कुणाल ने अपनी आँखें फोड़ लीं

kunalहम भारत वासियों के सौंदर्यबोध की कोई मिसाल नहीं है और हमे इसके लिए तो गर्वित होने का हक बनता है. मानवीय शरीर के विभिन्न भागों की तुलना प्रकृति में पाए जाने वाले पेड़ पौधों, पुष्पों, मृगों, पक्षियों आदि से कर आनंदित होने की परंपरा अपने यहाँ रही है. ब्रहुब्रीहि समास की यह व्यापकता तो भारतीय नामों में ही दिखेगी.  मृगनयनी, राजीवलोचन, कमलनयनी,  पंकजाक्षी और ना जाने कितने ही और.    हिमालय की तराइयों में पाया जाने वाला एक पक्षी है “कुणाल”. इस पक्षी की आँखों से प्रेरित होकर ही सम्राट अशोक ने अपने एक पुत्र का नाम ‘कुणाल’ रख दिया होगा क्योंकि उस बालक के नयन भी कुणाल पक्षी के सदृश रहे होंगे.

बौद्ध ग्रंथों में कुणाल की कहानी मिलती है. ‘कुणाल अवदाना’ के अनुसार पाटलीपुत्र के सम्राट अशोक की अनेकों रानियाँ थीं. उनमे से एक थी पद्मावती (जैन मतावलंबी) जिस का पुत्र कुणाल था. कहीं उसे वीर कुणाल कहा गया है और कहीं उसे ‘धर्म विवर्धना’ कह कर संबोधित किया गया है. कुणाल की आँखें सुंदर तो थी हीं, उनमे लोगों को सम्मोहित करने की भी विशेषता थी. ऊर्जा से भरा पूरा गठीला बदन उसके पौरुष की पहचान थी. उसकी अनेकों विमाताओं में एक तिश्यरक्षा भी थी, बूढ़े अशोक की युवा रानी, जिसके सौंदर्य के आगे अप्सराएँ भी शर्मा जाएँ.  तिश्यरक्षा कुणाल की आँखों के सम्मोहन से  मोहित हो गयी. उसके प्रेम के लिए इतनी आतुर हो गयी की एक दिन कुणाल को अपने कक्ष में बुलाकर अपने बहुपाश में जकड लेती है और प्रणय निवेदन करने लगती है. कुणाल किसी तरह अपने आप को अलग कर, अपनी विमाता को धिक्कारते हुए, कलंकित होने से बच निकलता है.  इस प्रकार तिरस्कृत किया जाना तिश्यरक्षा के लिए असहनीय था. क्रोध से काँपते हुए अपनी शैय्या में गिर कर लोटने लगती है. कुछ देर बाद सहज होकर ध्रिड निश्चय करती है कि वह उन आँखों से बदला लेगी जिसने उसे आसक्त किया था.

कुछ दिन बीत गये. तक्षशिला से समाचार मिला कि वहाँ का राज्यपाल (संभवतः तिश्यरक्षा  के कहने पर) बग़ावत पर उतारू है. उसे नियंत्रित करने के लिए सम्राट अशोक ने अपने पुत्र कुणाल को चुना. कुणाल अपनी पत्नी कंचनमाला को साथ ले, जिसके प्रति वह पूर्ण निष्‍ठावान था, एक सैनिक टुकड़ी के साथ तक्षशिला की ओर कूच कर गया. इधर सम्राट अशोक अपने प्रिय पुत्र कुणाल के विरह में बुरी तरह बीमार पड़ गया. तिश्यरक्षा की देखभाल और दिन रात की सेवा से सम्राट अशोक पुनः स्वस्थ हो गया. सम्राट ने प्रतिफल स्वरूप तिश्यरक्षा  को एक साप्ताह तक  साम्राज्ञी के रूप में साम्राज्य के  एकल संचालन के लिए अधिकृत कर दिया.

तिश्यरक्षा ने इस अवसर का फायदा उठाना चाहा और तक्षशिला के राज्यपाल को निर्देशित किया कि वह कुणाल की आँखें निकाल दे. यह पत्र धोके से कुणाल के हातों पड़ गया और अपनी विमाता की इक्षा पूर्ति करते हुए उसने स्वयं अपने ही हाथों अपनी आँखें फोड़ लीं. कंचनमाला  अंधे कुणाल को साथ लेकर वापस पाटलीपुत्र पहुँचती है. सम्राट अशोक को तिश्यरक्षा के षड्यंत्र की कोई जानकारी नहीं रहती. वह तो केवल यही जनता था कि उसका प्रिय पुत्र अब अँधा हो गया है. अपने पुत्र की दयनीय अवस्था को देख सम्राट की आँखों से अनवरत अश्रु धारा बहने लगती है. कुणाल को अपनी विमाता से कोई द्वेष नहीं था और उसके मन में उसके प्रति आदर भाव यथावत रहा. कुणाल की निश्चलता के कारण कालांतर में उसे उसकी दृष्टि वापस मिल जाती है.

एक और कहानी के अनुसार सम्राट अशोक अपने आठ वर्षीय पुत्र कुणाल को लालन पालन एवं विद्यार्जन के लिए उज्जैन भेजता है. वह कुणाल के भावी गुरु को प्राकृत में पत्र लिखता है और शिक्षा प्रारंभ करने के लिए “अधियव” शब्द का प्रयोग करता है. तिश्यरक्षा उस पत्र को पढ़ती है और अपने स्वयं के पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने की नीयत से  “अधियव” शब्द को परिवर्तित कर “अन्धियव” कर देती है. अब इस से आशय यह बनता है कि कुणाल अंधत्व को प्राप्त हो. यहाँ भी पत्र युवा कुणाल के हाथों मे लग जाता है और वह स्वयं अपने ही हाथों से अपने आँखों की पुतलियाँ निकाल देता है.

अशोकवदना” के अनुसार कहानी का अंत कुछ भिन्न है. जब सम्राट अशोक को सही जानकारी मिलती है तो वह अपने प्रधान मंत्री यश की सलाह पर तिश्यरक्षा को जिंदा ही जलवा देता है. एक बौद्ध भिक्षु “गॉश” या “घोष” की चिकित्सा से कुणाल को अपनी दृष्टि वापस मिल जाती है. कहा जाता है कि पूर्व जन्म में कुणाल ने ५०० हिरणों की आँखें ली थीं जिसका फल उसे भुगतना पड़ा था.

एक और कहानी के अनुसार अँधा कुणाल वर्षों बाद अशोक के दरबार में एक संगीतकार के रूप में पहुंकता है और अपने गायन से सम्राट को प्रसन्न कर देता है. सम्राट इस गायक से अपने लिए उपहार चुनने के लिए कहता है जिसके उत्तर में गायक कहता है “मै कुणाल हूँ, मुझे साम्राज्य चाहिए”. अशोक दुखी होते हुए कहता है कि अंधत्व के कारण तुम अब इस योग्य नहीं रहे. तब कुणाल बताता है कि साम्राज्य उसे नहीं वरन उसके बेटे के लिए चाहिए. आश्चर्य से अशोक पूछता है कि तुम्हे पुत्र कब हुआ. “संप्रति” अर्थात अभी अभी और यही नाम कुणाल के पुत्र का रख दिया गया. उसे अशोक का उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया गया हालाकि अभी वह गोद में ही था. ऐसा कहा जाता है कि कुमार कुणाल ने मिथिला में अपना राज्य स्थापित किया था. भारत – नेपाल सीमा पर कोसी नदी के तट पर वर्तमान कुनौली ग्राम ही कभी कुणाल की नगरी रही होगी.

 

चित्र: विकीमीडीया कामन्स

 

 

29 Responses to “कुणाल ने अपनी आँखें फोड़ लीं”

  1. dhirusingh Says:

    कुणाल की कथा इतिहास मे गुम सी लगती है . आज आपने कथा सुना कर भारत के स्वर्णिम इतिहास के सुपुत्र का परिचय कराया . अपनी मर्यादा का पालन करते हुए अपनी आँख स्वयम फोड़ लेना इससे बड़ी कुर्बानी क्या हो सकती थी कुणाल के लिए

  2. amitabh Says:

    is sindar katha ke liye sadhuvaad

  3. Ratan Singh Says:

    आज पहली बार कुणाल की कथा पढने को मिली | धन्य है कुणाल जैसे कुर्बानी करने वाले मर्यादित पात्र |

  4. Dr.Arvind Mishra Says:

    बहुत रोचक कुणाल कथा ! शुक्रिया !

  5. दिनेशराय द्विवेदी/Dineshrai Dwivedi Says:

    इतिहास कुछ ठोस तथ्य ही देता है उन को जोड़ कर बहुत सी कहानियाँ बन जाती हैं। सच का किसे पता?

  6. seema gupta Says:

    आज पहली बार कुणाल की कथा पढने को मिली बहुत रोचक लगी, ना जाने इतिहास के पन्नो में क्या क्या छुपा है ….ऐसा नायब ..”
    Regards

  7. Amit Jha Says:

    बहुत ही रोचक जानकारी रही……बहुत अच्छा लगा पढ़ कर….

  8. Brijmohanshrivastava Says:

    प्रत्येक कथा कोई संदेश देती है /इस में आपको कौनसा संदेश मिला यदि यह संदेश नही देती तो कथा है ही नही /कोई विशेष बात रही होगी तभी ग्रन्थ में दर्ज़ है /एक तो ऐसी ऐतिहासिक या लोक कथाओं में कहीं बिमाता का ,कहीं मौसी का ,किसी रानी का किसी दासी का ऐसा चरित्र मिल ही जाता है -पहले ऐसे नाटक भी लिखे जाते थे और रूप बसंत ,हर दौल और भी न जाने कितने /कृपया खोज करें कि हर घटना में यह बासना क्यों जुड़ जाया करती थी -और ऐसी कहानियो में पहल महिलाओं की तरफ़ से ही क्यों होती थी /ऐसा तो नहीं कि ये कहानी पुरुषों द्वारालिखी जाती थी और वे रानियों के इसी आचरण से अपने लेखन के संतुष्ट करना चाहते हों

  9. common man Says:

    सुंदर कथा, काफ़ी दीनो बाद दोबारा पढ़ने को मिली

  10. naresh singh Says:

    एक छुपी हुई कहानी को सामने लाने के लिए धन्यवाद

  11. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @श्री बृजमोहन जी:
    यह कहानी हमारी कल्पना की उपज नहीं है. वैसे हमें तो एक संदेश दिख रहा है. “बुढ़ापे में किसी कन्या पर आसक्त होकर विवाह करना दुखदायी हो सकता है” यहाँ हमें नहीं भूलना चाहिए कि अशोक सम्राट था. विवाह के लिए तिश्यरक्षा वाध्य रही होगी.

  12. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत परिश्रम पुर्वक आपने इस कथा को ढुंढ निकाला है ! इतिहास के पन्नो मे ऐसे कई रत्न छुपे पडे होंगे ! आपका बहुत आभार जो आपने यह कहानी यत्नपुर्वक यहां लिखी ! आगे भी आपसे यही उम्मीद रहेगी !

    रामराम !

  13. Gagan Sharma Says:

    हमारा ही नहीं सारे संसार का इतिहास भरा पड़ा है ऐसी बेमेल शादियों की कहानियों से। फिर चाहे वह राजनैतिक कारणों से हो, चाहे विजेता को खुश करने के लिये या फिर किसी षड़यन्त्र के तहत। ज्यादातर का अंजाम दर्दनाक ही रहा है।

  14. राज भाटिया Says:

    आज पहली बार इस कथा को पढा, आप का धन्यवाद इस सुंदर कथा को हम सब तक पहुचाने के लिये, कुणाल सच मै महान था, उस की सोतेली माता ही कुमाता थी.
    धन्यवाद

  15. गौतम राजरिशी Says:

    याद नहीं आता,बहुत पहले एक कोई उपन्यास पढ़ा था कुणाल की इस् मार्मिक कहानी पर…
    उस वक्त भी तिश्यरक्षा की क्रुरता पर और कुणाल की मासुमियत पर झल्ला उठा था और आज आप्के इस आलेख को पढ़ कर भी कुछ ऐसी ही सोचें उठीं..

  16. Brijmohanshrivastava Says:

    “”बुढापे में किसी कन्या पर अशक्त होकर विवाह करना दुखदायी हो सकता है “”इस शीर्षक से ,और आपकी कल्पना की उपज से .आप एक लेख तैयार करें जिसमें हकीकत भी हो,व्यंग्य भी ,हास्य भी और कल्पना भी

  17. sandhya gupta Says:

    कुणाल की कहानी तो पहले पढ़ी थी परंतु जिस अंदाज मे आपने प्रस्तुत किया उसके लिए बधाई.

  18. हिमांशु Says:

    बहुत दिनों बाद आपका चिट्ठा देख रहा हूं, चिट्ठाकारी से दूर था. अब नियमित रहूंगा.
    प्रविष्टि बड़ी प्यारी है. धन्यवाद.

  19. Vineeta Yashswi Says:

    कुणाल की कथा पढ़ के बहुत अच्छा लगा. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है आपकी

  20. Praney Says:

    अति सुंदर और रोचक. आता रहूँगा.

  21. सुनीता शानू Says:

    इनमे से सच क्या है आपने कई कथाएं लिख दी मगर मैने तो सच पूंछे तो एक भी नही पढ़ी थी, किन्तु अब संशय यह है की सच कौनसी है? जो हम बच्चों को भी सुना सकें…

  22. LOVELY Says:

    सुंदर कहानी ..अभी -अभी ही पढ़ पाई हूँ व्यस्तता के कारण – बहुत धन्यवाद यहाँ पोस्ट करने का.

  23. pritimav Says:

    बहुत अच्छी रचना है, पढ़कर मजा आ गया।

    नववर्ष मंगलमय हो।

  24. satish Says:

    बहुत सुंदर ! नव वर्ष की शुभकामनायें स्वीकार करें !

  25. mukesh kumar Says:

    kahani kalpnik lag rahi he par he intresting

  26. joice Says:

    one nice story. i read it 1st time.one who(kunal) followed his own limitation.

  27. awkash garg Says:

    Samrat Ke Charche To Sune The But Kunal Ki yah Kahani Is To Great
    Be Indian Culture

  28. Sanjay Burde Says:

    मुझे आज पहलीबार पता चला की सम्राट अशोक की तरह उनके पूञ भी बडें महान थे!

    आपका धन्यवाद!
    संजय बुरडे नागपूर
    फोन 8805129825

  29. कुणाल जी Says:

    बहुत बहुत दिल से धन्यबादआपने मेरे नाम का अर्थ हमे बताया

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