यवन सुंदरी

lady-standingमैने हाथों में सूक्ष्म तरंगों(Microwave) के माध्यम से संचार पर एक किताब पकड़ी हुई थी पर मेरा ध्यान सी.डी. प्लेयर से आ रही येसुदास के मधुर गीत पर था. गीत के बोल थे “यवन सुंदरी…” और मैं दशकों पुरानी यादों में खोया हुआ था. अचानक मेरी तंद्रा भंग हुई, दरवाजे पर के दस्तक से. दरवाज़ा खोला तो पाया कि वास्तव में ही एक हाड़ माँस की “यवन सुंदरी” खड़ी थी. सुसान तो यवन – यूरोपीय ही थी और अपने उम्र के चौथे दशक में भी “सुंदरी” कहला सकती थी. ये बात और है कि उसके लहराते सुनहरे केशों के बीच दो चार रूपहले बालों ने घुसपैन्ठ कर ली थी. इन कुछ वर्षों में उसके द्वारा स्वाहा किए गये अनेकों बेरल बीयर और सिगरेटों का भी कोई प्रतिकूल प्रभाव  नहीं दिखता. अलबत्ता वह एक दुखी आत्मा थी. उसकी श्रवण बाधित २० वर्षीय बेटी माँ से अलग ही रहती थी. उसकी एक सौतेली बेटी जिसे उसने अपने बेटी की तरह ही पाला पोसा था अब शादी होकर दूर ही कहीं रहती है. वे लोग कभी कभार मिलने चले आते हैं तभी नाती पोतों का साथ मिल जाया करता है. कुछ वर्षों पूर्व पति भी छोड गया, तलाक़ लेकर. अब सुसान एक महिला मित्र(पार्टनर) के साथ रह रही है, वह भी मेरे ही पड़ोस में.

“राड, मैं तुम्हारे लिए कुछ लाई हूँ” अगरबत्ती की एक पेकेट देते हुए उसने कहा “मैने इन्हें मार्केट में इंडियन स्टोर से खरीदा है, इन्हें अपने भगवान के सामने सुलगा दो और मेरे लिए प्रार्थना करो”. मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया. स्तब्ध हो उसे देखता रहा. फिर मैने पूछा “क्या कोई परेशानी हो गयी है, बता सकती हो तो मुझे बताओ”. मैने पाया कि कोई बात तो थी जो उसे उद्विग्न कर रही थी, लेकिन लगा कि शायद वह बताना नहीं चाहती. उसने बोलना तो शुरू किया परंतु वह अपनी असली पीड़ा को सहज हो कर नहीं बता पा रही थी. “राड, मैं तुम्हारे हिंदू धर्म के बारे में कुछ पूछना चाहती हूँ”.संध्या सात बजे हिंदू धर्म के बारे में क्या जानना चाहती होगी. साधारणतया यह समय तो उसका अस्पताल में रहने का होता है (वह नर्स थी) या फिर अपनी महिला मित्र के साथ किसी बार में. क्रिसमस के कुछ पहले उसने मुझे खाने पीने के लिए घर पर बुलाया था. हमारी आपस में कुछ चर्चाएँ भी हुई थी. मैं आशंकित हो रहा था कि कहीं उस दिन की चर्चा से कोई वास्ता तो नहीं है. उसे मालूम था कि मैं मदिरा सेवन नहीं करता और ना ही माँस आदि ख़ाता हूँ. मेरे लिए उसने काफ़ी बनाई थी और खाने के लिए केक, नान खटाई वग़ैरह. वो खुद अपने महिला मित्र के साथ बियर पीते हुए एक के बाद एक सिगरेट उड़ा रही थी. फिर पके अधपके गोश्त का भी नंबर लगा. उस समय उसने पूछा था “तुम्हारा धार्मिक ग्रंथ कौन सा है” मैने उस समय कहा था कि हमारा कोई एक विशेष ग्रंथ नहीं है. हमारे धर्म में इतिहास, मिथक, फलसफा सब आपस में गूँथे हुए हैं जैसे दूसरे धर्मों में भी है, चाहे ईसाई ही क्यो ना हो. परमपिता परमेश्वर स्वर्ग में बैठे बैठे ही धरती पर कुँवारी माँ से पुत्र प्राप्त करता है. हमारे मिथक भी कम रंगीन नहीं हैं. इस तरह के कई उदाहरण हमारे यहाँ भी मिलते हैं. उस समय मुझे अपनी बेवकूफी पर तरस भी आ रहा था कि कहा आधे नशे में धुत इस “यवन सुंदरी” और इसकी महिला मित्र से  धर्म और दर्शन की बात कर रहा हूँ. मैने अपना खाना पीना कुछ जल्दी ही निपटा कर उनसे छुट्टी पाना ठीक समझा. इस घटना के बाद हम लोग काई बार और मिले थे पर कभी उसने धर्म के बारे में कुछ नहीं पूछा.

“सुसन तुम अभी हिंदू धर्म के बारे में क्या जानना चाहती हो” मैने पूछा.
“राड, हिंदू धर्म का मूल भूत सिद्धांत क्या है”
“मूल भूत सिद्धांत?”
मैने उसे बताया कि मुझे खुद नहीं मालूम है  हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांत क्या हैं. मैं अपने कुछ दोस्तों से पूछ कर फ़ुर्सत से कभी बताऊँगा. अभी मुझे इस किताब में से कल के लिए प्रॉजेक्ट पूरा करना है. गनीमत थी कि वह इतना सुन कर चली गयी.

हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांत क्या है, जब कभी यह “यवन सुंदरी” दोबारा पूछती है तो मैं क्या उत्तर दूँगा ?

अँग्रेज़ी से रूपांतरित – मूल लेखक अनाम

23 Responses to “यवन सुंदरी”

  1. विनय Says:

    बहुत बढ़िया

    —आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

  2. Vineeta Yashswi Says:

    हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांत क्या है, जब कभी यह “यवन सुंदरी” दोबारा पूछती है तो मैं क्या उत्तर दूँगा ?

    Bahut achha.

  3. ranju Says:

    हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांत ? यक्ष प्रश्न है यह ..अच्छा लगा इसको पढ़ना शुक्रिया इसको पढ़वाने का

  4. amar jyoti Says:

    ‘हिन्दू’ तो फ़ारसी भाषा का एक भौगोलिक विशेषण है जिसका उपयोग सिन्धु नदी के पूर्वी क्षेत्र के निवासियों के लिये किया जाता था। वेदों,पुराणों,संहिताओं,रामायण, गीता कहीं भी इस शब्द का उल्लेख नहीं है। अंग्रेज़ों के आने के बाद ही इसका प्रयोग किसी समुदाय के लिये किया जाने लगा।सावरकर ने फ़ारसी के हिन्दू में सँस्कृत का प्रत्यय त्व लगा कर हिन्दूत्व शब्द का राजनैतिक प्रयोग सम्भवतः पहली बार किया।

  5. Amit Jha Says:

    sir pata chale to hame bhi bataaye…

  6. mamta Says:

    रोचक पोस्ट और सोचने पर मजबूर करती हुई पोस्ट ।

  7. ranjana Says:

    Sachmuch yaksh prashn hai……

  8. Abhishek Says:

    Hindu Dharm ka mulbhut sidhant Granthon mein nahin, hamare Gavon mein milega. Jara dhiraj se dekh sakein to. Swagat.

  9. amar jyoti Says:

    जब ‘हिन्दू’ जैसा कोई धर्म है ही नहीं तो फिर
    उसकी परिभाषा कैसे होगी। शैव,वैष्णव, शाक्त, बौद्ध, जैन
    आदि अनेक मत अथवा धर्म हैं जिन्हें परिभाषित भी किया
    जा सकता है। पर ऐसा मैं सोचता हूं। यह चर्चा आगे बढ़े तो
    मैं भी लाभान्वित होऊंगा।
    सादर,
    अमर

  10. हिमांशु Says:

    मैं भी फ़िर कभी सोच कर बताऊंगा हिन्दू धर्म के मूलभूत सिद्धान्त.
    बहुत रोचक प्रविष्टि. धन्यवाद.

  11. mahendra mishra Says:

    हिंदू होते हुए भी सभी को हिन्दू धर्म के मूलभूत सिद्दांत क्या है सभी को पूरी तरह से जानकारी नही रहती है यह सच है . वैसे होना चाहिए पर आज के व्यस्त समय में किसी को इतनी फुरसत कहाँ है . सभी धर्मो के मूलभूत सिद्दांत एक से होते है पर उनको असली जामा पहिनाता कौन है . पोस्ट में मुद्दे की बात रखने के लिए आभार .

  12. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत सार्थक और सटीक बात कही गई है.

    रामराम.

  13. sameer lal Says:

    बहुत रोचक और दिलचस्प पोस्ट. जानकारी बढ़े तो बताते रहियेगा.

  14. महामंत्री- तस्लीम Says:

    हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांतों के बारे में एक सोच पता लगी। इस पढवाने का आभार।

  15. tanu Says:

    हिंदुस्तान में आज आपके ब्लॉग की तारीफ पढ़ी……मेरे लिए तो कुछ नया नहीं था…..काफी दिनों से आपको पढ़ रहे हैं……लेकिन हां…..अखबार के ज़रिए कुछ और लोग भी जुड़ें आपके साथ…..शुभकामनाओं सहित

  16. seema gupta Says:

    हिंदू धर्म के मूल भूत सिद्धांत क्या है, जब कभी यह “यवन सुंदरी” दोबारा पूछती है तो मैं क्या उत्तर दूँगा ?

    “बात तो ऐसी पूछ डाली यवन सुन्दरी ने की हम भी सोच में पड गये है …????????क्या इसका जवाब कोई दे पायेगा…”

    Regards

  17. Brijmohanshrivastava Says:

    मूल लेखक जो भी हों ,आपको बहुत बहुत धन्यवाद

  18. tanu Says:

    हिंदुस्तान में एक वीकली कॉलम आता है….रवीश कुमार का…नाम है ….ब्लॉग-वार्ता….जिसमें हर हफ्ते वो किसी ना किसी ब्लॉग की खासियत बताते हैं….आज आपके बारे में पढ़ा…..काफी तारीफ लिखी थी…मैंने जो देखा था…..वो नोएडा का एडीशन था….लेकिन मेरे ख्याल से हिंदुस्तान के हर हिंदी एडीशन में आपको वो कॉलम ज़रुर मिल जाएगा….

  19. Arvind Mishra Says:

    परहित सरिस धर्म नही भाई !

  20. yoginder moudgil Says:

    वाह दादा वाह……. बहुत ही बढ़िया कथानक……………….

  21. Isht Deo Sankriyaayan Says:

    बहुत बढ़िया. हिंदू धर्म का कोई मूल सिद्धांत नहीं है. यहाँ तक की कोई एक मूल कर्मकांड भी नहीं है. रीति-रिवाज, धर्मग्रन्थ, और तो और ईश्वर तक कोई मूल नहीं है. मुझे लगता है की बस यही मूल वजह है इसकी जीवन्तता की. धन्यवाद इस अच्छे पोस्ट के लिए.

  22. राज भाटिया Says:

    बहुत ही सुंदर लगी आप की यह रचना, पता नही केसे मेरी आंखॊ से गुजर गई, ओर टिपण्णी तो मेने दी थी लेकिन आज दिखी नही शायद मने ही गलत कुछ कर दिया हो गा.
    धन्यवाद

  23. Ajeet Says:

    Hindu dharm mooltah Hindukush Parvat se lekar Hind Mahasagar ke madhya rahne vale nivasio ka jeevan jeene ke tarike ka nichor hai. Yah koi dharm na hokar ek jeevan padhati hai.Jisme “VASUDHAIV KUTUMBAKAM” se lekar ” TAMSO MA JYOTIRGAMAY” evam anya batain MELA,HAAT, TYOHARO,RITI-RIVAJO,ACHAR VYAVHAR,KARMKAND ADI KO EK DUSARE SE MAHIN BINAEI EVM SILAI KARKE BANAYAGAYA HAI.DHARM to Snatan Dharm hai.Jiska mool hai “SARVE BHAVANU SUKHINA,SARVE SANTU NIRAMAYA, SARVE BHADRANI………”,BALANCE OF NATURE & MAN.EACH & EVERY DAY WE TRY OUR BEST TO MENTAIN THIS BALANCE BY OUR WORKS,BY OUR WORDS & BY OUR THOUGHTS

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