हमारी हिन्दी कहाँ जा रही है

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“इन दिनों यूथ आर्कुट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का यूस कर रहे हैं. अपने मंगेतर की हॅबिट्स जाननी हो या पर्सनल और प्रोफेशनल इन्फर्मेशन चाहिए हो, यूथ आर्कुट को बेहतर विकल्प मान रहे हैं. अब लोग अपने लाइफ पार्टनर के फ्रेंड सर्किल, चाटिंग, आइडियास और विभिन्न तरह के ग्रूप्स को जोइन करने…”

यह अंश मैने आज की “पत्रिका” से ली है. अभी कुछ दिनों पूर्व ही एक तकनीकी चिट्ठाकार की अभिव्यक्तियों पर आक्रोश युक्त मंतव्य जालजगत पर प्रकट हुआ था. एक बुजुर्ग चिट्ठाकार ने अपनी टीप के ज़रिए समझाया था की नाराज़ मत हो, धीरे धीरे अच्छी हिन्दी सीख जाएगा.  मज़े की बात है कि उस तकनीकी चिट्ठे के स्वामी उत्तर प्रदेश के ही हैं.

अंतरजाल में प्रयुक्त होने वाले हिन्दी को लेकर लोगों की सोच भी भिन्न भिन्न है. कुछ चाहते हैं कि उनकी भाषा सुसंस्कृत हो या यों कहें कि भाषा की शुद्धता उनकी सोच पर हावी है. बदलते परिवेश में प्रयुक्त होने के लिए जब तत्सम शब्द नहीं मिलते तो फिर गढ्ने लगते हैं. तर्क दिया जाता है कि शनै शनै प्रयोग से ये नये शब्द रूढ हो चलेंगे.

ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि भाषा आसानी से समझ में आने लायक हो. नये नये शब्दों को गढ्ने के बदले तकनीकी शब्दों को या ऐसे प्रयोग जिसके लिए हिन्दी में शब्द नहीं हैं, सीधे सीधे विदेशी शब्द को ही जस का तस काम में ले लिया जावे. ऐसा करने से हिन्दी की प्रतिष्‍ठा में कोई आँच नहीं आने वाली है. उल्टे हमारी भाषा समृद्ध ही होगी.

ब्लॉगिंग से जुड़े लोगों को छोड, किसी को यह नहीं पता कि  “अंतरजाल” क्या होता है. लेकिन बगल में रहने वाली १० साल की बच्ची और उसकी ८५ साल की नानी जानती हैं कि  “कंप्यूटर” में “इंटरनेट” कुछ होता है  जिसमे से जानकारी मिलती है. ऐसे कई उदाहरण मिल जाएँगे.  

लेकिन हम यह आवश्य कहना चाहेंगे कि प्रारंभ में दिया गया उदाहरण और प्रयोग यदि इसी तरह जारी रहा तो हमारी भाषा शिखण्डी बन जाएगी.

22 Responses to “हमारी हिन्दी कहाँ जा रही है”

  1. संगीता पुरी Says:

    माहौल को देखते हुए यह तो लग ही रहा है कि हमारी भाषा भी अब दुनिया में कमजोर नहीं रह गयी है।

  2. RAJ SINH Says:

    aapkee dushchintayen sahee hain au is pa dhyan jana chahiye

  3. Dr.Arvind Mishra Says:

    सुब्रह्मण्यम जी ,पहले तो मुझे अपने नाम के हिज्जों को सही सही बताईये -क्या मैंने आपके नाम को सही लिखा है ?आपने ख़ुद अपना नाम शायद सही नही लिखा है -यह संभवतः पी सी के यांत्रिक ग्यान में हमारी दक्षता न होने के कारण है !
    आप विद्वान् हैं, यह जानते ही हैं कि किसी भी भाषा के उन्नयन को लेकर शुचितावादियों और स्वच्छ्न्द्तावादियों में ऐसी तकरारें कोई नयी बात नही है -हमें मध्यमार्ग अपना लेना चाहिए -भारतीय दृष्टि समन्वय वादी रही है -उस तकनीकी ब्लॉगर की तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद भी उसकी लिपि संबंधी गलतिया अक्षम्य हैं -उसे डिफेंड करने की जरूरत नही है -भाषा एक सहज प्रवाह की तरह होनी चाहिए -नदी की धारा सदृश ! अब इसमें जो कुछ भी जहाँ से आए यदि इसकी नैसर्गिक सुन्दरता के अनुरूप है तो स्वागत योग्य है -अंतर्जाल हो या इन्टरनेट दोनों अच्छे लग रहे हैं -हिन्दी उत्तरोत्तर समृद्ध हो रहीहै !

  4. seema gupta Says:

    लेकिन हम यह आवश्य कहना चाहेंगे कि प्रारंभ में दिया गया उदाहरण और प्रयोग यदि इसी तरह जारी रहा तो हमारी भाषा शिखण्डी बन जाएगी.

    ” ये एक ऐसा विषय है, जिस पर जितनी चाहे बहस हो सकती है, क्यूंकि सब की अपनी अपनी राय है… , आधी इंग्लिश , और आधी हिन्दी को मिलाकर प्रयोग करना आम बात हो गयी है.. orket, group net chat..etc पर यही सब होता है… , लकिन एक बात जरुर है, ब्लॉग जगत के द्वारा हिन्दी प्रचार मे जो कोशिश की जा रही हैं वो भी कम सराहनीय नही है…, और मुझे उम्मीद है ये कोशिश जरुर कामयाब होगी..आपका ये लेख और चिंता अपनी जगह बहुत सही और जायज है और सबको सोचने पर मजबूर करेगा.. ”

    आभार

  5. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    मुझे यह पता नहीं लग रहा है कि यह चिट्ठा किस का है? और यह आलेख किस ने लिखा है? पता नहीं अरविंन्द जी ने चिट्ठाकार का नाम सुब्रह्मण्यम है जान लिया?

    हिन्दी या किसी भी भाषा पर प्रश्न उठाना निरर्थक है। लोग अभिव्यक्ति के लिए भाषा का प्रयोग करते हैं। हम उन्हें बाध्य नहीं कर सकते। लोग भाषा को विकसित करते हैं और लोगों के उपयोग के आधार पर भाषा विकसित होती है।इस में कोई दखल नहीं दे सकता।
    जिस देश में बीसियों भाषाओं को बोलने वाले आपस में मिल जुल कर संवाद में हैं वहाँ केवल चिंताएँ व्यक्त की जा सकती हैं कुछ किया नहीं जा सकता।

  6. संजय बेंगाणी Says:

    दिनेशजी सुब्रह्मण्यमजी ने बताया इसलिए पता चल गया. भाषा में दुसरी भाषा के शब्दों का स्वागत तभी तक उच्चीत है जब तक वह उसका स्वरूप ही न बिगाड़ दे.

  7. Gajender Bisht Says:

    मैं भी मानता हूँ कि हमारी भाषा सुसंस्कृत हो. बदलते परिवेश में प्रयुक्त होने के लिए जब तत्सम शब्द नहीं मिलते तो फिर नए गढ्ने चाहिए. हिन्दी ही क्यों हर भाषा में भी नए शब्दों को जोड़ा जाता है जोकि शनै शनै प्रयोग से आम हो जाते हें. वरना हमारी भाषा शिखण्डी बन जायेगी.

    एक बात और कि लोगों को भी हिन्दी भाषा और भाषियों के प्रति अपनी शोच को सकारात्मक बनाना होगा.

  8. ताऊ रामपुरिया Says:

    मुझे ऐसा लगता है की जैसे नदी अपना रास्ता बना लेती है , आप चाहे जितने अवरोध डाल दे ! उसी तरह भाषा भी किसी की मोहताज नही रहती ! इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम देख सकते हैं जब हर बारह कोस या मील पर भाषा अपने आप बदलती जाती है ! हाँ नए शब्दों को गढ़ने और उनके सर्वमान्य उपयोग को भी तरजीह दी जानी चाहिए ! अगर ऐसा नही करेंगे तो सर्वसुविधा युक्त शब्द अपने आप चलन में आजायेंगे ! फ़िर आप कुछ भी करते रहिये !

  9. brijmohanshrivastava Says:

    शिखंडी बन ही नही जायेगी सर बन चुकी है /रामायण में शायद सावरी मन्त्र वाबत ही कहा गया था “”अनमिल आखर अरथ न जासू “”आज हम इस भाषा के वारे में यह भी तो नहीं कह सकते क्योंकि कुछ लोग ये भाषा समझ रहे है =भाषा में बहुत शोर्ट कट हो गया है पहले तो हिंगलिश ही थी अब तो ये कौनसी भाषा संस्कार में आरही है समझ ही नहीं आता हैजहाँ तक भाषा के सहज प्रवाह की बात है यदि किसी का सहज प्रवाह किसी अन्य को दुखदाई हो जाए तो उसे सहज प्रवाह तो नहीं कहा जासकता है जैसे कोई कहे मैं तो मध्यम मार्ग अपनाता हूँ तो यह लीक से हटना आपको सुगम हो सकता है किंतु यदि वह लीक से हटना नियम विरुद्ध हो तो ?इस वर्णसंकर भाषा से यदि आप समझ रहे हैं की हिद्नी की उत्तरोत्तर ब्रद्धि हो रही है तो ठीक है जब हमने पुरानी सारी चीजों को आउट आफ डेट करार दे ही दिया है तो क्या ग़लत क्या सही क्या व्याकरण और क्या अशुद्धि आप कभी इंटरनेट पर अंग्रेजी से हिन्दी में किया गया अनुवाद पढ़ना मज़ा आएगा

  10. सागर नाहर Says:

    अभिव्यक्ति पर कुछ समय पहले सर्वश्री प्रभू जोशी का एक लेख आया था “हिन्दी की हत्या के विरूद्ध” उस शानदार लेख में प्रभूजी ने भय व्यक्त किया था कि इस तरह हम अपनी भाषा में विदेशी शब्द जोड़ते जायें तो हो सकता है कि एक दिन हिन्दी शब्द कारक भर रह जायेंगे।
    जब तक अगर जरूरी अनुवाद हो सके तो दूसरी भाषा के शब्द लेने की बजाय उसका हिन्दी शब्द खोज लेने/गढ़ लेने या अनुवाद कर लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिये।
    यहाँ मैं प्रभूजी के लेख का एक पैरा लिकने से अपने आप्को रोक नहीं पा रहा हूँ, टिप्पणी ज्यादा लम्बी हो रही है, क्षमा चाहता हूँ।
    भाषा को परिवर्तित करने का यह चरण, ‘प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन’ कहा जाता है। यानी की ‘हिंदी के रोज़मर्रा के मूल शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम।’ ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे ‘स्नोबॉल थियरी` काम करना शुरू कर देगी-अर्थात बर्फ़ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे एक दूसरे से घुलमिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा। यह `सिद्धांतकी` (थियरी) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेज़ी के शब्द, हिंदी से इस क़दर जुड़ जाएँगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा।

    इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेज़ी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात ‘इनक्रीज़ द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेज़ेज़’। मसलन ‘आऊट ऑफ रीच/बियाण्ड डाउट/नन अदर देन/एज एण्ड व्हेन रिक्वायर्ड`/ आदि आदि। कुछ समय के बाद लोग हिंदी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जाएँगे। उदाहरण के लिए हिंदी में गिनती स्कूल में बंद किए जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रुपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पाएगा, जब तक कि उसे अंग्रेज़ी में ‘सिक्सटी एट’ नहीं कहा जाएगा। इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण हिंदी के एक अख़बार से उठाकर दे रहा हूँ।

  11. काली हवा Says:

    जिस मुद्दे पर यहाँ बहस हो रही है, अंग्रेजी भाषा पर वह एक अरसे सी चली आ रही थी और शिकायत अमरीकी अंदाज़ की अंग्रेजी को लेकर थी. नतीजा सामने है, अंग्रेजी आज पहले से कहीं ज्यादा समृद्ध हो चुकी है.

    मै द्विवेदी जी से पूर्ण रूप से सहमत हूँ के भाषा निरंतर विकास पर किसी की भी दखल बेमानी है और न ही इस से भाषा का सौंदर्य रत्ती भर भी धूमिल होगा, बल्कि भाषा अधिक समृद्ध हो जायेगी. कहने का मतलब मात्र इतना है के भाषा दोनों स्वरूपों में विद्यमान रहेगी जैसे की अंग्रेजी की स्थति है. संजीदा लोग उत्कृष्ट भाषा का इस्तेमाल करेंगे, टीवी/ फिल्मों में समय की मांग के अनुसार दोनों प्रकार की भाषा का इस्तेमाल होगा. शंब्दों का भण्डार बढ़ने से विचारों को सटीकता से अभिव्यक्त करने में सहूलियत पेश आएगी. क्या ये अपने आप में कोई कम बात है?

  12. एक आम आदमी Says:

    आपने बिल्कुल ठीक लिखा है, दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाना कोई बुरी बात नहीं यदि उनका विकल्प न हो, लेकिन दूसरी भाषा के शब्दों का अत्यधिक प्रयोग कर हिन्दी को हिंगलिश या हिंग्रेजी में बदलना निश्चित रूप से अक्षम्य है.

  13. नितिन Says:

    आपकी चिंता जायज है, वह दिन दूर नहीं है जब हिंग्लिश अखबार छपने साँरी, Hinglish newspaper print होने लगेंगे ।

    लेकिन उस पत्रिका के पाठकों को लेख में अभी भी कुछ शब्द समझ में नहीं आये होगें, इसलिये उन गुणी पाठकों के लिये ये…

    इन दिनों यूथ आर्कुट जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का यूस कर रहे हैं. अपने मंगेतर फियांसी की हॅबिट्स जाननी हो या पर्सनल और प्रोफेशनल इन्फर्मेशन चाहिए हो, यूथ आर्कुट को बेहतर विकल्प बैटर आँप्शन मान रहे हैं. अब लोग अपने लाइफ पार्टनर के फ्रेंड सर्किल, चाटिंग, आइडियास और विभिन्न डिफरेंट तरह के ग्रूप्स को जोइन करने…

  14. विष्‍णु बैरागी Says:

    यह ऐसी बहस है जिसमें सबके पास अपनी-अपनी सुविधानुसार तर्क हैं । मैं इसे दो भागों में विभक्‍त करता हूं । पहला – हिन्‍दी शब्‍दों का उपयोग । दूसरा – भाषा की शुध्‍दता । कठिनाई यह है कि ऐसे विमर्श में दोनों बातों को मिला दिया जाता है । यदि कोई उत्‍साही, हिन्‍दी शब्‍द प्रयुक्‍त करते हुए उसे अशुध्‍द रूप में लिख देता है तो शुध्‍दतावादी उस पर टूट पडते हैं ।

    इस बिन्‍दु पर मुझे कुछ बातें सूझ पडती हैं ‘
    1. किसी का किसी पर कोई नियन्‍त्रण नहीं है कि वह कौन सी और कैसी भाषा प्रयुक्‍त करे
    । हम केवल अनुरोध और अपेक्षा ही कर सकते हैं ।

    2. हमारा नियन्‍त्रण चूंकि मात्र स्‍यवम् तक ही सीमित है इसलिए व्‍यक्तिगत स्‍तर पर हम जो
    भी और जितना भी कर सकें, करें और करते रहें । मैं ने अनुभव किया है कि लिखने
    वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति सुन्‍दर शब्‍दों की खोज में लगा रहता है और मिलने पर प्रयुक्‍त
    करता है ।

    3. यदि हम किसी की भाषा पर अथवा किसी शब्‍द-विशेष पर कोई आपत्ति करना चाहते
    हैं तो अच्‍छा होगा कि ब्‍लाग पर, सार्वजिनक रूप से ऐसा करने के स्‍थान पर, उसके
    ई-मेल पर उसे सन्‍देश दें । इससे अहम् आहत होने की आशंका शून्‍यप्राय: होगी ।
    मैं अनुभव कर रहा हूं कई बार मित्र गण केवल इसलिए अपनी बात पर अडे रहते है
    क्‍यों कि उनकी बात को सार्वजनिक रूप से अनुचित प्रमाणित किया जा रहा है ।

    4. हम जब भी ऐसा कुछ करें, सम्‍पूर्ण सदाशयता से करें, स्‍वयम् को श्रेष्‍ठ और सामने वाले
    को हेय प्रमाणित करने की मानसिकता से नहीं ।

    5. हिन्‍दी की दशा को लेकर चिन्तित प्रत्‍येक व्‍यक्ति नितान्‍त व्‍यक्तिगत स्‍तर पर
    निरन्‍तर प्रयत्‍नरत रहे । हमें याद रखना पडेगा कि ‘बिगाड’ की गति तेज होती है और
    ‘सुधार’ की गति अत्‍यधिक धीमी । इतनी धीमी कि प्राणलेवा और धैर्य की परीक्षा लेने
    वाली अनुभव होने लगती है ।

    6. ‍ अपने प्रयत्‍नों को लेकर हमारी मामनसिकता ‘दादा आम रोपे, पोता खाए’ वाली होनी
    चाहिए । तत्‍काल परिणाम की अपेक्षा बिलकुल न रखें ।

    7. एक विचित्र बात मैं ने तेजी से अनुभव की है । ऐसे विमर्श में ‘असहमति’ को ‘विरोध’ मान
    लिया जाता है ।

    8. उपरोक्‍त् के सन्‍दर्भ में अन्तिम बात यह कि, मैं अभी भी व्‍यक्तिगत स्‍तर पर, समय-समय
    पर परिचितों/अपरिचितों से सम्‍पर्क कर उनसे निवेदन करता रहता हूं कि फलां अंग्रेजी शब्‍द
    के स्‍थान पर वे फलां हिन्‍दी शब्‍द प्रयुक्‍त कर सकते हैं । मेरे प्रयत्‍नों की सफलता का
    प्रतिशत अत्‍यन्‍त उत्‍साहजनक है । किन्‍तु ऐसा मैं उनके ई-मेल पर सन्‍देश देकर ही करता
    हूं – उनके ब्‍लाग पर सार्वजनिक टिप्‍पणी के माध्‍यम से नहीं ।

    9. यह ऐसा विषय है जिसमें निरन्‍तर और नियमित प्रयत्‍नों की आवश्‍यकता सदैव बनी
    रहेगी । ‘जो घर बारे आपनो’ की मानसिकता से लगे रहना पडेगा ।

  15. मनीष Says:

    achcha vishay uthaya hai aapne.

    sagar ji ne jis lekh ka jikra kiya wo bhi adbhut hai aur is vishay ke uchit paripekshya ko darshata hai.

  16. alpana Says:

    बहुत ही अच्छा लेख लिखा है ..बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है..उप्पर गुणिज़ानो ने इतना कुच्छ लिख दिया अब कुच्छ शेष नहीं रह गया.
    आभार सहित

  17. naresh singh Says:

    मै बैरागी जी की बात से पूर्णतया सहमत हूं । सुब्रह्मण्यम जी सार्थक व समयानुकुल बह्स छेड्ने के लिये धन्यवाद । यह जरूरी नही की सभी चिठाकार हिन्दी के विद्वान हो कुछ मेरे जैसे काम चलाउ भी तो है जिन्हे विशुद्ध हिन्दी सिखने मे कइ जनम लगेगें ।

  18. अशोक पाण्‍डेय Says:

    1. भाषाओ के बीच पारस्‍परिक लेन-देन चलता रहता है। कोई चाहकर भी इसे रोक नहीं सकता।
    2. कौन से शब्‍द लिए जाएं, कहां से लिए जाएं और कितने लिए जाएं, समय आने पर भाषा खुद ही तय कर लेती है।
    3. भाषा अभिव्‍यक्ति का मध्‍यम है। वह एक साधन है। हालांकि अध्‍येताओं के लिए भाषा साध्‍य हो जाती है, और वे सभी से ऐसी ही अपेक्षा करते हैं। यह आत्‍मके‍न्द्रित दृष्टि अनुचित है। किसी की अभिव्‍यक्ति पर हम इस आधार पर रोक नहीं लगा सकते कि उसकी भाषा शुद्ध नहीं है।

  19. सतीश पंचम Says:

    अशोक पाण्डेय जी ने मेरे मन की बात कह दी है। फिलहाल तो हिंदी पर कोई खतरा नहीं लग रहा। देखते हैं, आगे-आगे क्या होता है।

  20. G Vishwanath Says:

    निश्चिंत रहिए।
    शुद्ध हिन्दी को कुछ नहीं होगा।
    अंग्रेज़ी प्रेमी भी डरने लगे थे, कि यूरोप के अन्य देशों मे रहने वाले अंग्रेज़ी को “सुधारने” की कोशिश कर रहे हैं और उसका बुरा हाल कर रहे हैं।
    इस सन्दर्भ में कुछ साल पहले निम्नलिखित पंचवर्षीय योजना/प्रस्तावों के बारे में सुना था, यूरोप में अंग्रेज़ी को आसान और लोकप्रिय बनाने के लिए।

    आशा है इन्हें पढ़कर आप को भी उनता ही मज़ा आएगे जितना मुझे आया था।
    ==========

    In the first year, “s” will replace the soft “c”. Sertainly, this will make the sivil servants jump with joy. The hard “c” will be dropped in favor of the “k”. This should klear up konfusion, and keyboards kan have one less letter.

    There will be growing publik enthusiasm in the sekond year when the troublesome “ph” will be replaced with the “f”. This will make words like fotograf 20% shorter.

    In the 3rd year, publik akseptanse of the new spelling kan be expekted to reach the stage where more komplikated changes are possible.

    Governments will enkourage the removal of double letters which have always ben a deterent to akurate speling. Also, al wil agre that the horibl mes of the silent “e” in the languag is disgrasful and it should go away.

    By the 4th yer peopl wil be reseptiv to steps such as replasing “th” with “z” and “w” with “v”.

    During ze fifz yer, ze unesesary “o” kan be dropd from vords kontaining
    “ou” and after ziz fifz yer, ve vil hav a reil sensibl riten styl.

    Zer vil be no mor trubl or difikultis and evrivun vil find it ezi tu understand ech oza. Ze drem of a united urop vil finali kum tru.

    If zis mad yu smil, pleas pas it on to oza pepl.

  21. व्हाट गोस ऑफ माइ फादर « मल्हार Malhar Says:

    […] सो पेल दिया एक पोस्ट, अपने चिट्ठे पर( हमारी हिन्दी कहाँ जा रही है) . गाँव का कुत्ता  बैलगाड़ी के नीचे नीचे […]

  22. मिहिरभोज Says:

    हिंदी हो या इंग्लिश भाषा की शुद्धता बनी ही रहनी चाहिये….हिंगलिश की तरफदारी करने वालों को समझना चाहिये की खच्चरों के संतान नहीं होती है..मेरी इस पोस्ट पर मैंने यही विषय उठाया था…हिंदी पत्रकारिता के वर्णसंकर…
    http://merachithha.blogspot.com/2007/09/blog-post.html

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