हज़ारों ख्वाइषें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दिल मचले

 

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एक सुल्तान अपने महल से सुबह सुबह तफ़री के लिए निकल पड़ा तभी उसे सामने से आता एक भिकारी जैसा फकीर दिख गया. सुल्तान ने पूछा “क्या चाहिए तुमको”

फकीर हंस दिया और बोला “तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे मेरे सभी ख्वाइश पूरे कर दोगे”

सुल्तान अपने गुस्से को काबू करता हुआ बोला “तुमने समझा क्या है, मैं तुम्हारी हर ख्वाइश पूरी कर सकता हूँ, बोलो क्या चाहते हो”

फकीर बोला “सोच लो, किसी को वादा करते वक़्त दो बार सोच लिया करो”

फकीर कोई ऐरा ग़ैरा नहीं था वह तो पुराने जनम में सुल्तान का ही मालिक था. उसने कह रखा था “इस जनम में तो तुम चूक गये, अगले जनम में मैं तुम्हें अंदर से जगाने में मदद करूँगा”. अब किसे याद रहती है पुराने जनम की बातें. सुल्तान को भी कुछ याद नहीं था. सब कुछ भूल चुका था. इसलिए दोबारा ज़ोर देकर बोलता है “मैं सुल्तान हूँ, तुम जो माँगॉगे मिलेगा, तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारी ख्वाइश पूरी नहीं कर सकता. माँगो, जो माँगना है माँगो”

फकीर ने कहा “ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. देख रहे हो ना ये कटोरा. क्या इसे भर दोगे”

सुल्तान ने कहा, क्यों नहीं और अपने वज़ीर को बुलाकर बोला इस फकीर के कटोरे को अशरफियों से भर दो.

इतना सुनते ही वज़ीर दौड़कर महल में गया और एक थैले में चाँदी क़ी अशरफियाँ ले आया और फकीर के कटोरे में डाल दिया. लेकिन कटोरी भरी नहीं. फिर अंदर गया और इस बार एक बड़े थैले में सिक्के भर लाया. कटोरे में डालता गया डालता गया लेकिन यह क्या, कटोरी तब भी नहीं भर रही थी. यह सिलसिला चलता रहा और फकीर मुस्कुराता रहा. शाम हो गयी. अब तक महल के सब लोग इस अजूबे को देखने बाहर आ गये थे. शहर के दूसरे बाशिंदे भी इकट्ठे हो गये. बड़ी भीड़ जमा हो गयी. अब तो सुल्तान के इज़्ज़त का सवाल बन गया. उसने वज़ीर से कहा अब चाहे मेरी सलतनत चली जाए लेकिन इस फकीर के आगे तो मैं हार नहीं सकता. जाओ जितने हीरे जवाहरात हैं ले आओ. अब कटोरे में हीरे जवाहरात भी डाले जाने लगे और यहाँ तक नौबत आ गयी कि ख़ज़ाना पूरा खाली हो गया. वज़ीर ने सुल्तान को आगाह किया. अब तो पूरा लुट गये हम लोग.

तब जाकर सुल्तान की अकल ठिकाने आई. फकीर के सामने घुटने टेक कर बैठ गया और माफी माँगते हुए बोला “हम शिकस्त कबूल करते हैं, तुम जीत गये और मैं हार गया. अब जाने के पहले इतना भर बता दो कि ये जादुई कटोरी किस चीज की बनी है”

फकीर ने कहा ” इसमे कोई राज की बात नहीं है” और कटोरे को सुल्तान की तरफ बढ़ाते हुए कहता है,”लो इसे हाथ में लेकर देख लो”

सुल्तान ने उस कटोरे को हाथ में लिया और परखा फिर बोला “यह तो खोपड़ी है”

“हाँ यह आदमी क़ी खोपड़ी ही तो है जो ख्वाईषों  से बनी है”

19 Responses to “हज़ारों ख्वाइषें ऐसी कि हर ख्वाइश पे दिल मचले”

  1. हिमांशु Says:

    वह कटोरा मन का भी कटोरा रहा होगा, या ऐसी किसी चीज से बना जिससे मन बना.
    मन की छोटी-सी भूमि में अनन्त समृद्दि भर देने पर भी मन कहां मानता है, खाली ही रहता है- कुछ और, कुछ और के लिये सदैव अपेक्षित. मानव-मन अगम्य है, अतृप्त भी. उसे सन्तुष्टि ही कहां.

    धन्यवाद इस कथा के लिये.

  2. jitendra bhagat Says:

    सही कहा आपने, हमें अपनी खोपड़ी टटोलनी चाहि‍ए, जाने कब इसकी इच्‍छाओं का अंत होगा।

  3. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    सुंदर कथा है। लेकिन
    जब इंन्सान की ख्वाहिशें मर जाएंगी तो, बचेगा क्या?

  4. amar jyoti Says:

    सुन्दर कथा है।परन्तु उत्तरोत्तर बेहतरी की चाहत ही मनुष्य को पशु से अलग करती है।पूरी मानव जाति का विकास इसी मन्त्र के माध्यम से हुआ है:’ये दिल मांगे मोर’।

  5. amit Says:

    sundar katha hai..

  6. ताऊ रामपुरिया Says:

    इच्छाएं कभी पूरी नही होती. और ख्याल अपना २ है. बहुत लाजवाब कहानी सुनाई आपने. धन्यवाद.

    रामराम.

  7. Vineeta Yashswi Says:

    sahi baat hai ki ichhao ka koi ant nahi hai…

    aapne bahut achhi kath sunai hai. padh ke achha laga.

  8. पं. डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    बहुत ही सुन्दर कथा…..

    वास्तव में कभी किसी की संपूर्ण इच्छाएं पूरी नहीं हुईं। कितना ही धन मिल जाए, कितना ही वैभव मिल जाए, कितने ही भोग मिल जाएं, यहां तक कि अनंत ब्रह्मांड भी मिल जाए, तो भी इच्छाएं समाप्त नहीं होंगी, कुछ न कुछ लगी ही रहेगी।

    न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति
    हविपा कृष्णावत्र्मेव भूव एवाभिवर्धते

    जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और अधिक प्रजवल्लित हो उठती है उसी प्रकार मनुष्य की सतत इच्छाओं की पूर्ति जैसे जैसे होती जाती है वैसे ही वह और अधिक बढ़तीं जातीं हैं।

  9. विवेक सिंह Says:

    आँखें खोलने वाली कहानी !

  10. sameer lal Says:

    इच्छाऐं कब खत्म हुई हैं..एक ज्ञानवर्धक रोचक कथा.

  11. राज भाटिया Says:

    बहुत ही ज्ञानवर्धक रोचक कथा, तभी तो कहते है हमे अपनी इच्छाओ पर काबू रखना चाहिये, जिस ने इच्छऒ को जीत लिया, उस ने जहान जीत लिया
    धन्यवाद

  12. ratan singh Says:

    sundar katha

  13. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर Says:

    सच में आदमी कि इच्छाओ का कभी भी अंत नहीं होता है , पर अंत न हो यह भी आवशयक है , लालच और भूख के बजाय कल्पनाएँ जिन्दा रहे तो बेहतर है!!

  14. mahendra mishra Says:

    बहुत बढ़िया कहानी . राजाओ से जुड़ी कहानी पढ़कर बचपन याद आ जाता है . बहुत ही उम्दा ..

  15. sandhya gupta Says:

    Kaphi arthpurna..

    Vaastav me hamari lok kathaon me gyan ke wo moti bikhare paden hain jinhe samet aur sahej kar rakhne ki jarurat hai.

  16. Arvind Mishra Says:

    मजेदार भी और शिक्षाप्रद भी ! कहानी का अंत तो सचमुच धाँसू है !

  17. विनय Says:

    इच्छाएँ अनंत है सो अपनी इस्छाएँ नहीं इच्छा शक्ति का विकास करना चाहिए!

  18. nirmla.kapila Says:

    बहुत ही रोचक अवं भाव्पूर्ण रचना है ब्धाई

  19. Manish Says:

    ikshaaon ka koi or chhor nahin hai…..

    vaise Pic. bahut shandaar hain….. jo na dekha aapne dikha diya..🙂

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