Archive for सितम्बर, 2009

कोंकण के यहूदी (बेने इसराइली) – अलीबाग और उसके आगे

सितम्बर 27, 2009


विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष

Halegua

भारत में वैसे तो यहूदियों के कई समुदाय अलग अलग  प्रांतों में पाए जाते हैं परंतु कोच्चि के यहूदियों की चर्चा कुछ अधिक रही क्योंकि उनकी संख्या अब मात्र दस या ग्यारह रह गयी है. कोच्चि के यहूदियों की गली में भ्रमण के दौरान एक मृत यहूदी के घर जाना भी हुआ था जहाँ उसका शव इस इंतज़ार में था कि उनके धार्मिक रस्मों के लिए आवश्यक गणपूर्ति हेतु निर्धारित १० व्यक्ति जुट सकें. वहीं से हमें भी उनके बारे में कुछ जानने की इच्छा जागृत हुई. अभी अभी खबर मिली है कि कोच्चि के यहूदी समाज के प्रमुख और वहाँ के धर्मस्थल के मुखिया रहे सेमुअल हलेगूआ (७६ वर्ष) ने विगत १७ सितंबर को अंतिम साँस ली थी. उनके समाज के किस्से कहानियाँ और इतिहास बताने के लिए उन्हें जाना जाता था. हम उनकी आत्मा की शांति के लिए अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.

यह संयोग ही है कि अपने मुंबई प्रवास के समय महाराष्ट्र में बसे और बचे हुए यहूदियों के बारे में जानने का अवसर मिल ही गया. हमें पहले से मालूम था कि मध्य कोंकण इनका मूल स्थान रहा है. हमने कार्यक्रम बनाया  “अलीबाग” चलने का. चालक सहित वाहन का प्रबंध तो हमारे लघु भ्राता के सौजन्य से उपलब्ध था ही. हम, हमारी अर्धांगिनी उसके बड़े भाई और भाभी इस तरह चार लोग हो गये. अलीबाग, मुंबई वासियों के सप्ताहांत में मस्ती करने के लिए एक प्रमुख स्थल है. इसलिए हम लोगों ने ऐसा दिन चुना जब भीड़ भाड़ ना रहे. चेंबूर से २७ अगस्त, गुरुवार सुबह ही रवाना हो गये. हमारे साथ नक्शा आदि भी था इसके बावजूद भटकना पड़ गया. हमें “पनवेल”  से,  “पेण” और यहाँ से दाहिनी और मुड़कर “वडखल” नाका होते हुए अलीबाग जाना था. वाहन चालक की ग़लती से पनवेल पहुँच कर पुणे जाने वाली द्रुत गामी मुख्य मार्ग में गाड़ी दौड़ने लगी और फँस गये चुंगी के चक्कर में. ८३ रुपये अदा करने पड़े और चुंगी वालों ने बता दिया कि आगे से बाईं ओर मुड़ कर पेण के लिए रास्ता जाता है. ले देकर पेण पहुँचे. वहाँ राज्य परिवहन के बस अड्डे के निकट हम लोगों ने नाश्ता किया और फिर अलीबाग का रास्ता पूछते हुए चल पड़े.IMG_0220कोलाबा का किलाColaba Fortकोलाबा किले का एक हिस्सा

पेण से एक घंटे के सफ़र के बाद हम लोग अलीबाग में थे. मुंबई से कुल दूरी १३५ किलोमीटर. वैसे समुद्री मार्ग से केवल ३० किलोमीटर ही पड़ता है जिसके लिए मौसम अनुकूल नहीं था. हमें यह नहीं मालूम था कि अलीबाग, रायगड जिले का मुख्यालय है. हमारी जानकारी में दो रायगढ़ हैं, एक तो छत्तीसगढ़ का “रायगढ़” और दूसरा “रायगड” जो महाराष्ट्र में है. अब पता चला कि रायगड केवल किले का नाम है. अलिगाब तो वैसे एक मुसलमान व्यापारी “अली” द्वारा बनवाए हुए बागीचों और कुंवों के कारण नाम पड़ा था परन्तु वास्तविक ख्याति दिलाई शिवाजी महाराज के एक प्रमुख सेनानायक रहे कान्होजी आंग्रे ने जिन्होंने पुर्तगालियों और अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए. वे अलीबाग के ही रहने वाले थे और उनकी वहां समाधी भी है.  हमने पहले ही कह दिया है, अलीबाग, मुंबई वासियों के लिए मौज मस्ती करने की जगह बन गयी है. बॉलीवुड से जुड़े लोगों ने तो यहाँ आलीशान कोठियां बनवा रखी हैं.IMG_0229

IMG_0227समुद्र तट पर बैठने की व्यवस्था

समुद्र तट की ओर जाने के मार्ग का सूचना पटल भी रास्ते में था और हम सीधे पहुँच गये समुद्र तट पर. सामने ही रेलवे की प्लॅटफॉर्म के सदृश लोगों के बैठ्ने के लिए लंबी चौड़ी आधुनिक टाइल युक्त प्लॅटफॉर्म बनी हुई है जिसके किनारे कुछ पेड़ लगाए गये हैं और बैठ्ने के लिए बेंचें भी बनी हैं. नीचे उतरने पर समुद्र तट है और समुद्र के अंदर कुछ दूरी पर है कोलाबा का किला. हम लोग लगभग ११ बजे दिन को वहाँ पहुँचे थे. समुद्र का पानी चढ़ा हुआ था इसलिए किले तक जाना संभव नहीं था. सुबह और शाम को ही पानी उतार पर होता है जब घोड़ा गाड़ी में बैठ कर या फिर पैदल ही किले तक जाया जा सकता है. अब जब किले की बात आई तो बता दें कि इसे शिवाजी महाराज ने पुर्तगालियों, अँग्रेज़ों और पास ही बसे मुरुद जंजीरा के अफ्रीकी सिद्धियों पर नज़र रखने के लिए एक नौसैनिक अड्डे के रूप में सन १६५२ में विकसित किया था. किले के अंदर कई मंदिर भी हैं जिनमे प्रमुख है सिद्धि विनायक का मंदिर जिसे राघोजी आंग्रे ने १७५९ में बनवाया. इसके अतिरिक्त जय भवानी और हनुमान मंदिर भी है. एक और अजूबा जो है वह यह कि समुद्र के अंदर होते हुए भी किले के अंदर मीठे पानी के कुवें हैं. विकिपेडिया से प्राप्त किले के चित्र से जो १८५५ की है, ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः समुद्र के तट पर ही किला बना था और अब काफ़ी कुछ भूभाग समुद्र ने छीन लिया है. हमें खेद था कि हम किले तक नहीं पहुँच पाए. हमारे साथियों को दुख था कि सिद्धि विनायक के दर्शन नहीं हुए. तब हमने उन्हें आश्श्वस्त किया कि खाना खाने के बाद एक दूसरे महत्व्पूर्ण विनायक को देखने चलेंगे जो वहाँ से लगभग २० किलो मीटर की दूरी पर था.Colaba_Fort,_1855१८५५ में लिया गया किले का चित्र

समुद्र तट से लॉटते समय हमने सह यात्रियों से याचना कर ली कि रास्ते में यहूदियों के मंदिर को भी देखते चलें. क्योंकि बात मंदिर की कही थी इसलिए सबने हमारी बात रख ली. बहुत भटकने के बाद एक तिगड्डे पर कोने के दुकानदार से मिले. यहीं से हम लोग पहले समुद्र तट के लिए मुडे भी थे. बड़ी प्रसन्नता हुई जब उसने बताया कि बगल की गली ही तो इसराइली लेन है और आगे बाईं तरफ जाने पर आपको उनका प्रार्थना स्थल मिलेगा. उसने अपना कुछ मराठी नाम बताया था जिसे हम याद नहीं रख सके थे. उसके निर्देशों का पालन करते हुए हम यहूदियों के प्रार्थना स्थल (सिनेगॉग) तक पहुँच ही गये. गाड़ी को गली के कोने में रुकवा दिया था. दो गेट बने थे. हमने पहले वाले गेट से प्रवेश किया जो वास्तव में पिछला दरवाज़ा था. अंदर कुछ दूरी पर पाया कि एक वृद्ध नल में अपना हाथ मुह धो रहा है. हमने उससे पूछा कि क्या यह सिनेगोग दर्शकों के लिए खुलता है. उसने अंग्रेजी में हमसे सामने जाकर बैठने के लिए कहा. हमने गली के कोने में कार में बैठे अपने परिवार जनों को बुलवा लिया. थोडी ही देर में वही वृद्ध पेंट शर्ट पहिने सर पर टोपी डाले चाभियों का गुच्छा लिए आ गया और खोल दिया अपने प्रार्थना स्थल के पाट. हमने अन्दर घुसने के पूर्व अपने सर पर रूमाल डाल लिया और अपने साथ आये महिलाओं से भी साडी से सर को ढक लेने का आग्रह किया तो झट हमारी पत्नी ने कहा कि हमारी ऐसी परंपरा नहीं है. हमने कहा चलो ठीक है जैसी आप लोगों की मर्जी. उस वृद्ध ने अन्दर की सभी बत्तियां जला दीं ताकि हम लोग सब कुछ देख सकें. सामने एक चबूतरा सा बना था जिसके चारों तरफ रेलिंग बनी थी. यहीं “रब्बी” (काजी) के लिए कुर्सी रखी थी. बन्दों के बैठने के लिए कई बेंचें भी थी जो हमें किसी चर्च जैसा लगा. अन्दर के हाल में अलंकरण साधारण ही था. हमने उनके धर्मग्रन्थ “तोरा” के बारे में पूछा तब विस्मय से उस वृद्ध ने एकदम सामने बने आले को खोल दिया जहाँ तीन गोल डिब्बे दिख रहे थे. संभवतः उनका तोरा जो चमड़े में लिखा गया होगा उन डिब्बों में सुरक्षित थे. उसके सामने एक छिद्रयुक्त पीतल के बर्तन के अन्दर दिया भी जल रहा था. हमें बताया गया कि यह दिया २४ सों घंटे जला करता है और दिए में नारियल तेल डाला करते हैं.IMG_0231अलीबाग में यहूदियों का प्रार्थनास्थल (सिनेगोग)

हमारे साथ आये लोगों को व्यस्त रखते हुए हमने उस वृद्ध से बातचीत प्रारंभ की. उन्होंने अपना नाम बताया “जेकब इलैज़ा” (आयु ७२ वर्ष). हमने जब उनसे पुनः नाम को दोहराने के लिए कहा तब उत्तर मिला “दांडेकर”.  हमने पूछा  कि क्या आप महाराष्ट्रियन हो तो कहा नहीं हम “बेने इस्राइली” हैं. हम लोगों का उपनाम हम लोगों के द्वारा बसे हुए गाँव पर हुआ है. फिर उन्होंने उनके समाज की कहानी भी बताई. हमें बताया गया कि अब अलीबाग में केवल चार परिवार बचे हैं. श्री जेकब जी उस धर्मस्थल के मुखिया हैं और वे अकेले ही रोज तीन बार प्रार्थना करते हैं. उनका एक बेटा है जो इस्राइल चला गया परन्तु पत्नी साथ में रहती है. उन्होंने यह भी बताया की जिस कोने वाले दूकानदार ने हमें पता बताया था वह भी “बेने इस्राइली” है और उसका एक १६ वर्षीय बेटा वहां का सबसे छोटा सदस्य है.IMG_0232सिनेगोग के संरक्षक जेकब इलैज़ा दांडेकर

इस समाज के लोगों की धारणा है कि वे भारत में ५०० वर्ष ईसा पूर्व आये थे जब इस्राइल में उनका दूसरा मंदिर नहीं बना था. उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए पलायन किया था और कोंकण के तट पर उनकी नाव ध्वस्त हो गयी थी. कुल १४ लोग बच पाए थे जिनमे ७ पुरुष और उतनी ही महिलाएं थी. इन लोगों ने तैर कर “नगांव”  के समुद्री तट पर शरण ली. मृतकों को वहीँ दफना दिया और नगांव में बस गए. कालांतर में जब इनकी आबादी बढ़ी तो कोंकण के अन्य भागों में बसते गए. आजीविका के लिए इन्होने खेतों में काम किया और तेल की घनी चलाने लगे. इन लोगोंने स्थानीय बोली को अपनाया और अपने उपनाम भी मराठियों की तरह बसे हुए गाँव के आधार पर रख लिया जैसे नवगाँवकर, पन्वेलकर आदि. इनमें ऐसे १४२ उपनाम पाए जाते हैं. वे अपने आप को यहूदी न कहकर “बेने इस्राइली” ही कहा करते थे. परन्तु कोंकण में उन्हें शनिवारी तेली के नाम से जाना जाता था क्योंकि ये लोग शनिवार के दिन (सब्बाथ) कोई काम नहीं करते थे. उनकी धार्मिक परम्पराओं से भी वे बहुत कुछ अनभिग्य थे परन्तु १७ वीं शताब्दी में कोच्ची के यहूदी डेविड रहाबी ने इस समाज की कुछ परम्पराओं के आधार पर इन्हें यहूदियों के लुप्त हुए १२ कबीलों में से एक के रूप में पहचान की. इन्हें उनकी भाषा (हेब्रू) तथा धार्मिक परम्पराओं में प्रशिक्षित भी किया. ऐसा समझा जाता है कि भले यहूदियों से मुसलमानों की दुश्मनी रही हो, “बेने इस्राइली” लोगों को कुरआन में अल्लाह के चहेतों में माना गया है और यही एक बड़ा कारण था कि ये लोग अपने आप को यहूदी कहने से कतराते रहे. हिन्दुओं की नाराजगी से बचने के लिए इन्होने गोमांस खाना भी अपने लिए वर्जित कर रखा. आज महाराष्ट्र में इनकी आबादी लगभग ४००० है. पुणे में इनका धर्मस्थल सबसे खूबसूरत कहा जाता है परन्तु पनवेल के सिनागोग के बारे में मान्यता है कि वहां मन्नतें पूरी होती हैं

हम लोगों ने जेकब भाई से विदा ली तो उन्होंने एक किताब पकडा दी जिसमे हमें अपनी प्रतिक्रिया लिखनी पड़ी. उनकी प्रशंशा के बाद लिखना पड़ा कि सिनेगोग के सामने कुछ पेड़ पौधे लगवा दें क्योंकि वहां हरियाली बिलकुल भी नहीं थी. एकदम कब्रस्तान जैसा लग रहा था. अब पेट पूजा का समय हो चला था. इसलिए एक अच्छा सा होटल ढूँढ निकाला. गुजराती थाली की व्यवस्था थी परन्तु महँगी थी. सबसे अच्छा छाछ रहा जिसे सब ने छक कर पिया. महिलाओं को निवृत्त होना था जिसकी व्यवस्था भी वहां थी. इसके उपरांत हम लोग निकल पड़े बिरला जी के विनायक मंदिर की ओर जो वहां से लगभग २० किलोमीटर दूर ” रेवडंडा” नामक बस्ती के पास “अगरकोट” में था. यहाँ भी हमारा निहित स्वार्थ था. खेतों के बीच से होकर रास्ता जाता था. चारों तरफ हरियाली थी. फिर गाँवों में दाखिल हुए. घुमावदार रास्ते. सुन्दर सुन्दर गाँव. ऐसा लग रहा था जैसे जंगल के अन्दर से जा रहे हों. नारियल, सुपारी, कटहल के पेडों से अच्छादित. लगा जैसे केरल के किसी अंदरूनी भाग में हों. पूरा का पूरा माहौल वैसा ही. यहाँ तक कि घरों की बनावट भी वैसी ही. केवल भाषा में अंतर था. रस्ते में ही हमें “नगांव” मिला उसके आगे “छौल” जहाँ पुर्तगालियों का एक चर्च और खंडहरनुमा किला था. किले के पास से हमें “रेवडंडा” का समुद्री किनारा दिख रहा था. हमने अपने कैमरे से फोटो भी ली परन्तु शटर खुला ही नहीं. इसलिए उधारी की तस्वीर दिखा रहे हैं. एक पुल को पार कर रेवडंडा के आगे निकल गए जबकि हमें वहां से “अगरकोट” जाना था. परन्तु जब तक हम लोग पूछ पाते, सामने एक पुराना सा मंदिर दिखा..IMG_0236हमने गाडी रुकवाई. वह जगह चौल सराई थी और मंदिर सोमेश्वर महादेव का. आगे के रास्ते के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अलीबाग को जाता है. मतलब यह कि फिर भटक गए और वापस होना पड़ा.Revdandaरेवडंडा का समुद्री किनाराSynagogue, Rewdandaरेवडंडा में यहूदियों का प्रार्थनास्थल

पुनः रेवडंडा आये और हमने यहूदियों के एक प्रार्थनास्थल (सिनेगोग) को ढूँढ निकाला. वहां अधिक समय न बिताये ही, पूछते पाछते बिरला के गणेश (विनायक) मंदिर की ओर बढ़ गए. दुबारा एक पुल को पार किया जो वास्तव में समुद्री किनारा था और हमने यहाँ देखा कि बड़े बड़े जल पोत लौह अयस्क लेकर आ रहे हैं और कन्वेयर बेल्ट से कच्चा माल कहीं जा रहा है. आगे बढे तो एक इस्पात संयंत्र (विक्रम इस्पात कंपनी जो बिरला समूह का एक प्रयोजन है) भी दिखा जहाँ संभवतः इस्पात की चादरें बनायीं जाती हैं. इसके आगे ही एक छोटी पहाडी पर बिरला मंदिर था. इसे विक्रम विनायक मंदिर भी कहते हैं. बहुत ही सुरम्य वातावरण. मंदिर में सीढियों से जाना होता है परन्तु शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए रियायत स्वरुप सड़क भी बनी हुई है. हम लोगोंने सड़क मार्ग का प्रयोग किया जिसके लिए विशेष अनुमति दी गयी. हमारा पूरा परिवार इस मंदिर के दर्शन से अभिभूत हो गया. संगेमरमर से बना मंदिर, विनायक के अतिरिक्त बाकी सभी देवी देवता वहां अलग अलग प्रकोष्ठों में विराजमान थे. केमरा, या मोबाइल जिसमे केमरा हो ऊपर ले जाने पर मनाही थी और बड़े कडाई से इस नियम का पालन हो रहा था. हमें इसका औचित्य समझ में नहीं आया. यहाँ दर्शन के बाद तो बस एक ही काम रह गया था, घर वापसी का, हलाकि, रेवडंडा और छौल में अनेकों जगह देखने योग्य थीं. परन्तु क्या करें शाम हो चली थी. मुंबई वापस भी तो पहुंचना था.

Advertisements

माँ जीवदानी देवी, विरार, (मुंबई)

सितम्बर 14, 2009

Jivdani Maaविरार, मुंबई से लगभग 50 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर जानेवाली सबर्बन रेलवे का अंतिम स्टेशन. हमें जाना था हमारे एक मित्र के मित्र साल्वे जी से मिलने.  उनसे दूरभाष पर बात हो गयी थी और उन्होने अपने घर का पता बता दिया था जो स्टेशन के पूर्वी ओर कुछ ही दूरी पर था. उन्होने स्टेशन पर आकर लिवा ले जाने की पेशकश की थी परंतु एक दूसरे को पहिचानने की समस्या, वह भी भीड़ भाड़ में, आड़े आ रही थी. इसलिए स्वयं चलकर उनके घर जाना ही हमें उचित जान पड़ा. जब विरार पास आने लगा तो दाहिनी ओर सुदूर पहाडियों की ऊँचाई पर एक बहु मंजिला भवन दिखने लगा. हमने सोचा कोई होटल वगैरह  होगा. दादर से एक द्रुतगामी ट्रेन में बैठ कर प्रातः  10.30 पर हम वीरार में थे. पूछते पाछते 10 मिनट में ही हम श्री विट्ठल महादेव साल्वे जी के घर  पहुँच गये. श्रीमती साल्वे ने हमें अपनी बैठक में आमंत्रित किया और यह जानकार  सुखद लगा कि हमारी प्रतीक्षा हो रही थी. चंद मिनटों में श्रीमान साल्वे जी अंतःपुर से निकल कर बैठक में आए और बड़ी गरम जोशी से मिले. जैसा सोचा था, वैसी ही कद काठी थी. बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ और उसी बीच हमने पहाड़  पर देखे हुए भवन के बारे में भी पूछ ही लिया.आश्चर्य तब हुआ जब हमें बताया गया कि वह “माँ जीवदानी देवी” का मंदिर है. खाना खाने के पूर्व उस मंदिर को देख आने का उनका आग्रह हम टाल न सके (वास्तविकता तो यह है कि हम स्वयं वहाँ जाना चाह रहे थे)DSC04293

साल्वे जी के पास एक वेगन आर गाड़ी थी जिसे उनका पुत्र चला रहा था. साल्वे जी के अतिरिक्त उनकी पत्नी भी साथ हो ली. इस तरह हम चार लोग लगभग 3 किलोमीटर दूर उस पहाड़ी की तलहटी में पहुँच गये जिसपर जीवदानी  देवी का मंदिर था. ऊपर जाने के दो विकल्प थे. पहाड़ पर बनाए गये सीढ़ियों से या फिर उडनखटोले (रोपवे) से. साल्वे जी तो हमें सीढ़ियों से ऊपर ले जाने में उत्सुक दिखे. उन्होने हमसे पूछ भी लिया “क्यों 900 सीढ़ी चढ़ पाएँगे ना?”.  ऐसे में हम कैसे कह सकते थे कि हम ना जा पाएँगे. आत्म सम्मान की बात थी. हम लोगोंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए. आठ दस सीढ़ी चढ़ने पर बाईं तरफ एक गणेश जी का मंदिर था जिसकी प्रतिमा भी सुंदर थी. हमने अपने अंतःकरण से प्रार्थना की – आंतरिक शक्ति के लिए फिर आगे चल पड़े. सीढ़ियों के दोनों तरफ पहाड़ी पर वनस्पति बड़ी घनी थी और बड़ी लुभावनी लग रही थी. उनका आनंद लेते हुए हमने कुल 900 सीढ़ियाँ गिन लीं परंतु मंदिर का कहीं ओर छोर नहीं दिख रहा था. दर असल 1350 सीढ़ियाँ हैं परंतु हम से यह बात छुपाई गयी थी. हमारा उत्साह वर्धन करने के लिए यह भी बताया गया कि हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता भी दो बार देवी की अनुकंपा प्राप्त करने उन सीढ़ियों पर चढ़ चुके हैं.DSC04292DSC04295

ऊपर पहुँचने पर दूर से दिखाई देने वाला वह भव्य सात मंज़िलाभवन हमारे सामने था. सबसे ऊपर देवी का गर्भ गृह बताया गया जहाँ जाने के लिए लिफ्ट की सुविधा उपलब्ध थी. देवी की प्रतिमा निश्चित ही सुंदर परंतु आधुनिक थी. जनश्रुति के अनुसार उस पहाड़ी पर जीवदानी देवी का वास प्राचीन काल से ही रहा है. कहते हैं कि उन्होने एक कंदरा में अपने आपको छुपा लिया था और लोग वहाँ जाकर एक छेद में चढ़ावे के रूप में पान (तांबूल) डाला करते थे. वर्तमान में ऐसे किसी जन व्यवहार की पुष्टि नहीं हो सकी. वर्तमान मंदिर को बनवाने का श्रेय वीरार के किसी बाहुबली को दिया जाता है. यह मंदिर मुंबई तथा आसपास के उपनगरों के लोगों के लिया अपूर्व श्रद्धा का केन्द्रा बन गया है और यहाँ रविवार और मंगलवार के दिन हज़ारों श्रद्धालु दर्शनार्थ पहुँचते हैं. वसाई के कोली समाज के लिए तो यह उनकी कुलदेवी हैं. लोगों में विश्वास है कि माँ जीवदानी देवी, जैसा की नाम से ही बोध होता है, मरणासन्न लोगों को भी जीवन दान देने की क्षमता रखती हैं. कुछ समय पूर्व तक यहाँ भी बाकरों और मुर्गियों की बलि दिए जाने की परंपरा रही है जो अब सुनते हैं कि बंद कर दी गयी है.