बंगलूरू का मूंगफल्ली मेला

42-18596817क्या आप सोचते हैं कि भारत की तकनीकी राजधानी, बंगलूरु ने अपना ग्रामीण स्वाद खो दिया है. लेकिन इस तरह सोचना आपकी भूल होगी. कोई शहर या कस्बा जितना भी आधुनिक बनता जाता है उतने ही उनके नागरिकों में ग्रामीण आँचलों की शांति और सुरम्यता के प्रति आकर्शण बढ़ता जाता है. इसका सबूत है बंगलूरु में प्रति वर्ष होने वाली मूँगफल्ली मेले की बढ़ती लोकप्रियता जो बुल टेंपल रोड, बसवनगुडी में भरता है. हमने मेले तो बहुत सुने हैं जो अपनी विशिष्टता के लिए जाने जाते हैं, जैसे, गधों का, ऊँटों का, बकरियों का आदि परंतु यह मूँगफल्ली का मेला हमारे लिए एकदम नया ही था. वहाँ के स्थानीय कन्नड़ भाषा में इसे “कडलकाई परिशे” कहा जाता है. यह मेला कार्तिक माह (यह अधिकतर नवंबर के माह में पड़ता है) के अंतिम सोमवार को लगता है जिसमे भाग लेने राज्य के विभिन्न भागों से कृषक अपनी मूँगफल्ली की फसल को लेकर आते हैं.

peanutsवैसे इस मेले की और कोई ख़ासियत हमें नहीं दिखी. मेला तो बस मेला ही है, अब यहाँ मूँगफल्ली का है. मेले में ग्रामीणों की बड़ी संख्या होती है इसलिए बहुत सारे स्टॉल्स लग जाते हैं जिनमे ऐसी वस्तुएँ होती हैं जो गाँव वालों के लिए उपयोगी हो. खेल तमाशे वग़ैरह भी रहते हैं. गाँवों से भी मूँगफल्ली के अलावा दूसरी छोटी मोटी चीज़े जिनमे ग्रामीण शिल्प भी शामिल है, आती हैं. शाम शासन के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन कोहिनूर खेल मैदान में रहता है, जिसमे लोक कलाकार भाग लेते हैं. जिस दिन यह मेला लगा था हम बंगलूरु में ही थे और दुपहर के बाद हमारे भानजे ने कहा, चलिए मामाजी आपको घुमा लाते हैं और हम पहुँच गये इस मेले में जहाँ स्थानीय लोगों के अतिरिक्त, गाँव वाले और बंगलूरु में रह रहे दूसरे प्रदेश वालों की भीड़ थी. भिन्न भिन्न बोलियाँ बोली जा रही थीं. अब तो वास्तव में यह एक ग्रामीणों का मेला ना होकर एक संगम था “मेरा भारत महान”. बस घूम घाम कर लौट पड़े थे.

ganesha-templeदूसरे तीसरे दिन ही हम लोग गणेश जी के मंदिर गये. यहाँ लोग उसे दोड्डा गणपति कहते हैं क्योंकि यहाँ की मूर्ति विशाल है – १० फीट ऊंचा और १५ फीट चौडा. “दोड्डा” का अर्थ होता है “बड़ा” उसके पास ही टीले के ऊपर एक दूसरा मंदिर था “दोड्डा बसवा” अर्थात बड़े नंदी का. वास्तव में यह एक विशालकाय नंदी ही था जो लगभग १५ फीट ऊंचा और २० फीट लंबा है. भारत के सबसे बड़े नंदियों में से यह एक है. आजकल का गोपुरम वाला प्रवेश द्वार अभी हाल में ही बना है. मूलतः नंदी के ऊपर, एक समतल छत देकर, एक ढांचा बनाया गया था. हमने वहां के पुजारी से पूछा कि पंडित  जी यह कब का बना है तो उसने कहा हजारों साल पहले का है. हम अपना सर खुजाते रह गए. बाद में ही पता चला कि बंगलूरू के संस्थापक केम्पे गौडा ने सन १५३७ में इस मन्दिर का निर्माण करवाया था.

dodda-basawa1हमने बात तो प्रारम्भ की थी मूंगफल्ली के मेले की और पहुँच गए नंदी के पास. संभवतः यह हमारी कमजोरी है. लेकिन यहाँ ऐसी बात नहीं है, मूंगफल्ली का नंदी से सीधा सम्बन्ध रहा है.  किसी समय बसवनगुडी (इसका मतलब ही होता है नंदी का मन्दिर) के चारों तरफ़ गुट्टाहल्ली, मावल्ली और दसरहल्ली नामके गाँव थे जहाँ की मुख्य कृषि मूंगफल्ली हुआ करती थी. हर पौर्णमि के दिन एक सांड खेतों में घुस कर फसल को बरबाद कर दिया करता था. गाँव वाले परेशान ही थे कि एक दिन किसी को खेत में किनारे पड़ी हुई एक नंदी की मूर्ति मिल गई. उन्होंने उसे एक जगह स्थापित कर दिया और नंदी को पहली पैदावार समर्पित करने की प्रतिज्ञा करते हुए अपने फसल की सुरक्षा के लिए प्रार्थना की. कहते हैं कि उसके बाद सांड का उपद्रव बंद हो गया. यह भी कहा जाता है कि नंदी की प्रतिमा जो कभी छोटी थी, आकार में बड़ी  होती  चली  गई  और उसकी बढौतरी को नियंत्रित करने के लिए माथे पर एक कील ठोक दी गई. त्रिशूल नुमा वह कील अभी भी दिखायी देती है. इसी नंदी को केम्पे गौडा के द्वारा आश्रय प्रदान किया गया था. दोड्डा बसवा की सेवा में दूर दूर से गाँव वाले हर वर्ष अपनी मूंगफल्ली भेंट करने पहुँचते है जिसने मेले  का रूप धारण कर लिया. 

क्योंकि हम दोड्डा बसवा का चित्र नहीं दे पाए इसलिए एक छोटी विडियो क्लिप:

 

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40 Responses to “बंगलूरू का मूंगफल्ली मेला”

  1. Ratan Singh Says:

    बहुत बढ़िया जानकारी |

  2. Arvind Mishra Says:

    मूंगफली मेले के एक संस्कृति उतसव का परिचय ! शुक्रिया !

  3. sameer lal Says:

    मूंगफली मेले के विषय में पहली बार जाना. आपका बहुत आभार इस जानकारी के लिए.

  4. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत बेहतरीन जानकारी मिली. आभार आपका.

    रामराम.

  5. Amit Says:

    bahut sundar jaankaari di aapne..

  6. Poonam Says:

    एक पूर्णतः नई जानकारी मिली . मूंगफली मेला घुमाने के लिए धन्यवाद !

  7. ranju Says:

    यह जानकारी पहली बार पढ़ी …मूंगफली वैसे ही बहुत पसंद है मुझे ..इस तरह के मेले के बारे में पढ़ना रोचक लगा

  8. amar jyoti Says:

    रोचक और ज्ञानवर्द्धक।

  9. प्रदीप Says:

    कमाल है! बेंगलॊर मै रहकर भी इस मूंगफल्ली मॆले कि जान्कारी नही थी… 🙂

  10. Vineeta Yashswi Says:

    Nayi jankari mili…

  11. हरि जोशी Says:

    मूंगफली के एक्‍सक्‍लूसिव मेले के बारे में जानकार अच्‍छा लगा।

  12. Abhishek Mishra Says:

    Nandi aur Mungfali ke sambandh ki rochak jaankari di aapne. Swagat.

  13. Anunad Singh Says:

    ये मिट्टी सहित मूंगफली देखकर मन ललचा गया। कच्ची मूंगफली मुझे बहुत भाती है।

  14. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    ग़जब मेला है भाई, यहाँ तो पहुंचना चाहिए.

  15. sanjay vyas Says:

    ये पोस्ट अगर कडाके की सर्दी के दिनों में आई होती तो गरमा गरम मूंगफली ज़रूर खाने का मन होता.पर बधाई और साधुवाद.

  16. विष्‍णु बैरागी Says:

    रोचक जानकारी दी आपने। धन्‍यवाद।
    ऐसी ही अगली रोचक जानकारी की प्रतीक्षा रहेगी।

  17. Sciblog Says:

    मूंगफली मेले के एक संस्कृति उतसव का परिचय ! शुक्रिया !

  18. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    मूंगफली मेले का विवरण अच्छा लगा। पर नन्दी के बढ़ने की कथा गढ़ी हुई है।

  19. mahendr mshra Says:

    मूंगफली मेले का विवरण अच्छा लगा . बेहतरीन जानकारी मिली…

  20. MUSAFIR JAT Says:

    सुब्रमनियम जी,
    ये मेरा भारत ऐसा ही है.

  21. dhirusingh Says:

    मूंगफली तो हमारे यहाँ भी होती है लेकिन मेला
    नही

  22. नरेश सिंह Says:

    मूंगफली का मेला भी हो सकता है यह पढ कर आश्चर्य हुआ था । जानकारी पाकर अच्छा लगा ।

  23. Shastri JC Philip Says:

    कमाल है सुब्रमनियन जी कि मूंगफली का भी मेला!! हिन्दुस्तान की विविधता मुझे रोज आश्चर्यचकित करती है!

    सस्नेह — शास्त्री

    — हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

    महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

  24. लावण्या Says:

    बहुत आनँद आया सुब्रह्मणियमजी..

    आपसे अनुरोध है कि

    आप तमिल + कन्नड भाषा के साहित्य के बारे मेँ भी लिखियेगा

    – लावण्या

  25. alpana Says:

    waaah ! yah to ek dum nirali jaankari hai..

    mungphali mela…south mein muunphali ki kheti hoti hai..sach mein nain maluum tha….dhnywaad jaankari badhi…aur temple ki clip bhi dekhi

  26. alpana Says:

    there is some problem here -when i click on my name in comments it takes to a bible site—there is some problem with wordpress pages…

    no idea how it links to some other site…my site address is working fine otherwise.

    http://www.alpana-verma.blogspot.com

  27. alpana Says:

    try keeping mouse curser [no need to click]
    on both addresses..first on first comments ID—snap preview shows–wrong site

    whereas web address in second comment shows snap–of real site–

  28. राज भाटिया Says:

    बहुत ही सुंदर लगा इस मेले के बारे पढ कर, अब तो सदिया हो गई मेला देखे, हमारे यहां भी मेले तो लगते है, लेकिन न्जो मजा देसी मेले का है वो यहा नही.
    धन्यवाद

  29. उन्मुक्त Says:

    मैं अक्सर बैंगलोर जाता हूं पर कभी इस मेले को देखने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ।

  30. puja upadhyay Says:

    hamein to yahan rah kar bhi is mele ke bare me pata nahin chala! ab agle saal jaroor dekhne jaayenge. dodda basva ki picture nahin bhej paane ke liye sorry, hamein kahin jaane ki chutti hi nahin mil paati 😦

  31. common man Says:

    मजा आ गया, इस पोस्ट और कोल्हापुर वाली दोनों ही बहुत बढ़िया. चित्र बिल्कुल सजीव हैं>

  32. anupam agrawal Says:

    अच्छी और रोचक जानकारी .
    सजीव जैसे वहीं घूम रहे हों

  33. Gyan Dutt Pandey Says:

    बैंगलूरु के नाम से कैम्पेगौड़ा और नन्दी याद आते थे। अब मूंगफली भी टैग हो गयी बेंगळूरु के साथ!

  34. vidhu Says:

    अब तो कमोबेश सभी महानगरों मैं इस तरह के मेले लगने लगें हैं …हमारे यहाँ ख़ास कर दिवाली के मौसम मैं दुसरे अन्य मेलों के साथ मध्यप्रदेश कृषि मेला लगता है जहाँ लोगों की भीड़ होती है ….समय के साथ लोग अब पुराने की और लौट रहें है …मेरे यहाँ ट्रेडिशनल चीजों की ढेर लगी है ये खरीददारी मैं करती भी इस लिए हूँ की उनलोगों की आर्थिक मदद हो सके…..मुमफली मेला और कोलाह्पुर वाली पोस्ट जानदार है ….मन ललचा उठता है देखने जाने के लिए ….-शुक्रिया

  35. sareetha Says:

    लगता है आप इन दिनों भारत भ्रमण के अपने अनुभव हम सबके साथ बाँट रहे है । यूँ लगता है कि आप यात्रा वॄतांत कहते रहें और हम बस टकटकी बाँधे देखते रहें । दिल चाहता है , आपकी नज़रों से दुनिया के हर रुप को देखें – समझें ।

  36. varsha Says:

    ham bhi wahi soch rahe the ki moongfali se hatkar aap mandir me kahaa pahunch gaye!! waise rochak post hai..moongfali ka mela!

  37. डा. अमर कुमार Says:


    सुब्रह्मणियमजी,
    हर बार एक नई जानकारी देने का आपका यह अनोखा प्रयास प्रशंसनीय है ।
    पर.. लावण्या जी से सहमत.. कन्नड़ एवं तेलुगू के प्राचीन एवं समकालीन साहित्य का हिन्दी में दस्तावेज़ीकरण कर सकें, तो अति प्रसन्नता होगी ।

  38. hempandey Says:

    मूंगफली मेले के बहाने नन्दी और मूंगफली से सम्बन्धित दंतकथा की जानकारी मिली धन्यवाद.

  39. परमजीत बली Says:

    रोचक और ज्ञानवर्द्धक।

  40. brahmin-barcelona Says:

    hello .friend..bahut acha laga pad kar..bahut maja aya main bhi shiv ji ka ek chota sa bakt hoon..main net sey brahmin barcelona key naam sey juda hua hoon…or jankari aap mujey meri mail par send kartey rahengey main ye icha rakhta hoon..danyavaad

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