Archive for अक्टूबर, 2009

वज्रेश्वरी देवी का मंदिर और गरम पानी के कुंड

अक्टूबर 26, 2009

हमारे मुंबई प्रवास के समय आस पास घूमने लायक जगहों में वज्रेश्वरी के गरम पानी के कुंडों की बात चली थी. पता चला कि वहां वज्रेश्वरी देवी का एक मंदिर भी है. ज्वालामुखी से निर्मित पर्वतीय क्षेत्र है. विरार तो हमें जाना ही था सो सबर्बन (पश्चिमी) रेल द्वारा निकल पड़े थे और विरार भ्रमण के बाद भोजन कर एक मित्र, सल्वेजी, के वाहन में उनके साथ ही चले गए. विरार से १० किलोमीटर चलकर मुंबई से अहमदाबाद जाने वाले एक्सप्रेस हाईवे से जा मिले. इस हाईवे पर २ किलोमीटर उत्तर  चलकर दाहिनी ओर एक सड़क भिवंडी की ओर जाती है. इसी रास्ते पर २० किलोमीटर की दूरी पर है वज्रेश्वरी देवी का भव्य मंदिर.Outside Vajreshwari

मन्दाकिनी पर्वत की तलहटी के सुरम्य वादियों में, एक छोटी पहाडी पर कुल ५२ सीढियों को चढ़कर, सिंह द्वार को पार कर मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते हैं. वहां से चारों तरफ की नैसर्गिक छटा बड़ी लुभावनी लगी. दाहिनी तरफ दूर एक नदी (तनसा) प्रवाहित हो रही थी. एक बड़े मंडप (हाल) के आगे गर्भगृह है. जिसमें तीन देवियाँ विराजमान हैं. रेणुका, वज्रेश्वरी और कालिका.Three Devis तीनों ही मूर्तियाँ संगेमरमर की बनी हुई हैं. वहां के पुजारी बड़े ही मृदुभाषी थे. उनसे ही पता चला कि वे गिरी गोसाईं सम्प्रदाय के हैं और इसी सम्प्रदाय द्वारा मंदिर की गतिविधियाँ संचालित होती हैं. DSC04298दर्शन कर हम लोगों ने मंदिर की परिक्रमा की. वहां एक हनुमान मंदिर तथा दत्त मंदिर भी है. पीछे कुछ दूरी पर गोसाईं सम्प्रदाय के कुछ संतों की समाधियाँ भी हैं. चारों तरफ का प्रांगण साफ़ सुथरा, पत्थर के फर्श से युक्त है. कुछ कुछ जगहों पर टूटा फूटा भी है. मंदिर के बाएं तरफ ही एक नाट्य मंच (योगिनी रंगमंच) भी बना हुआ है जिसे बेलों से आच्छादित किया हुआ है. यहाँ समय समय पर नृत्य नाटिकाएं, नाटक, गायन, प्रवचन आदि का कार्यक्रम होता रहता है.DSC04299

इस मंदिर के बारे में अनेकों जनश्रुतियां मिलती हैं. पेशवाओं की राजधानी पूना (वर्त्तमान पुणे) हुआ करती थी. बाजीराव पेशवा (१) के छोटे भाई चीमाजी अप्पा ने पुर्तगालियों के गढ़ वसई के किले की घेराबंदी कर रखी थी. स्वयं वज्रेश्वरी के निकट गणेशपुरी/अकलोली के पास पड़ाव डाला हुआ था. यह जगह पुणे से वसई जाने वाले मार्ग पर ही पड़ता है. यहाँ से वसई मात्र ३० किलोमीटर की दूरी पर ही है. वसई की घेराबंदी किये दो वर्ष होने को हो गए परन्तु विजय हाथ नहीं लग रही थी. चिमाजी अप्पा निराश हुआ जा रहा था.एक दिन निकट ही प्रवाहित होने वाले तनसा नदी के किनारे अपने प्रातः भ्रमण के समय  उसने पाया कि कोई एक संत जैसा दिखने वाला नदी से जल लेकर निकट के पहाडी पर जाया करता. उसे कौतूहल हुआ. दूसरे दिन वह उस संत के पीछे पीछे हो लिया. पहाडी पर पहुँचने पर संत ने अपनी कुटिया से कोई मूर्ति निकाली और अपने द्वारा लाये गए जल से अभिषेक किया. चीमाजी अप्पा धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण वहां दंडवत हो गया और उस संत के साथ उसने भी देवी प्रतिमा की आराधना की. यह सिलसिला कुछ दिन चला. कहते हैं देवी प्रसन्न हो गयी और चीमाजी अप्पा के अभियान में परोक्ष रूप से मार्ग दर्शन देते रहने का आश्वासन भी दिया.

सन १७३९ में चीमाजी अप्पा अपने अभियान में सफल रहा और वसई का किला अंततः मराठों के कब्जे में आ गया. चीमाजी अप्पा ने इस विजय को वज्रेश्वरी देवी की अनुकम्पा मानते हुए, नव नियुक्त गवर्नर शंकर केशव फडके को आदेश दिया कि गणेशपुरी के निकट पहाडी पर ही वज्रेश्वरी देवी के लिए एक किलेनुमा मंदिर का निर्माण किया जावे. मंदिर में नित्य पूजा के लिए पुणे से गिरी सम्प्रदाय के पुजारियों को नियुक्त किया गया. यह गिरी गोसाई सम्प्रदाय का पेशवा दरबार में अच्छा दबदबा रहा है तथा इन्हें उच्च पदों पर भी रखा जाता था.DSC04303DSC04302

देवी दर्शन के बाद अब गरम पानी के कुंडों की बारी थी. पता चला कि इस क्षेत्र में भूगर्भीय परिस्थितिजन्य, गरम पानी के जल स्त्रोत अनेकों हैं, यहाँ तक की तनसा नदी में भी. हम लोग २/३ किलोमीटर चलकर अकलोली पहुंचे यहाँ बाकायदा सीमेंट के कुंड बने हैं. मुख्य कुंड से जहाँ का पानी अत्यधिक गरम है, जल प्रवाहित होकर तीन अलग अलग कुंडों में आता है. इन कुंडों के गरम पानी में औषधीय गुण के पाए जाने तथा अनेकों चर्म रोगों के लिए गुणकारी होने की मान्यता है. छुट्टी का दिन न होने पर भी वहां अच्छी खासी भीड़ थी. हमने जब चित्र लेना चाहा तो कई महिलाएं कुंड के बाहर आ गयीं. हम लोगों ने भी अपने पैर डुबोकर कुछ क्षणों का आनंद प्राप्त किया. सामने रामेश्वर महादेव का एक मंदिर है. यहाँ भी दर्शन कर आगे बढ़ गए.

गणेशपुरी जो निकट ही था, एक बड़ा आध्यात्मिक केंद्र बन गया है (गुरुदेव सिद्ध पीठ). स्वामी मुक्तानंद जी यहाँ सन १९५६ में आये और उनके प्रयास से ७५ एकड़ में एक बहुत ही विशाल आश्रम बन गया है जहाँ अनेकों विदेशी आधुनिक सुख सुविधाओं से परिपूर्ण आवासों में रह रहे हैं और अपना भी आध्यात्मिक उद्धार करने में लगे हैं. यह क्षेत्र सर्वसाधारण के लिए वर्जित है. सड़क के किनारे ही मुक्तानंद जी के गुरु रहे स्वामी नित्यानंद जी की समाधि है. समीप ही भीमेश्वर गणेश मंदिर भी है परन्तु वे सब बंद थे अतः बिना उन सबके दर्शन किये ही वापस लौट आये. यहाँ भी गरम पानी के कुंड होने की बात बताई गयी थी. लौटते हुए रास्ते में हमने देखा कि सैलानियों के लिए अनेकों रेसोर्ट्स बने हुए हैं. विदित हो कि वज्रेश्वरी देवी एक योगिनी है इसलिए कदाचित तंत्र साधना के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त माना जाता हो.

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सर्वतोभद्र स्तम्भ – कालंजर

अक्टूबर 19, 2009

श्री जी. एल. रायकवार एवम्  डा. एस. एन. यादव

यह पुरास्थल उत्तर प्रदेष के बांदा जनपद में 240 59’ 50’’ उत्तरी अक्षांष 800 29’ 15’’ पूर्वी देषान्तर पर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दक्षिण में बाघै नदी के किनारे एक समतल पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कालंजर दुर्ग की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 408 मीटर है, तथा दुर्ग का विस्तार लगभग 6-8 किलोमीटर परिधि में है। कालंजर दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चन्देलों के शासन काल में प्राप्त हुई। कालंजर का चन्देल इतिहास में महत्व इस कथन से सत्यापित होता है कि चन्देलों का सम्पूर्ण इतिहास कालंजर एवं थोड़ा सा कम अजयगढ़ दुर्ग के चारों ओर ही केन्द्रित रहा।

भारतीय कला परंपरा के बृहत परिप्रेक्ष्य में सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों का रूपांकन तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं और संस्कृति की एक धारा के रूप में दृष्टिगोचर है। भारतीय स्थापत्य कला शिल्पशास्त्रों से अनुशासित है तथापि मौलिक कल्पना से अधिकाधिक प्रयोगात्मक तथा ओजस्वी है। सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों में स्थापत्य कला, के अनुसरण के साथ-साथ अल्पतम अभिप्रायों के साथ पौराणिक कथाओं के रूपांकन में विविधताएं और विषिष्टताएं विषेष रूप से दर्शनीय होती है। इनमें प्रतिमा लक्षण के आवश्यक तत्वों का पालन कुछ अंशों में ही दिखाई पड़ता है तथापि कथा वस्तु का पूर्व ज्ञान होने से समस्त घटनायें तथा क्रम उद्घाटित होने लगती है। एक प्रकार से सर्वतोभद्र शिल्प में देषज कला (ब्वनदजतल ।तज) का प्रवाह प्रतिमा शास्त्रों के लक्षण और बंधनों से उन्मुक्त स्थिति में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण में केन्द्रित और गतिशील होती है। जिसमें शिल्पी की कल्पना अल्पतम अभिप्रायों के साथ कथा के प्रारंभ और समापन का सर्जन करती है। तालमान, और काल (क्रमबद्धता) से हटकर वण्र्य विषय के प्रस्तुतिकरण में सूक्ष्मता, भाव-भंगिमा की सार्थकता और शिल्पी की मौलिक कल्पना सर्वतोभद्र कृतियों को रोचक स्वरूप प्रदान करती है। इनमें वण्र्य विषय प्रधान होता है तथा अलंकरण पक्ष न्यूनतम रहता है। ब्राह्मण धर्म के अंतर्गत देवाचर्ना हेतु स्थापित सर्वतोभद्र में निम्न देव समुदाय-शिव, विष्णु, सूर्य, गणेष और महिषमर्दिनी में से कोई चार, चारों दिषाओं में रूपायित होते हैं। अनुष्ठानात्मक सर्वतोभद्र में मन्दिर वास्तु की परिकल्पना पर आधारित अधिष्ठान, जंघा तथा शिखर का संयोजन निहितार्थ रहता है। इसके प्रत्येक खंड, भूमि अथवा विमान के परिचायक हैं। सबसे ऊपर के भाग पर आमलक तथा कलष निर्मित रहता है। जैन शिल्पकला में भी सर्वतोभद्र शिल्प मिलते हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं संपूर्ण वैशिष्ट्य और लांछन के साथ रूपायित रहती हैं।

मध्य भारत में परमार, कलचुरि और चन्देल कालीन सर्वतोभद्र शिल्प अधिकांषतः ज्ञात हैं। परवर्ती काल में लगभग 16 वीं-17वीं सदी ईसवी तक इनकी परंपरा दिखाई पड़ती है। सर्वतोभद्र का अभिप्राय चारों दिषाओं में दैवी सत्ता की व्यापकता और प्राणियों के लिए मंगल कामना निहित है। इसमें चारों ओर से देव प्रतिमाओं के सम्मुख दर्शन किये जा सकने के कारण परिक्रमा का पुण्यलाभ भी अप्रत्यक्षतः प्राप्त होता है। इनके निर्माण में किसी यशस्वी व्यक्ति की स्मृति अथवा मनोकामना की पूर्ति होने पर अनुष्ठानात्मक शिल्प रचना और देवार्पण की मनोभूमि भी है। शैव एवं वैष्णव प्रतीकों से संयोजित एक तल से लेकर सात तल तक के सर्वतोभद्र शिल्प मिलते है। यह अवश्य सत्य है कि पूजित सर्वतोभद्र शिल्प अत्यल्प है। छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वतोभद्र चतुष्टिका अकलतरा-कोटगढ़ के सन्निकट स्थित ग्राम महमदपुर में पाये गये है। यह भी उल्लेखनीय है कि शिव मंदिर गंडई (राजनांदगांव जिले) के अधिष्ठान में कृष्ण के कालिय दमन लीला का अंकन है जिसमें कृष्ण कालिय के ऊपर बैठे हैं। विवेच्य सर्वतोभद्र क्रमांक-1 के द्वितीय क्रम में प्रदर्षित दृष्य में अदृभुत समानता है। छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा जिले के महेशपुर के सन्निकट स्थित ग्राम लक्ष्मणगढ़ से प्राप्त पाषाण फलक ने कृष्ण को बाल लीलाओं से संबंधित दृष्य में कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म और पूतनावध का अंकन ज्ञात हुआ है जिसमें शिल्पियों की मौलिक कल्पना रूपायित है।

सर्वतोभद्र की परिकल्पना युक्त कालिंजर से प्राप्त शिल्पकृति विशेष महत्वपूर्ण है। हल्का पीलापन रंग के बलुए पाषाण से निर्मित इन शिल्पकृतियों में दशावतार एवं कृष्ण लीला से संबंधित कथायें प्रर्दशित है।

सर्वतोभद्र -क्रमांक –1

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शिल्पकृतियों की संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार प्रस्तुत है:

विवेच्य सर्वतोभद्र, विष्णु के दशावतार तथा कृष्ण लीला के अंकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें सबसे ऊपर की पंक्ति में गोलाकार और एक दूसरे से सटे हुये तीन शिवलिंग चारों ओर रूपायित हैं। इस प्रकार की संरचना को कुछ विद्वानों ने स्मार्तलिंग की संज्ञा प्रदाय की है। उनका ऐसा मानना है कि इसमें पाँच पिण्ड होते है और यह पाँच गोलाकार पिण्ड पंचदेवों, शिव, विष्णु, गणेष, सूर्य एवं शक्ति के प्रतीक हैं। लिंगरूप में शिव की उपासना सदैव से लोकप्रिय रहा है। शिव के निराकार स्वरूप की अभिव्यक्ति का माध्यम भी शिव लिंग है। पौराणिक कथानकों के परिप्रेक्ष्य में शिवलिंग ज्योति का प्रतीक है। यह अनादि, अनन्न और असीम है। शिवलिंग की उपासना से चारों पुरूषार्थों की प्राप्ति होती है। शिव और विष्णु दोनों ही परमतत्व है तथा दोनों की उपासना सदैव से जन-मानस में लोकप्रिय रही है। पुराणों में शिव और विष्णु के एकत्व सिद्ध करने के अनेक प्रसंग तथा कथाएं मिलती है। प्रतिमाशास्त्र में हरिहर की अवधारणा शिव और विष्णु के एकत्व को निरूपित करते है। ऐतिहासिक काल में शिव के साथ विष्णु की उपासना अधिकाधिक लोकप्रिय रही है। लिंग के माध्यम से शिव की सत्ता तथा महत्व को सदैव से स्वीकार किया जाता रहा है। अतः प्रथम क्रम में शिवलिंग रूपायित है। विष्णु के दशावतारों में से क्रमषः कूर्म, मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन और बलराम को रूपायित किया गया है परन्तु राम, परषुराम, बुद्ध तथा कल्कि इस शिल्प कृति में छोड़ दिये गये है। इनके स्थान पर कृष्ण की कुछ महत्वपूर्ण बाल लीलाओं को सम्मिलित किया गया है। इनमें असुरों के वध से संबंधित लीलाओं में सहज नाटकीयता और भाव भंगिमा दर्शनीय है। अपेक्षित कथासार को प्रर्दशित करने के लिये कथा के उपसंहार में नाटकीयता के तत्व अत्यधिक रोचक हैं। इन प्रतिमाओं में अलंकरण का अभाव है तथापि भाव-भंगिमा और प्रस्तुति में मौलिकता का संप्रेषण है। अभिनयात्मक अंकन से संपूर्ण कथा प्रवाह लीला के प्रारंभ और विस्तार को प्रकट करने में सक्षम है। दृष्य संयोजन में शिल्पी की कल्पना, शास्त्रों में वर्णित विवरणों का अनुसरण करती है और अल्पतम अभिप्रायों के साथ संपूर्ण कथा को अभिनयात्मक रूप में प्रर्दशित करती है। इस शिल्पकृति में शिल्पी की कल्पना साधना की अंतिम सीमा को स्पर्श करते दिखाई देती है। विशालकाय अंशतः खुले हुये किवाड़ के माध्यम से कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म तथा गोकुल गमन की पूरी कथा आंखों के सामने घट जाती है। यह अंकन भारतीय कला में कृष्ण जन्म से संबंधित चित्रणों में सबसे अनूठी कल्पना है। अमूर्त के माध्यम से संबंधित घटना क्रम को स्मृतिपटल में प्रकाशित करने के लिये इनके नीचे के खंड में पूतनावध रूपायित है। पूतनावध कृष्ण की प्रथम बाल लीला है। इस लीला के पूर्व मथुरा के बंदी गृह में उनका जन्म, विशाल आकार के बंद दरवाजे के माध्यम से इंगित है। इस रूपांकन में शिल्पी की मौलिक कल्पना और मेधा अपौरूषेय है। अन्यंत्र ऐसी मौलिक कल्पना अज्ञात है। विवेच्य शिल्पकृति में विविध कल्पों में विष्णु के अवतार से प्रारंभ होकर द्वापर युग तक की वैष्णवी लीलाओं का रूपांकन शिल्पी का ध्येय रहा है। यह शिल्पकृति लगभग 12वीं-13वीं सदी ईस्वी में निर्मित ज्ञात होती है। कृष्ण की लीलाओं से संबंधित प्रस्तुतियाँ गूढ़तम अभिप्रायों के साथ बोध गम्य है।

सर्वतोभद्र क्रमांक –2

यह शिल्पकृति भी कांलजर से प्राप्त है। तथा हल्के पीलापन रंग के बलुआ पाषाण से निर्मित है। इसके ऊपरी भाग में गवाक्ष अलंकरण सहित आमलक कलष निर्मित है। इसमें भद्र जैसे तीन प्रकोष्ठ शेष हैं तथा नीचे का भाग अंषतः भग्न है। इसके सबसे ऊपर के खंड में तीन गोल शिवलिंग आपस में जुड़े हुये निर्मित है तथा इनके मध्य में चक्र के सदृष्य वलय निर्मित है। प्रतिमा शास्त्र की दृष्टि से इसका अभिज्ञान मार्तण्ड लिंग यथोचित है। बीच की गोलाकार वलय सूर्य का प्रतीक है। शिवपुराण में सूर्य को शिव से अभिन्न मानते हुये तादात्म्य स्थापित किया गया है आकाष लिंग के रूप में सूर्य की उपासना की जाती है। इस सर्वतोभद्र में अंकित दृष्य निम्नानुसार है:Falak2

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शिल्पकृति में अंकित दृष्यों का संक्षिप्त विवरण :

शिल्पकृति के प्रथम खंड में चारों ओर गोलाकार तीन शिवलिंग निर्मित है। इनके मध्य में वलयाकार चक्र निर्मित है। चक्र सूर्य का प्रतीक है। इस दृष्टि से यह शिव और सूर्य का संयुक्त रूप व्यक्त करना है। शिल्पकृति के प्रथम क्रम पर द्वितीय क्रम में शैय्या पर आसीन शिषु तथा माता, देवकी और कृष्ण के परिचायक हैं एवं इसके नीचे कारागार से कृष्ण को गोकुल ले जाते हुये वसुदेव दृष्टिगोचर हैं । यह संपूर्ण दृष्य कृष्ण जन्म से संबंधित है। द्वितीय क्रम में दूसरे खण्ड में असुर चाणूर को पटक कर हल से प्राणांत करते बलराम एवं नीचे के खण्ड में कंस के कुवलय पीड़ नामक दुर्दान्तः गजराज के दांत को उखाड़कर उसे धराषायी करते हुये कृष्ण प्रदर्षित हैं। तृतीय क्रम के द्वितीय खंड में आसन पीठिका पर शिषु सहित माता एवं उसके नीचे के प्रकोष्ठ पर शिषु सहित दो मानव आकृतियां उत्खचित हैं। सीमित दृष्यांकन तथा अन्य विस्तार एवं लांछन के अभाव में इस शिल्पकृति का वास्तविक अभिज्ञान कठिन है, साथ ही साथ संषय युक्त है। महाभारत की कथा के आधार पर उल्लेखित दृष्य का समीकरण गंगापुत्र भीष्म के जन्म से किया जाना समुचित है। उपरोक्त आधार पर निम्न विवेचन प्रस्तुत है। गंगापुत्र भीष्म- भीष्म अपनी माता गंगा के सान्निध्य में रहकर शस्त्र विद्या सीखते रहे। किसी अवसर पर गंगा के तट पर शस्त्राभ्यास करते हुये बालक भीष्म का अदभुत शर-कौषल देख कर शान्तनु विस्मित हुये। उसी अवसर पर गंगा वहां प्रकट हुई और भीष्म का परिचय देकर उसे शांतनु को सौंप दिया।

शिल्पकृति में ऊपर के खंड में गंगा तथा बालक भीष्म का अंकन है। नीचे के दृष्य में मध्य में सरिता प्रवाहित है। सरिता के दांये तट में स्थित गंगा अपने हाथ में शिषु को लिये हुई सम्मुख उपस्थित मानव आकृति को सौंप रही है, और दूसरे ओर स्थित शांतनु गंगा से शिषु को प्राप्त कर अपने अंक में ले रहे है। यह पाषाणकृति अभिनयात्मक भंगिमाओं के कारण विषिष्ठ है। भारतीय कला परंपरा में पौराणिक कथाओं और चरित्रों पर मौलिक कल्पना पर आधारित अनेक षिल्प निर्मित हैं। यह षिल्पकृति महाभारत की कथा पर आधारित भीष्म के बाल्यकाल की कथानक को अल्पतम अभिप्राय के साथ प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।

विवेच्य सर्वतोभद्र प्रतिमाओं के अध्ययन से भारतीय कला परंपरा और पौराणिक ग्रंथों का अनन्योश्रित संबंध दृष्टिगोचर होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत एवं श्रीमदभाग्वत गीता के अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित दशावतार , कृष्ण लीला तथा विविध प्रसंगों की गूढ़ जानकारी शिल्पियों को रहती थी जिससे अल्पतम अभिप्रायों के साथ वांछित चरित्र को अधिकाधिक स्पष्ट करने और जन-सामान्य को परिचित कराने में वे सफल रहे। भारतीय कला में विष्णु एवं शिव के विभिन्न रूप सदैव से आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। महाकाव्यों पर आधारित चरित्र नायक यथा राम, कृष्ण आदि से संबंधित प्रतिमायें अत्यल्प हैं। स्थापत्य कला में शिल्पशास्त्रों पर आधारित प्रतिमायें निर्माण किये जाने की परंपरा रही हैं। लोक जीवन को अधिकाधिक स्पंदित करने वाली कलाकृतियाँ शिल्पियों के मौलिक चिन्तन और कल्पना से ज्ञानवर्धक और मनोरंजक तत्वों से परिपूर्ण है।

सर्वतोभद्र शिल्पकृतियाँ , शास्त्रीय मर्यादा और लौकिक परंपरा से प्रसूत भारतीय कला परंपरा के चिरंतन संवाहक के रूप में लोक जीवन में व्याप्त रही हैं। प्राचीन देवालयों में धर्मशास्त्र और शिल्प शास्त्र का अक्षरषः प्रभाव दिखाई देता है। धर्मशास्त्रों में मानव जीवन के लिये चारों पुरूषार्थों का विधान है। धर्म की सिद्धि के लिये देवालयों का निर्माण भी एक सोपान है। सर्वतोभद्र शिल्प का निर्माण एवं समर्पण की परंपरा से धर्म के साथ साथ कला का पोषण भी होता रहा है। लोक पंरपरा और जन-सामान्य की अभिरूचि, शिल्पी की साधना एवं मौलिक कल्पना से समृद्ध सर्वतोभद्र शिल्प परवर्ती काल में भी भारतीय कला को नवीन दिशा देती रही है।

सर्वतोभद्र शिल्प के सम्यक अध्ययन से पौराणिक कथाओं से संबंधित अनेक कथाएं प्रकाष में आयेंगी। सांस्कृतिक धरोहर और पुरावशेष के रूप में चिन्हित इन अवशेषों के संरक्षण के प्रयास में इनका विस्तृत अध्ययन कला के क्षेत्र में अपेक्षित योगदान होगा, क्योंकि हमारी विरासत बहुत मूल्यवान और महान है, उनकी हमें रक्षा करनी चाहिए।

सन्दर्भ-ग्रन्थ:

01. सुल्लेरे, सुशील कुमार; अजयगढ़ और कालंजर की देव प्रतिमाएं, रामानन्द विद्या भवन, कालकाजी 1987.

02. श्रीमद्भागवत गीता; सम्पादक गीता प्रेस गोरखपुर संवत् 2037.

03. पुराभारती, खण्ड 1 बी.आर. मणि एवं एस. सी. सरन, शारदा पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 2006

04. यादव, शम्भू नाथ, कालिंजर क्षेत्र का पुरातत्व, शोध प्रबन्ध अप्रकाषित लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-2007.

05. महाभारत, क्रिटिकल एडिषन, पूना-1942.

06. महाभारत, अनुवादक पण्डित रामनारायण दत्त शास्त्री पांडे, राम, गीताप्रेस, गोरखपुर संवत् 2025

07. गोपीनाथ राव, टी.ए. एलीमेन्ट्स आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, वाराणसी 1971

08. बनर्जी जे.एन., दि डेवेलपमेंट आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, कलकत्ता 1968

09. खजुराहों की देवप्रतिमायें, रामाश्रय अवस्थी आगरा 1967

10. छायाचित्र, सौजन्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, लखनऊ मण्डल, लखनऊ

 उपसंचालक संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन  सहायक पुरातत्वविद् भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रायपुर मण्डल, रायपुर (छत्तीसगढ़)