तमिलनाडु में एक महाराष्ट्र

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यह हमारी विडंबना ही है कि आज़ादी के छै दशकों के बाद भी हम भारत वासी एक राष्ट्र के रूप में सुध्रिढ होकर समृद्धि की ओर अग्रसर होने के विपरीत वही सब हरकतें कर रहे हैं जो मूलतः हमारी दासता का कारक रहा है. चन्द सत्ता लोलुप स्वार्थी राज परिवारों के कारण ही भारत में सैकड़ों रियासतों का आपसी वैमनस्य हमें गुलामी के गर्त में ले गया.

मध्य युग में आज का तमिलनाडु भी अनेकों छोटी छोटी रियासतों में बँटा था जैसे मदुरै, तंजावूर, अरकाट, पुदुकोट्टई और ना जाने कितने और. तंजावूर पर सन १६७३ में मदुरै के नायकों ने हमला कर दिया. वहाँ के तत्कालीन शासक विजय राघव को मौत के घाट उतार दिया गया. इस तरह तंजावूर पर मदुरै के नायकों का अधिपत्य हो गया. तंजावूर के भूतपूर्व शासक विजय राघव का एक पुत्र या पौत्र ने भाग कर बीजापुर के सुल्तान के पास शरण ली और सुल्तान से मदद माँगी. सुल्तान ने मराठा सरदार एकोजी के नेतृत्व में अपनी सेना भेज दी जिसने सन १६७५ में तंजावूर को अपने कब्ज़े में ले लिया. एकोजी तंजावूर की गद्दी को उसके वास्तविक उत्तराधिकारी को सौपने की जगह स्वयं राजा बन बैठा. यह था तंजावूर में मराठा-भोंसले शासन का प्रारंभ जो अगले २०० वर्षों तक रहा. यहाँ यह बताना रोचक होगा कि एकोजी छत्रपति शिवाजी महाराज के सौतेले भाई ही थे. एकोजी को वेंकोजी के नाम से भी जाना जाता है.

krishna_tanjore_paintingsमराठो के शासन ने तंजावूर में एक प्रकार से स्थायित्व प्रदान किया और राज्य की अच्छी प्रगति हुई. कला, साहित्य आदि में भी भोंसले राजाओं ने अपनी अभिरुचि दिखाई और प्रोत्साहन प्रदान किया. तंजावूर की विश्व विख्यात चित्रकला भी इसी अवधि में पल्लवित हुई. प्रजा भी खुश हाल थी. एकोजी के साथ आए मराठी सैनिकों के अतिरिक्त महाराष्ट्र से भी हज़ारों की संख्या में लोग आकर तंजावूर में बसने लगे. इनकी भाषा मराठी ही थी लेकिन कालांतर में स्थानीय समाज में इस तरह घुल मिल गये कि उनकी अपनी पहचान का लोप होता गया. भेदभाव से बचने के लिए इन्होने अपने बच्चों के नाम भी दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार ही रख दिए. जाति सूचक उप नामों को त्याग दिया. अब सब के सब शुद्ध तंजावूरकर बन गये.! उनकी कहने के लिए, एक घर की बोली थी, जो मराठी कम और तमिल अधिक है. ख़ान पान, रहन सहन सब कुछ स्थानीय सदृश. वही इडली डोसा, सांभर वडा, रसम चावल आदि. इनमे विवाह की विधि भी दक्षिण भारतीय है क्योंकि इनके पंडित कम ही हैं. परंतु दुल्हन के लिए आवश्यक रहता है कि वह ९ गज की साड़ी पहने. दूल्हा पगड़ी पहने घोड़े पे बैठ कर ही आता है. यही एक बड़ा अंतर है. मराठा शासन काल के पश्चात भी वे वहीं के होकर रह गये. कालांतर में वे पूरे तमिलनाडु में फैल गये. रामेश्वरम मंदिर में काम करने वाले लगभग सभी पंडित मूलतः मराठी ही हैं. कुछ लोगों ने चेन्नई का रुख़ किया जहाँ आज उनकी आबादी २ लाख के लगभग है. हैदराबाद में लगभग ५०० परिवार हैं.

आज चेन्नई और भारत के अन्य शहरों में, यहाँ तक कि विदेशों में भी, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, सूचना प्राद्योगिकी आदि क्षेत्रों में इनका बोल बाला है.

 

11 Responses to “तमिलनाडु में एक महाराष्ट्र”

  1. संगीता पुरी Says:

    अच्‍छी जानकारी भरी बातें बतलायी हैं आपने इस पोस्‍ट में। धन्‍यवाद। फोण्‍ट कुछ बडा कर लें।

  2. ताऊ रामपुरिया Says:

    एकोजी के साथ आए मराठी सैनिकों के अतिरिक्त महाराष्ट्र से भी हज़ारों की संख्या में लोग आकर तंजावूर में बसने लगे. इनकी भाषा मराठी ही थी लेकिन कालांतर में स्थानीय समाज में इस तरह घुल मिल गये कि उनकी अपनी पहचान का लोप होता गया. भेदभाव से बचने के लिए इन्होने अपने बच्चों के नाम भी दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार ही रख दिए. जाति सूचक उप नामों को त्याग दिया. अब सब के सब शुद्ध तंजावूरकर बन गये.!

    आपने बड़ी उत्कृष्ट जानकारी दी ! आभार आपका इसके लिए !
    आपके आलेख के फॉण्ट बहुत बारीक हैं ! आपका आलेख अति सुंदर और पठनीय है इसलिए आँखे गडाकर पढ़ना पडा ! आपका नाम भी कहीं नही दिख रहा है ! कृपया अन्यथा ना ले ! सहज रूप से लिख रहा हूँ ! शुभकामनाएं !

  3. मनीष Says:

    .शुक्रिया इस बेहतरीन जानकारी के लिए.

  4. yoginder moudgil Says:

    क्या बात है दादा…. बेहतरीन…. साधुवाद…..
    पर ताऊ की बात पर भी गौर करें….

  5. ताऊ रामपुरिया Says:

    हाँ , अब बिल्कुल ठीक हो गए हैं आपके फांट साईज ! ध्यान देने के लिए अति धन्यवाद आपका !

  6. राज भाटिया Says:

    बहुत ही सुंदर जानकारी दी आप ने , ओर लिखाभी बहुत सही है, ाप की बात से सहमत हू .
    धन्यवाद

  7. seema gupta Says:

    यह था तंजावूर में मराठा-भोंसले शासन का प्रारंभ जो अगले २०० वर्षों तक रहा. यहाँ यह बताना रोचक होगा कि एकोजी छत्रपति शिवाजी महाराज के सौतेले भाई ही थे. एकोजी को वेंकोजी के नाम से भी जाना जाता है.
    ” Read this artical today only, dnt know how i missed it…., after a long time read such an interetsing historical artical…..परंतु दुल्हन के लिए आवश्यक रहता है कि वह ९ गज की साड़ी पहने. दूल्हा पगड़ी पहने घोड़े पे बैठ कर ही आता है. यही एक बड़ा अंतर है.,this religeious system is again very interetsing and exciting to know….well detalied description”

    Regards

  8. सतीश सक्सेना Says:

    बेहद रुचिकर एवं नवीन जानकारी, कृपया इन विषयों पर लिखते रहें, आपकी भाषा सौम्य है !

  9. tarangarts50 Says:

    hi .. i liked your tanjore painting ….. any idea about where to learn tanjore paings art in bangalore ……

    i have been collecting so many pictures for learning and doing … you can also refer this website for beautiful pictures of tanjore paintings http://www.tarangarts.com/tanjore-paintings/c-1.html

  10. ghughutibasuti Says:

    मेरी एक सहेली से मुझे इस बात की जानकारी मिली थी। किन्तु उन्होंने अपना सरनेम नही बदला था।वे पंत ही थीं। उन्होंने ही मुझे अपना इतिहास बताया था।
    घुघूती बासूती

  11. C P Chandrasekaran Says:

    Dear sir
    It is an excellent article. what exactly transpired that the marattas could take over Thanjavur after the fight between Nayak brothers is not clear in history. Some agreement had gone sour. You have rightly emphasised on the growth of diverse cultural patterns in Thanjavur after the entry of Marathas. the credit should go to the learned King Raja Sarabhoji II (1798-1832). He was a surgeon and performed eye surgery too. He never stepped on the world stage nor built statues for himself. That is why Tamilians probably forgot him !! . Still, we have in Thanjavur a lot of Maratti Traditions. Sampradaya bhajan, Kirtan, Harikatha why even the poli we serve in our marriages is due to Maratta influence.

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