अर्थ-ऑवर

आलेख: राहुल सिंह,
उप संचालक, पुरातत्व, रायपुर.

27 मार्च को अर्थ-ऑवर की सुगबुगाहट इस साल सन्‌ 2010 में रायपुर में भी हुई। रात साढ़े आठ से साढ़े नौ बजे तक निर्धारित इस अवधि में विद्युत मंडल के अनुसार बिजली की खपत लगभग दस फीसदी कम हुई। अगले दिन सुबह टहलते हुए, धूप निकलते तक स्ट्रीट लाइट जलती देखा। कोई चालीस साल पहले पढ़ा, विज्ञान का पाठ ‘फोटो सेल’ याद आया, जिसमें पढ़ाया जाता था कि किस तरह से यह रोशनी के असर से काम करता है और स्ट्रीट लाइट के जलाने-बुझाने को नियंत्रित कर सकता है। मैं सोचता था गुरूजी बता रहे हैं, किताब में लिखा है, सच ही होगा, ताजा-ताजा अविष्कार है, विदेशों में इस्तेमाल हो रहा होगा, हमारे यहां भी आ जाएगा, विज्ञान का यह वरदान।

28 मार्च 2010 के किसी अखबार में यह खबर भी थी कि अर्थ-ऑवर पर भारी पड़ा 20-20 क्रिकेट, यानि मैच और खेल प्रेमी दर्शकों पर इसका कोई असर नहीं हुआ तब याद आया दस साल पहले का एकदिवसीय क्रिकेट का डे-नाइट मैच, जिसमें बताया जा रहा था कि फोटो सेल नियंत्रित फ्लड लाइट ढलते दिन की कम होती रोशनी में इस तरह से एक-एक कर जलती हैं कि खिलाड़ियों पर संधि बेला का फर्क नहीं होता और उजाला दिन-रात में एक सा बना रहता है।

अब सब बातें मिलाकर सोचता हूं कि फोटो सेल का पाठ यदि मैंने चालीस साल पहले पढ़ा, तो यह उससे पहले का अविष्कार तो है ही, फिर उसका प्रयोग हमारे देश में भी होने लगा है यह डे-नाइट क्रिकेट मैच में देख चुका हूं, तो फिर यह इस शहर की सड़कों तक, स्ट्रीट लाइट के जलने-बुझने के नियंत्रण के लिए क्यों नहीं पहुंचा? चालीस साल पहले तो फोटो सेल का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है, नादान मन ने अपने को समझा लिया था, लेकिन ‘चिप’ के दौर में, आज इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है।

अर्थ-ऑवर पर बिजली की बचत के लिए दो और बातें। पहली तो पुरानी यादों में से ही है, जब सुबह आठ बजे दुकानें खुल जाया करती थीं और शाम सात बजे से दुकान बढ़ाई जाने लगती थी, रात आठ बजते-बजते बाजार सूना हो जाता था। आज का बाजार सुबह ग्यारह बजे अंगड़ाई ले रहा होता है और शाम सात बजे के बाद शबाब पर आता है। रविवार को बाजार का खुलना-बंद होना चर्चा का विषय बन जाता है, लेकिन 27 मार्च के एक घंटे बत्ती गुल कर, क्या इस तरह की बातें सोची-याद की जा सकती हैं और एक दिन, एक घंटे में सोची गई इन बातों को पूरे साल के लिए विस्तार क्यों नहीं दिया जा सकता?

हम मन चंगा रखने के लिए कठौती में गंगा ले आते हैं। हर मामले के लिए हमने अलग-अलग आकार-प्रकार के कठौते बना लिए हैं। वैलेन्टाइन का, महिला, बच्चों, बूढ़ों का, हिन्दी का, भाषा का एक-एक दिन, कभी सप्‍ताह और पखवाड़ा, हर तरह के कठौते। हलषष्ठी पर तालाब तो अनंत चतुर्दशी पर पूरा समुद्र अपने आंगनों में रच लेते हैं। लेकिन चिंता और अवसाद-ग्रस्त मन के रचे कठौते, कूप-मण्डूक बना सकते हैं और आंख मूंद लेने की शुतुरमुर्गी सुरक्षा महसूस करा सकते हैं। ध्यान रखना होगा कि कठौते से कभी-कभार ही और सिर्फ तभी काम चलता है, जब मन चंगा हो।

17 Responses to “अर्थ-ऑवर”

  1. ali syed Says:

    @ राहुल सिंह
    हम अच्छा करने के संकेत देने के समानांतर उससे भी बुरा कर रहे होते हैं …संभवतः यही मानव स्वभाव है ?

  2. arvind mishra Says:

    Impressive musings!

  3. Dr.Manoj Mishra Says:

    हम मन चंगा रखने के लिए कठौती में गंगा ले आते हैं। हर मामले के लिए हमने अलग-अलग आकार-प्रकार के कठौते बना लिए हैं। वैलेन्टाइन का, महिला, बच्चों, बूढ़ों का, हिन्दी का, भाषा का एक-एक दिन, कभी सप्‍ताह और पखवाड़ा, हर तरह के कठौते। हलषष्ठी पर तालाब तो अनंत चतुर्दशी पर पूरा समुद्र अपने आंगनों में रच लेते हैं। लेकिन चिंता और अवसाद-ग्रस्त मन के रचे कठौते, कूप-मण्डूक बना सकते हैं और आंख मूंद लेने की शुतुरमुर्गी सुरक्षा महसूस करा सकते हैं। ध्यान रखना होगा कि कठौते से कभी-कभार ही और सिर्फ तभी काम चलता है, जब मन चंगा हो।..
    सही है.

  4. भारतीय नागरिक Says:

    भारत में तो सब ढ़कोसला ही है…. दिखावे से परिपूर्ण…

  5. Alpana Says:

    यह पोस्ट ज्ञान के साथ साथ चितन का विषय भी दे गयी.
    उर्जा बचाने के एक दिन एक उपाय कर रहे हैं परन्तु बाकी दिनो में उसके विपरीत आचरण भी.
    पहले की व्यवस्था से अपरोक्ष रूप से ही सही उर्जा बचती ही थी.

    ——‘ध्यान रखना होगा कि कठौते से कभी-कभार ही और सिर्फ तभी काम चलता है, जब मन चंगा हो’–
    बहुत पते की बात कही है.

  6. ताऊ राम्पुरिया Says:

    बहुत ही सार्ग्रभिय आलेख, शुभकामनाएं.

    रामराम

  7. ताऊ राम्पुरिया Says:

    भूल सुधार

    सार्ग्रभिय = सारगर्भित

    पढा जाये.

    रामराम

  8. dhiru singh Says:

    हमारे यहा तो बिजली वालो की मेहरबानी से रोज़ १२-१४ घन्टे का अर्थ आवर होता है

  9. अमर कुमार Says:

    काश कि ग्लैमर का यह तामझाम लाने से पहले, इसका मानव नेत्र-पटल पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव और मस्तिष्क के ऑक्सीपिटल एरिया पर पड़ने वाले बोझ का आकलन भी कर लिया जाता । मैं कतई उत्साहित नहीं हूँ । फिर भी हिन्दी ब्लॉगिंग में एक जानकारीपरक आलेख प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद !

  10. अमर कुमार Says:

    क्षमा करें :
    मेरी उपरोक्त टिप्पणी किसी अन्य पोस्ट के सँदर्भ में है… अब आते हैं प्रस्तुत पोस्ट पर,

    यदि इस तरह की भयावहता पर प्रदर्शित किये जाने वाली चिन्तायें ग्लैमर से जोड़ दी जायेंगी, और प्रायोजकों का दबदबा रहेगा, तो भला तो क्या होना है जी । काश कि हममें अपने सरोकारों को बाज़ारवाद से अलग कर के देखने की समझ आ जाय !

  11. प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर Says:

    अर्थ आवर जैसे कांसेप्ट्स पर मुझे उतना यकीन नहीं ?
    हम जैसे छोटे शहरों के निवासी तो वैसे भी १२-१४ घंटे अर्थ आवर में ही रहते हैं |
    वैसे भी प्रतीकात्मक महत्व की भी एक सीमा है |

    आलेख के अंतिम हिस्से से पूर्णतः सहमत !

  12. Vinay Kumar Vaidya Says:

    A different approach to the problem. It is true that we lack the will to change the face of the ‘EARTH’. An ‘Earth-Hour’ can draw our attention to the urgent need of doing something worth-while, but we make it just another show, and then forget the purpose.

    Thanks.

  13. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    हिन्दुस्तान जैसे देश में जहाँ अभी भी दिन भर में 12-12 घंटे बिजली नहीं मिल पाती हो तो वहाँ इस प्रकार के बिजली बचाओ के प्रपन्च भला क्या मायने रखते हैं……ये सब निरी चोचलेबाजी है।

  14. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    हाँ आपकी पोस्ट के अन्तिम पैराग्राफ से पूर्णत: सहमति है……

  15. -लावण्या Says:

    बढ़िया लेखन के लिए आपको बधाई सुब्रमणियन जी – धरती हम सब की माँ हैं
    अर्थ आवर पर वीडीयो बढ़िया लगा पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के भरसक उपाय
    करना जरूरी है
    – लावण्या

  16. renu Says:

    hum sab log milkar chahe prithvi ko bachne ki baat karen ya aatankvad ki,sabhi log dhkosala hi karte hain.
    koi bhi gambheerata se koi kary nahi karta.
    aap sahi kahte hain ki surya ki urja ka aasheerwad lena bhi hum log ganvara nahi karte .
    bahut achchha likha hai.

  17. Asha Joglekar Says:

    हर दिन अर्थ अवर मनाना चाहिये । जिस कमरे में आप हों केवल वहीं की बत्ती जलाइये । ऊर्जा अपने आप बचेगी ।

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