Archive for जुलाई, 2009

सर्पों की एक और क्रीडा स्थली

जुलाई 27, 2009

पाम्बू मेकाट्टू मना :

Mekattumana

पिछले पोस्ट में हमने मन्नारशाला के बारे में जाना था. केरल में  सर्पों के लिए प्रख्यात एक दूसरी जगह भी है, “पाम्बू मेकाट्टू मना”. यह थ्रिस्सूर से दक्षिण में लगभग २५ किलोमीटर की दूरी पर माला नामके क़स्बे में है. “मना” वास्तव में कोई मंदिर नहीं है परन्तु नाम्बूदिरियों का पारंपरिक आवास है. इन्हें इल्लम भी कहा जाता है. साधारणतया नाम्बूदिरियों के आवास की बनावट एक विशेष प्रकार की होती है. उन्हें “नालू केट्टू” अर्थात चारों तरफ निर्माण और बीच में बड़ा सा दालान या आँगन. यहाँ इस पाम्बू मेकाट्टू मना में ऐसे दो निर्माण हैं इसलिए इसे “एट्टू केट्टू” कहा गया है. “एट्टू” आठ का पर्यायवाची शब्द है जब की “नालु” चार के लिए प्रयुक्त होता है. प्रवेश द्वार में विभिन्न सर्प आकृतियाँ उकेरी गयीं हैं.Mala Map

यह आवासीय परिसर ६ एकड़ के भूभाग पर फैला हुआ है और इस परिसर के अन्दर सर्पों के ५ “कावू” या चबूतरे हैं. बड़े बड़े वृक्षों, बेलों एवं अन्य जंगली वनस्पतियों से आच्छादित

Kavu1

. चमगादडों की भी भरमार है. जहाँ वास्तव में मंदिर का गर्भ गृह बताया जाता है वह परिसर के पूर्वी भाग में है. अन्दर दो कांसे से बने बड़े दीप अनवरत जलते रहते है. इन्हें “केडा विलक्कू” (अखंड ज्योति) कहा जाता है अर्थात कभी न बुझने वाला. ये जो दिए हैं वे वासुकी और नागयक्षी के प्रतीक स्वरुप हैं. वहां कोई प्रतिमा नहीं है. इस कक्ष में प्रवेश कुछ ख़ास दिनों में ही दिया जाता है. साधारणतया केवल उच्च वर्ण के लोग ही “कावू” के निकट जा सकते हैं. कुछ अवसरों पर सभी के लिए यह खुला रहता है. जैसे शबरी मला जाते हुए अय्यप्पा भक्तों के लिए नवम्बर के माह में परन्तु प्रवेश के पहले वहां के बावडी में स्नान कर गीले वस्त्रों को धारण कर ही जा सकते हैं.  यहाँ पर नैवेद्य के रूप में चांवल का आटा और दूध अथवा केले की एक स्थानीय प्रजाति “कदली” चढावे के रूप में भक्तों द्वारा दिया जाता है. “कदली” का अर्थ ही होता है केला परन्तु यह एक छोटे प्रकार का केला है जिसे हमने महाराष्ट्र में भी पाया है. नम्बूदिरी लोगों के पूजा विधान में मन्त्र की अपेक्षा तंत्र का प्रयोग अधिक होता है क्योंकि वे शक्ति साधना करते हैं अतः परिसर के अन्दर ही एक काली माता (भद्रकाली) का मंदिर भी है. वैसे साधारणतया हर “मना” में ऐसे मंदिर या तो परिसर के अन्दर ही होते हैं या फिर निकट ही. किसी नम्बूदिरी को पूजा संपन्न करते हुए देखना भी एक अलग अनुभव है. मंत्रों का उच्चारण कम परन्तु हस्त मुद्राओं से लगता है मानो कथकली कर रहे हों.

अब इस स्थल से जुडी किंवदंतियों को देखें तो प्रमुखतया बताया जाता है कि किसी जमाने में यह “मना” आर्थिक रूप से विपन्न हो गया था. यहाँ के बुजुर्ग नम्बूदिरी से गरीबी बर्दाश्त नहीं हुई. उसने तिरुवंचिकुलम (कोडूनगल्लुर / Cranganore) के शिव मंदिर में (यह केरल के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक है) जो उनके “मना” से १५ किलोमीटर की दूरी पर ही था, तपस्यारत हो गया. १२ वर्षों के घोर तपस्या के बाद एक दिन जब वह नम्बूदिरी बावडी में जल लेने गया तो उसे दिव्यरुप में वासुकी

Vasuki

के दर्शन हुए. नम्बूदिरी के समर्पण से प्रसन्न होकर वरदान भी दे दिया. नम्बूदिरी ने वासुकी

से आग्रह किया कि वे उनके “मना” में हमेशा उपस्थित रहें. तथास्तु तो होना ही था. वासुकी ने कहा ठीक है तुम जावो और अपने “मना” में दो दीप सदैव जलाये रखो. मेरी संगिनी भी आएगी. नम्बूदिरी ने वैसा ही किया और तब से उस “मना” के भाग्य खुल गए और दीप भी जल रहे हैं. एक दूसरी किंवदंती के अनुसार नम्बूदिरी को वासुकी से एक अभूतपूर्व मणि की प्राप्ति होती है और जब तक वह मणि “मना” में रहेगी, वहां समृद्धि का वास होगा ऐसा वासुकी ने कहा था. खैर जो भी रहा हो.

बचपन में हमने जिद की थी और अपने पिताश्री के साथ वहां गए भी. कहा जाता था कि वहां चारों तरफ सर्प घूमते रहते हैं. हम तो अपने ही घर में इन सर्पों को रोजाना देखने के आदी हो चले थे. यहाँ दो चार अधिक थे. वैसे वे होते तो हैं शर्मीले/डरपोक, वे अपने रस्ते चले जाते हैं. यहाँ की एक बड़ी विशिष्टता यह है कि यहाँ सर्पदंश से पीड़ित लोगों का उपचार भी किया जाता है. यहाँ के नम्बूदिरी विष शास्त्र के बड़े जानकार हैं और हमारे पारंपरिक चिकित्सा के द्वारा ही पीडितों की सहायता करते हैं. उस क्षेत्र के सभी लोग सर्प दंश से पीड़ित होने पर सर्वप्रथम यहीं आते हैं. कहा जाता है कि वहां के नम्बूदिरी वैद्य को पहले से आभास हो जाता है कि फ़लाने दिशा से कोई पीड़ित आज आएगा. अपने अधीनस्तों को वह आवश्यक सामग्री आदि जुटाकर तैयार रहने के निर्देश भी दे देता है. कभी कभी जब उसे मालूम हो जाता है कि जो  व्यक्ति  आने वाला है उसे बचाया नहीं जा सकता तो वह अपने कर्मियों को भिजवा कर रास्ते में ही सर्प दंश से पीड़ित व्यक्ति के बंधुओं को सूचित कर देता है कि यहाँ आने से कोई लाभ नहीं होगा. अन्तेय्ष्टि कर दें.

यह सब तो सुनी सुनाई बातें हैं. आज के इस आधुनिक युग में जब हम हर चीज को विज्ञान के नजरिये से देखते हैं तो ऐसी बातें गले नहीं उतरतीं. संभवतः लोगों में आस्था जागृत करने और बनाये रखने के लिए किस्से कहानियां प्रचारित होती हैं. लेकिन एक बात अवश्य ही कहेंगे कि हमारी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली भी समृद्ध है. केरल में ऐसे कई जगह हैं जहाँ विष चिकित्सा में लोग पारंगत हैं. एंटी वेनम तो आधुनिक चिकित्सा के अर्न्तगत आता है परन्तु पहले हमारे ग्रामीण अंचलों में इन्हीं वैद्यों के उपचार से लोग ठीक हुआ करते थे. सर्प दंश के मामले में समय का बड़ा महत्त्व है. समय रहते चिकित्सा उपलब्ध हो जावे तभी पीड़ित व्यक्ति बच सकता है. यह बात तो आज के आधुनिक चिकित्सा प्रणाली पर भी लागू होती है.

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जहाँ सर्प स्वछन्द घूमते हैं

जुलाई 20, 2009

पांच या छह माह पूर्व स्थानीय समाचार पात्र में एक खबर छपी थी कि उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक बिच्छू दरगाह है. ८०० साल पहले सैय्यद सर्बुद्दीन ईरान से यहाँ आये थे. संभवतः कोई सूफी संत रहे होंगे. उन्हें बिच्छू वाले बाबा भी कहा जाता है. इस दरगाह के अन्दर अनेकों बिच्छू स्वतंत्र घूमते रहते हैं परन्तु किसी को डंक नहीं मारते. परन्तु दरगाह के बाहर पाए जाने वाले बिच्छू बाबा के प्रभाव से मुक्त है तथापि उनसे बचना पड़ता है.

अब हम केरल जा रहे हैं. यह प्रांत भी सर्पों का प्रदेश कहला सकता है. प्राचीन काल से ही जब वहां वैदिक धर्म या बौद्ध धर्म का भी प्रवेश नहीं हुआ था, सर्प पूजा वहां की परंपरा रही है. आदिम जातियों की परम्पराओं को देखे तो बात बिलकुल साफ़ है. आदमी जिन जिन से भी डरता था उन्हें पूजने लगा था. आज भी केरल के पुराने घरों के दक्षिण पश्चिम भाग में एक चबूतरा होगा जिसपर सर्पों की प्रतिमाएँ लगी होती है. इन्हें “पाम्बुम कावु या सर्प कावु” कहा जाता है.Kavu इस भाग में जंगल जैसा वातावरण होता है. प्राकृतिक वनस्पतियों को यों ही बढ़ने दिया जाता है. हम कह सकते हैं कि सर्पों के लिए निर्मित उस क्षेत्र में मानव द्वारा किसी भी प्रकार से अतिक्रमण नहीं किया जाता. नित्य चबूतरे पर दिया भी जलाया जाता है. मान्यता है कि जिन घरों में ऐसी व्यवस्था है वहां सर्पों का कोई प्रकोप नहीं होता. लगभग सभी संस्कृतियों में सर्पों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है और हाल की खोजों से पता चलता है कि सर्पों की पूजा का विधान ७०,००० वर्ष पूर्व से ही है. भारत के मंदिरों में भी सर्पों को किसी न किसी रूप में प्रर्दशित किया गया है. कितनी ही पौराणिक कथाएँ उनसे जुडी हुई हैं. केरल में भी कई मंदिर सर्पों पर केन्द्रित हैं परन्तु कुछ एक अति विशिष्ट भी हैं.

मन्नारशाला :

मन्नारशाला, आलापुज्हा (अलेप्पी) से मात्र ३७ किलोमीटर की दूरी पर है. कोल्लम (quilon) जाने वाले रस्ते पर हरिपाड नामक छोटे शहर के पास ही. यहाँ पर है एक मंदिर जो नागराज और उनकी संगिनी नागयक्षी को समर्पित. यह मंदिर १६ एकड़ के भूभाग पर फैला हुआ है और जिधर देखो आपको सर्पों की प्रतिमाएँ ही दिखेंगी जिनकी संख्या ३०,००० के ऊपर बताई जाती हैं. और तो और अन्दर भी कई सर्प निर्भीक होकर स्वछन्द विचरण करते पाए जा सकते है. चलते समय सावधानी बरतनी पड़ेगी कि कहीं हमारे पैर उनपर न पड़ जाएँ. कहा तो जाता है कि वे भक्तों को नहीं डसते परन्तु आखिर जंगली जीव जो ठैरे . इस कलियुग में हम कैसे भरोसा कर लें.Mannarshala1

Vanamaliashram.org

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एक मिथक के अनुसार महाभारत काल में खंडावा नामक कोई वन प्रदेश था जिसे जला दिया गया था. परन्तु एक हिस्सा बचा रहा जहाँ वहां के सर्पों ने और अन्य जीव जंतुओं ने शरण ले ली. मन्नारशाला वही जगह बताई जाती है. मंदिर परिसर से ही लगा हुआ एक नम्बूदिरी का साधारण सा खानदानी घर (मना/इल्लम) है. मंदिर के मूलस्थान में  पूजा अर्चना आदि का कार्य वहां के नम्बूदिरी घराने की बहू निभाती है. उन्हें वहां अम्मा कह कर संबोधित किया जाता है. शादी शुदा होने के उपरांत भी वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए दूसरे पुजारी परिवार के साथ अलग कमरे में निवास करती है. इस मंदिर के सन्दर्भ में हमने “मूलस्थान” का प्रयोग किया है. जिस मंदिर में हम नागराज के दर्शन करते हैं वह मूलस्थान नहीं है. यह कुछ ताज महल में मुमताज महल की कब्र की तरह है जहाँ वास्तविक कब्र नीचे है और ऊपर जहाँ हम देख रहे होते हैं वह दिखावे के लिए है. ऐसा ही कुछ यहाँ भी है. इस से अधिक हमें जानकारी भी नहीं है..

कहा जाता है कि उस खानदान की एक स्त्री निस्संतान थी. उसके अधेड़ होने के बाद भी उसकी प्रार्थना से वासुकी प्रसन्न हुआ और उसकी कोख से एक पांच सर लिया हुआ नागराज और एक बालक ने जन्म लिया. उसी नागराज की प्रतिमा इस मंदिर में लगी है. यहाँ की महिमा यह है

Uruli

कि निस्संतान दम्पति यहाँ आकर यदि प्रार्थना करें तो उन्हें संतान प्राप्ति होती है. इसके लिए दम्पति को मंदिर से लगे तालाब (बावडी) में नहाकर गीले कपडों में ही दर्शन हेतु Uruli ultaजाना होता है. साथ में ले जाना होता है एक कांसे का पात्र जिसका मुह चौडा होता है. इसे वहां उरुली कहते है. उस उरुली को पलट कर रख दिया जाता है. संतान प्राप्ति अथवा मनोकामना पूर्ण होने पर लोग वापस मंदिर में आकर अपने द्वारा रखे गए उरुली को उठाकर सीधा रख देते हैं औरउसमें चढावा आदि रख दिया जाता है. इस मंदिर से जुडी और भी बहुत सारी किंवदंतियाँ हैं.

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एक वीडियो युट्यूब में प्राप्त हुआ. नीचे दे रहे हैं

चित्र: वनमाली आश्रम के सौजन्य से