मेरे आदमी के मरने के बाद दीजो

बात ज़्यादा पुरानी नहीं है. राजस्थान के एक गाँव में एक संपन्न सेठ गंगाराम रहता था. उसकी पत्नी का नाम गुणवंती और राधे उसका लड़का था. लड़का गाँव के ही स्कूल में पढ़ने जाता था. गंगाराम घमंडी, कंजूस और निर्दयी था. दूसरी ओर उसकी पत्नी गुणवंती सुशील, स्नेहमयी और दयावान थी. गाँववाले सेठ से तो नफ़रत करते थे लेकिन गुणवंती का बहुत सम्मान करते थे. इसके पीछे कारण भी था. वक्त बे वक्त ज़रूरत पड़ने पर गुणवंती ग़रीबों की सहायता करती थी.  लोग पैसे भी उधार ले जाते और वक़्त पर लौटाने आते तो गुणवंती लोगों का क़र्ज़ माफ़ कर देती. गाँव वालों के सुख दुख में साथ देकर उसने लोगों का दिल जीत लिया था.

गंगाराम कुछ वर्षों से बीमार  रहने लगा था. इलाज का कोई अच्छा असर भी नहीं हो रहा था. इस कारण उसके स्वाभाव में चिड़चिड़ापन भी आ गया. छोटी छोटी बातों को लेकर गंगाराम गुणवंती के साथ दुर्व्यवहार करता. इस कारण गुणवंती दुखी थी लेकिन सब कुछ सहते हुए पति के कार्यों में हाथ बटाती. गाँववालों को गुणवंती के द्वारा मदद किए जाने की खबर गंगाराम को थी लेकिन उसने गुणवंती को  कभी नहीं टोका.

एक साल बारिश की कमी से फसल चौपट हो गयी. कुछ बड़े किसानों ने तो प्रकृति की इस मार को बर्दाश्त कर लिया पर छोटे और ग़रीब किसानों पर संकट छा गया. खाने को अन्न भी नहीं रहा. लोग गुणवंती के दरवाज़े में खड़े हो गये. गुणवंती ने आनाज़ देकर गाँव वालों की सहायता की. लेकिन केवल आनाज़ से ही ग़रीब किसानों का काम नहीं चल सकता था. दूसरी आवश्यकताओं के लिए रुपयों की ज़रूरत थी. सहारा तो केवल एक  था, गुणवंती का, सो वे उसके पास पहुँचे.

गुणवंती के समझ में आ गया था कि उसे तो लोगों को रुपये पैसे देकर सहायता करनी ही पड़ेगी तब क्यों ना प्रतिफल स्वरूप उनसे कुछ कराया जावे. उसने गाँव वालों से कहा, ठीक है मैं हर एक को पाँच पाँच सौ रुपये दे सकती हूँ लेकिन इस बार मैं क़र्ज़ माफ़ नहीं कर सकती. आप लोगों को लौटाना ही पड़ेगा. लोगों ने आश्वासन दिया कि वे लौटा देंगे. गुणवंती ने कहा नहीं, मुझे उस दिन पूरे पैसे मिलने चाहिए जिस दिन गंगाराम जी मरते हैं. यह सुनकर लोग अवाक रह गये. गंगाराम के लड़के राधे ने भी अपनी माँ की बातें सुन ली और दुखी हो चला था. फिर लोगों ने सोचा मालकिन ठीक ही तो बोल रही है. गंगाराम जी के मरने पर बहुत सारा खर्च भी तो होगा. गाँव वाले इसके लिए एकदम सहमत हो गये और पैसा लेकर खुशी खुशी अपने घरों की ओर बढ़ गये. राधे ने माँ पर अपनी नाराज़गी जताई पर माँ के स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो गया.

गाँव वालों को अब एक चिंता ने घेर लिया. गंगाराम मर गया तो पैसे लौटाने पड़ेंगे. बताने की ज़रूरत नहीं है कि कोई भी पैसे लौटाना तो नहीं चाहता prayerथा. इसलिए प्रत्येक ऋणी परिवार ने ईश्वरसे प्रार्थना प्रारंभ कर दी कि हे ईश्वर गंगाराम के जीवन की रक्षा कर. गुणवंती की अपेक्षाएँ साकार होने लगीं. धीरे धीरे गंगाराम ठीक होने लगा. कुछ ही महीनों में एकदम स्वस्थ हो गया. राधे ने गंगाराम को गुणवंती द्वारा किए गये प्रयोग की जानकारी दी  और बताया कि यह गाँव वालों के अनवरत सामूहिक प्रार्थना का ही परिणाम है कि वो ठीक हो गये. फलस्वरूप गंगाराम के व्यवहार में अप्रत्याशिक परिवर्तन हुआ. गंगाराम तो अच्छा आदमी बन गया पर साथ ही गुणवंती के सारे दुख दर्द भी दूर हो गये.

 

पारंपरिक

 

18 Responses to “मेरे आदमी के मरने के बाद दीजो”

  1. Dr.Arvind Mishra Says:

    सही कहा आपने आज इस देश को भी समवेत दुआओं की जरूरत है ! बढियां हिन्दी लिखी है आपने !

  2. Ratan singh Says:

    बहुत ही सुंदर और ज्ञान वर्धक कहानी |

  3. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    अच्छी कथा है। पर अब तो लगता है दुआएँ भी असर नहीं करतीं।

  4. Prashant Says:

    दुवाओं का असर होते बस मैंने कहानियों में ही देखा है..

  5. ab inconvenienti Says:

    जो दुआ निःस्वार्थ नहीं मिल सकती उसका क्या मोल? वह प्राथनाएं बीमार की ज़िन्दगी के लिए नहीं, पैसा लौटना न पड़े इसलिए थीं. वे अपनी खुशी से नहीं, स्वार्थ और मजबूरी में दुआ कर रहे थे.

  6. seema gupta Says:

    ये कहानी पहली बार पढ़ी, दुआओं और प्रार्थना का असर भी देखा, सच कहा आज हम सिर्फ़ शहीदों के लिए दुआ ही कर सकतें हैं… और उनके परिवार को हौसला दे सकते हैं …. मै नही जानती की स्वार्थ के वशीभूत होकर की गयी दुआ काम आती है या नही जैसे इस कहानी मे बताया गया है, मगर सच्चे मन से की गयी दुआ शायद व्यर्थ नही जाती होगी…”

  7. ताऊ रामपुरिया Says:

    भाई दुआ तो दुआ होती है ! इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं की किसी की बद्दुआ मत लो ! अच्छी कहानी एक नेक सोच के साथ !

    रामराम !

  8. विष्‍णु बैरागी Says:

    दुआओं का असर होता है, भले ही वे, कर्जा चुकाने के डर से ही क्‍यों न दी गई हों ।
    हमारी लोक-कथाएं कोई कपोल-कल्‍पना नहीं हैं । युगों को जी चुकी पीढियों के अनुभव और आस्‍था के सीमेण्‍ट-कांक्रीट से इनकी रचना हुई है ।

  9. सरिता अरगरे Says:

    वाकई दुआओं में ज़बरदस्त असर होता है । शब्दों की ताकत वातावरण और हालात बदलने का माद्दा रखती है । इस वक्त हमें भी अपनी जन्मभूमि की खूशाहाली कायम रखने की दुआ करना चाहिए ।

  10. Asha Joglekar Says:

    जहाँ दवा काम न करे वहाँ दुआ काम करती है । गुणवंती की सोच बहुत अच्छी रही ।

  11. Gagan Sharma Says:

    सच्चे मन से की गयी दुआ का ‘हाट’ लिंक शायद सीधे भगवान से होता है, तभी तो वह कबूल हो जाती है। हमारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं ऐसी कथाओं से, जिनमें दुआ और बद्दुआ दोनो का असर बताया, समझाया गया है।

  12. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर , क्या बात है , बहुत ही शिक्षा प्रद कहानी.
    धन्यवाद

  13. ghughutibasuti Says:

    बहुत जबर्दस्त कहानी ! दुआएँ भी स्वार्थी हो सकती हैं !
    घुघूती बासूती

  14. satish saxena Says:

    बहुत बढ़िया रचना !

  15. गौतम राजरिशी Says:

    स्वार्थी दुआयें…..खूब कही

  16. उन्मुक्त Says:

    बहुत सुन्दर।

  17. govind goyal Says:

    sab ke apne swarth , koun kare prmarth. narayan narayan

  18. prem sagar singh Says:

    सच्चे मन से की गयी दुआ शायद व्यर्थ नही जाती होगी.

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