मांडू के राक्षस रूपी पेड़ “बाओबाब”

 

baobab

अभी कल ही सारथी पर बात निकली “खटाई तेरे रूप अनेक” तो हमें याद आया एक राक्षसी पेड़ का फल. अभी कुछ पहले ही होशंगाबाद जाना हुआ था. वहाँ फ्रेंड्स सेंटर, रसुलिया के अंदर घूमते हुए अचानक एक विशालकाय तने वाला पेड़ दिख गया. यह हमारा पूर्व परिचित था. लेकिन इसे तो मांडू में होना चाहिए था. हमने थप-थपाके के पूछा भाई यहाँ कैसे. फिर याद आया कि हम तो होशंगाबाद में हैं, जिसे मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने ही बसाया था. सुल्तान के साथ साथ यह भी आ गया होगा. ना जाने कितने और यहाँ  रहे होंगे.

अब मांडू या मांडव की बात चली तो बताना ही होगा कि मध्य प्रदेश में इंदौर के पास ही बहु चर्चित पर्यटन स्थल है जहाँ अनेकों सुंदर सुंदर पुरातात्विक महत्व के भवन आदि हैं. यहाँ के रानी रूपमति और बाज बहादुर का प्रेम प्रसंग भी तो चर्चित है. वैसे मांडू मध्य युग में मालवा के सुल्तानों की राजधानी रही है जिसे शायद होशंगशाह ने बसाया था. अब ज़्यादा कहेंगे तो भटक जाएँगे. चर्चा का केंद्र बिंदु तो वह पेड़ और उसपर लगने वाला फल है.

मांडू के चारों तरफ मोटे मोटे तनो वाले भयानक पेड़ दिखेंगे और इतने कि मानो इन्हीं का साम्राज्य हो. कल्पना कीजिए कि किसी पेड़ को ज़मीन से उखाड़ कर जड़ ऊपर और तना नीचे उल्टा गाड़ दिया, बिल्कुल वैसे ही ये पेड़ दिखते हैं. भगवान जाने इनमे पत्ते कब लगते हैं. अलबत्ता फल लटके मिलते हैं मानो मोटे मोटे चूहों को पूंछ पकड़ कर उल्टा लटका दिया गया हो. अपनी इन विचित्रताओं के कारण यह हरेक को अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं. तने इतने मोटे कि इनके पीछे दस पंद्रह लोग आसानी से छुप सकते हैं.

baobab-fruitवास्तव में ये पेड़ भारतीय मूल के नहीं हैं. कहा जाता है कि इन्हें मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने अफ्रीका से माँगाया था. हमें तो लगता हैं कि सुल्तान की सेना में जो अफ्रीकी गुलाम थे उन्होने इस पेड़ का फल अपने उपयोग के लिए साथ लाया होगा. उन्हीं के बीजों से इनका फैलाव भी हुआ होगा. अफ्रीका के सवाना वाले क्षेत्रों में इनकी बहुलता है. इन्हें “बाओबाब” (Adansonia digitata) के नाम से जाना जाता है. वहाँ के निवासी इसे जीवन दायिनि के रूप में देखते हैं.  यह वृक्ष मनुष्यों, एवं जानवरों को आश्रय, भोजन और पानी सुलभ कराने की क्षमता रखती है. इनके तने १५ मीटर तक की गोलाई लिए रहते है और अंदर से पोले भी.  इनमे बारिश का पानी जमा रहता है जो हज़ारों लीटर हो सकता है. जिनमे पानी जमा नहीं होता उन्हें कई  पशु पक्षी यहाँ तक मनुष्य भी आवास के रूप मे प्रयोग करते हैं. इस पेड़ का खाल कॉर्क जैसा होता है और अग्नि अवरोधक भी. तने के रेशों से कपड़े और रस्सी बुनी जाती है. पत्तियाँ भी खाने में काम आती हैं. कहा जाता है कि इस की पत्तियॉं में औषधीय गुण हैं और उनका प्रयोग ज़ायक़ा बढाने के लिए मसाले  की तरह किया जा सकता है.  इसमे जो फल लगता है उसे मंकी ब्रेड (Monkey Bread) भी कहते हैं जिसमे विटामिन सी भरपूर है. ऊपरी आवरण सूखी लौकी की तरह कठोर भूरे रंग का रहता है. फल के अंदर के खट्टे  गूदे का प्रयोग इमली की तरह ही किया जाता है. मांडू में लोग तो इसे औषधीय गुण युक्त इमली ही कहते हैं और प्रति नग ५ रुपये के हिसाब से पर्यटकों को बेचते हैं.

“बाओबाब” को अफ्रीका का कल्प वृक्ष कहा जावे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

विष्णु बैरागी जी उवाच:  मालवा अंचल में इसे ‘खुरासिनी इमली’ कहते. सुना है कि ‘साइट्रिक एसिड’ बनाने में भी इसका उपयोग होता है।

(इस महत्व्पूर्ण जानकारी के लिए आभार)

 

चित्र पेड़ का: डा. डेविड नॉक्स

चित्र फल का: स्वयम

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24 Responses to “मांडू के राक्षस रूपी पेड़ “बाओबाब””

  1. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    बहुत ही नयी जानकारी है। अनोखा वृक्ष है। इस की नस्ल के संरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

  2. Ratan Singh Says:

    एक अनोखे पेड की अनोखी जानकारी दी है आपने ! आभार

  3. Dr.Arvind Mishra Says:

    प्रयाग में झूंसी में भी यह वृक्ष है जिसे वहाँ के लोग विलायती इमली कहते हैं -जाहिर है इसका फल खट्टा होगा ! अयह कल्पवृक्ष तुल्य ही तो है -गीता में भी ऊर्ध्वमूल वृक्ष का उल्लेख है !

  4. sareetha Says:

    आपने इस विलायती इमली का स्वाद मुंह में घोल दिया । बहुत ही बढिया जानकारी के साथ दिलचस्प पोस्ट । धन्यवाद ।

  5. Smart Indian Says:

    बाओबाब अफ्रीका में तो होता ही है मगर भारत के मैदानों में भी यह इतनी दूर-दूर तक फैले हैं कि इसे अफ्रीकी मूल का कहना शायद सही न हो. सिर्फ़ लखनऊ जिले में बाओबाब के ११ बड़े जीवित पेड़ हैं. छोटों की गिनती न हो पाई हो यह सम्भव है क्योंकि बाओबाब को विशाल रूप लेने में काफी समय लगता है.
    http://www.merinews.com/catFull.jsp?articleID=130749

    कई इलाकों में इसे गोरख-इमली कहते हैं. लखनऊ बाराबंकी मार्ग पर बारोलिया गाँव में बाओबाब के एक विशाल वृक्ष का पौराणिक महत्व है और स्थानीय लोग उसे कृष्ण द्वारा इन्द्र के उपवन से लाया हुआ “पारिजात” वृक्ष मानते हैं. यह बाराबंकी पारिजात बाओबाब की एक विशिष्ट (शायद भारतीय) प्रजाति का अकेला बचा हुआ पेड़ है. बाराबंकी की एनआईसी साईट पर इस वृक्ष की काफी जानकारी उपलब्ध है:
    http://barabanki.nic.in/places.htm#Parijaat

  6. ताऊ रामपुरिया Says:

    वाह जी आपने तो लाजवाब बात बतादी. हम तो ठहरे ताऊ बुद्धि, अपने को खाने से मतलब सो ये फ़ल मान्डू मे खूब खाया और मांडू तो साल मे दो पिक्निक होती ही है, और कभी कभी वीक एण्ड पर रुक भी जाते हैं पर इस पेड पर ध्यान नही गया. अबकी बार इसको ध्यान से देखते हैं. साईज से तो यह पेडों का ताऊ दिखाई दे रहा है. 🙂

    रामराम.

  7. seema gupta Says:

    ” अद्भुत …. कितनी अनोखी वस्तुओं से भरा पडा है ये संसार ….जब भी ऐसी कोई जानकारी मिलती है एक बार को मन आश्चर्यचकित हो जाता है, आभार..”

    regards

  8. anuradha srivastav Says:

    कभी सुना नहीं था इस वृक्ष के बारें में रोचक व ज्ञानवर्द्धक जानकारी के लिये आभार

  9. ranju Says:

    अदभुत रोचक जानकारी है यह ..नई चीज पता चली यह शुक्रिया

  10. Amit Jha Says:

    बहुत ही नायाब जानकारी दी आपने………इसका सही से देखभाल होना चाहिए …….

  11. शास्त्री जे सी फिलिप् Says:

    हो न हो ताऊ जी इस फल के खाने के बाद ही इतने महान बने है — हिन्दी जगत के प्रिय ताउ जो बन गये !! लगता है कि मुझे भी यह फल खाना पडेगा. अगले मप्र यात्रा पर कोशिश करते हैं.

    अब आते हैं आपके लेख पर — सारा आलेख एक सांस में पढ गया. प्रकृतिप्रेम तो मेरे नस नस मे बसा है.

    आपके वर्णन से स्पष्ट है कि यह सचमुच में एक अद्वितीय पेड है एवं उत्तर भारत के बंजर जमीनों पर इसे लगा देना चाहिये. पानी का संग्रह कर लेगा तो जन जन की मदद करेग. फल भी सब के काम आयगा.

    अब सवाल है कि इसकी पौध कहा से हासिल की जाये.

    सस्नेह — शास्त्री

  12. Vineeta Yashswi Says:

    आप के ब्लॉग से बहुत रोचक जानकारिया मिलती है. अच्छा काम किया है आपने…..

  13. amar jyoti Says:

    बहुत रोचक जानकारी दी है आपने। आभार।

  14. makrand Says:

    bahut umda jankari

  15. विष्‍णु बैरागी Says:

    मैं केवल रस्‍म अदायगी के लिए मांडू गया हूं किन्‍तु ‘यह फल’ रतलाम में कई बार देखा है। मालवा अंचल में इसे ‘खुरासिनी इमली’ कहते हैं। पक्‍का तो मालूम नहीं किन्‍तु सुनी-सुनाई बात है कि ‘साइट्रिक एसिड’ बनाने में भी इसका उपयोग होता है।

  16. लावण्या Says:

    देखिये सुब्र्ह्मणियम जी आप की पोस्ट ने कितनी सारी दूसरी जानकारियाँ भी ब्लोग जगत के साथोयोँ द्वारा यहाँ जोडने का अच्छा काम किया –
    – लावण्या

  17. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर जानकारी दी आओ ने, मै इस का फ़ल देख कर थोडा देरान हुआ था, कोकि ऎसा ही फ़ल अफ़्रीका मै लोग पानी वगेरा भरने के लिये रखते है, आप की बातो से सहमत हुं , जरुर यह पेड उन अफ़्रीकीयो के साथ फ़ल के रुप मे भारत पहुचा होगा,ओर अब बहुत है.
    धन्यवाद

  18. mahendra mishra Says:

    बहुत बढ़िया जानकारी पूर्ण पोस्ट आभार

  19. Abhishek Says:

    हैरी पॉटर की फिल्में देखी हैं? उसमे एक जादुई पेड़ है, उसका नाम है व्होम्पिंग विलो। कसम से ये पेड़ बिल्कुल उसके जैसा ही है!!

  20. Sanjay Uchcharia Says:

    I lived in Dhar distt. just 35 Km. far away from Mandav.

  21. ashit agrawal Says:

    we have a tree and it has a very nice flower but we do not know which is that tree but it is like parijat or gorakh imli

  22. साझा ब्लोगरूपी दीवार में टंगी धूल पड़ी तस्वीर हैं हम : चिट्ठा चर्चा Says:

    […] ताऊ को मिला बराबरी का जोडीदार कौन मांडू के राक्षस रूपी पेड़ “बाओबाब” […]

  23. Kamlesh Patel Says:

    ha hamane is ped ko dekha or socha bhi tha ki is ped ki chaw me rajao ne aram bhi kiya hoga or dosto ko bhi is ped ko dikhaya tha lagta he in pedo ki umar kafi lambi he or kafi bade bhi ese ped pure des me laga dena chahiye jis se ki lakdi ki matra bad jaygi or hamara des prachin kal ki tarah hara bhara ho jayega or lagta he is ped ke piche jarur koi raj chupa he tabhi itni sari khubiya is ek ped me janna hoga——-

  24. lose extra weight Says:

    Highly descriptive article, I enjoyed that a lot.

    Will there be a part 2?

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