कोल्हापुर जहाँ समृद्धि का वास है

पिछली पोस्ट में आपने पन्हाला के किले के बारे में जाना. अब कोल्हापुर चलते हैं.
 
kolhapurपन्हाला से  कोल्हापुर वापस आकर पहले राजवाडे के सामने देवी मन्दिर में दर्शन किए. वहां से महालक्ष्मी (अम्बा बाई) मन्दिर चले गए. मन्दिर प्राचीन ही दिख रही थी. अन्दर देवी तो वास्तव ही में  अद्भुत सौदर्य की प्रतिमूर्ति . हीरे और अन्य रत्नों से बनी हुई. सर पर रत्न जडित मुकुट है जिसके शीर्ष में शेष नाग को दर्शाया गया है. कहते हैं इनकी मूर्ति का वजन ४० किलो है. मूर्ति के पीछे देवी का पत्थर का बना वाहन सिंह विद्यमान है. अन्य सभी प्रमुख देवी देवता भी इस मन्दिर में प्रतिष्टित हैं. मन्दिर के बाहर चारों तरफ़ का अलंकरण भी मनमोहक है. बहुत ही सुंदर नायिकाओं की प्रतिमाएँ जडी हुई हैं. इस मन्दिर का निर्माण 7  वीं सदी के अंत में चालुक्य वंश के राजा करण देव  ने कराया था तथा इसका विस्तार यादवों ने ९ वीं सदी में कराया. हिंदू पुराणों में वर्णित शक्ति पीठों में से यह एक है. ऐसा कहा जाता है कि विष्णु और लक्ष्मी जी इस क्षेत्र में वास करते हैं. अतः दर्शनार्थियों की मनोकामना तो पूर्ण होती ही है साथ में मोक्ष भी प्राप्त होता है.  साधारणतया मंदिरों की मूर्तियाँ पूर्व या उत्तर मुखी होती हैं परन्तु यहाँ महालक्ष्मी पश्चिम मुखी हैं.mahalaxmimain
मन्दिर के इस मूर्ती के पीछे सिंह  का विद्यमान होना हमारे लिए कौतुहल  का विषय बन गया. हमने पुरातत्व के बारे में आधी अधूरी जानकारियां हासिल कर रखी हैं और हमारे अनुसार तो यह प्रतिमा दुर्गा जी का होना चाहिए. लक्ष्मी जी का वाहन तो उल्लू है. लेकिन हमारी बात कोई सुने तब न. फ़िर कुछ और जानकारी हासिल की तो पता चला की वास्तव में यहाँ की मूर्ति को गढा ही नहीं गया है जैसे हम आम मूर्तियों को पाते हैं. एक चौकोर चबूतरे के ऊपर एक अनगढा   शिलाखंड है एक शिव लिंग की तरह, जिसे स्वयंभू  माना जाता है.  उसे ही रंत्नों से जड़ कर एक रूप दे दिया गया है. कुछ विद्वानों का तो यह भी मत है कि यह पूर्व में एक जैन मन्दिर था और यहाँ की अधिष्ठित देवी पद्मावती थी. इस बात का प्रमाण मन्दिर की दीवारों पर जैन धर्म के अन्य शिल्प बताये जाते हैं. यह बात हमें तर्क संगत लगती है क्योंकि कर्णाटक के चालुक्य वंश के राजा ने इस मन्दिर का निर्माण  करवाया था और जैन धर्मके प्रति  इस वंश की सहानुभूति रही है . जैसा पूर्व में कहा जा चुका है, ९ वीं शताब्दी में इस मन्दिर का पुनः विस्तार यादव कुल के हिंदू राजाओं के द्वारा कराया गया था.

8590272कोल्हापुर के नाम के बारे में मिथक है कि कोल्हासुर नामक एक असुर वहां की प्रजा को आतंकित किए हुए था. देवी महालक्ष्मी ने उसका वध कर लोगों को सुरक्षा प्रदान की. उस असुर की मृत्यु पूर्व की इक्षा थी की उस के नाम से नगर को जाना जावे. उसकी इस इक्षा की पूर्ति करते हुए पंचगंगा नदी के तट पर बसे इस नगर को कोल्हापुर कहा जाने लगा. सन १७८२ में कोल्हापुर मराठा शासकों की राजधानी बनी और शिवाजी के वंशज आज भी अपने नए महल में रहते हैं. महल के नीचे वाले हिस्से में राज परिवार के स्वयं का संग्रहालय बना हुआ है जिसमे बहुमूल्य वस्तुओं को प्रर्दशित किया गया है जो देखने योग्य  है. महल के एक तरफ़ बड़ा सा बागीचा है जिसमें कुछ वन्य प्राणी  जैसे हिरन आदि स्वछन्द विचरण करते देखे जा सकते हैं.

kolhapur_new_palace_another_angleनगर भ्रमण से ही आभास हो जाएगा की इस नगर पर लक्ष्मी जी की अनुकम्पा है. पूरे भारत में यही एक ऐसा शहर है जहाँ सबसे अधिक मर्सदेस (Mercedez Benz) कारें पायी जाती हैं और प्रति व्यक्ति आय भी यहाँ का सर्वाधिक है. यह नगर वास्तव में विशुद्ध मराठी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है. मराठी फिल्मों की भी यह ऐतिहासिक राजधानी है. वी. शांताराम ने अपनी फिल्मी यात्रा यहीं से प्रारम्भ की थी. भारत की सर्वप्रथम फीचर फ़िल्म  राजा हरिश्चंद्र की परकल्पना भी यहीं हुई थी.आए दिन यहाँ फ़िल्म समारोह होते रहते हैं.  शास्त्रीय गायन में भी लोगों का बड़ा रुझान दिखता है. कुश्ती के अखाडे भी यहाँ बहुत हैं. कई मराठा राजा आदि भी कुश्ती के शौकीन रहे हैं.

kassaarकोल्हापुर से १०-१२ किलोमीटर बंगलुरु राजमार्ग पर कनेरी गाँव में श्रीक्षेत्र सिद्धागिरी मठ है जो चारों ओर हरियाली  और पहाडियों के बीच ७ एकड़ भूभाग पर फैला हुआ है. . यहाँ वैसे तो सैकड़ों साल पुराना शिव मन्दिर है परन्तु जो अभूतपूर्व है वह है महाराष्ट्र के ग्राम्य जीवन की झांकिया. प्रतिमाएँ जो बनाई गई हैं एकदम जीवंत हैं. तेली घनी में कार्य करते हुए, किसानों को जुताई करते हुए, नाई की दूकान, किराने की दूकान, इलाज करता वैद्य  आदि ऐसी ऐसी सुंदर झांकियां हैं जो आपको अचंभित कर देंगी. झांकियों में प्रर्दशित आदमकद मूर्तियाँ इतनी कलात्मक और सजीव हैं कि आश्चर्यजनक  रूप से उनके जीवित होने का भ्रम हो सकता है. इन झांकियों की संख्या 80 के लगभग है. कहते हैं कि यह अपने आप में एक अनोखी प्रदर्शनी है जो अन्यत्र नहीं है.gurawnallband

कोल्हापुर अपने कोल्हापुरी चप्पलों के लिए भी विश्व विख्यात है,   जो हर रेंज में मिलते हैं, सस्ते से सस्ता मंहगे से महंगा. यहाँ का खान पान भी अपनी विशेषता लिए है. सब्जियां तीखी परन्तु काफी रुचिकर रहती हैं. भारत में अन्य शहरों के होटलों में वेजिटेबल कोल्हापुरी तो सबने खायी भी होगी. कुल मिला कर कोल्हापुर   सभी मायनों में एक सुंदर शहर  है.

36 Responses to “कोल्हापुर जहाँ समृद्धि का वास है”

  1. हिमांशु Says:

    निश्वय ही ये झांकियां अन्यतम हैं. कहीम अन्यत्र इनके वारे में नहीं सुना. देखने में तो यह एकदम जीवंत लगती हैं. धन्यवाद.

  2. Ratan Singh Says:

    आपने तो कोल्हापुर का जिवंत वर्णन कर हमें घर बैठे कोल्हापुर घुमा दिया | बहुत अच्छी जानकारी भरे लेख के लिए आभार !

  3. Arvind Mishra Says:

    कोल्हापुर की तफसील से दी गयी जानकारी रोचक और ज्ञानवर्धक रही ! और कोल्हापुरी चुम्बन भी तो चर्चा में रह चुका है ! जिससे एक प्रिंस के गाल सुर्ख हो गए थे !

  4. amar jyoti Says:

    बहुत ही रोचक और ज्ञानवर्द्धक।

  5. प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर Says:

    दी गयी जानकारी रोचक और ज्ञानवर्धक रही!!!!

  6. seema gupta Says:

    कोल्हापुर से जुड़ी अत्यन्त रोचक जानकारी और दुर्लभ चित्रों के लिए आभार

    regards

  7. Smart Indian Says:

    कोल्हापुर यात्रा बहुत रोचक रही. धन्यवाद!

  8. anil pusadkar Says:

    कोल्हापुर जाने का सौभाग्य आज तक़ नही मिला है,आपके ज़रिये माता के दर्शन हो गये,

  9. ranju Says:

    बहुत रोचक जानकारी दे दी आपने इस लेख के माध्यम से यही बैठे हम कोल्हापुर घूम लिए जैसे शुक्रिया

  10. mamta Says:

    आपके लेख से कोल्हापुर की सुन्दरता भी देखने को मिली और इसके बारे मे जानने को भी मिला ।
    वैसे कोल्हापुर के नाम से चप्पलें ही याद आती है ।🙂

    आखिरी वाली फोटो तो बिल्कुल ही जीवंत लग रही है ।

  11. Abhishek Mishra Says:

    विडम्बना है की स्थानीय जानकारियां मूल तथ्य को पीछे धकेल देती हैं. स्थानीय जीवन शैली को झांकी के माध्यम से झारखण्ड के रांची और आंध्रप्रदेश के अरकू वैली के संग्रहालय में भी देखा है.

  12. dhirusingh Says:

    मैं बचपन मे कोलहपुर गया था .आज भी हमारी यादो मे ताज़ा है यह शहर उस समय बहुत सुंदर और स्वछ था . हां वहां की चप्पल का तो जबाब नही .

  13. पं. डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    कोल्हापुर से जुडी अत्यन्त रोचक सचित्र जानकारी प्रदान करने हेतु आभार स्वीकार करें……….

  14. हरि जोशी Says:

    हम तो कोल्‍हापुर को अब तक सिर्फ कोल्‍हापुरी चप्‍पलों के माध्‍यम से जानते थे लेकिन आपने नयनाभिराम चित्रों के माध्‍यम से जो जानकारी दी है वह बहुत रोचक है।

  15. संजय बेंगाणी Says:

    सुन्दर लेख. रोचक विवरण.

    ( इच्छा को इक्षा लिखा गया है. सम्भव है मेरी ही भूल हो…अन्यथा ठीक कर सकते है. )

  16. sandhya gupta Says:

    Har baar ki tarah rochak aur jeevant.

  17. Amit Says:

    कोल्हापुर यात्रा बहुत रोचक रही. धन्यवाद!

  18. Isht Deo Sankrtiyaayan Says:

    यात्रा विवरण तो जानदार है, पर हमको तो आपने एक और तथ्य की ओर ध्यान दिला दिया. कोल्हापुर चप्पलों के लिए भी बहुत मशहूर रहा है, जो जूता कटेगरी की चीज़ है.पता नहीं, अब वहाँ इस उद्योग और इसके प्रोडट्स की क़्वालिटी का क्या हाल है! ठोदडा इसका भी विवरण अगर आपने तफसील से दिया होता तो मेरा काम ज़रा हल्का हो जाता. बहरहाल, आपने ध्यान दिलाया, ये भी बडी बात है. आभार.

  19. मुसाफिर जाट Says:

    सुब्रमनियम जी,
    मंदिरों और झांकियों के चित्र तो अच्छे लगे. झांकी देखकर तो एक बार को ऐसा लगा कि आप किसी गाँव में किसी घर में चले गए थे. घरवालों के चित्र आपने खींचे हों. इतनी सजीव झांकी.
    आपने लिखा है कि कोल्हापुर अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए भी मशहूर है. आपने इन प्राकृतिक नजारों के चित्र तो दिखाए ही नहीं. कृपया अगली पोस्ट में खूब सारे चित्र दे दें. नहीं तो कुछ चित्र मेरे लिए मुझे मेल कर दें.
    धन्यवाद.

  20. Shastri JC Philip Says:

    वाह सुब्रमनियन जी !! इस आलेख को पढ कर मन एकदम ताजा हो गया. इन में से कई स्थान अभी पिछले महीने ही देखने का मौका मिला था.

    कनेरी गांव में स्थित जो शिल्प आपने दिखवाये उन्हों ने मन को हर लिया. अच्छा किया कि जल्दबाजी में जाने के बदले मैं ने वहां अपनी यात्रा में जाने का सोचा. शायद मार्च में जाना होगा.

    सस्नेह — शास्त्री

  21. ghughutibasuti Says:

    बढ़िया यात्रा करवाने के लिए धन्यवाद। कोल्हापुर देखा तो नहीं है परन्तु आज से थोड़ा सा पहचाना जरूर लगेगा।
    घुघूती बासूती

  22. Gyan Dutt Pandey Says:

    ये झांकियों के चित्र तो वाह! बाकी भी दिखाते तो मजा आ जाता।

  23. hempandey Says:

    कोल्हापुर यात्रा के माध्यम से ज्ञान वर्धन हुआ. धन्यवाद.

  24. sanjay vyas Says:

    कोल्हापुर की यात्रा तो शानदार करवा ही दी पर महाराष्ट्रीय ग्राम्य जीवन की झांकी के तो क्या कहने! मानवीय रिश्तों की उष्मा से सराबोर.पुरातत्व के निर्जीव पाषाणों को यही तो जीवन प्रदान करते है.

  25. राज भाटिया Says:

    वाह आप ने तो मन ललचाव दिया कोहलपुर दिखा कर, चित्र एक से बढ कर एक, मंदिर भी एक से बढ कर एक, चित्र देख कर लगता है की सच मे इन मे जान है.
    एक बात आप से पुछनी है की साधारणतया मंदिरों की मूर्तियाँ पूर्व या उत्तर मुखी होती हैं, तो रो मे रखने वाली मुर्तिया, केसे रखी जाये हम ने घर मे एक छोटा स मंदिर बना रखा है जिस मे बिना सोचे समझे ही हम ने अपनी मर्जी से , ओर सहुलिय्त के हिसाब से धातू की मुर्तिया रख दी है, जिन की पुजा का ठेका हमारी बीबी का है.
    इस सुंदर लेख के लिये आप का बहुत बहुत धन्यवाद

  26. alpana Says:

    सर,
    बहुत ही रोचक जानकारियाँ मिलीं और चित्र भी अच्छे लगे..
    मंदिर के बारे में जानकारी बहुत ही रोचक और आश्चर्यजनक लगी.
    क्योंकि शक्ति का वाहन है शेर और लक्ष्मी जी का उल्लू—
    शायद कुछ रहस्य अब भी उलझे हुए हैन..जरुर वहाँ का कोई निवासी ही इस के बारे में बता सके.
    @ राज सर,
    मंदिर के लिए बेस्ट प्लेस इस नॉर्थ ईस्ट कॉर्नर ऑफ थे हाउस.
    मंदिर में मूर्तियाँ रखने की दिशा भी भगवान जी के ऊपर एवं —आप किस भगवान जी की मूर्ति रख रहे हैं उसपर डिपेंड करता है–अक तो वास्तु—एग्ज़ॅंपल –गणेश जी साउत फेसिंग होने चाहीए-मतल्ब उन्हें उत्तर में बिताएँ…ऐसे ही सब भगवानो का अल्ग अल्ग हिसाब है…जब पूजा करते हैं तो भगवान जी की तरफ बॅक नहीं करते…एट्सेटरा…थोडा कॉंप्लिकेटेड सा है…

    सब से अच्छा है—

    जहाँ सुविधा हो वहाँ मंदिर और मूर्तियाँ रख दें..[टाय्लेट फेसिंग नहीं होना चाहीी बस !और साउतवेस्ट में मंदिर रखना अवाय्ड करें]..सीधा सा सल्यूशन..
    वैसे दिल में श्रद्धा हो सब जगह भगवान दिखेंगे.

  27. sareetha Says:

    कह पाना बड़ा ही मुश्किल है कि आपने कोल्हापुर जाने की हमारी इच्छा को हवा दी है या हमें घर बैठे कोल्हापुर भ्रमण का आनंद उठाने का मौका दिया है । परिपूर्ण और रोचक पोस्ट । बढिया जानकारी । मज़ा भी खूब आया ।

  28. Vineeta Yashswi Says:

    achha laga apka ye schitra varnan

  29. महामंत्री- तस्लीम Says:

    मैंने तो कोल्हापुर की चप्पलों के बारे में ही सुना था। पर वह इतना समृद्ध क्षेत्र है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। जानकारी के लिए आभार।

  30. Satish Saxena Says:

    जीवंत यात्रा सी महसूस की, बेहतरीन वर्णन शैली ! शुभकामनायें !

  31. raj sinh Says:

    sir,

    hamesha hee aapke likhe ka aanad uthata hoon . gyan vardhan to hota hee hai . peshe se bhale kuch raha lekin itihas ko vartman se jodteen ye hamaree dharoharen , thatee hee manta hoon .bhale hee use le meree drishti kuch aur ho par ye sthal, itihas se lekar vartman tak unpar aapkee samyak rochak shailee me kiye aalekh, gyan aanad aur us se bhee badh unhen sambhalne kee zimmedaree ka ehsas karatee hain .

    bahut bahut dhanyavaad. aapka lekhan stutya hai !

  32. नरेश सिंह Says:

    सुब्रमनियम जी,
    सजीव झांकियों के चित्र अच्छे लगे. आज तक कोल्हापुर की चप्पल के बारे में ही सुना था। आपने यहा कि पूरी सैर ही करा दी ।जानकारी के लिए आभार।

  33. varsha Says:

    kolhapur ke baare me bahut kuch jaanne ko mila, rochak jaankaari ke liye dhanyawaad..

  34. Shama Says:

    Aapkaa blog zyadaa der to nahee padh paayee…lekin jobhi padha, kaafee jankaree haasil huee…!
    Dhanyawaad !
    Aapki mere blogpe comment ke liye shukriya…uskaa uttar maine waheen pe diya…bohot khushee hogi gar aap use padh len….shayad aapki galatfehmee door ho jay ! Yr ek behad namr binatee hai…

  35. परमजीत बली Says:

    सुब्रमनियम जी,बहुत अच्छी जानकारी दी है।सजीव झांकियों के चित्र भी अच्छे लगे.जानकारी के लिए आभार।

  36. लावण्या Says:

    बहुत बढिया लगा कोल्हापुर वर्णन -जब हम वहाँ गये थे तब झाँकियाँ नहीँ बनी थीँ परँतु, हैँ बहुत सुँदर !
    जय अम्बे महालक्ष्मी की !!
    – लावण्या

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