राजू के चप्पल

अभी अभी की बात है. मैं मुंबई प्रवास पर था. चतुर्दशी का दिन था. आँटॉप हिल में कलपक एस्टेट.  नीचे बने क्रीड़ा कक्ष में गणपति बप्पा की पूरे विधि विधान से स्थापना की गयी थी. सांध्य पूजा अर्चना, भजन कीर्तन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात स्वरुचि भोज का आयोजन भी था. फ्लॅट क्र.१९/२४ में आए हुए दो अतिथि मूर्ति और राजू आरती में उपस्थिति जताने नीचे उतर कर आते है. मूर्ति नंगे पैर ही आ जाता है. (वैसे मद्रासी लोग नंगे पैर चलने के आदी होते हैं) राजू ने बाहर ही अपने चप्पल उतारे और दोनों हाल मे प्रवेश कर गये. आरती के पश्चात दोनों बाहर आते हैं. राजू अपने चप्पलों को ढूँढता है पर वे दिखते नहीं हैं. एक किनारे चप्पलों का जोड़ा देख राजू बड़ी बारीकी से उनका निरीक्षण करता है. पर वे एकदम नये थे. उसकी खुद की तो ५० रुपये वाली बरसाती थी. ज़रूर अदला बदली हो गयी होगी सोच कर उस जोड़े को दूसरी तरफ ले जाकर रख, उन्हें आरक्षित कर देता है. मूर्ति पूरे घटनाक्रम मे राजू के साथ ही था. उसने राजू से पूछा “अब तुम क्या करोगे, क्या इन चप्पलों को ले जाओगे”. राजू ने कहा “देखते हैं, यदि इनका मलिक नहीं आता तो समझो कि इन्हीं को पहनना पड़ेगा”. मूर्ति ने भी उस चप्पल को देखा और कहा “एक परेशानी होगी. मेरे चप्पल भी इससे मिलते हैं. हम दोनों क़ी चप्पल आपस में बदला करेगी”.

इतने में खाने का समय हो जाता है. खाना टेबुलों पर सज़ा है. पुरुषों और महिलाओं क़ी लंबी लाइन लग जाती है. मौका देख कर परेशान राजू एक एक कर हर व्यक्ति के पैरों का निरीक्षण करता है. संभव है किसी के पैरों में उसका चप्पल दिख जाए. राजू का छोटा भाई विस्सु पूछ बैठता है “भइया क्या बात है, लोगों के पैरों को क्यों देख रहे हो” उत्तर में राजू कहता है “क्या तूने सड़क के किनारे बैठे मोचियों को देखा है, उनकी नज़र कहाँ रहती है ? मै भी प्रॅक्टीस कर रहा हूँ”. विस्सु को अलग ले जाकर मूर्ति उसे मामले से अवगत करता है. राजू क़ी आँखें थक जाती हैं पर असली चप्पल किसी के पैरों में नहीं दिखती. शरलोक होम्स क़ी तर्ज पर राजू मूर्ति से कहता है  “जिसने भी मेरे चप्पल पहने हैं वह बड़ी जल्दी में रहा होगा. गणेशजी के दर्शन के बाद वह व्यक्ति कहीं बाहर चला गया”. फिर बड़ी मायूसी से कहता है, चलो खाना खा लेते हैं.  दोनो खाने क़ी लाइन में लग जाते है. आनमने  ढंग से राजू एक दो रोटी खा लेता है. उसके बाद एक बार फिर ढूँडने मे लग जाता है. कुछ देर में सब चले जाते हैं पर चप्पलों का एक जोड़ा बचा रहता है. वही जिसे राजू ने एक अलग कोने में रख दिया था. अब जब सब जा चुके थे, राजू नये चप्पल पाने क़ी खुशी में गद गदायमान था. बस उन्हे जल्दी जल्दी पहन लिया और जल्दी चलो कहते हुए मूर्ति को साथ लेकर वापस अपने अस्थाई घोंसले मे आ गया.

चप्पल को उतार कर दरवाज़े के किनारे रखते समय यह देख कर उसे आश्चर्य हुआ कि उसके खुद क़ी चप्पल तो वहीं रखी है. अब परेशानी बढ़ गयी. प्रश्न उठता है कि उसके द्वारा पहन कर लाए गये चप्पल किसके रहे होंगे. मूर्ति के मुहसे सहसा ठहाका फूट पड़ता है. अर्रे! यह तो मेरा ही है. मतलब सॉफ होता दिखा. मूर्ति तो नंगे पैर ही गया था लेकिन राजू ने मूर्ति क़ी चप्पल पहन ली थी. उसकी इक्षा तो हो रही थी कि  अपने सिर पर उन चप्पलो  को दे मारे पर खीज कर कहता है, मै थक गया हूँ अब मुझे सोने दो.

7 Responses to “राजू के चप्पल”

  1. Satish Pancham Says:

    बहुत ही रोचक और मजेदार पोस्ट। अंत तक लेख ने बाँधे रखा। इस बेहद रोचक पोस्ट के लिये मेरी ओर से बधाई स्वीकार करें।

  2. राज भाटिया Says:

    अरे वाह क्या बात है जासुसी नावल की तरह से बंधे रखा ओर अन्त मै एक अलग तरह का राजं, ओर फ़िर होठो पर एक मुस्कुराहट.
    धन्यवाद एक अच्छी रचना के लिये

  3. govind goyal Says:

    dono pairon ke jute chappal alag alag sthan par rakho kabhee gum nahin honge.

  4. yoginder moudgil Says:

    गोविंद जी का अनुसरण करना चाहिये
    बहरहाल रोचक पोस्ट
    पढ़ कर आनन्द आया
    सहज हास्यबोध से परिपूर्ण रचना
    साधुवाद

  5. PN Subramanian Says:

    श्री गोविंद गोयल जी,
    मैं आपके सुझाव से अत्यधिक प्रभावित हुआ हूँ. यक़ीनन कारगर तरीका है. आभार.

  6. Dr.B.K.Pandey Says:

    this story is very good

  7. Sanjay Uchcharia Says:

    It’s innocent but very interesting post…sure, I would tell all my friends about it.

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