रायसेन का किला

Tom Baker

एक बार आयरिश मूल के एक मित्र टॉम बेकर का भोपाल आना हुआ था. हमारे मित्रों ने उसे साँची घुमा लाने का प्रस्ताव रखा. सुबह नाश्ते के बाद लगभग 10 बजे अपनी कार से निकल पड़े थे. कार हम ही चला भी रहे थे.  उन दिनों साँची की सड़क यात्रा बड़ी दुखदायी हुआ करती थी. विदेशी मेहमान को पूरी तरह से साँची के स्तूपों, मंदिरों, विहारों का अवलोकन करवाया  गया. स्मारकों के बारे में विस्तार से बतलाने के लिए हम ने ही गाईड का रोल भी अदा किया.  शाम होनेपर भोपाल  वापसी के लिए हमने मार्ग बदल दिया और तय किया कि रायसेन होकर वापस चलेंगे क्योंकि सड़क अच्छी मिलेगी. रायसेन होकर जाने पर लगभग 35 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी होगी, जो हमें स्वीकार था. शाम 5.00 बजे हमलोग रायसेन के लिए निकल पड़े हालाकि साँची से रायसेन तक का मार्ग भी कोई अच्छा नहीं था. लेकिन रायसेन के आगे अच्छी सड़क मिलने की सुनिश्चितता थी.

लगभग 40 मिनटों में हमलोग एक पहाड़ का चक्कर लगाते हुए रायसेन पहुंचे. हम जब कभी भी रायसेन से गुजरते तो उस पहाड़ पर बना  भव्य   किला हमें मुह चिढाता दिखता. कई बार ऊपर जाने की सोची पर हर बार यही बताया गया कि रास्ता ठीक नहीं है. ऊपर बीहड़ है. लूट खसोट की घटनाएँ भी होती हैं और फिर वहां तो बस खँडहर ही रह गया है. हम मन मसोस कर रह जाते. उस दिन पहाड़ की तलहटी से गुजरते हुए हमारे विदेशी मित्र टॉम बेकर की नज़र किले पर पड़ी. उसके मन में भी किले के बारे में जानने की उत्सुकता जागी. हमने भी सोचा चलो आज तो ऊपर चढ़ा ही जाए. मुख्य मार्ग के दाहिनी ओर एक सकरी सी सड़क जाती है, पहाड़ की तलहटी तक. रास्ता बहुत  ही ज्यादा ऊबड़ खाबड़ था. एकदम धीमी गति में डोलते डालते गाडी अंतिम छोर तक पहुँच ही गयी. वहां  गाडी को पार्क कर पहाड़ पर बनी खस्ताहाल सीढ़ियों से हम सभी ऊपर चल पड़े.

हमलोगों ने पाया कि कई लोग  किले से नीचे उतर भी रहे थे. उनके हाथों में निर्माण सम्बंधित औजार भी थे. हम लोगों को लगा कि वे सब मिस्त्री होंगे. उनसे पूछ ताछ भी करी. उन्होंने बताया कि ऊपर काम चल रहा है. उन लोगोंने हम लोगों को आश्वश्त किया कि ऊपर कोई खतरा नहीं है.  हम लोगों का उत्साह बढ़ गया परन्तु हममे से एक मित्र (श्री देवदास) अपने भारीपन को दोष देते बीच में ही थक कर चट्टान पर बैठ गए. अतः अंत में हम तीन लोग ही रहे जिन्होंने किले में प्रवेश किया. मुख्य द्वार से घुसने पर ही हमें चारों तरफ जंगल सा दिखा. चारों तरफ बहुत सारे जीर्ण शीर्ण भवन भी थे,  और कुछ गुम्बद लिए हुए.  वहां बड़ी  चिल्लपों हो रही थी. चमगादड़ों का डेरा था. सभी भवन एक विशाल दालान की तरफ मुह किये हुए थे और बीच में थी  एक टूटी फूटी स्थिति में बड़ी सी बावड़ी. हमें जिसने आकृष्ट किया वह  था वहां बनी एक बारादरी. इसकी हालत वैसे तो ठीक ही थी. यहाँ से दूर दूर तक देखा जा सकता था . दूर हमें भोपाल जाने वाली सड़क साफ़ दिख रही थी और नीचे की बस्ती भी. बगल में एक मकबरा था जिसके दरवाजे बंद थे. हमें लगा था कि यदि इस किले को संरक्षित किया जावे और पहुँच मार्ग बना दिया जावे तो अत्यधिक मात्रा में पर्यटकों को  आकर्षित करेगा. संध्या हो चली थी और अँधेरा होने लगा था. अन्दर और अधिक कुछ देखने की स्थिति नहीं रही इसलिए वापस निकल पड़े थे. रास्ते में हमारे मित्र देवदास जी मिल गए और उन्होंने हम लोगों पर चढ़ाई कर दी यह कहते हुए कि हम लोग कहाँ थे. उनका कहना था कि वे भी ऊपर तक चढ़ आये परन्तु हममे से किसी को न पाकर और फिर अँधेरे को देखते हुए लौट आये थे. हमें उनकी बातों पर भरोसा नहीं था.

एक टूटी हुई गुम्बद के अन्दर से आकाश  का दृश्य

तोपों की कब्रगाह

किले की दीवार पर पाया गया शिलालेख

रायसेन नगर को एक हिन्दू शासक रायसिंह ने 1143 ईसवी में बसाया था और लगभग उसी कालावधि में वर्त्तमान किले का निर्माण हुआ. परन्तु ६ वीं सदी के एक दुर्ग के वहां स्थित होने के संकेत मिलते हैं. रायसेन में सन 1485 ईसवी के आस पास गयासुद्दीन घौरी के शासनकाल में मस्जिद, मदरसे और कई इमारतों के निर्माण किये गए थे. एक और राजपूत सरदार का उल्लेख मिलता है जो तोमर था. नाम था सिल्हादी (शिलादित्य). उत्तरी मालवा इस के कब्जे में रहा. सन 1531 में सिल्हादी ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह को मालवा पर विजय दिलाई. यह एक संयुक्त अभियान था जिसमे मेवाड़ के  राणा सांगा की सेना ने भी भाग लिया था. प्रतिफल स्वरुप सिल्हादी को उज्जैन और सारंगपुर के सूबे दिए जाने थे. मालवा विजय के पश्चात बहादुर शाह को लगा कि सिल्हादी और अधिक शक्तिशाली हो जावेगा और सुलतान के लिए भी खतरा बन सकता है. अतः उसने अपना इरादा बदल दिया और सिल्हादी को  रायसेन के किले को खाली कर सौपने और वापस बरोडा जाने को कहा. सिल्हादी इसके लिए कतई तैयार नहीं था और उसके इनकार किये जाने पर बहादुर शाह द्वारा कैद कर लिया गया. सन 1532 में बहादुर शाह ने सिल्हादी को लेकर रायसेन के किले की घेराबंदी कर दी.  उन दिनों किला सिल्हादी के भाई लक्ष्मण राय के कब्जे में था. महीनों की घेराबंदी से भी किले पर बहादुर शाह का अधिपत्य नहीं हो सका. सिल्हादी ने बहादुर शाह से स्वयं अकेले किले में प्रवेश कर अपने भाई को समझाने की  पेशकश की  और इस प्रस्ताव को मान लिया गया. सिल्हादी किले में प्रवेश कर गया. किले में दोनों भाई  गले मिले  और उपलब्ध विकल्पों पर विचार किया. रसद की कमी थी और अधिक समय तक शत्रु को रोके रखना संभव नहीं दिख रहा था. सिल्हादी की पत्नी दुर्गावती ने भी जौहर की तैय्यारी कर ली. वह अपने पुत्र वधु (राणा सांगा की बेटी)  और उसके दो बच्चों समेत चिता में कूद पड़ी. ७०० अन्य महिलाओं ने भी उनका साथ दिया. सिल्हादी अपने भाई और किले में उपलब्ध सैनिकों के साथ शस्त्र धारण कर सुलतान की सेना से भिड  गया.  किले की तलहटी में ही दोनों वीर गति को प्राप्त हुए. संभवतः बहादुर शाह किले को पूरनमल के आधीन छोड़ गया था   क्योंकि सन 1543 में शेर शाह सूरी ने पूरनमल से इस किले को छीन लिया था. सन 1760 से यह किला भोपाल के नवाबों के आधीन रहा.

रायसेन किले के अन्दर जो  भवन हैं उनमे बादल महल, रोहिणी महल, इत्रदान महल और हवा महल प्रमुख हैं. ऊपर ही १२ वीं सदी के एक शिव मंदिर के होने की भी पुष्टि होती है जिसके पट वर्ष में एक बार शिव रात्रि के दिन खोले जाते हैं. लोहे के दरवाज़े (ग्रिल गेट) में मन्नत मांगते हुए रंगीन कपडे या धागे को बाँधने की परंपरा बन गयी है. कुछ लोग तो प्लास्टिक की पन्नियों को ही बाँध जाते हैं. उसी पहाड़ी से लगी हुई कई गुफाएं भी हैं जिनमें भीमबैठका की तर्ज पर शैल चित्र पाए जाते हैं. किला  वैसे तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में  ले लिया गया है परन्तु किले के उद्धार के प्रति पूर्ण उदासीनता बनी रही. सुना है कि किले तक पहुँच मार्ग निर्मित हो चुका है और अभी कुछ दिनों पूर्व अख़बारों से अवगत हुए कि राज्य शासन ने किले को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने हेतु पर्यटन निगम से प्रस्ताव आमंत्रित किये हैं.

नोट: श्री रवीश व्यास जी ने इन सुन्दर चित्रों को उपलब्ध कराकर प्रेरित किया

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31 Responses to “रायसेन का किला”

  1. समीर लाल Says:

    बहुत आभार इस विवरण और चित्रों के लिए.

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

  2. satish saxena Says:

    हमारी यह धरोहरें देश में जगह जगह बिखरी पडी हैं, काश आप जैसी जागरूकता वाले पुरातत्व प्रेमी और हों तो ऐसे वीरान पड़े कितने ही खजाने लोगों की निगाह में आ पाएंगे ! !
    शुभकामनायें !

  3. भारतीय नागरिक Says:

    आपकी वापसी सुखद है. रायसेन के किले के बारे में सचित्र जानकारी देने के लिये आभार.

  4. Manish Kumar Says:

    इतिहास के बारे में आपकी पुख्ता जानकारी आपकी हर पोस्ट की विशेषता होती है। चित्र भी खूब आए हैं. पर आकाश का इतना गहरा नीलापन अक्सर काफी ऊँचाई पर देखने को मिलता है जहाँ प्रदूषण मुक्त वातावरण रहता है। व्यास जी खुशकिस्मत रहे होंगे की ऐसी छटा उन्होंने मध्यप्रदेश में देखी।

  5. renu Says:

    hum bhi kai baar us raah se gujar gaye , lekin kile ke paas tak jane ka sahas nahi juta paye .
    aaj behad khushi hui jab raysen ke kile ke bare main jankari mili .
    aisa laga mano hum bhi sath -sath ghoom rahe hain .
    bahut khoob .

  6. Dr.Manoj Mishra Says:

    बहुत ही उम्दा जानकारी,आपका धन्यवाद.

  7. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर जानकारीदी आप ने, काश की हमारी सरकार अगर इस ओर ज्यादा ध्याण देतो हम पुराने किलो को समभाल कर रख सकते है, जो अब इस देश की धरोहर है, सुंदर चित्र से सजी इस सुंदर जानकारी के लिये आप का धन्यवाद

  8. RAJ SINH Says:

    हमेशा की तरह लाजबाब . आपको बहुत मिस किया .भाभीजी अब स्वस्थ हैं जान कर बड़ी खुशी हुयी .

    इश्वर आपका सुख संतोष बनाये रखें .

  9. Vineeta Yashswi Says:

    Apki her post jankari se bhari hui hoti hai…umid hai ab ye silsila uhi chalta rahega…

  10. Alpana Verma Says:

    किले की जरजर स्थिति के बारे में पढ़ते हुए जब आखिर की पंक्तियाँ पढ़ीं तो तसल्ली हुई कि अब इस किले को संरक्षण में ले लिए गया है.देर सवेर हालत बेहतर होजाएगी.
    रायसन के किले के बारे में विस्तार से जानकारी मिली.बहुत ही अच्छे से जानकारी प्रस्तुत की है.
    [वज़न नियंत्रित होने का फायदा कि किले तक चढ़ाई कर पाए!यह भी एक सन्देश भी मिलता है इस पोस्ट से :)]

  11. पूजा उपाध्याय Says:

    भारत में ऐसे कई अद्भुत किले हैं जो सिर्फ उपेक्षा के शिकार होने के कारण लोगों की नज़रों से छुपे हुए हैं. आपकी नज़रों से ऐसे कई भवन हमारे सामने आ रहे हैं. जाने का तो पता नहीं कभी जा पायेंगे कि नहीं, पर तस्वीरों के माध्यम से देखना बहुत अच्छा लगा.

    मुझे ऐसी जगहें बहुत आकर्षित करती हैं जहाँ लोगों की कम आवाजाही हो…लगता है कि अतीत अनछुआ रहा है अब तक.

    आपको बहुत धन्यवाद इस पोस्ट के लिए.

  12. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    मनीष जी, हमसे भी रहा नहीं गया और रवीश व्यास जी से पूछ ही लिया. पूरी ईमानदारी से उन्होंने गहरे नीले आकाश को फोटोशॉप का कमाल बताया.

  13. Ratan Singh Shekhawat Says:

    बढ़िया एतिहासिक जानकारी दी आपने ! ये किले हमारी एतिहासिक विरासत है इसके हर एक पत्थर में गहरी वेदनाएं छिपी है कोई महसूस करने वाला होना चाहिए |

    जौहर के बाद शस्त्र धारण कर शत्रु भिड़ने को शाका कहते है | पहले स्त्रियाँ आग में कूदकर जौहर करती थी और जौहर के बाद पुरुष केशरिया वस्त्र व शस्त्र धारण कर शाका करते थे | शाका एक तरह से शत्रु पर आत्मघाती हमला होता था |

  14. Lovely goswami Says:

    सुन्दर तस्वीरें …अच्छी पोस्ट …मुझे भी जनशून्य इलाका पसंद है ..

  15. amar jyoti Says:

    उपेक्षित पड़ी इस ऐतिहासिक धरोहर को प्रकाश में लाने के लिये आभार।

  16. anil pusadkar Says:

    चलिये आपके जरिये रायसेन का किला घूम लिया और जैसे आपने रायसेन का किला देखा ठीक वैसे ही हम लोगों ने भी भीमबैठका के दर्शन किये थे।राजधानी तब भोपाल थी और अक्सर भोपाल जाना हुआ करता था।रेल से भी और सड़क मार्ग से भी।रास्ते मे भीमबैठका आकर्षित करता था लेकिन अगली बार अगली बार कह कर टाल ही दिया जाता था।राज्य के बंटवारे के बाद जब उधर से निकला तो फ़िर अगली बार कह कर आगे निकल गये मगर ऐसा लगा पता नही अगली बार कब आने मिले सो कुछ किमी आगे जाने के बाद वापस लौटे और भीमबैठका के भीत्तीहित्र देखे।सच मे अद्भुत है भीमबैठका।यंहा छत्तीसगढ मे भी भीत्तीचित्र बहुत से स्थानों पर मिले हैं और उनका भी पुरातात्विक महत्व है।अच्छा लगा आपके ब्लाग पर आकर हमेशा की तरह्।

  17. RAJ SINH Says:

    आलेख तो पहले ही पढ़ लिया था टिप्पणी अब कर रहा हूँ .
    इतिहास सहित यह जानकारी अद्भुत जिग्यांसा और उसके लिए की गयी आपकी मेहनत से हम सब हमेशा ही लाभान्वित होते रहे हैं.
    पुनः पुनः धन्यवाद .

  18. shobhana Says:

    bhut hi suruchpoorn varnan .
    abhar

  19. ताऊ रामपुरिया Says:

    इस पोस्ट से बहुत ही विस्तृत जानकारी मिली. सागर जाते हुये पचासों बार रायसेन होकर गुजरा हूं. जान्कारी के अभाव मे कभी इस तरफ़ ध्यान ही नही गया. चित्र वाकई बहुत ही सुंदर है. बहुत आभार.

    रामराम.

  20. Vinay Kumar Vaidya Says:

    आपके इस लेख को पढते हुए याद आया कि कितनी बार उस किले
    को देखने की इच्छा मन में उठी लेकिन पूरी न हो सकी थी ।
    आज पूरी हो सकी । धन्यवाद ।

  21. Dilip kawathekar Says:

    आलेख पढकर मज़ा आ गया. भोपाल में ही पढा़ हूं , कई बार सांची गया हूं, रायसेन भी, मगर यह किला हमेशा दूर से ही देख पाया.

    आज आपनें हसरत पूरी कर दी, और पुरानी यादें ताज़ा हो गयी.

  22. shyam kori uday Says:

    …बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति!!!

  23. arvind mishra Says:

    जबर्दस्त चित्र और वरणन ! शुक्रिया !

  24. sanjay bengani Says:

    बहुत दिनों बाद आपके चिट्ठे पर पहुँचना हुआ है. अब तस्सली से पढ़ कर टिप्पणी देंगे.

  25. Asha Joglekar Says:

    बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आई और आना सफल हुआ । रायसेन के किले की जानकारी पाकर बहुत खुशी हुई । आप हमेशा ही नित नये पर पुरातन ऐतिहासिक स्मारकों की जानकारी देते रहते हैं आपका शुक्रिया । सरकार का पुरातत्व विभाग भी इन धरोहरों को संजोकर रखने में कोई रुची नही दिखाता ये खेद जनक है ।

  26. Brijmohanshrivastava Says:

    संस्मरण और चित्र काफी अच्छे लगे | साँची के स्तूप तो देखे है बहुत अरसा पहले परन्तु रायसेन रोड से कभी भोपाल जाना नहीं हो पाया _संस्मरण लिखने की आपकी विधा भी निराली है ।टू इन वन देखते भी जाओ पढ़ते भी जाओ |किले की दीवार पर लिखा शिला लेख पढने की कोशिश की नहीं पढ़ पाया

  27. Ajaypal Singh dhakar Says:

    this is a fantastic movement of indian old art

  28. ssporte Says:

    Namaskar

  29. umasharan shrivastava Says:

    very good very excllence

  30. titu tomar Says:

    Bahut saal pahle ki baat hai.main 6 class me tha 1988 me……..Raisen me.Daily ye sochta tha ki jaane kab hamare gharwale ise dikhane le jayenge.per aapne aaj 22 saal baad iske darshan kara diye aapka bahut-2 dhanyabad……..or sabse jyada iske liye ki yahan TOMAR rajaon ka bhi shashan raha tha…because I am also belongs a TOMAR FAMILY.THANKS !

  31. prashant malviya Says:

    परम आदरणीय ,

    परम आदरणीय सर्वप्रथम आपको मेरा नमस्कार । परम आदरणीय माननीय आपसे मेरा आपसे विनर्म निवेदन की रायसेन दुर्ग ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्मारक हैंपरन्तु इसके संरक्षण सुधार में कई तरह से लापरवाही वर्ती जा रही हैं भारत पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीनस्थ यह धरोहर जिसका इतिहास पन्नों पर उल्लेख हैं रायसेन का भव्य दुर्ग कई कारणों के चलते आज अपनी पहचान से दूर हैं हमारे ग्रुप के माध्यम से कई बार इसके प्रचार प्रसार हेतु अनेकों प्रयत्न किये जा रहे हैं हम सभी हैं की हमारी इस धरोहर को विश्व पटल पर पहचान मिल सके यह ऐतिहासिक दुर्ग हैं अगर इसे पर्यटन क्षेत्र में बढ़ावा मिलता हैं तो हम सभी सदैव आपके ऋणी रहेंगे ग्रुप के माध्यम से हम अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं आपके आशा करते हैं और निवेदन करते हैं की आप एक बार इस विषय में अवश्य विचार करें प्रकृति के बीच ऐतिहासिक धरोहर एवं एक मनमोहक सुन्दर वातावरण मिलता हैं वैसे तो मेरी उम्र कम हैं परन्तु हमारे राष्ट्र में अपनी बात सम्पूर्ण स्वतंर्ता से किसी के भी सम्मुख रखने का अधिकार हैं आप हमारे लिए परम आदरणीय हैं अगर आप इस विषय में कुछ विचार करते हैं तो मैं एवं यहाँ की जनता सदैव आपकी ऋणी रहेगी । माननीय मैं आपका हृदय से सम्मान करता हूँ एवं आशा करता हूँ की आप हमारे इस कार्य को देखते हुए इस ऐतिहासिक दुर्ग को विश्व पटल पर पहचान दिलाने ही की जनता को रोजगार दिलाने क्यूंकि पर्यटन क्षेत्र में विकसित होने से यहाँ रोजगार के अवसरों में वृद्धि भी होगी युवाओं को रोजगार और रायसेन को पहचान दोनों ही मिलेगी । किला परिसर बहुत बड़ा हैं यहाँ पर ३ मंदिर एक गुफा मंदिर दूसरा सुमैया मंदिर और तीसरा सबसे बड़ा मंदिर पमेया मंदिर जिसे सोमेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता हैं वर्ष में एक बार महाशिवरात्रि के दिन यहाँ बहुत ही विशाल मेला लगता हैं और दुर्भाग्य यह की वर्ष भर भगवान भोलेनाथ मंदिर में बंद रहते हैं पट नहीं खुलते और सौभाग्य यह में एक दिन महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर मंदिर के कपाट खुलने से हजारों संख्या में श्रद्धालु यहाँ आकर भगवन शिव का महाभिषेक करते हैं किला परिसर में एक दरगाह भी हैं एवं अनेकों ताल प्राचीनकाल में जल संग्रहण का एक नायब तरीका दर्शित करते हैं । रानी महल , धोबी महल , डोला-डोली ताल, मदागन ताल , रानी ताल, कचहरी , बादल महल , बारादरी, प्राचीन काल की तोपें आदि हैं यहाँ पर माननीय यूँ तो अगर मैं इस अजय दुर्ग की व्याख्या करने बैठा तो शायद शब्दों की कमी पड जाएगी मुझे क्यूंकि उम्र काम होने से (१९ वर्ष) अनुभव काम होने से शायद इसका वर्णन ना कर सकु परन्तु यह ऐतिहासिक किला हकीकत में इतना ही सुन्दर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं प्रकृति की अपार दें प्राकृतिक मनमोहक सौंदर्य स्वच्छ और सुन्दर परिवेश बहुत कुछ हैं यहाँ पर । परिवार के साथ अवकाशों के दिनों में घूमने के लिए बहुत ही सुन्दर जगह हैं परन्तु दुर्भाग्यवश इसका प्रसार प्रचार न होने के कारन यहाँ कम लोग आ पाते हैं मेरा यही निवेदन हैं की आप किसी भी तरह मेरी मदद करने की कोशिश करें ताकि अधिक से अधिक लोगों को इस ऐतिहासिक दुर्ग के बारे में पता चले और वह सपरिवार आकर यहाँ के इतिहास को भी जाने साथ ही साथ अपने परिवार के साथ एक सुन्दर और स्वच्छ वातावरण एवं यहाँ के मनमोहक दृश्यों का आनंद ले सकें । बहुत ही बड़ा परिसर हैं किले का भारत वर्ष में बहुत काम ऐसे किले हैं और आज राजस्थान का सबसे अधिक आय का स्त्रोत पर्यटन क्षेत्र से ही हैं और काफी अधिक पहचान मिली हैं उसे पर्यटन क्षेत्र में मैं यही चाहता हूँ की ज्यादा से ज्यादा लोग आकर हमारी धरोहरों को देखें एवं यहाँ के इतिहास को जाने हमारी संस्कृति को जाने । माननीय महोदय आपका सहयोग मिले इसी कामना के साथ अपने शब्दों को विराम देता हूँ अगर शब्दों में कहीं कोई त्रुटि हुयी हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ ।आप सहयोग करें इसी आशा के साथ मैं सदा आपका आभारी रहूँगा ।

    ” धन्यवाद ”

    प्रशांत मालवीय
    अपना रायसेन परिवार
    सम्पर्क 8516975736

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