की नज़र बोतल पर पड़ी. उन्होने हमें डाँट पिलाई और तत्काल साँप को बाहर छोड़ आने का आदेश दिया. झाड़ियों में हमने उसे छोड़ भी दिया पर जीवित होते हुए भी चलने से इनकार कर रहा था. बड़े मुश्किल से और बड़ी देर के बाद वह झाड़ियों में चला गया. साधारणतया पेड़ पौधों पर पाया जाने वाला यह हरा साँप बड़ा फुर्तीला होता है और एक डॅगाल से दूसरे पर छलाँग लगा लेता है. ऐसा करते समय वह अपने आप को चपटा कर लेता है और वस्तुतः हवा में तैरता है. कुछ लोग इसीलिए इसे उड़ने वाला साँप भी कहते हैं.  बाद में पिताजी ने हमें बताया कि यह विषैला नहीं होता पर आँखों पर वार करता है या यों कहें कि चमकीले हिस्से पर प्रहार करता है. चोरों से संबंधित कुछ मिथक भी उन्होने बताए.

कुछ दिनों के अंदर ही घर के पीछे बने शौचालय के करीब नागराज से भी मुलाकात हो गयी. घरवालों ने मुझे बताया की वह अक्सर दिखता रहता है. साधारणतया साँप मनुष्य को देख डर के मारे भाग जाया करते हैं. परंतु मैने पाया क़ि हमारा नागराज भागने के मूड में नहीं था. मुझे देख फन फैलाकर अपनी जगह स्थिर हो गया. मेरे द्वारा डंडा पटकने पर सिर झुका कर आगे रेंगने लगा पर उसकी चाल में कोई हड़बड़ाहट नहीं थी. थोड़ी दूर जाकर फिर सिर उँचा कर पलट कर देखता मानो पूछ रहा हो, मारोगे क्या? मेरी उस प्राणी से आसक्ति हो गयी.!


मेरी छुट्टियाँ ख़त्म होने के पहले ही मुझे अपने घर के आस पास ही सभी जाने माने वाले सर्पों से सामना हो चला था (विस्तार से फिर कभी).  कहा जाता है क़ि जहाँ नेवला रहता है, साँप नहीं आते. यह सरासर झूट है. मेरे घर में ही एक भरा पूरा नेवले का परिवार भी रहता है जिसने बांसों क़ि झुरमुट में कहीं अपना बिल बना रखा है. अम्मा नेवला को अपने छोटे छोटे बच्चों को साथ लेकर घूमते हुए मैने कई बार देखा.

शांतिपूर्ण सह अस्तित्व का ऐसा अद्भुत परिदृश्य क्या अन्यत्र है?

 

10 Responses to “सर्पों का सानिध्य”

  1. paramjitbali Says:

    बढिया आलेख है\अच्छी जानकारी दी है।आभार।

  2. mamta Says:

    बहुत ही अच्छा लेख और लिखने का अंदाज ,आपका घर और हरा भरा बगीचा भी बहुत पसंद आया ।

    आपने सही कहा की ये झूठ है की जहाँ नेवला होता है वहां साँप नही होता क्यूंकि यहाँ हमारे घर मे भी नेवला है और साँप भी घूमते-फिरते नजर आते रहते है ।🙂
    पर फ़िर भी इन्हे देख कर हमें डर लगता ही है ।🙂

  3. comman man Says:

    mujhe to abhi bhi bahut dar lagta hai, aap hi ko mubarak

  4. Dr.Arvind Mishra Says:

    बहुत अच्छा भाई -मुझे ख़ुद अपना बचपन याद आ गया -मैंने भी बोतल में साँप कैद किए है और घर वालों ने उसे छोड़ा है !
    सावधान ! नागराज से दिल्लगी मत करना !

  5. राज भाटिया Says:

    अरे वाह ! बहुत अच्छा लिखा है आप ने पढने मे मजा भी आया ओर अपना बचपन भी याद आ गया, धन्यवाद

  6. मनीष Says:

    sarp katha pasand aayi aur wo chota hara sarp bhi

  7. Advocate Rashmi Saurana Says:

    बहुत सुन्दर लिखा है आपने. बधाई हो. आपके लिये मदन मोहन के गाने का लिन्क दे रही हु.
    http://thodasasukun.blogspot.com/2008/10/blog-post_19.html#links

  8. yoginder moudgil Says:

    बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति
    पढ़ कर आनन्द आ गया
    हां मुझे सांप महाराज से डर लगता है
    खैर

  9. Sanjay Uchcharia Says:

    I became your fan when i read your second post; i think we think alike. These kind of posts shows that you do love your childhood, your ancestral home and so on…
    😀

  10. Lovely Says:

    hun ..arvind ji ki salah maniye nagraj bahut aakramak hota hai ..bachiyega usse.

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