सर्वतोभद्र स्तम्भ – कालंजर

श्री जी. एल. रायकवार एवम्  डा. एस. एन. यादव

यह पुरास्थल उत्तर प्रदेष के बांदा जनपद में 240 59’ 50’’ उत्तरी अक्षांष 800 29’ 15’’ पूर्वी देषान्तर पर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दक्षिण में बाघै नदी के किनारे एक समतल पहाड़ी के ऊपर स्थित है। कालंजर दुर्ग की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 408 मीटर है, तथा दुर्ग का विस्तार लगभग 6-8 किलोमीटर परिधि में है। कालंजर दुर्ग को सर्वाधिक प्रसिद्धि चन्देलों के शासन काल में प्राप्त हुई। कालंजर का चन्देल इतिहास में महत्व इस कथन से सत्यापित होता है कि चन्देलों का सम्पूर्ण इतिहास कालंजर एवं थोड़ा सा कम अजयगढ़ दुर्ग के चारों ओर ही केन्द्रित रहा।

भारतीय कला परंपरा के बृहत परिप्रेक्ष्य में सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों का रूपांकन तत्कालीन धार्मिक मान्यताओं और संस्कृति की एक धारा के रूप में दृष्टिगोचर है। भारतीय स्थापत्य कला शिल्पशास्त्रों से अनुशासित है तथापि मौलिक कल्पना से अधिकाधिक प्रयोगात्मक तथा ओजस्वी है। सर्वतोभद्र शिल्पकृतियों में स्थापत्य कला, के अनुसरण के साथ-साथ अल्पतम अभिप्रायों के साथ पौराणिक कथाओं के रूपांकन में विविधताएं और विषिष्टताएं विषेष रूप से दर्शनीय होती है। इनमें प्रतिमा लक्षण के आवश्यक तत्वों का पालन कुछ अंशों में ही दिखाई पड़ता है तथापि कथा वस्तु का पूर्व ज्ञान होने से समस्त घटनायें तथा क्रम उद्घाटित होने लगती है। एक प्रकार से सर्वतोभद्र शिल्प में देषज कला (ब्वनदजतल ।तज) का प्रवाह प्रतिमा शास्त्रों के लक्षण और बंधनों से उन्मुक्त स्थिति में विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण में केन्द्रित और गतिशील होती है। जिसमें शिल्पी की कल्पना अल्पतम अभिप्रायों के साथ कथा के प्रारंभ और समापन का सर्जन करती है। तालमान, और काल (क्रमबद्धता) से हटकर वण्र्य विषय के प्रस्तुतिकरण में सूक्ष्मता, भाव-भंगिमा की सार्थकता और शिल्पी की मौलिक कल्पना सर्वतोभद्र कृतियों को रोचक स्वरूप प्रदान करती है। इनमें वण्र्य विषय प्रधान होता है तथा अलंकरण पक्ष न्यूनतम रहता है। ब्राह्मण धर्म के अंतर्गत देवाचर्ना हेतु स्थापित सर्वतोभद्र में निम्न देव समुदाय-शिव, विष्णु, सूर्य, गणेष और महिषमर्दिनी में से कोई चार, चारों दिषाओं में रूपायित होते हैं। अनुष्ठानात्मक सर्वतोभद्र में मन्दिर वास्तु की परिकल्पना पर आधारित अधिष्ठान, जंघा तथा शिखर का संयोजन निहितार्थ रहता है। इसके प्रत्येक खंड, भूमि अथवा विमान के परिचायक हैं। सबसे ऊपर के भाग पर आमलक तथा कलष निर्मित रहता है। जैन शिल्पकला में भी सर्वतोभद्र शिल्प मिलते हैं जिसमें तीर्थंकरों की प्रतिमाएं संपूर्ण वैशिष्ट्य और लांछन के साथ रूपायित रहती हैं।

मध्य भारत में परमार, कलचुरि और चन्देल कालीन सर्वतोभद्र शिल्प अधिकांषतः ज्ञात हैं। परवर्ती काल में लगभग 16 वीं-17वीं सदी ईसवी तक इनकी परंपरा दिखाई पड़ती है। सर्वतोभद्र का अभिप्राय चारों दिषाओं में दैवी सत्ता की व्यापकता और प्राणियों के लिए मंगल कामना निहित है। इसमें चारों ओर से देव प्रतिमाओं के सम्मुख दर्शन किये जा सकने के कारण परिक्रमा का पुण्यलाभ भी अप्रत्यक्षतः प्राप्त होता है। इनके निर्माण में किसी यशस्वी व्यक्ति की स्मृति अथवा मनोकामना की पूर्ति होने पर अनुष्ठानात्मक शिल्प रचना और देवार्पण की मनोभूमि भी है। शैव एवं वैष्णव प्रतीकों से संयोजित एक तल से लेकर सात तल तक के सर्वतोभद्र शिल्प मिलते है। यह अवश्य सत्य है कि पूजित सर्वतोभद्र शिल्प अत्यल्प है। छत्तीसगढ़ अंचल में सर्वतोभद्र चतुष्टिका अकलतरा-कोटगढ़ के सन्निकट स्थित ग्राम महमदपुर में पाये गये है। यह भी उल्लेखनीय है कि शिव मंदिर गंडई (राजनांदगांव जिले) के अधिष्ठान में कृष्ण के कालिय दमन लीला का अंकन है जिसमें कृष्ण कालिय के ऊपर बैठे हैं। विवेच्य सर्वतोभद्र क्रमांक-1 के द्वितीय क्रम में प्रदर्षित दृष्य में अदृभुत समानता है। छत्तीसगढ़ के ही सरगुजा जिले के महेशपुर के सन्निकट स्थित ग्राम लक्ष्मणगढ़ से प्राप्त पाषाण फलक ने कृष्ण को बाल लीलाओं से संबंधित दृष्य में कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म और पूतनावध का अंकन ज्ञात हुआ है जिसमें शिल्पियों की मौलिक कल्पना रूपायित है।

सर्वतोभद्र की परिकल्पना युक्त कालिंजर से प्राप्त शिल्पकृति विशेष महत्वपूर्ण है। हल्का पीलापन रंग के बलुए पाषाण से निर्मित इन शिल्पकृतियों में दशावतार एवं कृष्ण लीला से संबंधित कथायें प्रर्दशित है।

सर्वतोभद्र -क्रमांक –1

.Falak1

Stambh

शिल्पकृतियों की संक्षिप्त विवेचन निम्नानुसार प्रस्तुत है:

विवेच्य सर्वतोभद्र, विष्णु के दशावतार तथा कृष्ण लीला के अंकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें सबसे ऊपर की पंक्ति में गोलाकार और एक दूसरे से सटे हुये तीन शिवलिंग चारों ओर रूपायित हैं। इस प्रकार की संरचना को कुछ विद्वानों ने स्मार्तलिंग की संज्ञा प्रदाय की है। उनका ऐसा मानना है कि इसमें पाँच पिण्ड होते है और यह पाँच गोलाकार पिण्ड पंचदेवों, शिव, विष्णु, गणेष, सूर्य एवं शक्ति के प्रतीक हैं। लिंगरूप में शिव की उपासना सदैव से लोकप्रिय रहा है। शिव के निराकार स्वरूप की अभिव्यक्ति का माध्यम भी शिव लिंग है। पौराणिक कथानकों के परिप्रेक्ष्य में शिवलिंग ज्योति का प्रतीक है। यह अनादि, अनन्न और असीम है। शिवलिंग की उपासना से चारों पुरूषार्थों की प्राप्ति होती है। शिव और विष्णु दोनों ही परमतत्व है तथा दोनों की उपासना सदैव से जन-मानस में लोकप्रिय रही है। पुराणों में शिव और विष्णु के एकत्व सिद्ध करने के अनेक प्रसंग तथा कथाएं मिलती है। प्रतिमाशास्त्र में हरिहर की अवधारणा शिव और विष्णु के एकत्व को निरूपित करते है। ऐतिहासिक काल में शिव के साथ विष्णु की उपासना अधिकाधिक लोकप्रिय रही है। लिंग के माध्यम से शिव की सत्ता तथा महत्व को सदैव से स्वीकार किया जाता रहा है। अतः प्रथम क्रम में शिवलिंग रूपायित है। विष्णु के दशावतारों में से क्रमषः कूर्म, मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन और बलराम को रूपायित किया गया है परन्तु राम, परषुराम, बुद्ध तथा कल्कि इस शिल्प कृति में छोड़ दिये गये है। इनके स्थान पर कृष्ण की कुछ महत्वपूर्ण बाल लीलाओं को सम्मिलित किया गया है। इनमें असुरों के वध से संबंधित लीलाओं में सहज नाटकीयता और भाव भंगिमा दर्शनीय है। अपेक्षित कथासार को प्रर्दशित करने के लिये कथा के उपसंहार में नाटकीयता के तत्व अत्यधिक रोचक हैं। इन प्रतिमाओं में अलंकरण का अभाव है तथापि भाव-भंगिमा और प्रस्तुति में मौलिकता का संप्रेषण है। अभिनयात्मक अंकन से संपूर्ण कथा प्रवाह लीला के प्रारंभ और विस्तार को प्रकट करने में सक्षम है। दृष्य संयोजन में शिल्पी की कल्पना, शास्त्रों में वर्णित विवरणों का अनुसरण करती है और अल्पतम अभिप्रायों के साथ संपूर्ण कथा को अभिनयात्मक रूप में प्रर्दशित करती है। इस शिल्पकृति में शिल्पी की कल्पना साधना की अंतिम सीमा को स्पर्श करते दिखाई देती है। विशालकाय अंशतः खुले हुये किवाड़ के माध्यम से कंस के कारागार में कृष्ण का जन्म तथा गोकुल गमन की पूरी कथा आंखों के सामने घट जाती है। यह अंकन भारतीय कला में कृष्ण जन्म से संबंधित चित्रणों में सबसे अनूठी कल्पना है। अमूर्त के माध्यम से संबंधित घटना क्रम को स्मृतिपटल में प्रकाशित करने के लिये इनके नीचे के खंड में पूतनावध रूपायित है। पूतनावध कृष्ण की प्रथम बाल लीला है। इस लीला के पूर्व मथुरा के बंदी गृह में उनका जन्म, विशाल आकार के बंद दरवाजे के माध्यम से इंगित है। इस रूपांकन में शिल्पी की मौलिक कल्पना और मेधा अपौरूषेय है। अन्यंत्र ऐसी मौलिक कल्पना अज्ञात है। विवेच्य शिल्पकृति में विविध कल्पों में विष्णु के अवतार से प्रारंभ होकर द्वापर युग तक की वैष्णवी लीलाओं का रूपांकन शिल्पी का ध्येय रहा है। यह शिल्पकृति लगभग 12वीं-13वीं सदी ईस्वी में निर्मित ज्ञात होती है। कृष्ण की लीलाओं से संबंधित प्रस्तुतियाँ गूढ़तम अभिप्रायों के साथ बोध गम्य है।

सर्वतोभद्र क्रमांक –2

यह शिल्पकृति भी कांलजर से प्राप्त है। तथा हल्के पीलापन रंग के बलुआ पाषाण से निर्मित है। इसके ऊपरी भाग में गवाक्ष अलंकरण सहित आमलक कलष निर्मित है। इसमें भद्र जैसे तीन प्रकोष्ठ शेष हैं तथा नीचे का भाग अंषतः भग्न है। इसके सबसे ऊपर के खंड में तीन गोल शिवलिंग आपस में जुड़े हुये निर्मित है तथा इनके मध्य में चक्र के सदृष्य वलय निर्मित है। प्रतिमा शास्त्र की दृष्टि से इसका अभिज्ञान मार्तण्ड लिंग यथोचित है। बीच की गोलाकार वलय सूर्य का प्रतीक है। शिवपुराण में सूर्य को शिव से अभिन्न मानते हुये तादात्म्य स्थापित किया गया है आकाष लिंग के रूप में सूर्य की उपासना की जाती है। इस सर्वतोभद्र में अंकित दृष्य निम्नानुसार है:Falak2

stambh2

शिल्पकृति में अंकित दृष्यों का संक्षिप्त विवरण :

शिल्पकृति के प्रथम खंड में चारों ओर गोलाकार तीन शिवलिंग निर्मित है। इनके मध्य में वलयाकार चक्र निर्मित है। चक्र सूर्य का प्रतीक है। इस दृष्टि से यह शिव और सूर्य का संयुक्त रूप व्यक्त करना है। शिल्पकृति के प्रथम क्रम पर द्वितीय क्रम में शैय्या पर आसीन शिषु तथा माता, देवकी और कृष्ण के परिचायक हैं एवं इसके नीचे कारागार से कृष्ण को गोकुल ले जाते हुये वसुदेव दृष्टिगोचर हैं । यह संपूर्ण दृष्य कृष्ण जन्म से संबंधित है। द्वितीय क्रम में दूसरे खण्ड में असुर चाणूर को पटक कर हल से प्राणांत करते बलराम एवं नीचे के खण्ड में कंस के कुवलय पीड़ नामक दुर्दान्तः गजराज के दांत को उखाड़कर उसे धराषायी करते हुये कृष्ण प्रदर्षित हैं। तृतीय क्रम के द्वितीय खंड में आसन पीठिका पर शिषु सहित माता एवं उसके नीचे के प्रकोष्ठ पर शिषु सहित दो मानव आकृतियां उत्खचित हैं। सीमित दृष्यांकन तथा अन्य विस्तार एवं लांछन के अभाव में इस शिल्पकृति का वास्तविक अभिज्ञान कठिन है, साथ ही साथ संषय युक्त है। महाभारत की कथा के आधार पर उल्लेखित दृष्य का समीकरण गंगापुत्र भीष्म के जन्म से किया जाना समुचित है। उपरोक्त आधार पर निम्न विवेचन प्रस्तुत है। गंगापुत्र भीष्म- भीष्म अपनी माता गंगा के सान्निध्य में रहकर शस्त्र विद्या सीखते रहे। किसी अवसर पर गंगा के तट पर शस्त्राभ्यास करते हुये बालक भीष्म का अदभुत शर-कौषल देख कर शान्तनु विस्मित हुये। उसी अवसर पर गंगा वहां प्रकट हुई और भीष्म का परिचय देकर उसे शांतनु को सौंप दिया।

शिल्पकृति में ऊपर के खंड में गंगा तथा बालक भीष्म का अंकन है। नीचे के दृष्य में मध्य में सरिता प्रवाहित है। सरिता के दांये तट में स्थित गंगा अपने हाथ में शिषु को लिये हुई सम्मुख उपस्थित मानव आकृति को सौंप रही है, और दूसरे ओर स्थित शांतनु गंगा से शिषु को प्राप्त कर अपने अंक में ले रहे है। यह पाषाणकृति अभिनयात्मक भंगिमाओं के कारण विषिष्ठ है। भारतीय कला परंपरा में पौराणिक कथाओं और चरित्रों पर मौलिक कल्पना पर आधारित अनेक षिल्प निर्मित हैं। यह षिल्पकृति महाभारत की कथा पर आधारित भीष्म के बाल्यकाल की कथानक को अल्पतम अभिप्राय के साथ प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है।

विवेच्य सर्वतोभद्र प्रतिमाओं के अध्ययन से भारतीय कला परंपरा और पौराणिक ग्रंथों का अनन्योश्रित संबंध दृष्टिगोचर होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत एवं श्रीमदभाग्वत गीता के अतिरिक्त अन्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित दशावतार , कृष्ण लीला तथा विविध प्रसंगों की गूढ़ जानकारी शिल्पियों को रहती थी जिससे अल्पतम अभिप्रायों के साथ वांछित चरित्र को अधिकाधिक स्पष्ट करने और जन-सामान्य को परिचित कराने में वे सफल रहे। भारतीय कला में विष्णु एवं शिव के विभिन्न रूप सदैव से आकर्षण के केन्द्र रहे हैं। महाकाव्यों पर आधारित चरित्र नायक यथा राम, कृष्ण आदि से संबंधित प्रतिमायें अत्यल्प हैं। स्थापत्य कला में शिल्पशास्त्रों पर आधारित प्रतिमायें निर्माण किये जाने की परंपरा रही हैं। लोक जीवन को अधिकाधिक स्पंदित करने वाली कलाकृतियाँ शिल्पियों के मौलिक चिन्तन और कल्पना से ज्ञानवर्धक और मनोरंजक तत्वों से परिपूर्ण है।

सर्वतोभद्र शिल्पकृतियाँ , शास्त्रीय मर्यादा और लौकिक परंपरा से प्रसूत भारतीय कला परंपरा के चिरंतन संवाहक के रूप में लोक जीवन में व्याप्त रही हैं। प्राचीन देवालयों में धर्मशास्त्र और शिल्प शास्त्र का अक्षरषः प्रभाव दिखाई देता है। धर्मशास्त्रों में मानव जीवन के लिये चारों पुरूषार्थों का विधान है। धर्म की सिद्धि के लिये देवालयों का निर्माण भी एक सोपान है। सर्वतोभद्र शिल्प का निर्माण एवं समर्पण की परंपरा से धर्म के साथ साथ कला का पोषण भी होता रहा है। लोक पंरपरा और जन-सामान्य की अभिरूचि, शिल्पी की साधना एवं मौलिक कल्पना से समृद्ध सर्वतोभद्र शिल्प परवर्ती काल में भी भारतीय कला को नवीन दिशा देती रही है।

सर्वतोभद्र शिल्प के सम्यक अध्ययन से पौराणिक कथाओं से संबंधित अनेक कथाएं प्रकाष में आयेंगी। सांस्कृतिक धरोहर और पुरावशेष के रूप में चिन्हित इन अवशेषों के संरक्षण के प्रयास में इनका विस्तृत अध्ययन कला के क्षेत्र में अपेक्षित योगदान होगा, क्योंकि हमारी विरासत बहुत मूल्यवान और महान है, उनकी हमें रक्षा करनी चाहिए।

सन्दर्भ-ग्रन्थ:

01. सुल्लेरे, सुशील कुमार; अजयगढ़ और कालंजर की देव प्रतिमाएं, रामानन्द विद्या भवन, कालकाजी 1987.

02. श्रीमद्भागवत गीता; सम्पादक गीता प्रेस गोरखपुर संवत् 2037.

03. पुराभारती, खण्ड 1 बी.आर. मणि एवं एस. सी. सरन, शारदा पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, 2006

04. यादव, शम्भू नाथ, कालिंजर क्षेत्र का पुरातत्व, शोध प्रबन्ध अप्रकाषित लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-2007.

05. महाभारत, क्रिटिकल एडिषन, पूना-1942.

06. महाभारत, अनुवादक पण्डित रामनारायण दत्त शास्त्री पांडे, राम, गीताप्रेस, गोरखपुर संवत् 2025

07. गोपीनाथ राव, टी.ए. एलीमेन्ट्स आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, वाराणसी 1971

08. बनर्जी जे.एन., दि डेवेलपमेंट आफ हिन्दू आइकोनोग्राफी, कलकत्ता 1968

09. खजुराहों की देवप्रतिमायें, रामाश्रय अवस्थी आगरा 1967

10. छायाचित्र, सौजन्य से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, लखनऊ मण्डल, लखनऊ

 उपसंचालक संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन  सहायक पुरातत्वविद् भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, रायपुर मण्डल, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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25 Responses to “सर्वतोभद्र स्तम्भ – कालंजर”

  1. समीर लाल Says:

    त्यौहार के दिन इतना सारगर्भित और गंभीर आलेख…वो तो हम हैं जो पढ़ गये. 🙂

  2. alpana verma Says:

    यूँ तो इस तरह के prachin stambhon को paraytak sarsari सा देख कर निकल जाते हैं..
    आज आप के इस lekh से maluum हुआ की इन stambhon में भी इतना रोचक vivaran छुपा होता है.
    besahq हमारी virasat mulyavaan है और इसे bachaye rakhne के लिए हर sambhav prayas hona chaheeye.
    kafi reasearch कर के likhi गयी आप की इस post से gyanvardhan हुआ.

    abhaar.

  3. sanjay vyas Says:

    vistrit aur shodhparak jankari.
    kabhi talabon ke nirmaan shilp par bhi jankari den.yahan ke pracheen talaabon ke tatbandh par ek govardhan-stambh hota hai.

  4. Lovely Says:

    अभी सरसरी निगाह से ही पढ़ पाई हूँ …बुकमार्क कर लिया है आराम से पढूंगी …एक सुझाव है, इन ऐतिहासिक चीजों पर लिखते वक्त थोडा समकालीन समाज, वर्ण व्यवस्था और मान्यताओं पर भी प्रकाश डालते चले वस्तुस्थिति अधिक स्पस्ट होगी. जानती हूँ अधिक परिश्रम की अपेक्षा कर रही हूँ आपसे पर सिर्फ अतीत के खंडहरों पर चर्चा करने से कई गुना बेहतर होगा सम्यक दृष्टि से अतीति के हर आयाम पर प्रकाश डालना.
    आपके उत्तर की प्रतिक्षा करुँगी.

    लवली

  5. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    हम आपके सुझावों का सम्मान करते हैं. हम जब भी लिखेंगे तो उन बातों को समावेश करने का प्रयास करेंगे. यह आलेख हमारा लिखा हुआ नहीं है. हम इस तरह की क्लिष्ट भाषा का प्रयोग सामान्यतः नहीं करते. इस लेख में लेखकों की मजबूरी रही होगी क्योंकि यह एक प्रकार का शोध प्रबंध है और निश्चित विषय पर ही केन्द्रित होना पड़ता है.
    आपका बहुत आभार. आज भाईदूज है. यह पर्व आपके लिए मंगलमय हो.
    सस्नेह,
    सुब्रमणियन

    Гbrmþyn
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    Please visit my Indian History related blogs at:
    http://paliakara.blogspot.com (English)
    https://mallar.wordpress.com (Hindi)

  6. Lovely Says:

    मुझे भाषा की किलिष्टता से कोई शिकायत नही है. विषयपरक लिखते वक्त अगर हम भाषा को लोकप्रिय बनाने की चेष्टा में लगेंगे तो भाषागत गलताफहमिओं से उसे दूर रखना कठिन हो जाएगा जिससे की उसका खंड़न या उस पर विवाद खडा करना विघ्न संतोषी लोगों के लिए सहज हो जाएगा.
    आपने यह भी देखा होगा कि गंभीर विषय पर चर्चा करते समय प्रथम शर्त होती है उसके अर्थ को संरक्षित करना, इस कारन भाषा क्लिष्ट हो जाती है, सो इस विषय पर मेरी और से निश्चिंत रहें. मेरा संकेत दूसरी और है.
    ================
    भाई दूज की बधाईयाँ आपको.
    ================

  7. Lovely Says:

    *गलताफहमिओं = गलतफहमिओं

  8. nirmla.kapila Says:

    बहुt त्द्न स्dे आपकी पोस्ट की प्रतीक्षा थी। आज फुर्सत मे पढी है इतनी विस्त्रित और महत्वपूर्ण जामकारी के लिये ध्न्यवाद ।

  9. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    अभी पूरा तो नहीं पढ पाए है ओर बीच में ही छोडकर किसी आवश्यक कार्य से जाना पड रहा है……
    वापिसी में आकर आराम से पढकर टिप्पणी करेंगें……

  10. dr arvind mishra Says:

    बहुत ज्ञानपूर्ण -रोचक !

  11. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर लिखा आप ने अभी पुरा नही पढ पाया, लेकिन जितना पढा बहुत अच्छा लगा, ऎसे लेख शांति से ओर आरम से पढने मै ज्यादा अच्छा लगता है, इस विस्तरित जानकारी के लिये आप का धन्यवाद

  12. musafir jat Says:

    सुब्रमनियम जी,
    कालिंजर के किले के बारे में बहुत कुछ पढ़ा हुआ है, समय मिलने पर जरूर देखने जाऊँगा.

  13. Shastri JC Philip Says:

    इस जानकारीपरक आलेख को अपने चिट्ठे पर छापने के लिये आभार.

    भाषा क्लिष्ट है एवं लगता है कि यह उन दो लेखकों की भाषा है जिनका नाम आप ने लेख के ऊपर दिया है. (आप की हिन्दी प्रवाहमय होती है).

    सस्नेह — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  14. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    बहुत ही उम्दा और ज्ञानवर्धक आलेख. ये बताएं कि चित्रकूट से कालिंजर जाने का कोई सीधा रास्ता है क्या?

  15. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत ज्ञानवर्धक और रोचक जानकारी से भरपूर लेख.

    रामराम.

  16. vidhu Says:

    आद, सुब्रमन्यम जी एक शुद्ध – शोध लेख इसमें बेहद परिश्रम किया गया है निसंदेह …निम्न पंक्तियों से आलेख का आशय बन पडा है लेख अपने को केन्द्रित करता है और विशेष ध्यानआकर्षण की दरकार रखता है ,शेष लवली जी के पहले कमेन्ट से में भी सहमत हूँ ………।मध्य भारत में परमार, कलचुरि और चन्देल कालीन सर्वतोभद्र शिल्प अधिकांषतः ज्ञात हैं। परवर्ती काल में लगभग 16 वीं-17वीं सदी ईसवी तक इनकी परंपरा दिखाई पड़ती है। सर्वतोभद्र का अभिप्राय चारों दिषाओं में दैवी सत्ता की व्यापकता और प्राणियों के लिए मंगल कामना निहित है। इसमें चारों ओर से देव प्रतिमाओं के सम्मुख दर्शन किये जा सकने के कारण परिक्रमा का पुण्यलाभ भी अप्रत्यक्षतः प्राप्त होता है ..

  17. Satish Saxena Says:

    समीर लाल से सहमत ! भाषा की सौम्यता नहीं नज़र आ रही भाई जी ! हम जैसे अज्ञानी कैसे समझें ??
    सादर

  18. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    सतीश भाई,
    हमतो केवल इतना कहेंगे “न बनाओ बतियाँ हटो काहे को झूटी”

    Гbrmþyn
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  19. महामंत्री तस्लीम Says:

    इस ऐतिहासिक महत्व की जानकारी के लिए आभार।
    ( Treasurer-S. T. )

  20. yoginder moudgil Says:

    एक बार फिर बेहतरीन प्रस्तुति…. वाह…..

  21. amar jyoti Says:

    रोचक विषय-वस्तु का गम्भीर विवेचन। भाषा भी कथ्य के अनुरूप ही है। यद्यपि कुछ सहज-सरल
    होती तो सोने में सुहागा होता।

  22. hari shanker rarhi Says:

    The article is really valuable for researchers,archaelogists and architects.In fact, the writer deserves high appreciation.
    hari shanker rarhi

  23. Asha Joglekar Says:

    पहले आई थी आपके ब्लॉग पर पर लंबा लेख देख कर सोचा समय ले कर पढना होगा । तो आज पढ पाई । सर्वतोभद्र शिल्प के बारे में आपके आलेख से ही जानकारी मिली । तरों दिशाओं में स्थापित .े देव मूर्तियाँ चहुँ और से हमारी रक्षा करे यही भावना निहीत होगी । आपने जो इन शिल्पों के बारे में चित्र सहित विस्तार से समझाया है इसके लिये आप को कितना धन्यवाद कहें वह कम ही है । आप शायद पुरातत्ववेत्ता होंगे इसी से इतना सुंदर और सविस्तार विश्लेषण करते हैं ।

  24. संजय बेंगाणी Says:

    एक शानदार लेख. कई स्थानों पर श को ष लिखा गया है. सम्भव है मेरी ही भूल हो.

  25. उमंग संदीप तोमर Says:

    good

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