Archive for मई, 2009

झील पर तैरते टापू

मई 25, 2009

दक्षिण अमरीका की सबसे ऊंची और लम्बी पर्वत श्रंखला “एंदेस” (Andes) (हिमालय के बाद यही पृथ्वी पर सबसे ऊंची पर्वत श्रंखला है) उस महाद्वीप के उत्तर से दक्षिण तक लगभग ७००० किलोमीटर लम्बी है. इसी पर्वत के ऊपर  दुनिया का सबसे ऊँचाई में स्थित (समुद्र तल से ३८१० मीटर – १२५८० फीट)  नौचालन योग्य झील “टिटिकाका” भी है जो लगभग १८० किलोमीटर लम्बी है. इस झील का  बड़ा हिस्सा पेरू में समाहित है जब कि एक  हिस्सा बोलीविया के अर्न्तगत भी आता है. १३ वीं से लेकर १६ वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में “इनका” (Inca) सभ्यता फल फूल रही थी.andesअन्डेस पर्वत श्रंखला का एक भाग

इस झील में एक विस्मयकारी बात जो दिखाई देती है वह है वहां के तैरते हुए टापू. उस इलाके में एक जनजाति “उरो”  हुआ करती थी जो इन्काओं से भी पहले की थी. बाहरी आक्रमण से अपने आपको बचाने के लिए उन्होंने एक नायाब तरीका ढूँढ निकाला. इसके लिए सहायक हुई वहां झील के किनारे उगने वाली एक जलीय वनस्पति (रीड-मुश्कबेंत)

a1ssc1 अंग्रेजी में Scirpus totora कहा गया है. एक प्रकार से यह हमारे भर्रू वाला पौधा ही है जो लगभग ८/१० फीट तक ऊंचा होता है. अन्दर से पोला. समझने के लिए कह सकते हैं कि पतला सा बांस जिसे बेंत सरीखे मोडा भी जा सकता हो.  इन लोगों ने इस तोतोरा को काट काट कर एक के ऊपर एक जमाया जिससे एक बहुत ही मोटी परत या प्लेटफोर्म बन जाए. आपस में उन्हें जोड़ कर वाँछित लम्बा चौडा भी बना दिया. यह पानी पर तैरने लगी . इसे इतना बड़ा बना दिया कि उस पर अपनी एक झोपडी भी बना सकें. अब उनकी झोपडी पानी पर तैरने लगी. तोतोरा की एक खूबी यह भी है कि पानी में रहते हुए उनकी जड़ें निकल कर आपस में एक दूसर को गूँथ भी लेती हैं. जब नीचे का भाग सड़ने लग जाता तो ऊपर से एक और परत तोतोरा की बिछा दी जाती. इस तरह यह प्लेटफोर्म कम से कम ३० वर्षों तक काम में आता है. वैसे वे लोग इन झोंपडियों में किनारे ही रहा करते थे और अपने प्लेटफोर्म को किनारे से बांधे रखते थे परन्तु जब भी उन्हें बाहरी लोगों के आक्रमण का डर सताता तो वे किनारा छोड़ कर झील में आगे निकल जाते थे जैसे हम अपनी नावों को करते हैं. हाँ ये लोग तोतोरा की डंठलों से अपने नाव का भी निर्माण करते हैं. समुद्र में जाने योग्य बड़े बड़े नाव इसUros2तोतोरा से बनाये जाने का भी उल्लेख मिलता है. तोतोरा केवल उरो लोगों की ही नहीं बल्कि झील के किनारे रहने वालों के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है. जिस प्रकार बांस से हम दैनिक उपयोग की वस्तुवें, कलात्मक सामग्रियां आदि बनाते हैं, वैसे ही तोतोरा का भी प्रयोग होता है.Uros4

इसी तकनीक को आधार बनाकर टिटिकाका झील में बड़े बड़े द्वीप बना दिए गए हैं जिनमे कई झोंपडियाँ बनी हुई हैं. उरो जनजाति के तो लगभग १००० लोग ही जीवित हैं परन्तु इन द्वीपों में बसने वाले उनमे से आधे ही हैं. कहा जाता है कि उरो जनजाति के लोगों का खून काला होता था (शायद हमारे काले गुलाब की तरह) जो उन्हें वहां उस जानलेवा ठंडे पानी के ऊपर  जीने के लिए सहायक हुआ करता था.  शुद्ध उरो मूल की अंतिम महिला का निधन १९५९ में हो गया था और आज जो वहां बसते हैं वे ऐमारा और इनका से मिश्रित वर्ण के हैं. फिर भी वे उरो परंपरा को संजोये हुए हैं. उनकी भाषा भी अब बदल कर ऐमारा लोगों की हो गयी है.Uros

मूलतः उरो लोग तो बड़े ही शर्मीले प्रकृति के रहे परन्तु आज जो उनके वंशज तितिकाका के बड़े बडे द्वीपों जैसे तोरानिपाता, हुआका, हुअकानि, सांता मारिया आदि में रह रहे हैं वे वास्तव में एकदम आधुनिक हैं.  आलू और बार्ली की खेती करते है, मछलियों और पक्षियों का शिकार भी करते हैं. उन्हें मालूम है कि कैसे उनकी जीवन शैली को देखने के लिए बाहरी लोगों को जुटाया जावे. उन्होंने अपने द्वीपों में पर्यटकों के रहने के लिए भी कमरे बना रखे हैं. सर्वसुविधायुक्त. उनके स्वयं के घरों में भी सभी आधुनिक संसाधन उपलब्ध हैं जैसे फ्रीज, डिश टीवी, वगैरह. बिजली के लिए इन्होने सौर ऊर्जा के संयंत्र लगा रखे हैं. पर्यटक वहां रहें, उनके साथ नाचे गायें, उनका खाना खाएं. लेकिन एवज़ में अपनी गाँठ भी ढीली करें.

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इन लोगों की तैरती बस्तियों तक पहुँचने के लिए हमें पूनो जाना होगा जिसे टिटिकाका का प्रवेश द्वार कहते हैं. यहाँ से मोटर बोट मिलते हैं जिनमे आगे की यात्रा की जाती है. पूनो जाने के लिए पेरू की राजधानी लीमा से नियमित उडाने उपलब्ध हैं. पूनो के पास वाला हवाई अड्डा जुलियाका कहलाता है. अब जब पेरू जा ही रहे हैं तो वहां “माचू पिच्चु” भी देख आना चाहिए. पहाडों पर इनका लोगों के द्वारा बसाया गया प्राचीन नगर जो विश्व के सात नए आश्चर्यों में से एक है. यदि ऐसा कार्यक्रमक बनता है तो लीमा से “कुज्को” की उडान भरनी होगी. कुज्को से रेलगाडी चलती है और पूनो तक आती भी है. इस तरह एक पंथ दो काज. माचू पिच्चु भी देख लेंगे. _Machu_Picchuमाचू पिच्चु

आप धोके में न रहे. हम यहाँ कभी नहीं गए परन्तु सपना तो देख ही सकते हैं.

 

 

 

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भारत में अंग्रेजों पर प्रथम हिंसक आक्रमण

मई 18, 2009

हम में से अधिकतर लोग जानते ही हैं कि सन १८५७ में भारतीय सैनिकों ने अपने अंग्रेजी हुक्मुरानों के विरुद्ध बगावत कर दी थी.  यह आग फैलते हुए हमारे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिणित हुआ. ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में भारत में आकर व्यापार करने के लिए तत्कालिन शासकों से अनुमति प्राप्त कर अंग्रेज विभिन्न जगहों में अपनी फैक्ट्री डाला करते थे और उनकी सुरक्षा के लिए किलेबंदी कर लिया करते थे. कलकत्ता में उनका किला फोर्ट विलियम कहलाताFort William था. स्थानीय जनता इन अंग्रेजों से तंग आ गयी थी. बंगाल के तत्कालीन शासक सिराज-उद-दौला ने सन १७५६ मे  फोर्ट विलियम को अपने कब्जे में ले लिया. कुल १४६ लोगों को नवाब के सैनिकों ने बंदी  बना लिया था जब कि अधिकतर अंग्रेज वहां के गवर्नर सहित समुद्री रास्ते से भाग खड़े हुए. कहा जाता है कि नवाब के सैनिकों ने इन १४६ लोगों को (जिसमे अंग्रेज, फ्रांसीसी, डच, पुर्तगाली आदि के अतिरिक्त भारतीय कुली भी थे) २० जून १७५६ की रात एक १८ x १४ फीट के कमरे में बंद कर दिया था जिसमें से २३ को छोड़ बाकी सब  दम घुटने से मारे गए थे. इस घटना को इतिहास में कलकत्ता के ब्लैक होल के नाम से जाना जाता है.

कलकत्ता की इस घटना को तो पीढियों तक याद किया जाता रहा है परन्तु अंग्रेजों  का नर संहार जो इस से भी ३५ वर्ष पूर्व सन १७२१ में हुआ था बिलकुल ही बिसरा दी गयी जिसमे लगभग १८० अंग्रेजों की निर्ममता से हत्या कर दी गयी थी. लार्ड  कर्ज़न के द्वारा कलकत्ता में मारे गए अंग्रेजों की स्मृति में संगमरमर का एक स्मारक बनवाया था (जो बाद में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में जनता द्वारा आक्रोश व्यक्त किये जाने के कारण हटा दिया गया था) परन्तु भारत में सर्वप्रथम अंग्रेजों के विरुद्ध घटित खूनी विद्रोह  मे  मृत उन अंग्रेजों के लिए कोई स्मृति पटल उस स्थल पर नहीं बनाया गया है.

यह कहानी है एक नगर “अत्तिनगल” (Attingal)  से,  जो थिरुवानंथापुरम से मात्र ३१ किलोमीटर उत्तर में मुख्य राज मार्ग NH-४७ पर है. प्रमुख रेलवे स्टेशन “वर्कला” है जो १५ किलोमीटर दूर है. वर्कला अपने खूबसूरत बीचVarkala Beach के लिए प्रसिद्द है. ट्रावन्कोर  राजघराने की रानियाँ अत्तिनगल में ही रहा करती थीं. उस प्रदेश का शासन भी सीमित स्वायत्तता में वहां की रानी के आधीन था.  (मात्रु सत्तात्मक व्यवस्था) और १६वीं /१७वीं शताब्दी में उनकी बड़ी धाक रही. नायरों का एक और शक्तिशाली समूह था जिन्हें “एट्टू वीट्टू पिल्लामारू” (आठ घरों के पिल्लई) के नाम से जाना जाता है.  वहां कि रानी पर भी इन लोगों का खासा प्रभाव रहा जिसके चलते राज काज में इनका भी काफी दखल था.

उन दिनों अंग्रेजी कंपनी अपना कारोबार “विज्हिंजम” (Brinjohn)  नामक जगह से चलाया करती थी. रानी साहिबा को सलाह दी गयी कि इन अंग्रेजों को वहां से हटा दिया जावे और सन १६९४ में अंग्रेजों को पट्टे पर Anjengo Fort1“अन्जुतेंगु” (अन्जेंगो) नामक जगह दी  गयी जहाँ से वे कारोबार कर सकते थे. वहीँ उस प्रभावशाली नायर लोगों  के एक वर्ग ने स्थानीय जनता को अंग्रेजों के खिलाफ भड़काना भी प्रारंभ कर दिया. दूसरी  तरफ अंग्रेजों ने शीघ्र ही उस नयी जगह “अन्जेंगो”  में एक किला बनाकर अपना अड्डा स्थापित Anjengo fortकर लिया. किले के अन्दर की गतिविधियों के बारे में नाना प्रकार की खबरें मिल रही थीं. ईस्ट इंडिया कंपनी का दुर्भाग्य ही था कि उसके अधिकतर अधिकारी/कर्मचारी समुद्री लुटेरे थे. उनका व्यवहार स्थानीय जनता के साथ अत्याचार का रहा.   उन्होंने हिन्दुओं के मंदिरों की भूमि पर भी अपना कब्जा जमा लिया. वहां के मुसलमानों के साथ भी अंग्रेजों ने बदसलूकी की. इन सब बातों से निराश हो रानी साहिबा ने अंग्रेजों को वहां से भी चले जाने का फरमान सुना दिया परन्तु तब तक अंग्रेजोंने अपने किले पर तोप आदि लगा कर अपने आप को सुरक्षित कर लिए था. बीच बीच में झड़पें होती रहीं. अंग्रेजों ने स्थानीय नायर समुदाय में फूट डाल कर अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास किया. इस तरह दो दशक से ऊपर निकल गए.Anjengo fort_1 1 

पट्टे पे ली गयी अन्जेंगो की भूमि के एवज में अंग्रेजों द्वारा वार्षिक नजराना दिया जाना था परन्तु मन मुटाव और संवादहीनता के चलते यह राशि भी लंबित ही रही. इसका एक कारण और था. सन १६९८ में रानी “उमयम्मा” के मृत्यु के उपरांत उत्तराधिकारी के बारे में कुछ अनिश्चितता बनी रही. अंग्रेजों ने संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से तत्कालिन रानी साहिबा को पूर्व की लंबित धन राशि और कुछ उपहार भेंट करने की सोची. प्रभावशाली नायर गुट ने इन सबको स्वयं प्राप्त करना चाहा परन्तु अंग्रेज स्वयं व्यक्तिगत रूप से रानी साहिबा से मिल कर भेंट देने की जिद पर अडे रहे.

सन १७१२ में जॉन कैफ्फिन अन्जेंगो के किले का करता धरता बनाया गया परन्तु कंपनी के पैसों के गबन के कारण १७१९ में उसे बर्खास्त कर दिया गया. उसके पूर्व भी किला इसी प्रकार के लोगों के आधीन रहा था. कैफ्फिन के उत्तराधिकारी के रूप में विलियम गैफ्फोर्ड नियुक्त हुआ जो उससे भी अधिक भ्रष्ट था. परन्तु शामत इन्ही पर आने वाली थी. विलियम गैफ्फोर्ड रानी साहिबा को प्रसन्न करने के लिए उन्हें देय राशि, उपहारों सहित स्वयं राज प्रसाद में जाने की ठान ली थी. दिन भी तय कर लिया गया. १४ अप्रेल १७२१, मलयालियों के लिए विशु का दिन (नव वर्ष का दिन जो  बिहू या बैसाखी के दिन पड़ता है). अन्जेंगो के किले से ७ या ८ किलोमीटर की दूरी पर ही अत्तिनगल का राजप्रसाद था. Attingal Palaceगैफ्फोर्ड करीब २०० लोगों के साथ पैदल ही निकल पड़ा था. सिपाहियों के अतिरिक्त उसके साथ पूर्व में एजेंट रह चुके साइमन  कौसे, पुर्तगाली दुभाषिया इग्नशियो मल्हेइरोस, बर्टन फ्लेमिंग आदि भी साथ थे. राज प्रसाद में पहुँचने पर इन सबका अच्छा स्वागत किया गया और लायी गयी भेंट आदि भी स्वीकार कर ली गयी . रानी साहिबा ने अंग्रेजों को रात्रि राज प्रसाद में ही बिताने का आग्रह भी किया. क्योंकि सब को एक ही जगह नहीं रखा जा सकता था इसलिए अलग अलग ठिकानों (कमरों) में व्यवस्था की गयी थी. साइमन कौसे को दाल में कुछ काला दिखा और उसने गैफ्फोर्ड को चेतावनी दी जिसपर उनमे बहश छिड गयी.  गैफ्फोर्ड ने कौसे को वहीँ पर बंदी बना कर एक कमरे में ड़ाल दिया. कुछ समय बाद जब गैफ्फोर्ड ने पाया कि उनके द्वारा लाये गए हथियारों को निष्क्रिय कर दिया गया है तो उसने एक मलाबारी चाकर को अतिरिक्त बंदूकों के लिए किले की और दौडा दिया.Varkala

पूरी जनता में अंग्रेजों के राज प्रसाद में होने की खबर थी. मुसलमान भी बड़ी संख्या में एकत्रित हो गए थे. फिर प्रारंभ हुआ तांडव. उस रात कुल १७ स्थानीय कुलिओं को छोड़ कर बाकी सभी अंग्रेजों को बहुत ही बर्बर तरीके से हत्या कर दी गयी.  गैफ्फोर्ड को पकड़ कर उसकी जुबान काट दी गयी और एक लट्ठे में कील से ठोंक कर उसके शव को नदी में प्रवाहित कर दिया गया था. दूसरा व्यक्ति जिसको धीरे धीरे एक एक अंग काट कर मारा गया वो था इग्नशियो मल्हेइरोस जिसपर मंदिर की जमीन हड़पने का इल्जाम था. किले में खबर पहुँच गयी थी इसलिए वहां की तीन महिलायें, जिनके पति मारे जा चुके थे, कोल्लम और मद्रास के लिए एन केन प्रकारेण भाग निकलीं . अंततोगत्वा किला खाली हो गया और दुबारा अंग्रेजों के आधीन ६ माह के बाद ही आ पाया जिसके लिए एक सेना की टुकडी “तलास्सेरी” (कन्नूर के पास)  के किले से भिजवाई गयी.

इस प्रकार अपनी अदूरदर्शिता, स्थानीय रीति रिवाजों और लोगों की भावनाओं की अवहेलना की कीमत अंग्रेजों ने चुकाई. क्योंकि इस घटना को लगभग अनदेखा कर दिया गया था इसलिए अंग्रेजों ने कुछ भी नहीं सीखा और अंततः १८५७ में ग़दर का सामना करना पड़ा.

 

प्रेरणा: केलिकट हेरिटेज फोरम