Archive for मार्च, 2010

रायसेन का किला

मार्च 24, 2010

Tom Baker

एक बार आयरिश मूल के एक मित्र टॉम बेकर का भोपाल आना हुआ था. हमारे मित्रों ने उसे साँची घुमा लाने का प्रस्ताव रखा. सुबह नाश्ते के बाद लगभग 10 बजे अपनी कार से निकल पड़े थे. कार हम ही चला भी रहे थे.  उन दिनों साँची की सड़क यात्रा बड़ी दुखदायी हुआ करती थी. विदेशी मेहमान को पूरी तरह से साँची के स्तूपों, मंदिरों, विहारों का अवलोकन करवाया  गया. स्मारकों के बारे में विस्तार से बतलाने के लिए हम ने ही गाईड का रोल भी अदा किया.  शाम होनेपर भोपाल  वापसी के लिए हमने मार्ग बदल दिया और तय किया कि रायसेन होकर वापस चलेंगे क्योंकि सड़क अच्छी मिलेगी. रायसेन होकर जाने पर लगभग 35 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी होगी, जो हमें स्वीकार था. शाम 5.00 बजे हमलोग रायसेन के लिए निकल पड़े हालाकि साँची से रायसेन तक का मार्ग भी कोई अच्छा नहीं था. लेकिन रायसेन के आगे अच्छी सड़क मिलने की सुनिश्चितता थी.

लगभग 40 मिनटों में हमलोग एक पहाड़ का चक्कर लगाते हुए रायसेन पहुंचे. हम जब कभी भी रायसेन से गुजरते तो उस पहाड़ पर बना  भव्य   किला हमें मुह चिढाता दिखता. कई बार ऊपर जाने की सोची पर हर बार यही बताया गया कि रास्ता ठीक नहीं है. ऊपर बीहड़ है. लूट खसोट की घटनाएँ भी होती हैं और फिर वहां तो बस खँडहर ही रह गया है. हम मन मसोस कर रह जाते. उस दिन पहाड़ की तलहटी से गुजरते हुए हमारे विदेशी मित्र टॉम बेकर की नज़र किले पर पड़ी. उसके मन में भी किले के बारे में जानने की उत्सुकता जागी. हमने भी सोचा चलो आज तो ऊपर चढ़ा ही जाए. मुख्य मार्ग के दाहिनी ओर एक सकरी सी सड़क जाती है, पहाड़ की तलहटी तक. रास्ता बहुत  ही ज्यादा ऊबड़ खाबड़ था. एकदम धीमी गति में डोलते डालते गाडी अंतिम छोर तक पहुँच ही गयी. वहां  गाडी को पार्क कर पहाड़ पर बनी खस्ताहाल सीढ़ियों से हम सभी ऊपर चल पड़े.

हमलोगों ने पाया कि कई लोग  किले से नीचे उतर भी रहे थे. उनके हाथों में निर्माण सम्बंधित औजार भी थे. हम लोगों को लगा कि वे सब मिस्त्री होंगे. उनसे पूछ ताछ भी करी. उन्होंने बताया कि ऊपर काम चल रहा है. उन लोगोंने हम लोगों को आश्वश्त किया कि ऊपर कोई खतरा नहीं है.  हम लोगों का उत्साह बढ़ गया परन्तु हममे से एक मित्र (श्री देवदास) अपने भारीपन को दोष देते बीच में ही थक कर चट्टान पर बैठ गए. अतः अंत में हम तीन लोग ही रहे जिन्होंने किले में प्रवेश किया. मुख्य द्वार से घुसने पर ही हमें चारों तरफ जंगल सा दिखा. चारों तरफ बहुत सारे जीर्ण शीर्ण भवन भी थे,  और कुछ गुम्बद लिए हुए.  वहां बड़ी  चिल्लपों हो रही थी. चमगादड़ों का डेरा था. सभी भवन एक विशाल दालान की तरफ मुह किये हुए थे और बीच में थी  एक टूटी फूटी स्थिति में बड़ी सी बावड़ी. हमें जिसने आकृष्ट किया वह  था वहां बनी एक बारादरी. इसकी हालत वैसे तो ठीक ही थी. यहाँ से दूर दूर तक देखा जा सकता था . दूर हमें भोपाल जाने वाली सड़क साफ़ दिख रही थी और नीचे की बस्ती भी. बगल में एक मकबरा था जिसके दरवाजे बंद थे. हमें लगा था कि यदि इस किले को संरक्षित किया जावे और पहुँच मार्ग बना दिया जावे तो अत्यधिक मात्रा में पर्यटकों को  आकर्षित करेगा. संध्या हो चली थी और अँधेरा होने लगा था. अन्दर और अधिक कुछ देखने की स्थिति नहीं रही इसलिए वापस निकल पड़े थे. रास्ते में हमारे मित्र देवदास जी मिल गए और उन्होंने हम लोगों पर चढ़ाई कर दी यह कहते हुए कि हम लोग कहाँ थे. उनका कहना था कि वे भी ऊपर तक चढ़ आये परन्तु हममे से किसी को न पाकर और फिर अँधेरे को देखते हुए लौट आये थे. हमें उनकी बातों पर भरोसा नहीं था.

एक टूटी हुई गुम्बद के अन्दर से आकाश  का दृश्य

तोपों की कब्रगाह

किले की दीवार पर पाया गया शिलालेख

रायसेन नगर को एक हिन्दू शासक रायसिंह ने 1143 ईसवी में बसाया था और लगभग उसी कालावधि में वर्त्तमान किले का निर्माण हुआ. परन्तु ६ वीं सदी के एक दुर्ग के वहां स्थित होने के संकेत मिलते हैं. रायसेन में सन 1485 ईसवी के आस पास गयासुद्दीन घौरी के शासनकाल में मस्जिद, मदरसे और कई इमारतों के निर्माण किये गए थे. एक और राजपूत सरदार का उल्लेख मिलता है जो तोमर था. नाम था सिल्हादी (शिलादित्य). उत्तरी मालवा इस के कब्जे में रहा. सन 1531 में सिल्हादी ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह को मालवा पर विजय दिलाई. यह एक संयुक्त अभियान था जिसमे मेवाड़ के  राणा सांगा की सेना ने भी भाग लिया था. प्रतिफल स्वरुप सिल्हादी को उज्जैन और सारंगपुर के सूबे दिए जाने थे. मालवा विजय के पश्चात बहादुर शाह को लगा कि सिल्हादी और अधिक शक्तिशाली हो जावेगा और सुलतान के लिए भी खतरा बन सकता है. अतः उसने अपना इरादा बदल दिया और सिल्हादी को  रायसेन के किले को खाली कर सौपने और वापस बरोडा जाने को कहा. सिल्हादी इसके लिए कतई तैयार नहीं था और उसके इनकार किये जाने पर बहादुर शाह द्वारा कैद कर लिया गया. सन 1532 में बहादुर शाह ने सिल्हादी को लेकर रायसेन के किले की घेराबंदी कर दी.  उन दिनों किला सिल्हादी के भाई लक्ष्मण राय के कब्जे में था. महीनों की घेराबंदी से भी किले पर बहादुर शाह का अधिपत्य नहीं हो सका. सिल्हादी ने बहादुर शाह से स्वयं अकेले किले में प्रवेश कर अपने भाई को समझाने की  पेशकश की  और इस प्रस्ताव को मान लिया गया. सिल्हादी किले में प्रवेश कर गया. किले में दोनों भाई  गले मिले  और उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया. रसद की कमी थी और अधिक समय तक शत्रु को रोके रखना संभव नहीं दिख रहा था. सिल्हादी की पत्नी दुर्गावती ने भी जौहर की तैय्यारी कर ली. वह अपने पुत्र वधु (राणा सांगा की बेटी)  और उसके दो बच्चों समेत चिता में कूद पड़ी. ७०० अन्य महिलाओं ने भी उनका साथ दिया. सिल्हादी अपने भाई और किले में उपलब्ध सैनिकों के साथ शस्त्र धारण कर सुलतान की सेना से भिड  गया.  किले की तलहटी में ही दोनों वीर गति को प्राप्त हुए. संभवतः बहादुर शाह किले को पूरनमल के आधीन छोड़ गया था   क्योंकि सन 1543 में शेर शाह सूरी ने पूरनमल से इस किले को छीन लिया था. सन 1760 से यह किला भोपाल के नवाबों के आधीन रहा.

रायसेन किले के अन्दर जो  भवन हैं उनमे बादल महल, रोहिणी महल, इत्रदान महल और हवा महल प्रमुख हैं. ऊपर ही १२ वीं सदी के एक शिव मंदिर के होने की भी पुष्टि होती है जिसके पट वर्ष में एक बार शिव रात्रि के दिन खोले जाते हैं. लोहे के दरवाज़े (ग्रिल गेट) में मन्नत मांगते हुए रंगीन कपडे या धागे को बाँधने की परंपरा बन गयी है. कुछ लोग तो प्लास्टिक की पन्नियों को ही बाँध जाते हैं. उसी पहाड़ी से लगी हुई कई गुफाएं भी हैं जिनमें भीमबैठका की तर्ज पर शैल चित्र पाए जाते हैं. किला  वैसे तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में  ले लिया गया है परन्तु किले के उद्धार के प्रति पूर्ण उदासीनता बनी रही. सुना है कि किले तक पहुँच मार्ग निर्मित हो चुका है और अभी कुछ दिनों पूर्व अख़बारों से अवगत हुए कि राज्य शासन ने किले को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने हेतु पर्यटन निगम से प्रस्ताव आमंत्रित किये हैं.

नोट: श्री रवीश व्यास जी ने इन सुन्दर चित्रों को उपलब्ध कराकर प्रेरित किया

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कन्हेरी की गुफाएं

मार्च 17, 2010

वर्षों पूर्व सतवाहन राजवंश के पदचिन्हों के अध्ययन में हम कन्हेरी, नानेघाट और नासिक (पांडव लेणी) गुफाओं में उपलब्ध शिलालेखों से अवगत हुए थे. तब से ही निरंतर उत्सुक रहे क़ि कब अवसर मिले क़ि हम इन  अति प्राचीन पुण्य स्थलों  का भ्रमण कर सकें और कुछ पल उस युग के अहसास में खो जाएँ.

पिछले वर्ष मुंबई प्रवास में हमने अपना  मन बना लिया क़ि कोई साथ दे न दे हम तो कन्हेरी (कृष्णगिरी) हो आयेंगे. वैसे साथ देने के लिए हमारा पुत्र तो था ही. संयोगवश हमारे छोटे साले साहब भी झट तैयार हो गए. दादर रेलवे स्टेशन से हम लोगों ने बोरिवली के लिए  लोकल (पश्चिम रेलवे) से निकल पड़े. ३० या ४० मिनटों में ही हमलोग बोरिवली में थे. दिन के पौने बारह का समय हो चला था तो सोचा क्यों न पहले पेट पूजा हो जावे. नजदीक के एक भोजनालय में अच्छा खाना भी मिल गया. उसके बाद एक ऑटो वाले से संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान चलने को कहा. मिनटों में हम लोग राष्ट्रीय उद्यान के सामने थे. किराया मात्र १० रुपये. मुख्य द्वार से प्रवेश शुल्क देकर अन्दर हो लिए. प्रसन्नता हुई क़ि कन्हेरी जो वहां से लगभग ६ किलोमीटर अन्दर जंगल में है, की ओर जाने के लिए पर्यटन विभाग की बस खड़ी मिली. मालूम हुआ क़ि हम लोगों को प्रति व्यक्ति २० रुपये देने होंगे. बस के चालक ने बताया क़ि पर्याप्त मात्र में यात्री होने पर ही बस जायेगी. वहां उस समय चार पांच लोग ही थे. प्रतीक्षा करते रहे परन्तु बात नहीं बनी. कुछ देर में एक निजी वाहन आ खड़ा हुआ और उसके चालक ने हम लोगों को ले चलने की पेशकश की. वाहन में पहले से ही कुछ लोग थे. हम तीनों के लिए १०० रुपयों की  मांग की गयी और हम लोग गाडी में सवार हो गए. घन घोर और एकदम हरे भरे जंगल को भेदते हुए हमारी गाडी आगे बढती गयी. मुंबई वासियों के लिए प्रदूषण मुक्त श्वसन के लिए अनुकूल. दस मिनटों में ही हम लोग एक पहाड़ के तलहटी में थे जहाँ पुरातत्व विभाग का सूचना फलक और प्रवेश शुल्क वसूली की  व्यवस्था थी. हम लोगों को लाने वाली  गाडी  वहीँ पार्किंग में चली गयी यह बताते हुए क़ि हम लोगों को  दो घंटे में वापस आना होगा.  हम लोग खरामा खरामा चल पड़े उन सीढ़ियों पर जो चट्टान को तराश कर बनाये गए थे.

कन्हेरी के गुफाओं के समूह को भारत में विशालतम माना जाता है. एक ही पहाड़ को तराश कर लगभग १०९ गुफाओं  का निर्माण अन्यत्र नहीं है. यह बौद्ध धर्म के शिक्षा का एक बड़ा केंद्र रहा है चाहे वह हीनयान का हो या फिर महायान का. पश्चिम भारत में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म सोपारा में ही पल्लवित हुआ था जो कभी अपरान्तक (उत्तर कोंकण) की राजधानी रही. उसी समय से कन्हेरी को जो सोपारा के करीब ही है, धार्मिक शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित किया जाता रहा.  इस अध्ययन केंद्र का प्रयोग निरंतर ११ वीं सदी तक किया जाता रहा है. बौद्ध धर्म के उत्थान एवं पतन तक. कन्हेरी की गुफाओं के प्रारंभिक निर्माण  को ३ री सदी ईसापूर्व का माना जाता है. और अंतिम चरण के निर्माण को ९ वीं सदी का. प्राम्भिक चरण हीनयान सम्प्रदाय का रहा जो आडम्बर विहीन है. गुफाओं में प्रतिमाओं को भी नहीं उकेरा गया है. सीधे सादे कक्ष. दूसरी तरफ अलंकरण युक्त गुफाएं महायान सम्प्रदाय की मानी जाती हैं.

प्रथम चरण की सीढ़ियों को चढ़ लेने पर एक समतल भूमि मिली और सामने दृष्टिगोचर  हो रहा था, पहाड़ियों को काट कर बनायीं गयी गुफाएं. चट्टान जहाँ सबसे ऊंची थी वहां पहाड़ को तराश कर बनाया गया भवन हमें कुछ देखा सा लग रहा था. मस्तिष्क पर जोर डाला तो हमें अपने भ्रम का बोध हुआ.जोर्डन का पेट्रा जैसा लग रहा था. वहां भीड़ भी थी. सर्वप्रथम वहीँ चले गए. वाह्य अलंकरण तो लेश मात्र.  परन्तु अन्दर प्रवेश करने पर आँखें चौंधिया गयीं. बायीं तरफ बुद्ध  की वरद मुद्रा में खड़ी प्रतिमा, विशाल मंडप, एक विशालकाय हाल, दोनों तरफ अलंकरण  युक्त खम्बे, छत गोलाई लिए हुए   और हाल के अंत में पत्थर को ही तराश कर बनाया गया एक स्तूप. हमने जोर से कहा, यह तो हमारे लिए अविस्मरणीय  रहेगी. हमारे छोटे साले साहब, जो साथ ही थे, ने कहा  “आप लोनावला के पास कारला नहीं गए हो. वहां का चैत्य गृह इससे भी विशाल है और कारीगिरी उच्चकोटि  की है”. कुछ देर में ही हमें भी लगने लगा की भले ही परिश्रम अत्यधिक रहा हो परन्तु कलात्मकता का आभाव था. दोनों और बने खम्बों में एकरूपता नहीं थी. दाहिनी तरफ के अंतिम  ६ खम्बे तो यों ही चौकोर तराशे गए हैं. खैर तो यह था बौद्ध भिक्षुओं के लिए आराधना स्थल. इसे गुफा क्रमांक ३ कहा गया है और वहां के  सभी गुफाओं में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है. यह २६.३६ मीटर लम्बा, १३.६६ मीटर चौड़ा और १२.९ मीटर ऊंचा है. इसका निर्माण कार्य सतवाहन शासक यज्ञं   श्री सतकरनी के शासनकाल (१७२ – २०१ ईसवी) में प्रारंभ किया गया था. सतवाहन वंश का वह अंतिम प्रतापी राजा था.   यज्ञं  श्री सतकरनी के मरणोपरांत साम्राज्य निरंकुश हाथों में चला गया और वंश का पतन प्रारंभ हुआ. संभवतः अर्थाभाव के कारण कारीगर पलायन कर गए होंगे. अकुशल कर्मियों से शेष बचा कार्य एन केन प्रकारेण कराया गया होगा. यह बौद्ध विहार सतवाहनों के   धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक कहा जा सकता है क्योंकि वे वैदिक धर्म के अनुयायी थे.

कारला का चैत्य गृह – इससे तुलना की गयी थी.

चैत्य गृह   के पास ही  दो संरचनात्मक स्तूपों  का अस्तित्व रहा है.  एक पत्थर का बना था.  इसकी खुदाई जब की गयी तो अन्दर से, दो ताम्बे के भस्मयुक्त कलश मिले,  एक छोटे से सोनेकी डिबिया में  कपड़े का एक टुकड़ा, एक चांदी की डिबिया, माणिक्य ,  मोती, सोने के टुकड़े और  ३२४  ई.के दो ताम्र पत्र. दूसरा स्तूप जो ईंटों से बना था  उसके अन्दर से एक पत्थर का टुकड़ा मिला जिसपर ५-६  वीं शताब्दी में प्रयुक्त लिपि अंकित थी.

हम लोगों ने इस चैत्य गृह में अत्यधिक समय बिता दिया था इसलिए अब जल्दी करनी पड़ी और बगल में एक दूसरे  चैत्य गृह (क्रमांक १) की ओर बढ़ लिए.  मूलतः इसे दुमंजिला बनना था परन्तु अपूर्ण ही रहा. इसमें बने खम्बे भीमकाय हैं. बगल में ही अपेक्षाकृत एक छोटी गुफा थी (क्रमांक २). यहाँ एक स्तूप के अतिरिक्त दीवारों पर बुद्ध की एवं अवलोकितेश्वर की मूर्तियाँ उकेरी गयीं हैं. यहाँ की गुफाएं पहाड़ के अलग अलग धरातल पर हैं और चट्टान को तराश कर ही ऊपर जाने के घुमावदर सीढियां  हैं. हमें आभास होने लगा क़ि कदाचित उपलब्ध समय में सब कुछ देख पाना असंभव होगा. एक सुधी पर्यटक ने कहा क़ि गुफा क्रमांक १, २, और ३ के अतिरिक्त ११, ४१, ६७, ८९ और ९० में मूर्तिकला मिलती है. अतः हमलोग चल पड़े गुफा क्रमांक ११ की तरफ. इसे दरबार हाल कहा जाता है. अन्दर एक स्तूप के अतिरिक्त दोनों तरफ अगल बगल आवासीय कोठरियां बनी हैं. यहाँ बहुत से शिलालेख भी हैं. गुफा क्रमांक ४१ मत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ भी  अवलोकितेश्वर को चार हाथ और ११ सर से युक्त दर्शाया गया है. ऐसी प्रतिमा भारत में अन्यत्र नहीं है.  विदित हो क़ि  अवलोकितेश्वर जी ने सभी प्राणियों की मुक्ति के पूर्व अपने लिए  बुद्धत्व को अस्वीकार कर दिया था. गुफा क्रमांक ६७ में बौद्ध जातक से ली हुई कहानी को दीवारों पर मूर्त रूप दिया गया था. इन सब स्वतंत्र कोठरियों के सामने खम्बे और बरामदे भी हैं. हर कोठरी में बौद्ध भिक्षुओं के शयन के लिए चबूतरे भी बने हुए हैं. इन सभी कोठरियों के सामने  छोटी नाली द्वारा

बौद्ध भिक्षुओं की जगह अब बंदरों ने ले ली है!

ऊपर से जल प्रवाहित होकर पहुँच रहा था. इसके अतिरिक्त ऊपर चढ़ते हुए हमने देखा था क़ि वर्षा का पानी चट्टानों से कल कल करता  नीचे की ओर प्रवाहित हो रहा था. इस पानी को जल कुंडों में संगृहीत किये जाने की व्यवस्था थी.

हमारे लिए निर्धारित समय सीमा  निकट हो चली थी और कुछ हद तक थकान के कारण भी गुफा क्रमांक ६७ से ही लौट पड़े थे. वैसे कान्हेरी में शाम ५ बजे तक रहा जा सकता है. हमें बाद में पता चला था क़ि सबसे ऊपर समतल पठार है जहाँ मृत बौद्ध भिक्षुओं का दाह  संस्कार किया जाता था. वहां कई छोटे बड़े कच्चे पक्के ईंटों से निर्मित स्तूप भी बने हुए हैं. जब हमलोग अपनी गाडी के पार्किंग स्थल में पहुंचे तो पाया क़ि चालक हल्ला कर ही रहा था. पुनः बोरीवली पहुँच कर लोकल ट्रेन द्वारा संध्या होते होते घर वापस पहुँच गए.

नोट: वाटरमार्क युक्त चित्रों को छोड़ बाकी सभी विकीमीडिया से लिए गए हैं.