एक ज्योतिर्लिंग ऐसा जहाँ शिव लिंग दिखाई नहीं देता

ब हम लोग मुंबई गए थे, हमारे साले साहब ने सुझाया कि कहीं बाहर चलें. सबका रुझान तो धार्मिक पर्यटन पर ही रहा. हमने भी बात मान ली कि कहीं हमारी रूचि की भी कोई बात बन जाए. हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि हम अधार्मिक हैं लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब बाकी सब लोग केवल धार्मिक ही बन कर रह जाते हैं और इधर उधर नज़र दौडाने से परहेज रखते हैं. हम लोगों ने कार्यक्रम बनाया. पहले शनि महाराज का दर्शन करेंगे जो शनिशिनगनापुर में वास करते हैं. वहां से शिर्डी और फिर नासिक होते हुए त्रियंबकेश्वर. एक सूमो गाडी का इंतज़ाम भी हो गया. हम कुल पांच थे. हम, हमारी अर्धांगिनी, साला उसकी पत्नी और एक पत्नी रहित छोटा साला.

भैय्या हम लोग एक सुबह निकल ही पड़े. हमने महा मृतुन्जय मन्त्र का जाप भी किया “त्रियम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुका मिव बन्धनात, मृत्यो मुक्षी यमामृतायात”   मुंबई पुणे एक्सप्रेस हाइवे पर हमारा पहला अनुभव था. पहले ही पड़ाव में जहाँ गाड़ी रुकी, बहुत ही बढ़िया आधुनिक ढाबा था जहाँ हर प्रांत के व्यंजन उपलब्ध थे. निवृत्त होने के लिए बहुत ही सॉफ सुथरा इंतज़ाम. बच्चों के मनोरंजन का भी पूरा इंतज़ाम था हालाकि हमारे साथ कोई बच्चे नहीं थे. उस हाइवे पर बड़ा ही मनोहारी प्रबंध. वहाँ से आगे बढ़े, लोनावला होते हुए अहमदनगर पहुँचे. हमने जान बूझ कर कहा की यहाँ साड़ियाँ अच्छी मिलती हैं ऐसा सुना है. महिलाओं में खलबली मच गई परंतु गाड़ी वहाँ के किले के सामने  से निकल गयी और हम हाथ मलते रह गये. किला जो छूट गया. एक चौराहा आया, बाईं तरफ सड़क शनिशिनगनापुर जाती थी तो दाहिनी ओर शेगाँव के लिए रास्ता था. हमें संत गजानन महाराज का स्मरण हो आया. लेकिन पता चला कि उनकी समाधी अकोला के पास वाले शेगाँव में है.  जैसा पहले से ही कार्यक्रम था, हम लोग शनि महाराज के दर्शन के लिए पहुँच गये. पूजा सामग्री की खरीदी की गयी तो हमें आगाह किया गया कि  हम लोग गाड़ी में ताला ना लगाएँ. ऐसी मान्यता है कि  वहाँ चोरी नहीं होती. वहाँ के लोगों के घर दरवाज़े नहीं होते. वैसे हमें फ़िक्र भी नहीं थी क्योंकि माल असबाब तो महिलाओं के पास था और शनि की शिला पर केवल पुरुष ही तेल चढाने  जा सकते थे. इसके लिए उनके द्वारा दिए गये धोती को पहन पूरा गीला होना पड़ता है. नहाने के लिए नलों की व्यवस्था थी. वहाँ के कार्यक्रम के बाद हम लोग शिर्डी के लिए बढ़ गये जब कि हमारी पत्नी हल्ला करती रही कि यहाँ पर कोई काँच से बना देवी का मंदिर भी है.

रास्ते में ही एक ढाबे में हम लोगों ने खाना खाया. पूरे रास्ते में गन्ने के खेत थे और कुछ शराब के कारखाने भी. शिर्डी पहुँच कर सीधे दर्शन के लिए जुट गये. कोई समस्या नहीं हुई. उस पेड़ को भी देखा जिसके नीचे साईं बाबा बैठा करते थे. शिर्डी में रुकने का मन नहीं था क्योंकि हमें त्रियंबकेश्वर भी तो जाना था. इसलिए सीधे नासिक निकल पड़े. रात हो गयी थी और हमें आश्रय मिला गुजराती समाज के एक विश्राम गृह में. किराया बहुत ही कम था और उसी के अनुरूप सुविधाएँ भी थीं . कमरों में बाथ रूम लगा था परंतु रख रखाव अच्छा नहीं कहा जा सकता. उसी कम्पौंड में “मुक्ति धाम” का आधुनिक मंदिर भी है जो संगेमरमर से बना है. यहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों को प्रदर्शित किया गया है. “मुक्ति धाम”, यह संबोधन बड़ा ही भ्रामक है. nasik-ke-ghat

रात वहीँ बिता कर सुबह नासिक भ्रमण के लिए निकल पड़े. वहाँ के राम कुंड और वो जगह जहाँ कुंभ में सैकड़ों लोग मर गये थे, का अवलोकन किया. प्लेटफोर्म जैसे घाट बने थे और पानी भी भरपूर था. एक होटेल में नाश्ता भी कर लिया, जो भी मिला वाली बात थी. फिर सीधे त्रियंबकेश्वर जो करीब 28 किलोमीटर दूर थी. लगभग 19 किलोमीटर चलने के बाद हमें बाईं तरफ “मॉनिटरी म्यूज़ीयम” का बड़ा सा सूचना पट दिखा.numismatic यह संग्रहालय इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ रिसर्च इन नूमिसमॅटिक स्टडीस का ही हिस्सा था. यह संस्थान भारत में मुद्राओं के अध्ययन और अध्यापन का सबसे बड़ा केंद्र है. मुंबई के माहेश्वरी फाउंडेशन के द्वारा संचालित. हमने इसे वापसी में देखने की सोची. कुछ आगे बढ़ने पर अंजनेरी नाम का गाँव दिखा जहाँ लिखा था कि इसी जगह हनुमान (आंजनेय) ने जन्म लिया था. यहाँ की बसाहट काफ़ी प्राचीन है क्योंकि इस गाँव में 4/5 प्राचीन मंदिरों के खंडहर पाए जाते हैं. एक जैन मंदिर तो 11 वीं सदी का है. लगता है कभी यहाँ जैनियों की आबादी रही होगी. anjaneri-11th-jain

त्रियंबकेश्वर पहुँचने तक दुपहर हो चली थी परंतु मंदिर दर्शन के लिए खुला था. उस दिन ना जाने क्यों अत्यधिक भीड़ थी और लाइन में हमें तो 1 घंटे के ऊपर खड़े रहना पड़ा. लगभग दो बजे गर्भगृह में प्रवेश कर पाए थे. हमारे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब देखा कि जलहरी पर शिवलिंग है ही नहीं. केवल एक गोलाकार गड्ढा जिसको देखकर आभास होता था कि कभी उस गड्ढे में शिवलिंग रहा होगा जो किसी कारणवश निकल गया या अतातायियों के द्वारा उखाड़ फेंका गया. परंतु वहाँ तो कहानी ही कुछ और थी. कहते हैं कि उस गड्ढे के अंदर ही तीन लिंग बने हैं जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक हैं. समूचे भारत में यहीं एक जगह है जहाँ के ज्योतिर्लिंग की आराधना त्रिमूर्ति स्वरूप की जाती है. ऊपर की तरफ एक आईना रखा हुआ है जिस में जलहरी का प्रतिबिंब दिखता है परंतु गड्ढे के अंदर का भाग समझ में नहीं आता. कहते हैं कि अनवरत पानी के प्रवाह के कारण तीनों लिंगों का क्षरण हो गया. trimbakeshwar

इन बातों से हम संतुष्ट नहीं हो पाए. क्योंकि यदि त्रिमूर्ति के रूप में वहाँ के ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई है तो फिर शिल्पकार चाहता तो संयुक्त रूप से एक ही पत्थर को तराश कर तीन लिंगों में विभाजित कर सकता था और जलहरी में बिठा देता. हमारा तो मानना है कि उस गड्ढे में एक शिवलिंग स्थापित था जो निकल गया या निकाल दिया गया. अंदर जो तीन पत्थर के लिंग रूपी बनावट है वह वास्तव में शिवलिंग को स्थिर रखने के प्रायोजन से खाँचे की तरह बनाए गये थे. शिव लिंग जो रहा होगा उसके निचले भाग में तीन छिद्र रहे होंगे जिस से वह जलहरी में ठीक से बिना हिले डुले स्थिर रह सके.

बाहर निकलने के बाद हमने इधर उधर नज़र दौड़ाई तो हमें दो या तीन शिव लिंग  बिखरे पड़े मिले. हमें लगा था कि हो सकता है  इनमे से ही कोई अंदर रहा हो. हम सूक्ष्म निरीक्शण नहीं कर पाए क्योंकि सबको भूक लगी थी और हम पर गुर्रा रहे थे. हम सब के साथ हो लिए और खाना खाने के लिए होटल की तलाश में जुट गये.

इस बीच हम आपको बता दें कि इस मंदिर के निर्माण के बारे में कोई अधिकृत जानकारी हमारे पास नहीं है. संभवतः यह मराठों (पेशवा)  के समय का है. प्रत्येक सोमवार को सायं 4 से 5 के बीच में जलहरी पर एक हीरे और अन्य रत्नों से जडित मुकुट को रख कर प्रदर्शित किया जाता है. एक और ऐतिहासिक सत्य यह भी है कि यहाँ के ज्योतिर्लिंग में “नासाक” नामका 43 केरट वाला हीरा था जिसे एंग्लो मराठा युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ले गई और उसे बेच दिया. आज वह हीरा अमरीका में है. कहा जाता है कि यह हीरा वहाँ सन 1500 से लेकर 1817 तक ज्योतिर्लिंग को शोभायमान करता रहा.

खाने का जुगाड़ हो जाने और पेट पूजा कर हम लोग उस “कुशवरता” कुंड को देखने गये जिसे गोदावरी नदी का उदगम माना जाता है. पानी के गहरे होने की सूचना हिन्दी, अँग्रेज़ी और मराठी में लिखी हुई थी. वैसे तो गोदावरी का उदगम स्थल ब्रह्मगिरि की पहाड़ी है जिसकी तलहटी में त्रियंबकेश्वर बसा है. वहाँ ऊपर ब्रह्मगिरि पर कभी गौतम ऋषि का आश्रम था. यहाँ गोदावरी को गौतमी भी कहते हैं. उसकी तो फिर अलग कहानी है.

हम लोगों ने वापस नासिक का रुख़ किया. रास्ते में हमें “मॉनिटरी म्यूज़ीयम” ने आकृष्ट किय. तब तक सायं 5 बाज रहे थे. सबने एक सुर में कहा ये तो बंद हो गया होगा. हमने फिर भी गाड़ी रुकवाई और उतर कर चल पड़े. सामने ही तो था. वहाँ एक सज्जन मिले नाम था दानिश मोईन. उन्होने कहा कि अभी अभी बंद किया है. उन्होने हमारा परिचय जानना चाहा और हमने बता भी दिया. बहुत ही सुखद अनुभूति हुई जब उन्होने हमें एकदम पहचान लिया और गर्म जोशी से गले मिले. कहा सर आप के लिए हम खोल रहे हैं.(वास्तविकता यह है कि वहाँ बहुत ही कम लोग जाते हैं. यादि कोई आ गया तो वहाँ के लोग अपना सौभाग्य मानते हैं – यही है  धरोहर के प्रति हमारी निष्ठा) हमने गाड़ी में बैठे अपने लोगों को बुला लिया और दानिश मोईन साहब से आग्रह किया कि वे ही इनको घुमाकर समझा भी दें. यह इसलिए कि हमारी बातों का वजन उतना नहीं पड़ता जितना उनका. उन्होने भारत की प्राचीनतम मुद्राओं के बनाए जाने की प्रक्रिया समझाई जिसके लिए वहाँ बहुत सारी झाँकियाँ बनाई गयी थी. फिर भारत के सभी मुद्राओं के संग्रह का अवलोकन कराया. हमारे लिए मोईन साहब ने बहुत मेहनत की. यह इस बात से भी जाहिर हो रहा था कि हमारे लोग अब “जानकार” हो चले थे.

यहाँ से जब निकले तो हमारे साले साहब आश्चर्य चकित थे कि यहाँ के लोग हमें कैसे जानते हैं. हम भी फूले नहीं समाए और दंभ से कह दिया कि क्या तुम्हारे मुंबई में हमारे चाहने वाले नहीं हैं? आगे और कह दिया कि भाई हमारी भी कोई औकात है भले नौकरी में नहीं हैं. तमिलमें कहा था हिन्दी में नहीं.

रास्ते में कसारा घाट के बाद खाना वाना कर लिया था और लगभग 11 बजे रात मुंबई अपने घोंसले मे पहुच ही गये.

 

 

51 Responses to “एक ज्योतिर्लिंग ऐसा जहाँ शिव लिंग दिखाई नहीं देता”

  1. अशोक पाण्‍डेय Says:

    आपके इधर-उधर नजर दौड़ाने से उन परिजनों को जरूर परेशानी होती होगी जो धार्मिक स्‍थलों की यात्रा को तीर्थयात्रा मात्र समझते हैं 🙂
    अंजनेरी के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा हो रही है।

  2. Dr.Arvind Mishra Says:

    त्रियंबकेश्वर दर्शन कराने के लिए शुक्रिया !

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत बढिया यात्रा वृतांत लिखा आपने. आपकी लेखनी से और भी जीवंत हो ऊठता है. इन सभी जगह हमको जाने का सौभाग्य मिला है पर आपका लेख आदि से अंत एक सांस मे ही पढ गये. बहुत शुभकामनाएं

    रामराम.

  4. नरेश सिंह राठौङ Says:

    आपका यात्रा वर्णन इतना रोचक होता है कि लगता है कि हम भी आपके साथ साथ ही घूम रहे है ।

  5. संजय बेंगाणी Says:

    सुन्दर. हम भी यात्रा कर आए.

  6. Lovely Kumari Says:

    सुन्दर विवरण.

  7. raj sinh Says:

    MANBHAVAN . 45 SAAL PAHLE KEE MEREE YATRA SAJEEV HO GAYEE .

  8. GK Awadhiya Says:

    बहुत ही रोचक यात्रा वृतान्त है। जानकारी देने के लिये धन्यवाद! अवसर मिला तो अवश्य जायेंगे उन स्थानों में।

  9. प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर Says:

    ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
    उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌।

    बहुत जीवंत और मजेदार संस्मरण !!
    लगा कि हम सब आपके साथ ही हैं !!
    साभार!!

  10. ranju Says:

    बहुत बढ़िया लिखते हैं आप यात्रा साथ साथ हो जाती है ..शुक्रिया

  11. Rahul Katyayan Says:

    mujhe bhi hindi main blog likhna hai lekin samajh nahin aa raha kaise. zara madad kijiye.

  12. MUSAFIR JAT Says:

    सुब्रमनियम जी,
    ऊपर नासिक के घाट वाले चित्र में बड़ी ही गंदगी दिख रही है. अरे, यहाँ तो लोगबाग कपडे भी धो रहे हैं.

  13. Dr.Manoj Mishra Says:

    सुंदर चित्र ,संस्मरण और रोचक जानकारी दी है आपने ,अद्भुत .

  14. हरि जोशी Says:

    हर बार की तरह बढि़या यात्रा संस्‍मरण।

  15. Vinay Kumar Vaidya Says:

    Tryambakeshwar Darshan ke liye aapkaa dhanyawaad !

  16. Gagan Sharma Says:

    आपके विवरणों से ऐसा लगता है कि हम भी वहीं हैं। बस एक कमी रह जाती है, ढाबों के भोजन का स्वाद नहीं मिल पाता।

  17. yoginder moudgil Says:

    वाह दादा वाह खूब दर्शन कराये साधुवाद

  18. velu Says:

    A brilliant travel description. Its very refreshing to read a hindi blog written so well. Wish you all the best.

    Regds,
    Velu

  19. abhishek Says:

    Badhiya yatra vivran. ‘Monitory Museum’ ki apni jaankari bhi hamse sajhi karein.

  20. anupam agrawal Says:

    आपके यात्रा वर्णन सजीव और दिलचस्प हैं .

    बधाई.

  21. pt.d.k.sharma "vatsa" Says:

    सुब्रमणियम जी,आप को तो खैर पता ही होगा कि नासिक के पास ही कईं अन्य रामायण काल के अति प्राचीन दर्शनीय स्थल भी मौजूद हैं. मसलन अगस्तय ऋषि का आश्रम,पंचवटी जहां लक्ष्मण द्वारा शूर्पनखा की नाक काटी गई थी और नासिक से लगभग 50-60 किलोमीटर आगे ताकेडगांव नामक तीर्थ जहां पर रावण द्वारा जटाऊ वध किया गया था. लगे हाथ वहां भी घूम आते.

  22. Gyan Dutt Pandey Says:

    कमाल है – आप लोग इतनी सरलता से घूम आते हैं। हम तो इतनी माइन्यूट योजना बनाते रह जाते हैं – कि न योजना पूरी बन पाती है न घूमना हो पाता है।
    आपसे घुमक्कड़ी सीखनी होगी।

  23. मनीष Says:

    dharmik sthalon ke bare mein khaskar, aapke blog par aakar, meri jaankariyon mein izaapha hua hai. dhanyawaad !

  24. nirmla Says:

    bahut hi rochak jaankari hai apke blog ke madhyam se bharat darshan ho jate hain dhanyvad

  25. ghughutibasuti Says:

    बढ़िया वृतांत। अपसे ईर्ष्या होती है। हम तो इतने प्रांतोम में रहकर भी बहुत कम घूमे हैं।
    घुघूती बासूती

  26. sciblogindia Says:

    सुब्रमणियम जी बधाई हो, आपका यह आलेख आज के अमर उजाला के ब्लॉग कोना में प्रकाशित हुआ है।
    ———-
    किस्म किस्म के आम
    क्या लडकियां होती है लडको जैसी

  27. anil pusadkar Says:

    शनिशिंगनापुर,शिर्डी,औरंगाबाद,घ्रश्नेश्वर के दर्शन तो हो चुके लेकिन त्र्यंबकेश्वर के दर्शन अभी तक़ नही हुये है। आप्से जो जानकारी मिली हैउससे उसके दर्शन का मोह और बढ गया है।

  28. Rahul Katyayan Says:

    आप लोगों से प्रेरणा लेकर हमने भी हिंदी मैं ब्लॉग लिखना शरू किया है. कृपया नीचे लिखे लिंक को क्लिक करें और अपने विचार बताएं…

    http://rahulkatyayan.wordpress.com/2009/05/04/जाग-मुसाफिर-भोर-भई/

    राहुल कात्यायन

  29. Vineeta Yashswi Says:

    Yatra vritant bahut avhha laga…

  30. Annapurna Says:

    बहुत अच्छी जानकारी और चित्र भी !

  31. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    बहुत अच्छी जानकारी दी आपने. ख़ास तौर से अंजनेरी की जानकारी देने के लिए.

  32. arsh Says:

    WAAH BAHOT HI ROCHAK AUR JAANKAARI PARAK RAHI YE POST BHI … AAP ITNAA KAISE GHUM LETE HAI IS BAAT SE HAIRAAN HUN FIR ITNI SAARI JAANKARIYAAN…. UFFFF KAMAAL HAI YE TO .. DHERO BADHAAYEE AAPKO..

    ARSH

  33. Dilip kawathekar Says:

    आपके जीवंत लेखन के कारण, किसी भी स्थान की भेंट का वर्णन रोचक, और जीवंत हो उठता है.

  34. amar jyoti Says:

    रोचक और सजीव चित्रण।

  35. seema gupta Says:

    यात्रा वर्णन इतना रोचक है की चित्र जैसे जीवित हो उठे हैं ….आभार इतना सुंदर आलेख प्रस्तुत करने पर…..

    regards

  36. sandhya gupta Says:

    Ghar baithe ek baar phir rochak yatra karane ke liye dhanywaad.

  37. Alpana Says:

    आप की यह पोस्ट मैंने उसी दिन पढ़ ली थी और टिप्पणी भी दी थी..लगता है वह टिप्पणी पहुंची नहीं.कोई तकनीकी वजह रही हो?
    आप की पोस्ट का इंतज़ार हमेशा रहता है क्योंकि एक नयी जगह की चित्रमय जानकारी जो मिलती है.
    आज फिर से वही बात लिख रही हूँ ,
    शिर्डी हम भी गए थे और नासिक में गाड़ी रूक कर जाती है.तब किसी ने शनि देव के मंदिर के बारे में जरुर बताया था मगर इस स्थान का कोई जिक्र नहीं किया था.आज आप ने बताया और सैर ही करा दी है..तो जिज्ञासा है कि भविष्य में नासिक या शिर्डी गए तो वहां भी हो कर आयें.
    -शनिशिनगनापुर के बारे में यही सुना है कि वहां कोई ताला नहीं लगाता अब आप भी यही बता रहे हैं ..तो यह सच है!
    -हनुमान जी के जन्मस्थान के बारे में आज पढ़ा.
    ‘-त्रियंबकेश्वर =समूचे भारत में यहीं एक जगह है जहाँ के ज्योतिर्लिंग की आराधना त्रिमूर्ति स्वरूप की जाती है–यह जानकारी भी अद्भुत है.
    -43 केरट वाला हीरा -ईस्ट इंडिया तो हीरा ले ही गयी होगी..कोई दो राय नहीं–बडे दुःख कि बात है.
    -मॉनिटरी म्यूज़ियम कि सैर भी खूब रही और आप की पहचान की धाक भी सब पर जम गयी!
    बहुत ही रोचक ढंग से लिखा गया ज्ञानवर्धक लेख.

  38. Asha Joglekar Says:

    धन्यवाद आपका त्रिंबकेश्वर की जानकारी देने के लिये । इतनी बार मुंबई जाने के बावजूद नासिक जाना नही हो पाया था । शनिशिंगणापूर और शिरडी तो हम हो आये थे । त्रिंबकेश्वर में शिवलिंग ही नही है जानकर दुख हुआ जरूर आततायियों ने ही उखाड फेंका होगा ।

  39. Purushottam Kumar Says:

    धन्यवाद आपका त्रिंबकेश्वर की जानकारी देने के लिये ।शनिशिंगणापूर और शिरडी तो हम हो आये ,हनुमान जी के जन्मस्थान के बारे में आज पढ़ा.बहुत बढिया यात्रा वृतांत लिखा आपने. आपकी लेखनी से और भी जीवंत हो ऊठता है. पर आपका लेख आदि से अंत एक सांस मे ही पढ गये. बहुत शुभकामनाएं

  40. Dr. Mahesh Sinha Says:

    नाशिक के आसपास का यह क्षेत्र धर्मं क्षेत्र माना जाता है , पास में ही दो और ज्योतिर्लिंगा हैं घ्रिश्नेस्वर और भीमाशंकर

  41. vishal mishra Says:

    मुझे त्रयम्बकेश्वर गए वर्ष भर हो गया और मैं आज तक यही समझ रहा था कि आरती के पश्चात दर्शन नहीं होते होंगे। इसलिए शिवलिंग उठाकर रख दिया होगा। आज यह सुखद जानकारी मिलने के बाद अच्छा लगा कि केवल गोल कटॅरेनुमा जलधारी के ही दर्शन होते हैं।
    कोटि कोटि साधुवाद। एक जानकारी और मिली कि कहीं घूमने जाने से पहले एक बार नेट पर इन सब स्थानों को सर्च में डालकर ढूँढा जाए तो आसपास की अन्य जगहें भी आसानी से मिल सकती हैं। जैसे हनुमान जी की जन्मस्थली, अहमदनगर की साड़ियाँ आदि।

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  45. g.k.bahuguna Says:

    aap ka likha huva lekh bahut pasand aaya kintu aap ko batade yah teeno ling nahi balki teen ambika [laxmi,parvati,sarswati] ki yoniya hai keval ishi sthan par shiv svayam ling roop mai vidyaman nahi hai.ishi liye is ko trayabmkesvar kah te hai.
    gopal krishan bahuguna
    raj.

  46. arun mandwal Says:

    sir apki dwra di gai jankari behad rochak thi. apko SADHUWAD

  47. manoj Says:

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    मुझे नहीं पता के आपने यह यात्रा कब की पर कुछ बातें हैं जो मैं आपसे कहना चाहता हूँ प्रथम के अब शनि दर्शन में स्नान करके जाना प्रतिबंधित हो गया है मात्र हाथ पैर धो कर जा सकते हैं, शनि देवता तक अब नहीं जाया जा सकता क्यूंकि तेल पंप चढ़ाया जाता है, बाकि सब कुछ आप जैसा ही अनुभव रहा विशेष कर लिंग के न होने को लेकर और हाँ अब फिर से जाना हो तो इस एक बात को छोड़ कर बाकि सब रस्ते में बोर्ड पर लिखा हुआ है, के १७७५ इ पु ९००००० के खर्च से त्रयम्बकेश्वर मंदिर का निर्माण हुआ था

  51. narendra dhangar Says:

    dhanyawad sir Itani Sunder Jankari dene ke liye

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