आदि शंकराचार्य जी की जन्मस्थली – कालडि

अवसर था मेरे एक भतीजे का उपनयन संस्कार. हम छै भाईयों  में  नीचे से दूसरे पायदान पर एक भाई कोच्ची के जहाजरानी निगम में कार्यरत है. उसे मालूम था कि हम गर्मियों में यात्रा नहीं करते परन्तु हमसे भी रहा नहीं गया. प्यार से बुलाया है तो जाना ही पड़ेगा भले हम अपनी सहधर्मिणी को न ले पायें क्योंकि उनकी तो टांग टूटी थी. बा मुश्किल वाकर के सहारे चल पा  रहीं हैं . चूंकि इतल्ला पहले से ही कर दिया गया था, हम ने हिम्मत कर अपने लिए वातानुकूलित शयनयान में टिकट करा ली थी. हमारे लिए एक आकर्षण भी था. उपनयन संस्कार शंकराचार्य जी की जन्म स्थली “कालडि” में और उनके ही संस्थान में आयोजित किया गया था.

हम सभी भाई बहन एवं और उन सब का  परिवार पलियाकरा में एकत्रित हुआ था. उसी दिन शाम हम लोगों को कालडि के लिए निकलना भी था. उपनयन तो ५ तारीख को होना था परन्तु एक दिन पूर्व अर्थात ४ तारीख के लिए एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित था. इसे हमलोग नांदी श्राद्ध कहते हैं. पूर्वजों के आशीष के लिए यह आयोजन है. इसलिए हम सब एक बस और सुमो में लद कर शाम होते होते कालडि पहुँच गए. यहीं रास्ते में ही हमें एक आठ मंजिला  गोलाकार भवन दिख गया जिसे कीर्ति स्तम्भ कहते है. इसे कांची कामकोटी मठ, कांचीपुरम द्वारा निर्मित किया गया था. ऊपर जाने के लिए गोलाई लिए सीढियां बनी है और शंकराचार्य के जीवन से सम्बंधित चित्रों से दीवार को सजाया गया है. हम तो गर्मी से त्रस्त थे. ४२ डिग्री, फिर पसीने की बौछार. वहां के लोगों का कहना था कि ऐसा इसके पहले  कभी नहीं हुआ है. आश्रम परिसर में ही आदि शंकरा न्यास के अतिथि गृह  में जगह बुक कराई गयी थी और हमारे प्रिय भाई ने  एक वातानुकूलित कमरे की चाभी हमें पकड़ा दी.

हमने अपना और दूसरों का भी सामान आदि कमरे में रखवा कर एक भतीजे और भांजी को साथ ले पास ही बहने वाली पेरियार (पूर्णा) नदी की तरफ चले गये. कालडि में (पहले यह शालका  ग्रामम के नाम से जाना जाता था) शिवगुरु एवं आर्याम्बा का ब्राह्मण परिवार रहता था. वर्षों वे निस्संतान रहे. थ्रिस्सूर नगर के बीच बने वडकुनाथन (शिव) मंदिर में आराधना उपरांत उन्हें सन ७८८ ईस्वी में एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम शंकर रखा गया. शंकर के बालकाल में ही पिता स्वर्गवासी हो गये. कालडि का सीधा सा मतलब है “कदमों के तले”. इसके लिए एक रोचक किस्सा भी है.   बालक शंकर की माता आर्याम्बा प्रति दिवस प्रातः पेरियार  नदी में नहाने जाया करती जो उन दिनों उनके घर से  लगभग ३ किलोमीटर की दूरी पर थी. एक दिन अपने बालक को साथ ले जब नदी की ओर जा ही रही थी कि वह मूर्छित हो गिर पड़ी. बालक शंकर से यह सहा  नहीं गया. उसने पूरी श्रद्धा से अपने कुलदेव श्री कृष्ण से सहायता मांगी. श्री कृष्ण बालक शंकर की भक्ति से द्रवित हो, आश्वस्त किया कि चिंता मत करो, यह नदी तुम्हारे “कदमों के तले” बहेगी. वही हुआ भी. नदी ने अपना रास्ता बदल लिया और शंकर के घर से लग कर बहने लगी. नदी के बीच एक द्वीप दिखाई देता  है. संभवतः यह नदी के दो भागों में बंट कर बहने से बना  होगा.

पेरियार (पूर्णा) नदी

नदी जाने वाले मार्ग पर ही वह प्राचीन श्री कृष्ण मंदिर भी पड़ता है. बाहर से ही देखते हुए हम लोग आगे बढ़ गए. फिर उसी के पास एक वेद पाठशाला थी, गुरुकुल जैसी, जहाँ बालक एवं युवा अध्ययन में रत थे. अब तो नदी दिख भी रही थी और एक सूचना फलक भी जो बता रहा था कि यह मगरमच्छ घाट है. कहते हैं कि १६ वर्ष की आयु में ही शंकर वेदांती बन चुका था. उसने अपनी माता से संन्यास ग्रहण करने की अनुमति मांगी थी. माता अपने पुत्र के आग्रह को टाल गयी, अनुमति कैसे दे देती. परन्तु एक दिन नहाते समय शंकर को एक मगरमच्छ ने दबोच लिया. माता किनारे ही थी. शंकर ने चिल्लाकर कहा “माते मुझे संन्यास की अनुमति दे दे तो यह मगरमच्छ मुझे छोड़ देगा”. माता ने कोई दूसरा विकल्प न देख हामी भर दी. मगरमच्छ भी शंकर को छोड़ एक तरफ निकल गया.

शंकराचार्य जी का पारिवारिक श्री कृष्ण मंदिर

वेद पाठशाला (गुरुकुल)

सूचना पटल

घाट

विदित हो कि इसी नदी के किनारे शंकराचार्य जी का घर था. परन्तु वास्तविक स्थल अज्ञात रहा. शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित प्रथम पीठ श्रृंगेरी (कर्णाटक) में है. २० वीं सदी के प्रारंभ में श्रृंगेरी पीठ के  तत्कालीन शंकराचार्य ने कालडि में पेरियार नदी के उत्तरी भाग में खोज बीन की और उन्हें एक पाषाण स्तम्भ मिला. इसके आधार पर यह निश्चित हुआ कि शंकराचार्य जी की माता का अंतिम संस्कार उसी जगह किया गया था. उनका घर भी वहीँ था क्योंकि उन दिनों मृतकों का दाह संस्कार घर के दक्षिण भाग में ही कर दिया जाता था.  घरों के चारों तरफ का भूभाग भी काफी फैला हुआ होता था. यदा कदा आजकल भी यह परंपरा दिखाई पड़ जाती है.

मंदिर का बाँयां भाग

मंदिर का मुख्य द्वार


द्वार के बगल भित्ति चित्र

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित कर्णाटक के श्रृंगेरी पीठ ने ही शंकराचार्य जी के मूल निवास की जगह एक भव्य एवं सुन्दर मंदिर समूह तथा आश्रम का निर्माण कराया है. मंदिर के मुख्य द्वार के अगल बगल भित्ति चित्र बने हैं जो शंकराचार्य जी के जीवन से जुडी घटनाओं पर आधारित है. मुख्य द्वार के छत   के अंदरूनी भाग में उस समय भी चित्रांकन का  कोई कार्य चल रहा था. अन्दर प्रवेश करने पर एक बरामदा है. सीधे आगे खुला प्रांगण  जिसमे एक सुन्दर बगिया है.

बगिये के बीच एक बड़ा हौज जिसमें दो तीन रंगों के मन मोहक कमल खिले हुए थे.बरामदे से होकर बायीं तरफ जाएँ तो वहां माँ शारदा का मंदिर है जिसके सामने एक बड़ा सा हाल. यहाँ संगीत आदि के कार्यक्रम होते रहते हैं. हाल के अंत से एक और बरामदा जो मंदिर के दायें बने दूसरे हाल को जोड़ता है. बायीं तरफ ही बरामदे से लगी शंकराचार्य जी की माता अर्याम्बा की समाधी है जिसके सामने प्राचीन पाषाण स्तम्भ है.

माता अर्याम्बा की स्मृति में – प्राचीन स्तम्भ अपने मूल स्थान में

दाहिने हाल में प्रवेश के पूर्व एक कोने में गणेश जी का एक छोटा मंदिर है और मंदिर के सामने हवन कुण्ड बना है. दाहिने हाल से जुड़ा हुआ एक और मंदिर है जिसमें शंकराचार्य जी विराजमान हैं. पूरा परिसर एकदम साफ़ सुथरा. यहाँ प्रवेश के लिए धर्म या जाति आधारित किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है. आश्रम परिसर के ही वेद पाठशाला में अध्ययन रत सन्यासियों द्वारा वहां के मंदिरों में प्रातः एवं संध्या आरती के समय सामूहिक वेद पाठ किये जाने की परंपरा भी है और उस समय वहां उपस्थित रहना एक विशेष अनुभव रहेगा.

हमने पाया कि दिन ढलते ही कई बसें पर्यटकों को लेकर आती है और उनमें कर्णाटक तथा महाराष्ट्र के लोग अधिक होते हैं. वहीँ खाना बनवाते है जिसके लिए सामग्री और कारीगर साथ आये होते हैं. रात को कमरे मिल गए तो ठीक नहीं तो बाहर बने होमिओपेथिक क्लिनिक के अन्दर और बरामदों में विश्राम करते हैं. रात की आरती में भाग लेते हैं और प्रातःकाल नदी में नहा धो कर पुनः दर्शन आदि कर लौट पड़ते हैं. वहां पर खाने पीने की समुचित व्यवस्था नहीं है. मात्र एक दूकान है जहाँ चाय/कोफी, ठंडा पानी, बोतल बंद पेय  तथा स्नेक्स उपलब्ध रहता है. दूकान सुबह १० बजे के बाद ही खुलती है और रात ८ बजे बंद भी हो जाती है. शहर लगभग २ किलोमीटर दूर है. परन्तु वहां के शांत वातावरण में एक दिन रुकना आनंद दायक रहता है. कुछ वृद्ध दम्पति तो यहाँ स्थाई रूप से निवास कर रहे हैं. उनके लिए आवासीय परिसर अलग से है. वे अपनी सेवाएं मंदिर संचालन के लिए देते हैं.

रामकृष्ण  मिशन द्वारा संचालित अद्वैत आश्रम भी कालडी में कार्यरत है.  उसका भवन बांगला शैली में बना है. आदि शंकर न्यास के द्वारा कई महाविद्यालय (अभियांत्रिकी सहित) एवं स्कूलों का संचालन किया जाता है. कालडी में ही श्री शंकरा संस्कृत विश्वविद्यालय भी है जहाँ संस्कृत के अतिरिक्त रंगमंच, नृत्य, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, विभिन्न भारतीय भाषाओँ आदि के अध्ययन और शोध की सुविधा उपलब्ध है.

एर्नाकुलम (कोच्ची) से कालडी की दूरी मात्र २८ किलोमीटर है.  कोच्ची के हवाई अड्डे से तो यह केवल ६ किलोमीटर पर है. एर्नाकुलम जाने वाले मुख्य रेल मार्ग पर अन्गामाली नामका  स्टेशन पड़ता है. यहाँ से कालडी मात्र १० किलोमीटर पर है. बस अथवा टेक्सी की कोई कमी नहीं है.


यहाँ चटका लगाकर कालडी का विहंगम दृश्य गूगल के सौजन्य से देख सकते हैं.

58 Responses to “आदि शंकराचार्य जी की जन्मस्थली – कालडि”

  1. arvind mishra Says:

    आपने तो घर बैठे ही कालडी के दर्शन करा दिए विधिवत और सचित्र ….

  2. नीरज जाट जी Says:

    कालडी- शंकराचार्य की जन्मस्थली
    अगली बार शंकराचार्य की कर्म स्थली की भी जानकारी चाहिये, खासकर रामेश्वरम की।
    राम्व्श्वरम को उन्होने ही तो एक धाम बनाया था।

  3. पा.ना. सुब्रमणियन Says:

    @नीरज
    शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चार पीठ हैं. श्रृंगेरी, द्वारका, बद्रीनाथ और पुरी. उनका रामेश्वरम से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं था. रामेश्वरम भारत के १२ ज्योतिर्लिंगों में एक है. लंका पर चढ़ाई करने के पूर्व, रेत से ही शिव लिंग बना कर श्री रामचंद्र जी ने वहां पूजा की थी.

  4. RAJ SINH Says:

    हमेशा की तरह प्रतीक्षा परक पोस्ट .और विकिमेपिया जोड़ कर आपने जानना आसन बना दिया है .

    धन्यवाद !

  5. समीर लाल Says:

    बेहतरीन विस्तार से जानकारी और उम्दा चित्र. आनन्द आ गया. आपका बहुत बहुत आभार!!!

  6. Anurag Says:

    very nice

  7. Alpana Verma Says:

    सबसे पहले आप के भतीजे के उपनयन संस्कार पर बहुत बहुत बधाई और बहुत सी शुभकामनाएँ.
    ——-
    कुछ दिन पूर्व कोच्चि के एक प्राचीन चर्च के विषय में लिखते समय इस स्थान के बारे में मालूम हुआ.एक जगह यह भी लिखा था की इस स्थान के बारे में
    बहुत कम लोग जानते हैं और इस का प्रयाप्त प्रचार नहीं है इस कारण पर्यटक इस स्थान को देखे बिना कोच्चि से लौट जाते हैं.[?].
    आप ने भी लिखा है कि अधिकतर दर्शनार्थी महाराष्ट्र और कर्नाटक से आते हैं.

    आज इस विषय में इतनी विस्तृत जानकारी आप की इस पोस्ट से मिली.और साथ ही सुंदर चित्र.भित्ति चित्र वाले चित्र में दरवाज़े की बनावट बहुत ही खूबसूरत है.
    कमल के फूल के चित्र बड़े ही मोहक हैं. चित्रों से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह स्थान कितना शांत और मनोरम होगा.

  8. Alpana Verma Says:

    इस बहुत अच्छी और ज्ञान वर्धक पोस्ट के लिए आप का आभार.

  9. satish saxena Says:

    ऐसा लगा कि साक्षात् तपोवन में ही पहुंचा दिया आपने ! ऐसी पवित्र और शांत जगह के दर्शन करवाने के लिए आभार आपका !

  10. anil pusadkar Says:

    आनंद आ गया कालडी की सैर में।

  11. vidhu Says:

    ये सैर हमारे लिए महत्वपूर्ण रही वहां जाना चाहते थे लेकिन घर बैठ कर ही आनंद आगया…चित्र तो आपके हमेशा से ही सुन्दर मनमोहक और जिवंत रहे हेँ आपको बधाई

  12. Gyandutt Pandey Says:

    आदिशंकर मेरे लिये महत प्रेरणा के स्रोत हैं। और उनपर लिखे इस सुन्दर ट्रेवेलॉग की तो जितनी प्रशंसा करूं, कम है।
    सुब्रह्मण्यम जी, आपकी ब्लॉगिंग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है!
    धन्यवाद।

  13. Gagan Sharma Says:

    आपके सौजन्य से देश के दूर-दराज क्षेत्रों का भी दर्शन तथा भ्रमण हो जाता है।
    मंदिर की सफाई व्यवस्था देख उत्तर के मंदिरों की याद आ जाती है, काश वहां भी हम ऐसा स्वच्छ परिवेश बना सकें।

  14. vinay vaidya Says:

    प्रिय महोदय,
    आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली से संबन्धित जानकारी
    पढ़कर और चित्र देखकर हृदय प्रसन्न हो उठा ।
    बहुत बहुत धन्यवाद ।
    सादर,
    -विनय.

  15. राज भाटिया Says:

    बहुत सुंदर जानकारी, ओर चित्र भी खुब सुरत, आप ने विस्तार से एक एक बात सही रुप मै बताई है, धन्यवाद

  16. अमर Says:

    रोचक

  17. Dr.Manoj Mishra Says:

    बहुत ही सुन्दर जानकारी,इन तथ्यों के बारे में विस्तृत मुझे अभी नहीं पता था.

  18. अनुनाद सिंह Says:

    आपका लेपढ़ते ही कालड़ी या कालडी पर हिन्दी विकिपिडिया में एक लेख जोड़ने का मन कर गया। किन्तु आप कहीं कालड़ी लिख रहे हैं, कहीं कालडी। कौन सा सही उच्चारण है? मलयालम में तो ‘ड़’ वर्ण नही है सो कालडी सही लग रहा है।

  19. L.Goswami Says:

    ज्ञान वर्धक पोस्ट.

  20. ali syed Says:

    पूर्व टिप्पणी :

    फिलहाल तो इस बात से खुश हूँ कि आपने मेरे घर में खिले कमल पुष्पों की फोटो हूबहू छाप दी है 🙂

    टिप्पणी :

    आदरणीय सुब्रमनियन जी
    प्रणाम !
    तय हुआ कि अभिरुचियों में कोई धर्म भेद नहीं होता ! शंकराचार्य जी के बारे में पहले भी पढ़ा था पर आपका आलेख पहला और अदभुत लगा ! सुन्दर छाया चित्र ! सुन्दर वृत्तान्त !

  21. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत ही अदभुत ज्ञानवर्धक और सुंदर चित्रों वाली नयनाभिराम पोस्ट, बहुत धन्यवाद आपको इस कालडी दर्शन के लिये.

    रामराम.

  22. हिमांशु Says:

    सदा ही इस चिट्ठे के आलेख ज्ञानवर्द्धक और तुष्टिदायक होते हैं !
    शंकराचार्य सदैव ही सम्मोहित करते हैं ! फिलहाल उनकी सौन्दर्य लहरी को पी रहा हूँ !
    शंकर के जन्मस्थान पर केन्द्रित इस यात्रा-संस्मरण पर मुग्ध हूँ !
    सर्वांगीण अभिव्यक्त होता है आपके आलेखों में !
    चित्र तो आलेख को सजाते चलते ही हैं, आत्मीयता इन आलेखों को और भी रोचक और ग्राह्य बनाती है !
    बहुत आभार !

  23. - लावण्या Says:

    सुब्रमणियन जी ,
    आज ही आपका यह रोचक और ग्याम्वर्धक आलेख देख पायी हूँ —
    आराम से पूरा पढूंगी – और मार्क भी कर लिया है
    आप इसी तरह लिखते रहें …देर से आने के लिए क्षमा !

  24. seema gupta Says:

    शंकराचार्य जी की जन्म स्थली “कालडि” के बारे में इतनी जानकारी पहली बार मिली. एक से एक मनमोहक चित्र और शब्दों का चित्रण बेहद ही रोचक लगा. कमल के पुष्पों ने विशेष कर मन मोह लिया. आभार इतनी सुन्दर जानकारी के लिए.
    regards

  25. shobhana Says:

    आदरणीय भाईजी
    बहुत ही सुन्दर विस्तृत जानकारी के लिए आभार |आपका यात्रा व्रतान्त ,इतिहास परक जानकारी अपने आप में परिपूर्ण होती है ऐसा लगता है हम भी आपके साथ होते है |रामकृष्ण मिशन द्वारा संचालित अद्वैत आश्रम मायावती (उतरांचल ) कि यात्रा करके मै भी अभी अभी लौटी हूँ |
    बहुत सुन्दर जगह है कोशिश करूंगी कुछ वर्णन कर पाऊ |
    शन्कराचार्य जी कि जन्म स्थली के साक्षात् दर्शन कराने का बहुत बहुत धन्यवाद |

  26. Ratan Singh Shekhawat Says:

    badhiya jankari , photo bahut badhiya lage .

  27. Amit Says:

    Bahut hi rochak jaankaari…aapne kaafi acche se vivran diya hai.. ab to man kar raha hai wahan jaane ka…dekhiye kab jaa paata hun…

  28. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    बहुत सुन्दर. इस रोचक जानकारी के लिए साधुवाद.

  29. संजय बेंगाणी Says:

    भित्तिचित्र कमाल का है.

    जगह जगह रोमन में लिखा समझ से बाहर है.

    जानकारी में अभिवृद्धी हुई.

  30. singh Says:

    आदरणीय
    कलादी पर आपकी पोस्ट निश्चित ही अविस्मरनीय है…….यूँ तो मैंने देश का काफी हिस्सा देखा है मगर इत्तिफाक कलाडी नहीं देखा था….आपकी पोस्ट के सहारे शंकराचार्य जी के जन्म स्थल के भी दर्शन भी कर लिए…..संस्कार पर आये सभी मेहमानों के साथ अपने एन्जॉय कर लिया……वाह वाह !फोटो तो बहुत ही प्यारे हैं संग्रहणीय भी……! आची पोस्ट लिखने क्ले लिए आभार !

  31. renu Says:

    namaskar !!
    shankrachary ji ki janmsthli ke bare main jankar bahut hi achchha laga .
    photo dekhkar to tabiyat khush ho gai
    aise laga mano main shakshat vahan ghoom rahi hoon
    bahut shukriya.

  32. ghughutibasuti Says:

    बहुत सुन्दर चित्रों के साथ सुन्दर वर्णन।
    घुघूती बासूती

  33. yoginder moudgil Says:

    Wah dada waah
    is chitrawali ko dekh prassan hoon
    wah

  34. brijmohanShrivastava Says:

    सर जी _बहुत मेहनत की आपने ।बहिन जी आपके साथ नही जा पाई बहुत दिन कम्पलीट बैड रेस्ट के बाद वाकर से चल पारही है ।कीर्ति स्तम्भ की
    की तस्बीर देखी ।वहां तो ४२ डिग्री था गुना मे कुछ दिन पहले पारा ४६ तक पहुंच गया था ।नदी के बीच के द्वीप की तस्बीर नही दिखाई थी कुछ इन्टर्नेट की प्रोब्लम होगी वहा क्रोस का निशान बना था ।मगरमच्छ घाट के वाबत विवरण भी पढा ।बेद पाठ्शाला का चित्र भी नही दिख सका ।हां कई जगह यह परम्परा है कि दाह संस्कार स्वम के खेत मे ही किया जाता है ।मन्दिर के वायें भाग का मनोरम चित्र देखा ।भित्ति चित्र नही दिख सका ।सुन्दर बगिया देखी ।रंग बिरंगे कमल व मां शारदा का मन्दिर देखा ।रामक्रष्ण मिशन।नीरज जी को आपका दिया हुआ जवाब भी पढा ।रामेश्वर १२ ज्योतिर्लिंगों मे से एक है वह आदि शंकराचार्य की कर्मस्थली नही है ।ऐसे जानकारी उपलब्ध कराने हेतु मै आपका आभारी हूं

  35. anupam agrawal Says:

    आपकी मेहनत देखकर दंग हूँ। रोचक और सजीव जानकारी के लिये बधाई।

  36. नितिन Says:

    ज्ञानवर्धक पोस्ट!

  37. pritima vats Says:

    आपका हर पोस्ट इतना ज्ञान वर्धक और शोधपूर्ण होता है कि एक मुकम्मल जानकारी देता है। यह हमारा दुर्माग्य है कि हम हर पोस्ट पढ नहीं पाते हैं।
    धन्यवाद

  38. Vineeta Yashswi Says:

    Behtreen jankari aur shanddar pictures wali post…

  39. dhiru singh Says:

    एक आप ही तो है जिनके द्वारा हम भारत दर्शन करते है

  40. Rahul Singh Says:

    विवरण के बीच में सि‍लसिलेवार चित्र लगाकर आपने इसे पठनीय और दर्शनीय भी बना दिया है। हमारी रुचियां वृहत्‍तर संदर्भों के साथ किस तरह व्‍यापक और रोचक हो जाती हैं, इसका इतना सुंदर उदाहरण देखने-पढने को कम मिलता है। आपकी यह यात्रा जारी रहे।

  41. नरेश सिंह राठौड Says:

    बहुत सुन्दर जानकारी है | चित्र भी बहुत सुन्दर लिए गए है |आप अपनी पोस्ट पर बहुत मेहनत करते है |

  42. mamta Says:

    शुक्रिया कालडी की पूरी यात्रा चित्रों सहित करवाने के लिए।

  43. nirmla.kapila Says:

    aapakaa ye safar bhee bahut achhaa lagaa dhanyavaad aur shubhakaamanaayen. jaldee me itanaa hee likh rahee hoon>

  44. प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI Says:

    देर से आने की मुआफी |

    आपका प्रस्तुतीकरण हमेशा से ही आकर्शित करता रहा है |
    आपकी अपने पोस्ट्स के साथ की गयी मेहनत दिखती है |
    अच्छी खासी जानकारियाँ मिली ,|
    ………हो सके तो अनुनाद जी के सुझावों पर भी ध्यान दें |

  45. mahendra mishra Says:

    आपने तो कालडी के विधिवत और सचित्र दर्शन करा दिए . कुछ दिनों से अत्यंत आवश्यक कार्य होने से और पारिवरिक व्यस्तता के चलते मै समयानुसार आपके ब्लॉग को नहीं पढ़ सका जिसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ .
    महेंद्र मिश्र जबलपुर.

  46. radhe shyam pandey Says:

    wonderful & beautiful.To see photograph of ADI GURU SHANKARACHARYA & matter given above.This place & vedant philosophy should be spread allover the world for peace & unity. PRANAM TO ALL CONCERNED.

  47. radhe shyam pandey Says:

    wonderful & beautiful..This place & vedant philosophy should be spread allover the world for peace & unity. PRANAM TO ALL CONCERNED.

  48. radhe shyam pandey Says:

    This place & vedant philosophy should be spread allover the world for peace & unity. PRANAM TO ALL CONCERNED.

  49. radhe shyam pandey Says:

    This place & vedant philosophy should be spread allover the world for peace & unity.

  50. radhe shyam pandey Says:

    approach to the birth place of ADI SHANKAR BHAGWAN not shown in deatil.

  51. krishna Says:

    i wanted to know about aadiguru shankaracharya. today i could get to know His birth place and other important details.

  52. rajendra kumar sahu Says:

    Shrimad Adi Jagadguru Shankaracharya ji ke bare me di gai jankari se bahut prasnnta hui. jinhone snata dharm ki pataka vishav me phahrai tatha inhone ne charo dishaon me char math bnaye

  53. Dwaraka chahar Says:

    आदि जगतगुरु शंकराचार्य भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के पुनर्स्थापक थे उन्होंने अपने शास्त्रार्थ के बल पर ही सभी हिन्दु संत व साधु सम्प्रदायों में व्याप्त भेद विभेद को समाप्त कर अद्वेतवाद के सिद्धांत को प्रतिपादित कर हिन्दु संस्कृति को सनातन(अमर-अजर) बना दिया| उन्होंने चार धाम मठो की स्थापना की| बारह ज्योतिर्लिंग व इक्यावन शक्तिपीठों की पहचान कराई और भारतवर्ष को एक अनूठी धर्म-संस्कृति की एकता में पिरो कर विश्व के धर्म मानचित्र पर विलक्षण पहचान प्रदान की है वे साधारण मानव से महामानव बने वे महादेव शिव-शंकर के ही अंश थे| आपने इस आलेख में उनके जन्म-स्थान की जानकारी प्रदान करके मुझे कृतज्ञ कर दिया है|

  54. संस्कृतानंतanant kulkarni Says:

    अहो आश्चर्यम्‌ ! वर्णन -शैली प्रशंसनीया ! अदि शंकराचार्यकी जय !
    बहवः धन्यवादाः !
    अनन्त कुलकर्णी,पुणे .

  55. s k Albela Says:

    koti-koti dhanyabad

  56. स्वामी मृगेन्द्र सरस्वती Says:

    ईश्वरीय कार्य !

  57. आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली एक और भी है « मल्हार Malhar Says:

    […] की मान्य धारणा के अनुसार उनका जन्म कालड़ी में ही हुआ […]

  58. Ravi Shankar Tripathi Says:

    He was not only First Shankarachaya he was the true Shankar.
    My heartiest wishes for whom, who created this site to know about AADI ShankaraCHAYA for the common man.

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