कोंकण के यहूदी (बेने इसराइली) – अलीबाग और उसके आगे


विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष

Halegua

भारत में वैसे तो यहूदियों के कई समुदाय अलग अलग  प्रांतों में पाए जाते हैं परंतु कोच्चि के यहूदियों की चर्चा कुछ अधिक रही क्योंकि उनकी संख्या अब मात्र दस या ग्यारह रह गयी है. कोच्चि के यहूदियों की गली में भ्रमण के दौरान एक मृत यहूदी के घर जाना भी हुआ था जहाँ उसका शव इस इंतज़ार में था कि उनके धार्मिक रस्मों के लिए आवश्यक गणपूर्ति हेतु निर्धारित १० व्यक्ति जुट सकें. वहीं से हमें भी उनके बारे में कुछ जानने की इच्छा जागृत हुई. अभी अभी खबर मिली है कि कोच्चि के यहूदी समाज के प्रमुख और वहाँ के धर्मस्थल के मुखिया रहे सेमुअल हलेगूआ (७६ वर्ष) ने विगत १७ सितंबर को अंतिम साँस ली थी. उनके समाज के किस्से कहानियाँ और इतिहास बताने के लिए उन्हें जाना जाता था. हम उनकी आत्मा की शांति के लिए अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.

यह संयोग ही है कि अपने मुंबई प्रवास के समय महाराष्ट्र में बसे और बचे हुए यहूदियों के बारे में जानने का अवसर मिल ही गया. हमें पहले से मालूम था कि मध्य कोंकण इनका मूल स्थान रहा है. हमने कार्यक्रम बनाया  “अलीबाग” चलने का. चालक सहित वाहन का प्रबंध तो हमारे लघु भ्राता के सौजन्य से उपलब्ध था ही. हम, हमारी अर्धांगिनी उसके बड़े भाई और भाभी इस तरह चार लोग हो गये. अलीबाग, मुंबई वासियों के सप्ताहांत में मस्ती करने के लिए एक प्रमुख स्थल है. इसलिए हम लोगों ने ऐसा दिन चुना जब भीड़ भाड़ ना रहे. चेंबूर से २७ अगस्त, गुरुवार सुबह ही रवाना हो गये. हमारे साथ नक्शा आदि भी था इसके बावजूद भटकना पड़ गया. हमें “पनवेल”  से,  “पेण” और यहाँ से दाहिनी और मुड़कर “वडखल” नाका होते हुए अलीबाग जाना था. वाहन चालक की ग़लती से पनवेल पहुँच कर पुणे जाने वाली द्रुत गामी मुख्य मार्ग में गाड़ी दौड़ने लगी और फँस गये चुंगी के चक्कर में. ८३ रुपये अदा करने पड़े और चुंगी वालों ने बता दिया कि आगे से बाईं ओर मुड़ कर पेण के लिए रास्ता जाता है. ले देकर पेण पहुँचे. वहाँ राज्य परिवहन के बस अड्डे के निकट हम लोगों ने नाश्ता किया और फिर अलीबाग का रास्ता पूछते हुए चल पड़े.IMG_0220कोलाबा का किलाColaba Fortकोलाबा किले का एक हिस्सा

पेण से एक घंटे के सफ़र के बाद हम लोग अलीबाग में थे. मुंबई से कुल दूरी १३५ किलोमीटर. वैसे समुद्री मार्ग से केवल ३० किलोमीटर ही पड़ता है जिसके लिए मौसम अनुकूल नहीं था. हमें यह नहीं मालूम था कि अलीबाग, रायगड जिले का मुख्यालय है. हमारी जानकारी में दो रायगढ़ हैं, एक तो छत्तीसगढ़ का “रायगढ़” और दूसरा “रायगड” जो महाराष्ट्र में है. अब पता चला कि रायगड केवल किले का नाम है. अलिगाब तो वैसे एक मुसलमान व्यापारी “अली” द्वारा बनवाए हुए बागीचों और कुंवों के कारण नाम पड़ा था परन्तु वास्तविक ख्याति दिलाई शिवाजी महाराज के एक प्रमुख सेनानायक रहे कान्होजी आंग्रे ने जिन्होंने पुर्तगालियों और अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए. वे अलीबाग के ही रहने वाले थे और उनकी वहां समाधी भी है.  हमने पहले ही कह दिया है, अलीबाग, मुंबई वासियों के लिए मौज मस्ती करने की जगह बन गयी है. बॉलीवुड से जुड़े लोगों ने तो यहाँ आलीशान कोठियां बनवा रखी हैं.IMG_0229

IMG_0227समुद्र तट पर बैठने की व्यवस्था

समुद्र तट की ओर जाने के मार्ग का सूचना पटल भी रास्ते में था और हम सीधे पहुँच गये समुद्र तट पर. सामने ही रेलवे की प्लॅटफॉर्म के सदृश लोगों के बैठ्ने के लिए लंबी चौड़ी आधुनिक टाइल युक्त प्लॅटफॉर्म बनी हुई है जिसके किनारे कुछ पेड़ लगाए गये हैं और बैठ्ने के लिए बेंचें भी बनी हैं. नीचे उतरने पर समुद्र तट है और समुद्र के अंदर कुछ दूरी पर है कोलाबा का किला. हम लोग लगभग ११ बजे दिन को वहाँ पहुँचे थे. समुद्र का पानी चढ़ा हुआ था इसलिए किले तक जाना संभव नहीं था. सुबह और शाम को ही पानी उतार पर होता है जब घोड़ा गाड़ी में बैठ कर या फिर पैदल ही किले तक जाया जा सकता है. अब जब किले की बात आई तो बता दें कि इसे शिवाजी महाराज ने पुर्तगालियों, अँग्रेज़ों और पास ही बसे मुरुद जंजीरा के अफ्रीकी सिद्धियों पर नज़र रखने के लिए एक नौसैनिक अड्डे के रूप में सन १६५२ में विकसित किया था. किले के अंदर कई मंदिर भी हैं जिनमे प्रमुख है सिद्धि विनायक का मंदिर जिसे राघोजी आंग्रे ने १७५९ में बनवाया. इसके अतिरिक्त जय भवानी और हनुमान मंदिर भी है. एक और अजूबा जो है वह यह कि समुद्र के अंदर होते हुए भी किले के अंदर मीठे पानी के कुवें हैं. विकिपेडिया से प्राप्त किले के चित्र से जो १८५५ की है, ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः समुद्र के तट पर ही किला बना था और अब काफ़ी कुछ भूभाग समुद्र ने छीन लिया है. हमें खेद था कि हम किले तक नहीं पहुँच पाए. हमारे साथियों को दुख था कि सिद्धि विनायक के दर्शन नहीं हुए. तब हमने उन्हें आश्श्वस्त किया कि खाना खाने के बाद एक दूसरे महत्व्पूर्ण विनायक को देखने चलेंगे जो वहाँ से लगभग २० किलो मीटर की दूरी पर था.Colaba_Fort,_1855१८५५ में लिया गया किले का चित्र

समुद्र तट से लॉटते समय हमने सह यात्रियों से याचना कर ली कि रास्ते में यहूदियों के मंदिर को भी देखते चलें. क्योंकि बात मंदिर की कही थी इसलिए सबने हमारी बात रख ली. बहुत भटकने के बाद एक तिगड्डे पर कोने के दुकानदार से मिले. यहीं से हम लोग पहले समुद्र तट के लिए मुडे भी थे. बड़ी प्रसन्नता हुई जब उसने बताया कि बगल की गली ही तो इसराइली लेन है और आगे बाईं तरफ जाने पर आपको उनका प्रार्थना स्थल मिलेगा. उसने अपना कुछ मराठी नाम बताया था जिसे हम याद नहीं रख सके थे. उसके निर्देशों का पालन करते हुए हम यहूदियों के प्रार्थना स्थल (सिनेगॉग) तक पहुँच ही गये. गाड़ी को गली के कोने में रुकवा दिया था. दो गेट बने थे. हमने पहले वाले गेट से प्रवेश किया जो वास्तव में पिछला दरवाज़ा था. अंदर कुछ दूरी पर पाया कि एक वृद्ध नल में अपना हाथ मुह धो रहा है. हमने उससे पूछा कि क्या यह सिनेगोग दर्शकों के लिए खुलता है. उसने अंग्रेजी में हमसे सामने जाकर बैठने के लिए कहा. हमने गली के कोने में कार में बैठे अपने परिवार जनों को बुलवा लिया. थोडी ही देर में वही वृद्ध पेंट शर्ट पहिने सर पर टोपी डाले चाभियों का गुच्छा लिए आ गया और खोल दिया अपने प्रार्थना स्थल के पाट. हमने अन्दर घुसने के पूर्व अपने सर पर रूमाल डाल लिया और अपने साथ आये महिलाओं से भी साडी से सर को ढक लेने का आग्रह किया तो झट हमारी पत्नी ने कहा कि हमारी ऐसी परंपरा नहीं है. हमने कहा चलो ठीक है जैसी आप लोगों की मर्जी. उस वृद्ध ने अन्दर की सभी बत्तियां जला दीं ताकि हम लोग सब कुछ देख सकें. सामने एक चबूतरा सा बना था जिसके चारों तरफ रेलिंग बनी थी. यहीं “रब्बी” (काजी) के लिए कुर्सी रखी थी. बन्दों के बैठने के लिए कई बेंचें भी थी जो हमें किसी चर्च जैसा लगा. अन्दर के हाल में अलंकरण साधारण ही था. हमने उनके धर्मग्रन्थ “तोरा” के बारे में पूछा तब विस्मय से उस वृद्ध ने एकदम सामने बने आले को खोल दिया जहाँ तीन गोल डिब्बे दिख रहे थे. संभवतः उनका तोरा जो चमड़े में लिखा गया होगा उन डिब्बों में सुरक्षित थे. उसके सामने एक छिद्रयुक्त पीतल के बर्तन के अन्दर दिया भी जल रहा था. हमें बताया गया कि यह दिया २४ सों घंटे जला करता है और दिए में नारियल तेल डाला करते हैं.IMG_0231अलीबाग में यहूदियों का प्रार्थनास्थल (सिनेगोग)

हमारे साथ आये लोगों को व्यस्त रखते हुए हमने उस वृद्ध से बातचीत प्रारंभ की. उन्होंने अपना नाम बताया “जेकब इलैज़ा” (आयु ७२ वर्ष). हमने जब उनसे पुनः नाम को दोहराने के लिए कहा तब उत्तर मिला “दांडेकर”.  हमने पूछा  कि क्या आप महाराष्ट्रियन हो तो कहा नहीं हम “बेने इस्राइली” हैं. हम लोगों का उपनाम हम लोगों के द्वारा बसे हुए गाँव पर हुआ है. फिर उन्होंने उनके समाज की कहानी भी बताई. हमें बताया गया कि अब अलीबाग में केवल चार परिवार बचे हैं. श्री जेकब जी उस धर्मस्थल के मुखिया हैं और वे अकेले ही रोज तीन बार प्रार्थना करते हैं. उनका एक बेटा है जो इस्राइल चला गया परन्तु पत्नी साथ में रहती है. उन्होंने यह भी बताया की जिस कोने वाले दूकानदार ने हमें पता बताया था वह भी “बेने इस्राइली” है और उसका एक १६ वर्षीय बेटा वहां का सबसे छोटा सदस्य है.IMG_0232सिनेगोग के संरक्षक जेकब इलैज़ा दांडेकर

इस समाज के लोगों की धारणा है कि वे भारत में ५०० वर्ष ईसा पूर्व आये थे जब इस्राइल में उनका दूसरा मंदिर नहीं बना था. उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए पलायन किया था और कोंकण के तट पर उनकी नाव ध्वस्त हो गयी थी. कुल १४ लोग बच पाए थे जिनमे ७ पुरुष और उतनी ही महिलाएं थी. इन लोगों ने तैर कर “नगांव”  के समुद्री तट पर शरण ली. मृतकों को वहीँ दफना दिया और नगांव में बस गए. कालांतर में जब इनकी आबादी बढ़ी तो कोंकण के अन्य भागों में बसते गए. आजीविका के लिए इन्होने खेतों में काम किया और तेल की घनी चलाने लगे. इन लोगोंने स्थानीय बोली को अपनाया और अपने उपनाम भी मराठियों की तरह बसे हुए गाँव के आधार पर रख लिया जैसे नवगाँवकर, पन्वेलकर आदि. इनमें ऐसे १४२ उपनाम पाए जाते हैं. वे अपने आप को यहूदी न कहकर “बेने इस्राइली” ही कहा करते थे. परन्तु कोंकण में उन्हें शनिवारी तेली के नाम से जाना जाता था क्योंकि ये लोग शनिवार के दिन (सब्बाथ) कोई काम नहीं करते थे. उनकी धार्मिक परम्पराओं से भी वे बहुत कुछ अनभिग्य थे परन्तु १७ वीं शताब्दी में कोच्ची के यहूदी डेविड रहाबी ने इस समाज की कुछ परम्पराओं के आधार पर इन्हें यहूदियों के लुप्त हुए १२ कबीलों में से एक के रूप में पहचान की. इन्हें उनकी भाषा (हेब्रू) तथा धार्मिक परम्पराओं में प्रशिक्षित भी किया. ऐसा समझा जाता है कि भले यहूदियों से मुसलमानों की दुश्मनी रही हो, “बेने इस्राइली” लोगों को कुरआन में अल्लाह के चहेतों में माना गया है और यही एक बड़ा कारण था कि ये लोग अपने आप को यहूदी कहने से कतराते रहे. हिन्दुओं की नाराजगी से बचने के लिए इन्होने गोमांस खाना भी अपने लिए वर्जित कर रखा. आज महाराष्ट्र में इनकी आबादी लगभग ४००० है. पुणे में इनका धर्मस्थल सबसे खूबसूरत कहा जाता है परन्तु पनवेल के सिनागोग के बारे में मान्यता है कि वहां मन्नतें पूरी होती हैं

हम लोगों ने जेकब भाई से विदा ली तो उन्होंने एक किताब पकडा दी जिसमे हमें अपनी प्रतिक्रिया लिखनी पड़ी. उनकी प्रशंशा के बाद लिखना पड़ा कि सिनेगोग के सामने कुछ पेड़ पौधे लगवा दें क्योंकि वहां हरियाली बिलकुल भी नहीं थी. एकदम कब्रस्तान जैसा लग रहा था. अब पेट पूजा का समय हो चला था. इसलिए एक अच्छा सा होटल ढूँढ निकाला. गुजराती थाली की व्यवस्था थी परन्तु महँगी थी. सबसे अच्छा छाछ रहा जिसे सब ने छक कर पिया. महिलाओं को निवृत्त होना था जिसकी व्यवस्था भी वहां थी. इसके उपरांत हम लोग निकल पड़े बिरला जी के विनायक मंदिर की ओर जो वहां से लगभग २० किलोमीटर दूर ” रेवडंडा” नामक बस्ती के पास “अगरकोट” में था. यहाँ भी हमारा निहित स्वार्थ था. खेतों के बीच से होकर रास्ता जाता था. चारों तरफ हरियाली थी. फिर गाँवों में दाखिल हुए. घुमावदार रास्ते. सुन्दर सुन्दर गाँव. ऐसा लग रहा था जैसे जंगल के अन्दर से जा रहे हों. नारियल, सुपारी, कटहल के पेडों से अच्छादित. लगा जैसे केरल के किसी अंदरूनी भाग में हों. पूरा का पूरा माहौल वैसा ही. यहाँ तक कि घरों की बनावट भी वैसी ही. केवल भाषा में अंतर था. रस्ते में ही हमें “नगांव” मिला उसके आगे “छौल” जहाँ पुर्तगालियों का एक चर्च और खंडहरनुमा किला था. किले के पास से हमें “रेवडंडा” का समुद्री किनारा दिख रहा था. हमने अपने कैमरे से फोटो भी ली परन्तु शटर खुला ही नहीं. इसलिए उधारी की तस्वीर दिखा रहे हैं. एक पुल को पार कर रेवडंडा के आगे निकल गए जबकि हमें वहां से “अगरकोट” जाना था. परन्तु जब तक हम लोग पूछ पाते, सामने एक पुराना सा मंदिर दिखा..IMG_0236हमने गाडी रुकवाई. वह जगह चौल सराई थी और मंदिर सोमेश्वर महादेव का. आगे के रास्ते के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अलीबाग को जाता है. मतलब यह कि फिर भटक गए और वापस होना पड़ा.Revdandaरेवडंडा का समुद्री किनाराSynagogue, Rewdandaरेवडंडा में यहूदियों का प्रार्थनास्थल

पुनः रेवडंडा आये और हमने यहूदियों के एक प्रार्थनास्थल (सिनेगोग) को ढूँढ निकाला. वहां अधिक समय न बिताये ही, पूछते पाछते बिरला के गणेश (विनायक) मंदिर की ओर बढ़ गए. दुबारा एक पुल को पार किया जो वास्तव में समुद्री किनारा था और हमने यहाँ देखा कि बड़े बड़े जल पोत लौह अयस्क लेकर आ रहे हैं और कन्वेयर बेल्ट से कच्चा माल कहीं जा रहा है. आगे बढे तो एक इस्पात संयंत्र (विक्रम इस्पात कंपनी जो बिरला समूह का एक प्रयोजन है) भी दिखा जहाँ संभवतः इस्पात की चादरें बनायीं जाती हैं. इसके आगे ही एक छोटी पहाडी पर बिरला मंदिर था. इसे विक्रम विनायक मंदिर भी कहते हैं. बहुत ही सुरम्य वातावरण. मंदिर में सीढियों से जाना होता है परन्तु शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए रियायत स्वरुप सड़क भी बनी हुई है. हम लोगोंने सड़क मार्ग का प्रयोग किया जिसके लिए विशेष अनुमति दी गयी. हमारा पूरा परिवार इस मंदिर के दर्शन से अभिभूत हो गया. संगेमरमर से बना मंदिर, विनायक के अतिरिक्त बाकी सभी देवी देवता वहां अलग अलग प्रकोष्ठों में विराजमान थे. केमरा, या मोबाइल जिसमे केमरा हो ऊपर ले जाने पर मनाही थी और बड़े कडाई से इस नियम का पालन हो रहा था. हमें इसका औचित्य समझ में नहीं आया. यहाँ दर्शन के बाद तो बस एक ही काम रह गया था, घर वापसी का, हलाकि, रेवडंडा और छौल में अनेकों जगह देखने योग्य थीं. परन्तु क्या करें शाम हो चली थी. मुंबई वापस भी तो पहुंचना था.

28 Responses to “कोंकण के यहूदी (बेने इसराइली) – अलीबाग और उसके आगे”

  1. Ratan singh Shekhawat Says:

    सुन्दर चित्रों के साथ बढ़िया जानकारी |

  2. ranju Says:

    रोचक तरीके से बताया आपने .चित्र भी अच्छे लगे शुक्रिया

  3. राज भटिया Says:

    आप ने तो आंखो देखा हाल सुना दिया,ऎसा लगा जेसे हम सब अपनी आंखॊ से देख रहे है, बहुत अच्छे ढंग से एक एक बात को समझाया, बहुत अच्छा लगा, साथ मै चित्र भी मनमोहक लगे, ओर हमे इस नये मित्रो का भी पता चला.आप का धन्यवाद

  4. vidhu Says:

    सुब्रमन्यम जी .विश्व पर्यटन दिवस की हार्दिक बधाई…थोडा फुरसत और सुकूं के साथ पढ़ती हूँ फिर कोई कमेन्ट देना उचित होगा

  5. सुरेश चिपलूनकर Says:

    उत्तम जानकारी, आभार

  6. sanjay vyas Says:

    जहां तक मेरी जानकारी है, अरसे तक बेने इजराइलियों को यहूदी मानने से इजराइल बचता रहा.कारण शायद इनका भारतीय रंग हो सकता है. विडम्बना है कि जो समुदाय इतिहास में सबसे घृणित नस्लभेद का शिकार रहा वो खुद अपने लोगों से दूरी रखे रहा.
    विस्तृत,.शोधपरक और रोचक. सदा की तरह.

  7. mahendra mishra Says:

    बहुत सुन्दर फोटो और काफी जानकारी सहित प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.

  8. dr arvind mishra Says:

    आपने तो यहूदियों की जीजिविषा के साथ ही एक पर्यटन का भी आनंद दिला दिया !शुक्रिया !

  9. ताऊ रामपुरिया Says:

    सुंदर मनमोहक चित्रों सहित यहुदियों के बारे मे जानकारी बहुत बढिया लगी. दशहरे की रामराम.

    रामराम.

  10. ali syed Says:

    आदरणीय सुब्रमनियन जी ,
    आपनें अपने आलेख में एक हिब्रू शब्द “रब्बी” का उल्लेख योग किया है ! आपको यह जानकर पता नहीं कैसा लगेगा की मेरी बिटिया का नाम भी इसी शब्द के अरबिक वर्जन पर ‘रावी’ रखा गया है , जबकि हमारे पञ्चनद में से एक का नाम भी यही है ! …शायद ऐसे ही कारणों से ये सारी दुनिया मुझे , जातीय / धार्मिक / भाषाई / भेदभाव के बगैर इंटरलिंक्ड और अपनी सी लगती है !
    आदर सहित !

  11. हिमांशु Says:

    इतनी समृद्धि दे देते हैं आप अपनी प्रविष्टि को कि हैरत होती है । सब कुछ व्यवस्थित और पूर्ण !

  12. satish saxena Says:

    हमेशा की तरह बढ़िया और उपयोगी !

  13. - लावण्या Says:

    आपकी विस्तार सहित खोजकर लिखी पोस्ट पढ़कर बहुत जानकारी मिलाती है — आभार

  14. ताऊ रामपुरिया Says:

    इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

  15. हरि जोशी Says:

    आनंद आया। लगा जैसे मैं भी आपके साथ ही घूम रहा हूं।

  16. प्रवीण पाण्डेय Says:

    आपके द्वारा भारतीय भूमि पर यहूदियों के इतिहास के बारे में बड़े रोचक तथ्य मिले । बहुत बहुत धन्यवाद

  17. varsha Says:

    rochak jaankaari.. pics ke saath to aur bhi sundar!! yoon hi ghoomte rahiye wa hamein bhi ghumaate rahiye…

  18. nirmla.kapila Says:

    बहुत दिन बाद आपके आने का पता चला। मुझे तो बहुत दिनों से आपकी पोस्ट का इन्तज़ार था। पोछली पोस्ट भी आज ही देखी है । इतने लम्बे इन्त्ज़ार के बाद जहिर है कोई बहुत खास पोस्ट आनी ही थी। पढते हुये लगा कि हम भी आपके साथ हे अपनी आँखों से सब कुछ देख रहे हैं बहुत सुन्दर स्थान है और विवरण तो आपकी कलम हमेशा ही सुन्दर और विस्तार से देती है ।धन्यवाद और शुभकामनायें

  19. जाकिर अली रजनीश Says:

    कभी कभी आपसे ईर्ष्या करने का मन करता है, कहां कहां घूमते रहते हैं आप।
    बहुत प्यारी जगह है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  20. alpana Says:

    बहुत ही achchhe और visataar से likhi गयी post है.
    -1855 के kile की तस्वीर देख कर लग रहा है की यह sagar के kinare ही कभी bana होगा…
    आप ने भी यही लिखा है…
    -yahudiyon के मंदिर के बारे में jaankariyan नयी milin….बहुत abhut abhaar–
    -mandiron में aksar कैमरे ले janaa manaa होता है.
    मदुरई में एक बार एक मंदिर के पुजारी ने इस का जवाब हमें यूँ दिया था—कैमरे के फ्लैश से मूर्तियों की चमक पर असर पड़ता है..वे कई साल पुरानी हैं शायद यह कोई वैज्ञानिक कारण भी हो..

  21. shobhana Says:

    मैं ने कई दिन पहले ही टिप्पणी कर दी थी आपकी पोस्ट पर शायद प्रकाशित नही हुई \
    बहुत ही सुन्दर चित्रमय वर्णन |अगर अलीबाग में रुकना पडे तो वहां बिरला गेस्ट हाउस भी है |
    आभार

  22. Asha Joglekar Says:

    hamesha kee tarah well researched post. Bharat kee yahee khaseeyat hai ki kitane hee log yahan aaker base aur yaheen ke ho gaye. ye to aajkal hee log algawwad faila rahe hain aur isme hamaree sarkar ka bada hath hai.

  23. महामंत्री तस्लीम Says:

    मेरे लिए बिलकुल नयी जानकारी है यह।

  24. संजय बेंगाणी Says:

    बहुत सरस सुन्दर जानकारी.

  25. सुरेश पण्डा Says:

    रोचक तथा ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये आभार

  26. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    इस उत्कृष्ट जानकारी के लिए आपको धन्यवाद.

  27. zakir Says:

    माफी चाहूँगा, आज आपकी रचना पर कोई कमेन्ट नहीं, सिर्फ एक निवेदन करने आया हूँ. आशा है, हालात को समझेंगे. ब्लागिंग को बचाने के लिए कृपया इस मुहिम में सहयोग दें.
    क्या ब्लागिंग को बचाने के लिए कानून का सहारा लेना होगा?

  28. shailesh banglekar Says:

    I love revdanda

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